अध्याय 264
श्लोक 1
मेरो कह्यो सुनि पुनि भावै तोहि करि सो ।चारिहू बिलोचन बिलोकु तू तिलोक महँ तेरो तिहु काल कहु को है हितू हरि-सो
mero kahyo suni puni bhāvai tohi kari so | cārihū bilocana biloku tū tiloka maha~ tero tihu kāla kahu ko hai hitū hari-so
अध्याय 264
मेरो कह्यो सुनि पुनि भावै तोहि करि सो ।चारिहू बिलोचन बिलोकु तू तिलोक महँ तेरो तिहु काल कहु को है हितू हरि-सो
mero kahyo suni puni bhāvai tohi kari so | cārihū bilocana biloku tū tiloka maha~ tero tihu kāla kahu ko hai hitū hari-so
अध्याय 264
नये-नये नेह अनुभये देह-गेह बसि, परखे प्रपंची प्रेम, परत उघरि सो ।सुहृद-समाज दगावाजिहीको सौदा-सूत, जब जाको काज तब मिलै पाँय परि सो
naye-naye neha anubhaye deha-geha basi, parakhe prapaṃcī prema, parata ughari so | suhṛda-samāja dagāvājihīko saudā-sūta, jaba jāko kāja taba milai pā~ya pari so
अध्याय 264
बिबुध सयाने, पहिचाने कैधौं नाहीं नीके, देत एक गुन, लेत कोटि गुन भरि सो ।करम-धरम श्रम-फल रघुबर बिनु, राखको सो होम है, ऊसर कैसो बरिसो
bibudha sayāne, pahicāne kaidhauṃ nāhīṃ nīke, deta eka guna, leta koṭi guna bhari so | karama-dharama śrama-phala raghubara binu, rākhako so homa hai, ūsara kaiso bariso
अध्याय 264
आदि-अंत-बीच भलो भलो करै सबहीको जाको जस लोक-वेद रह्यो है बगरि-सो ।सीतापति सारिखो न साहिब सील-निधान, कैसे कल परै सठ! बैठो सो बिसरि-सो
ādi-aṃta-bīca bhalo bhalo karai sabahīko jāko jasa loka-veda rahyo hai bagari-so | sītāpati sārikho na sāhiba sīla-nidhāna, kaise kala parai saṭha! baiṭho so bisari-so
अध्याय 264
जीवको जीवन-प्रान, प्रानको परम हित प्रीतम, पुनीतकृत नीचन निदरि सो ।तुलसी! तोको कृपालु जो कियो कोसलपालु, चित्रकूटको चरित्र चेतु चित करि सो
jīvako jīvana-prāna, prānako parama hita prītama, punītakṛta nīcana nidari so | tulasī! toko kṛpālu jo kiyo kosalapālu, citrakūṭako caritra cetu cita kari so
पाठ सेटिंग्स · Reading settings
भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
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धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।
अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.