Chandogya Upanishad
16
अध्याय 16 / 154

Adhyāya 16

प्रपाठक खण्ड 16

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 16

श्लोक 2.3.1

॥ वृष्टौ पञ्चविधँ सामोपासीत पुरोवातो हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनम्

|| vṛṣṭau pañcavidham̐ sāmopāsīta purovāto hiṃkāro megho jāyate sa prastāvo varṣati sa udgītho vidyotate stanayati sa pratihāra udgṛhṇāti tannidhanam

हिन्दी अर्थ

न दपु प्रति, नेच्छति यदि वह इच्छा न रेतो नसं रुक पराप्त नही होता तथा 1 ष ध जरसे सम्पन्न होता है--यह 8 ऋतुनिषयक पाचि प्रकारकी सामोपतसना । ऋतुषु पथविधश्सामोपासीत वसन्तो हिंकारो छतुओमें पाँच प्रकारके सामकौ उपा्नना करे । वसन्त हिकार है ्रीष्म प्रस्तावे है, वर्षा उदगीथ है, शरत्‌ परतिहार है ओर हेमन्त

English

Let a man meditate on the fivefold Sâman as rain. The hiṅkâra is wind (that brings the rain); the prastâva is, 'the cloud is come;' the udgîtha is, 'it rains;' the pratihâra, 'it flashes, it thunders;'

अध्याय 16

श्लोक 2.3.2

वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान्वृष्टौ पञ्चविधँसामोपास्ते

varṣati hāsmai varṣayati ha ya etadevaṃ vidvānvṛṣṭau pañcavidham̐sāmopāste

हिन्दी अर्थ

दकारः, प्राथम्यात्‌ । ग्रीष्मः चऋछतुओरम पांच प्रकारके; सामकी उपासना करे । ऋतुर्ोकी व्यवस्था पूर्वोक्त जररूप निमित्तसे ही होती जो इसे इष प्रकार जाननेवास पुरुष ऋतुओंमे पाँच प्रकारके सामकी उपा्टना करता है उसे तुए अपने अनुरूप भोग देती है ओर वह ऋतुमान्‌ ( ऋतुसम्बन्धी भोगोसे सम्पन्न ) होता है

English

The nidhana is, 'it stops.' There is rain for him, and he brings rain for others who thus knowing meditates on the fivefold Sâman as rain. Next: II, 4 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।