Chandogya Upanishad
17
अध्याय 17 / 154

Adhyāya 17

प्रपाठक खण्ड 17

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 17

श्लोक 2.4.1

॥ सर्वास्वप्सु पञ्चविधँसामोपासीत मेघो यत्सम्प्लवते स हिंकारो यद्वर्षति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम्

|| sarvāsvapsu pañcavidham̐sāmopāsīta megho yatsamplavate sa hiṃkāro yadvarṣati sa prastāvo yāḥ prācyaḥ syandante sa udgītho yāḥ pratīcyaḥ sa pratihāraḥ samudro nidhanam

हिन्दी अर्थ

कल्पन्ते ह॒ ऋतुग्यवस्था- इस उपासनाके लिये ऋतु अपने कालको व्यवस्थाके अनुरूप फक भोग्-रूपसे उपस्थित करनेमे समर्थं पु विषयक पच प्रकारकी सामोपसना पशुषु पञ्चविधश्सामोपासीताजा हिंकारोऽवयः पड्म पोच प्रकारके सामकी उपासना करे । बकरे हकार है, में प्रस्ताव है, गीं उदुगीथ है, अध प्रतिहार है ओर्‌ पुरुष निषन हे

English

Let a man meditate on the fivefold Sâman in all waters. When the clouds gather, that is the hiṅkâra; when it rains, that is the prastâva that which flows in the east , that is the udgîtha that which flows in the west , that is the pratihâra the sea is the nidhana.

अध्याय 17

श्लोक 2.4.2

न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान्भवति य एतदेवं विद्वान्सर्वास्वप्सु पञ्चविधँसामोपास्ते

na hāpsu praityapsumānbhavati ya etadevaṃ vidvānsarvāsvapsu pañcavidham̐sāmopāste

हिन्दी अर्थ

सम्यगबत्तेष्वूत॒षु पशव्यः काल इत्यानन्तयम्‌ । अजा हिंकारः, पञ्ुओंमिं पांच प्रकारके सामकी उपासना करे। चछतुओंके ठीक-टीक वरतनेसे पञ्ओंके स्यि अनुकर समय जो इस प्रकार जाननेवासा पुरुष पञ्युओंमे पञ्चविध सामकी उपासना करता है उसे पञ्च प्राप्त होते है जर वह पडुधनसे सम्पन्न होता है

English

He does not die in water , nay, he is rich in water who knowing this meditates on the fivefold Sâman as all waters.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।