अध्याय 172
श्लोक 1
कबहूँक हौं यहि रहनि रहौंगो ।श्रीरघुनाथ-कृपालु-कृपातें संत-सुभाव गहौंगो
kabahū~ka hauṃ yahi rahani rahauṃgo | śrīraghunātha-kṛpālu-kṛpāteṃ saṃta-subhāva gahauṃgo
अध्याय 172
कबहूँक हौं यहि रहनि रहौंगो ।श्रीरघुनाथ-कृपालु-कृपातें संत-सुभाव गहौंगो
kabahū~ka hauṃ yahi rahani rahauṃgo | śrīraghunātha-kṛpālu-kṛpāteṃ saṃta-subhāva gahauṃgo
अध्याय 172
जथालाभसंतोष सदा, काहू सों कछु न चहौंगो ।पर-हित-निरत निरंतर, मन क्रम बचन नेम निबहौंगो
jathālābhasaṃtoṣa sadā, kāhū soṃ kachu na cahauṃgo | para-hita-nirata niraṃtara, mana krama bacana nema nibahauṃgo
अध्याय 172
परुष बचन अति दुसह श्रवन सुनि तेहि पावक न दहौंगो ।बिगत मान, सम सीतल मन, पर-गुन नहिं दोष कहौंगो
paruṣa bacana ati dusaha śravana suni tehi pāvaka na dahauṃgo | bigata māna, sama sītala mana, para-guna nahiṃ doṣa kahauṃgo
अध्याय 172
परिहरि देह-जनित चिंता, दुख-सुख समबुद्धि सहौंगो ।तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि, अबिचल हरि-भगति लहौंगो
parihari deha-janita ciṃtā, dukha-sukha samabuddhi sahauṃgo | tulasidāsa prabhu yahi patha rahi, abicala hari-bhagati lahauṃgo
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भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
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अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
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समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.