अध्याय 18
श्लोक 2.1
पितृमेधः।१-६० अथर्वा।यमः, मन्त्रोक्ताः, ४, ३४ अग्निः, ५ जातवेदाः, २९ पितरः।त्रिष्टुप्, १-३, ६, १४- १८, २०, २२-२३, २५, ३०, ३४, ३६, ४६, ४८, ५०-५२, ५६ अनुष्टुप्, ४, ७, ९, १३ जगती, ५ , २६, ४९, ५७ भुरिक्, १९ त्रिपदाऽर्षी गायत्री, २४ त्रिपदा समविषमाऽर्षी गायत्री, ३७ विराड् जगती, ३८-४४ आर्षी गायत्री, (४०, ४२-४४ भुरिक्) ४५ ककुम्मती अनुष्टुप्।य॒माय॒ सोमः॑ पवते य॒माय॑ क्रियते ह॒विः ।य॒मं ह॑ य॒ज्ञो ग॑च्छत्य॒ग्निदू॑तो॒ अरं॑कृतः
pitṛmedhaḥ| 1-60 atharvā| yamaḥ, mantroktāḥ, 4, 34 agniḥ, 5 jātavedāḥ, 29 pitaraḥ| triṣṭup, 1-3, 6, 14- 18, 20, 22-23, 25, 30, 34, 36, 46, 48, 50-52, 56 anuṣṭup, 4, 7, 9, 13 jagatī, 5 , 26, 49, 57 bhurik, 19 tripadā'rṣī gāyatrī, 24 tripadā samaviṣamā'rṣī gāyatrī, 37 virāḍ jagatī, 38-44 ārṣī gāyatrī, (40, 42-44 bhurik) 45 kakummatī anuṣṭup| yamāya somaḥ pavate yamāya kriyate haviḥ | yamaṃ ha yajño gacchatyagnidūto araṃkṛtaḥ
हिन्दी अर्थ
वानप्रस्थ धारण करनेवाले कोकहा जाताहैकि प्रेहि) जा, पिता पितामह रादि भ्रगले-्रगले प्राश्रमोमें ( परेताः) गएहैँ। वहांतू (यमं देवम्) यमदेव का(च) भ्रौर (वरुणं देवम् ) वरुणदेव का (पर्यास) दशंन करेगा, जो (उभा) दोनों कि (राजानौ) उस-उस आश्म के राजा प्राचा्यं का निज स्वाभाकिकिरूपदहै, भ्रौर वरुण परमेदवरका रूपदहै। चारी मेँ भ्रामूलबूल परिवत्तंन कर, उसके पूरवंरूप को विनष्ट कर उसे दुसरा
English
Yes, this is good to taste and full of sweetness, verily it is strong and rich in flavour. No one may conquer Indra in the battle when he hath drunken of the draught we offer.