अध्याय 171
श्लोक 1
कीजै मोको जमजातनामई ।राम! तुम-से सुचि सुहृद साहिबहिं, मैं सठ पीठि दई
kījai moko jamajātanāmaī | rāma! tuma-se suci suhṛda sāhibahiṃ, maiṃ saṭha pīṭhi daī
अध्याय 171
कीजै मोको जमजातनामई ।राम! तुम-से सुचि सुहृद साहिबहिं, मैं सठ पीठि दई
kījai moko jamajātanāmaī | rāma! tuma-se suci suhṛda sāhibahiṃ, maiṃ saṭha pīṭhi daī
अध्याय 171
गरभबास दस मास पालि पितु-मातु-रूप हित कीन्हों ।जड़हिं बिबेक, सुसील खलहिं, अपराधिहिं आदर दीन्हों
garabhabāsa dasa māsa pāli pitu-mātu-rūpa hita kīnhoṃ | jaḍa़hiṃ bibeka, susīla khalahiṃ, aparādhihiṃ ādara dīnhoṃ
अध्याय 171
कपट करौं अंतरजामिहुँ सों, अघ ब्यापकहिं दुरावौं ।ऐसेहु कुमति कुसेवक पर रघुपति न कियो मन बावौं
kapaṭa karauṃ aṃtarajāmihu~ soṃ, agha byāpakahiṃ durāvauṃ | aisehu kumati kusevaka para raghupati na kiyo mana bāvauṃ
अध्याय 171
उदर भरौं किंकर कहाइ बेंच्यौं बिषयनि हाथ हियो है ।मोसे बंचकको कृपालु छल छाँड़ि कै छोह कियो है
udara bharauṃ kiṃkara kahāi beṃcyauṃ biṣayani hātha hiyo hai | mose baṃcakako kṛpālu chala chā~ḍa़i kai choha kiyo hai
अध्याय 171
पल-पलके उपकार रावरे जानि बूझि सुनि नीके ।भिद्यो न कुलिसहुँ ते कठोर चित कबहुँ प्रेम सिय-पीके
pala-palake upakāra rāvare jāni būjhi suni nīke | bhidyo na kulisahu~ te kaṭhora cita kabahu~ prema siya-pīke
अध्याय 171
स्वामीकी सेवक-हितता सब, कछु निज साँइँ-द्रोहाई ।मैं मति-तुला तौलि देखी भइ मेरेहि दिसि गरुआई
svāmīkī sevaka-hitatā saba, kachu nija sā~i~-drohāī | maiṃ mati-tulā tauli dekhī bhai merehi disi garuāī
अध्याय 171
एतेहु पर हित करत नाथ मेरो, करि आये, अरु करिहैं ।तुलसी अपनी ओर जानियत प्रभुहि कनौड़ो भरिहैं
etehu para hita karata nātha mero, kari āye, aru karihaiṃ | tulasī apanī ora jāniyata prabhuhi kanauḍa़o bharihaiṃ
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भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
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अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
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समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
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पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.