अध्याय 176
श्लोक 1
राख्यो राम सुस्वामी सों नीच नेह न नातो ।एते अनादरहूँ तोहि तें न हातो
rākhyo rāma susvāmī soṃ nīca neha na nāto | ete anādarahū~ tohi teṃ na hāto
अध्याय 176
राख्यो राम सुस्वामी सों नीच नेह न नातो ।एते अनादरहूँ तोहि तें न हातो
rākhyo rāma susvāmī soṃ nīca neha na nāto | ete anādarahū~ tohi teṃ na hāto
अध्याय 176
जोरे नये नाते नेह फोकट फीके ।देहके दाहक, प्राहक जीके
jore naye nāte neha phokaṭa phīke | dehake dāhaka, prāhaka jīke
अध्याय 176
अपने अपनेको सब चाहत नीको ।मूल दुहूँको दयालु दूलह सीको
apane apaneko saba cāhata nīko | mūla duhū~ko dayālu dūlaha sīko
अध्याय 176
जीवको जीवन प्रानको प्यारो ।सुखहूको सुख रामसों बिसारो
jīvako jīvana prānako pyāro | sukhahūko sukha rāmasoṃ bisāro
अध्याय 176
कियो करैगो तोसे खलको भलो ।ऐसे सुसाहब सों तू कुचाल क्यों चलो
kiyo karaigo tose khalako bhalo | aise susāhaba soṃ tū kucāla kyoṃ calo
अध्याय 176
तुलसी तेरी भलाई अजहूँ बूझै ।राढ़उ राउत होत फिरिकै जूझै
tulasī terī bhalāī ajahū~ būjhai | rāḍha़u rāuta hota phirikai jūjhai
पाठ सेटिंग्स · Reading settings
भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded
धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।
अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.