अध्याय 265
श्लोक 1
तन सुचि, मन रुचि, मुख कहौं 'जन हौं सिय-पीको' ।केहि अभाग जान्यो नहीं, जो न होइ नाथ सों नातो-नेह न नीको
tana suci, mana ruci, mukha kahauṃ 'jana hauṃ siya-pīko' | kehi abhāga jānyo nahīṃ, jo na hoi nātha soṃ nāto-neha na nīko
अध्याय 265
तन सुचि, मन रुचि, मुख कहौं 'जन हौं सिय-पीको' ।केहि अभाग जान्यो नहीं, जो न होइ नाथ सों नातो-नेह न नीको
tana suci, mana ruci, mukha kahauṃ 'jana hauṃ siya-pīko' | kehi abhāga jānyo nahīṃ, jo na hoi nātha soṃ nāto-neha na nīko
अध्याय 265
जल चाहत पावक लहौं, बिष होत अमीको ।कलि-कुचाल संतनि कही सोइ सही, मोहि कछु फहम न तरनि तमीको
jala cāhata pāvaka lahauṃ, biṣa hota amīko | kali-kucāla saṃtani kahī soi sahī, mohi kachu phahama na tarani tamīko
अध्याय 265
जानि अंध अंजन कहै बन-बाघिनी-घीको ।सुनि उपचार बिकारको सुबिचार करौं जब, तब बुधि बल हरै हीको
jāni aṃdha aṃjana kahai bana-bāghinī-ghīko | suni upacāra bikārako subicāra karauṃ jaba, taba budhi bala harai hīko
अध्याय 265
प्रभु सों कहत सकुचात हौं, परौं जनि फिरि फीको ।निकट बोलि, बलि, बरजिये, परिहरै ख्याल अब तुलसिदास जड़ जीको
prabhu soṃ kahata sakucāta hauṃ, parauṃ jani phiri phīko | nikaṭa boli, bali, barajiye, pariharai khyāla aba tulasidāsa jaḍa़ jīko
पाठ सेटिंग्स · Reading settings
भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded
धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।
अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.