Atharva Veda
18
अध्याय 18 / 20

Kanda 18

काण्ड 18

283 श्लोकभाग 4/6 · श्लोक 3.67–3.73

पूर्ण अध्याय पाठ7 श्लोक

अध्याय 18

श्लोक 3.67

इन्द्र॒ क्रतुं॑ न॒ आ भ॑र पि॒ता पु॒त्रेभ्यो॒ यथा॑ ।शिक्षा॑ णो अ॒स्मिन् पु॑रुहूत॒ याम॑नि जी॒वा ज्योति॑रशीमहि

indra kratuṃ na ā bhara pitā putrebhyo yathā | śikṣā ṇo asmin puruhūta yāmani jīvā jyotiraśīmahi

हिन्दी अर्थ

मनर १८८ मे परमेश्वर के ठपासक परज्ञा की प्ररथना कर रटे है । (भरधारयन्) सुरक्षित रख लिया है, (ते) वे (मधुमन्तः) मधुर तथा म्नौर समय-समय पर ये मेंट देते रह, ताकि ब्रह्मचारी पपरसन्न होकर विद्याध्ययन कर सकं । 1 । १०० अथर्वेवेद-माष्य का० १८ ।सू०३

English

The chalice brimming o’er which erst Atharvan offered to Indra, Lord of wealth and treasure, Indu therein sets draught of virtuous action, and ever purifies himself within it.

अध्याय 18

श्लोक 3.68

अ॒पू॒पापि॑हितान् कु॒म्भान् यांस्ते॑ दे॒वा अधा॑रयन्।ते ते॑ सन्तु स्व॒धाव॑न्तो॒ मधु॑मन्तो घृत॒श्चुतः॑

apūpāpihitān kumbhān yāṃste devā adhārayan| te te santu svadhāvanto madhumanto ghṛtaścutaḥ

हिन्दी अर्थ

(तिलमिश्राः) तिलमिश्चित (धानाः) घान्यों को (अनुकिरामि) ऋत्वनुसार म देताहुं, (ताः) वे (तेरे) तेरे लिये (विभ्वीः) प्रभूत माच्रामें हो, रौर (भ्वी) शक्ति देने वाले हो । (यमः) यम-नियमों का भ्रधिष्ठाता (राजा) समुस्नति करता रहेगा । धानाः मने जौ तथा चावल, सत्तु तथा जो (एषः) यह ब्रह्मचारी (त्वयि) भ्राप को (निहितः) सौपा गया है, उसे (पुनः) फिर (देहि) हमारे सुपुदं कर दीजियेगा । (यथाः) ताकिं (यमस्य) म्नौ र वन्य उपलो पर उस-उस आचाय का भविकार हो, ताकि वन्य फलों भौर भ्राचायों का ही नियन्त्रण होना चाहिए ।

English

What wound soe’er the dark bird hath inflicted, the emmet, or the serpent, or the jackal, May Agni who devoureth all things heal it, and Soma, who hath passed into the Brāhmans.

अध्याय 18

श्लोक 3.69

यास्ते॑ धा॒ना अ॑नुकि॒रामि॑ ति॒लमि॑श्रा स्व॒धाव॑तीः ।तास्ते॑ सन्तु वि॒भ्वीः प्र॒भ्वीस्तास्ते॑ य॒मो राजानु॑ मन्यताम्

yāste dhānā anukirāmi tilamiśrā svadhāvatīḥ | tāste santu vibhvīḥ prabhvīstāste yamo rājānu manyatām

हिन्दी अर्थ

का० १८। सु०३ भथवंवेद-भाष्य १०१ रीरमख सं दशनं घेदि सुवाम लोके ॥७१॥। तदनन्तर इसे (सुकृताम्) सूक्मि्यों के (लोके) गृहस्थ-लोक मँ (धेहि) भाचार्यं छेसा होना चाहिए कि वह् भ्रपने पापहारी-तेज द्वारा बरह्मचारी की पापमयी वासनाभ्रों को दग्ध कर उसे सुकर्म बना सके । वेद

English

The plants of earth are rich in milk, and rich in milk is this my milk. 237 With all the milky essence of the Waters let them make me clean.

अध्याय 18

श्लोक 3.70

पुन॑र्देहि वनस्पते॒ य ए॒ष निहि॑त॒स्त्वयि॑ ।यथा॑ य॒मस्य॒ साद॑न॒ आसा॑तै वि॒दथा॒ वद॑न्

punardehi vanaspate ya eṣa nihitastvayi | yathā yamasya sādana āsātai vidathā vadan

हिन्दी अर्थ

का घारण-पोषण करनेवाली, तथा सैकड़ों घारा्भोवाली (घृतस्य कृस्या). जल की नहर (एतु) प्राप्तं हो । घृतम् उदकम् (निधं १।१२) (एतद) इस गृह प्र (भरारोह) तु भारोहण कर, (वयः) भपनी यु मत छोड जाना । गृहस्थाश्रम (पिदणां लोकम्) माता-पिता बनने का

English

Decked with fair jewels, tearless, free, from trouble, first let the dames go up to where he lieth. Meet Yama, meet the Fathers, meet the merit of virtuous action in the loftiest heaven.

