Vinaya Patrika
173
अध्याय 173 / 279

पद १७३

6 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ6 श्लोक

अध्याय 173

श्लोक 1

नाहिन आवत आन भरोसो ।यहि कलिकाल सकल साधनतरु है स्रम-फलनि फरो सो

nāhina āvata āna bharoso | yahi kalikāla sakala sādhanataru hai srama-phalani pharo so

अध्याय 173

श्लोक 2

तप, तीरथ, उपबास, दान, मख जेहि जो रुचै करो सो ।पायेहि पै जानिबो करम-फल भरि-भरि बेद परोसो

tapa, tīratha, upabāsa, dāna, makha jehi jo rucai karo so | pāyehi pai jānibo karama-phala bhari-bhari beda paroso

अध्याय 173

श्लोक 3

आगम-बिधि जप-जाग करत नर सरत न काज खरो सो ।सुख सपनेहु न जोग-सिधि-साधन, रोग बियोग धरो सो

āgama-bidhi japa-jāga karata nara sarata na kāja kharo so | sukha sapanehu na joga-sidhi-sādhana, roga biyoga dharo so

अध्याय 173

श्लोक 4

काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह मिलि ग्यान बिराग हरो सो ।बिगरत मन संन्यास लेत जल नावत आम घरो सो

kāma, krodha, mada, lobha, moha mili gyāna birāga haro so | bigarata mana saṃnyāsa leta jala nāvata āma gharo so

अध्याय 173

श्लोक 5

बहु मत मुनि बहु पंथ पुरानन जहाँ-तहाँ झगरो सो ।गुरु कह्यो राम-भजन नीको मोहिं लगत राज-डगरो सो

bahu mata muni bahu paṃtha purānana jahā~-tahā~ jhagaro so | guru kahyo rāma-bhajana nīko mohiṃ lagata rāja-ḍagaro so

अध्याय 173

श्लोक 6

तुलसी बिनु परतीति प्रीति फिरि-फिरि पचि मरै मरो सो ।रामनाम-बोहित भव-सागर चाहै तरन तरो सो

tulasī binu paratīti prīti phiri-phiri paci marai maro so | rāmanāma-bohita bhava-sāgara cāhai tarana taro so

स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.