Chandogya Upanishad
108
अध्याय 108 / 154

Adhyāya 108

प्रपाठक खण्ड 108

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 108

श्लोक 6.11.1

॥ अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेद्यो मध्येऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेद्योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेत्स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति

|| asya somya mahato vṛkṣasya yo mūle'bhyāhanyājjīvansravedyo madhye'bhyāhanyājjīvansravedyo'gre'bhyāhanyājjīvansravetsa eṣa jīvenātmanānuprabhūtaḥ pepīyamāno modamānastiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

धन देनेपर भी उसे लेनेवालेको वन्धनका प्रसंग उपस्थित होता है ॥ इख प्रकार कदे जानेपर वे ओर यदि वह उस (चोरी) का करनेवाला नही होतात उसीसे वह अपनेको स्य प्रमाणित करता है । वह सव्याभिषन्ध अपनेको स्यसे आत्रृत कर उस तपे हुए परशुकरो पकड़ लेता है । वह उपते

English

'If some one were to strike at the root of this large tree here, it would bleed, but live. If he were to strike at its stem, it would bleed, but live. If he were to strike at its top, it would bleed, but live. Pervaded by the living Self that tree stands firm, drinking in its nourishment and rejoicing;

अध्याय 108

श्लोक 6.11.2

अस्य यदेकाँ शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां जहात्यथ सा शुष्यति सर्वं जहाति सर्वः शुष्यति

asya yadekām̐ śākhāṃ jīvo jahātyatha sā śuṣyati dvitīyāṃ jahātyatha sā śuṣyati tṛtīyāṃ jahātyatha sā śuṣyati sarvaṃ jahāti sarvaḥ śuṣyati

हिन्दी अर्थ

क्रनेवाखा नहीं होता तो उष ८ चोरीके अक्ल ) के दी द्रार वह अपनेको सत्य प्रमाणित करता वह्‌ जिप्ष प्रकार उप्त परीक्षके समय नहीं जरुता उसी प्रकार विद्ान्‌का पुनरावर्तन नहीं होता ओर. भविद्रानका होता है यह सव एतदरूप दी है, वह सस्य है, वह आत्मा है ओर टे इवेतकेतो तरयोः शरीरपातकाले च तुल्या- वतंते । अविद्वांस्तु विकारानृता- वह॒ सव्याभिसन्ध पुरूष निस

English

'But if the life (the living Self) leaves one of its branches, that branch withers; if it leaves a second, that branch withers; if it leaves a third, that branch withers. If it leaves the whole tree, the whole tree withers . In exactly the same manner, my son, know this.' Thus he spoke:

अध्याय 108

श्लोक 6.11.3

एवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच

evameva khalu somya viddhīti hovāca jīvāpetaṃ vāva kiledaṃ mriyate na jīvo mriyate iti sa ya eṣo'ṇimaitadātmyamidam̐ sarvaṃ tatsatyam̐ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca

हिन्दी अर्थ

कृतजीवात्मविज्ञाननिवत॑क भीशंकरभगवतः कतौ छान्दोग्योपनिषद्धि- नारद्के प्रति प्नत्कुमारका उपदेश “ है भगवन्‌ सुसञे उपदेश कीजियेः रसा कहते हुए नारदनी सनदभर नीके पास गये । उनसे सनुमारजीने कडा तुम बो कु जानते हो उसे बतराते हुए भेरे पास उपदेश लेनेके ल्य आथो; त

English

'This (body) indeed withers and dies when the living Self has left it; the living Self dies not. 'That which is that subtile essence, in it all that exists has its self. It is the True. It is the Self, and thou, Svetaketu, art it.' 'Please, Sir, inform me still more,' said the son. 'Be it so, my child,' the father replied.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।