अध्याय 18

श्लोक 3.71

आ र॑भस्व जातवेद॒स्तेज॑स्व॒द्धरो॑ अस्तु ते ।शरी॑रमस्य॒ सं द॒हाथै॑नं धेहि सु॒कृता॑मु लो॒के

ā rabhasva jātavedastejasvaddharo astu te | śarīramasya saṃ dahāthainaṃ dhehi sukṛtāmu loke

हिन्दी अर्थ

"बच्र' का अथं ह्भिटनी ने किया है “1196; “करना चाहिए- 616." । “96 प्रथं इस लिये किया है कि मन्त्र परलोक-वर्णेन का विधान है। इसीलिये वे दिकशाला को ““हृत्तिनीव पती" द्वारा उपमित किया है (भ्रथर्वं० ९€।३।१७) । वयः सायण ने इस पद का भरं १९५. आ रोहत जनित्रीं जातवेदसः पितृयाणैः सं ब॒ आ रोहयामि। अबाइव्येषितो इव्यवाई देजानं युक्ताः सुकृतां त्त लोके॥१॥ (जातवेदसः) है भष्यात्मविद्या के जाननेवाले सदृगहस्थो ! तुम (पितृयाणैः) पितरृयाण मागो दवारा (जननीम्) जगज्जननी की प्राप्ति को सम्यक् विधि से (भारोहयामि) इस मागं पर प्रारूढ़ कराता हु । (हन्य वाहः) तुम्हारी भत्मसमपंणरूपी हवियो को स्वीकार करनेवाले परमेरवर ने

English

Leave sin and evil, seek anew thy dwelling: so bright with glory let him join his body. Our Father’s Fathers and their sires before them, they who have entered into air’s wide

अध्याय 18

श्लोक 3.72

ये ते॒ पूर्वे॒ परा॑गता॒ अप॑रे पि॒तर॑श्च॒ ये।तेभ्यो॑ घृ॒तस्य॑ कु॒ल्यैऽतु श॒तधा॑रा व्युन्द॒ती

ye te pūrve parāgatā apare pitaraśca ye| tebhyo ghṛtasya kulyai'tu śatadhārā vyundatī

हिन्दी अर्थ

किया है, स्वीकृत किया है । (युक्ताः) है योगयुक्त योगीजनो ! (ईजानम्) पंचमहायज्ञों ॐ करनेवाले को (सुकृतां लोके ) सुकभियों के समाज में (धत्त) स्थापित करो । मनोर पग बढ़ाते जाना । भौर इस निमित्त योगिजनों की सेवाएं करना, यह सद्गहस्थी का लक्ष्य होना चाहिए । प्रादे से बनी टिक्कौ का, भ्रनिमे घी की भ्राहुति डालने के चमचो का,.

English

region, For them shall self-resplendent Asuniti form bodies now accord- ing to her pleasure. Let the hoar-frost be sweet to thee. sweetly on thee the rain descend!

अध्याय 18

श्लोक 3.73

ए॒तदा रो॑ह॒ वय॑ उन्मृजा॒नः स्वा इ॒ह बृ॒हदु॑ दीदयन्ते ।अ॒भि प्रेहि॑ मध्य॒तो माप॑ हास्थाः पितॄ॒नां लो॒कं प्र॑थ॒मो यो अत्र॑

etadā roha vaya unmṛjānaḥ svā iha bṛhadu dīdayante | abhi prehi madhyato māpa hāsthāḥ pitṝnāṃ lokaṃ prathamo yo atra

हिन्दी अर्थ

तथा यशो के भरन्य नानाविध उपकरणों का । है यजमान ! (देवयानः) - धा्चिक देवों के (तेभिः) उन (पथिभिः) मागो हयार तु (स्वर्गं लोकम्) (ईजानाः) यज्ञ करनेवाले यजमान (सवर्ग लोकं यन्ति) स्वगं लोक को निरदिचत प्राप्त होते है । ऋतवः भिन्न-मिन्न ऋतु के भनुसार किये जानेवाले चातुर्मास्य वृद्धि होने पर सुखविकेष होता है । (साधु) मोक्षसाघक (भनुपल्य) भौर भ्रनुकूल जानकर, (सुकृतः) सुकरमी

English

O full of coolness, thou cool Plant, full of fresh moisture, fresh- ening Herb, Bless us in waters, female Frog: calm and allay this Agni here.

स्रोत: bhavykhatri/DharmicData · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।