ऐतरेयोपनिषद्

Adhyāya 1 · Khaṇḍa 3 — Creation of Food and the Entry of the Selfश्लोक 4/1429%

Aitareya Upanishad 3.4

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

तत्प्राणेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुम् ।स यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

उसने उसे प्राण (घ्राण-शक्ति) से पकड़ना चाहा, पर न पकड़ सका। यदि प्राण से पकड़ लेता, तो केवल अन्न को सूंघने मात्र से मनुष्य तृप्त हो जाता। ॥ ४ ॥

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He sought to grasp it with breath (olfaction). He could not grasp it with breath. Had he grasped it with breath, merely by smelling food one would be satisfied.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

एक व्युत्पत्तिपरक रहस्योद्घाटन: 'इन्द्र' 'इदन्द्र' से व्युत्पन्न है — 'जिसने इसे देखा।' देव परोक्ष नाम पसन्द करते हैं, यह श्लोक खिलवाड़ से टिप्पणी करता है। दोहरा समापन खण्ड 3 के अध्याय 1 के अन्त का चिह्न है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
"क्योंकि उसने सत्य को प्रत्यक्ष देखा (इदम् अदर्शत्), इसलिए उसका नाम 'इदन्द्र' है। किन्तु लोग उसे परोक्ष रूप से 'इन्द्र' कहते हैं, क्योंकि देवताओं को परोक्ष (गूढ़, सूक्ष्म और संकेतपूर्ण) प्रिय होता है।" यह सूत्र आधुनिक युग की उथली और शोरगुल भरी विचार-संस्कृति पर एक गहरी चोट है। आज का समाज हर चीज़ को 10-सेकंड के सतही रील्स, क्लिकबेट हेडलाइंस और स्थूल नारों में समेट देना चाहता है। हम सूक्ष्मता, काव्यात्मक गहराई और गूढ़ प्रतीकों को समझने की क्षमता खोते जा रहे हैं। उपनिषद् स्मरण कराती है कि जीवन के सर्वोच्च और पवित्रतम सत्य कभी बाजारू नारों में नहीं बेचे जा सकते; वे सदैव सूक्ष्म, शांत और परोक्ष होते हैं। जो व्यक्ति केवल बाह्य लेबलों (इंद्र) में उलझता है, वह सार (इदन्द्र) से वंचित रह जाता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **सतही शाब्दिक अर्थ से परे देखना (Looking Beyond Surface Meaning):** शास्त्रों, जीवन की घटनाओं और दूसरों के शब्दों को केवल ऊपर-ऊपर से मत आँकिए; उनके अंतर्निहित भाव और गहरे संकेत को समझिए। - **गंभीरता और सूक्ष्मता का विकास (Cultivating Cognitive Depth):** त्वरित राय बनाने और सरलीकृत निष्कर्ष निकालने की आदत छोड़िए; रहस्यों और विरोधाभासों को सहने और समझने की क्षमता बढ़ाइए। - **नाम और सार का भेद (Distinguishing Name from Essence):** संसार में लोग बाह्य लेबलों और उपाधियों में उलझते हैं; आप उस आंतरिक सत्य को पहचानिए जिसने यथार्थ का प्रत्यक्ष दर्शन किया है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप जीवन और सत्यों को केवल सतही, शोरगुल भरे शाब्दिक लेबलों से तौल रहे हैं, या उनके पीछे छिपे सूक्ष्म और मौन रहस्य (परोक्ष) का आदर करना जानते हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

पवित्र ग्रन्थों में भाषाई-व्युत्पत्ति: गहरा अर्थ प्रायः प्रकट नाम में छिपा होता है। आधुनिक व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) इस गोपन-प्रकाशन की परत को पहचानता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
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Translation
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Last updated
2026-10-23
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