Vinaya Patrika
185
अध्याय 185 / 279

पद १८५

6 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ6 श्लोक

अध्याय 185

श्लोक 1

लाज न लागत दास कहावत ।सो आचरन बिसारि सोच तजि, जो हरि तुम कहँ भावत

lāja na lāgata dāsa kahāvata | so ācarana bisāri soca taji, jo hari tuma kaha~ bhāvata

अध्याय 185

श्लोक 2

सकल संग तजि भजत जाहि मुनि, जप तप जाग बनावत ।मो-सम मंद महाखल पाँवर, कौन जतन तेहि पावत

sakala saṃga taji bhajata jāhi muni, japa tapa jāga banāvata | mo-sama maṃda mahākhala pā~vara, kauna jatana tehi pāvata

अध्याय 185

श्लोक 3

हरि निरमल, मलग्रसित हृदय, असमंजस मोहि जनावत ।जेहि सर काक कंक बक सूकर, क्यों मराल तहँ आवत

hari niramala, malagrasita hṛdaya, asamaṃjasa mohi janāvata | jehi sara kāka kaṃka baka sūkara, kyoṃ marāla taha~ āvata

अध्याय 185

श्लोक 4

जाकी सरन जाइ कोबिद दारुन त्रयताप बुझावत ।तहँ गये मद मोह लोभ अति, सरगहुँ मिटत न सावत

jākī sarana jāi kobida dāruna trayatāpa bujhāvata | taha~ gaye mada moha lobha ati, saragahu~ miṭata na sāvata

अध्याय 185

श्लोक 5

भव-सरिता कहँ नाउ संत, यह कहि औरनि समुझावत ।हौं तिनसों हरि! परम बैर करि, तुम सों भलो मनावत

bhava-saritā kaha~ nāu saṃta, yaha kahi aurani samujhāvata | hauṃ tinasoṃ hari! parama baira kari, tuma soṃ bhalo manāvata

अध्याय 185

श्लोक 6

नाहिन और ठौर मो कहँ, तातें हठि नातो लावत ।राखु सरन उदार-चूड़ामनि! तुलसिदास गुन गावत

nāhina aura ṭhaura mo kaha~, tāteṃ haṭhi nāto lāvata | rākhu sarana udāra-cūḍa़āmani! tulasidāsa guna gāvata

स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.