Chandogya Upanishad
18
अध्याय 18 / 154

Adhyāya 18

प्रपाठक खण्ड 18

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 18

श्लोक 2.5.1

॥ ऋतुषु पञ्चविधँ सामोपासीत वसन्तो हिंकारः ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनम्

|| ṛtuṣu pañcavidham̐ sāmopāsīta vasanto hiṃkāraḥ grīṣmaḥ prastāvo varṣā udgīthaḥ śaratpratihāro hemanto nidhanam

हिन्दी अर्थ

भवन्ति हास्य पशवः, उसे प्श प्राप होते है ओर उह = होता है अर्थात्‌ वह त्यागाद्मियुज्यत इत्यथंः॥२। एवं दानादिपे युक्त होता है ग्राणविषयक पोच प्रकारक सामोषसना हिंकारो वाक्पस्तावशवश्ुरुद्रीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो प्ा्णोमिं पच प्रकारके परोवरीय ( उत्तरोत्तर उककृष्ट ) गुणविरिष्ट सामकी उपासना करे । उनम प्राण हिंकार हे, वाक्‌ प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ हे, श्रोत्र प्रतिहार है ओर मन निधन है । ये उपासना

English

Let a man meditate on the fivefold Sâman as the seasons. The hiṅkâra is spring, the prastâva summer (harvest of yava, &c.), the udgîtha the rainy season, the pratihâra autumn, the nidhana winter.

अध्याय 18

श्लोक 2.5.2

कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान्भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधँ सामोपास्ते

kalpante hāsmā ṛtava ṛtumānbhavati ya etadevaṃ vidvānṛtuṣu pañcavidham̐ sāmopāste

हिन्दी अर्थ

हिंकारः, उत्तरोत्तरवरीयसां प्राथ- प्राणमं पोच प्रकारके परोवरीय सामकी उपासना करे अर्थात्‌ उत्तरो- परोवरीयो. हास्य भवति परोवरीयसो ह छोकाञ्ज- जो इसे इस प्रकार जानेवाला पुरुष भाणो षच प्रकारके उत्त- रोखर उ्छृष्टतर॒सामकी उपासना करता स है उसका जीवन उत्तरोत्तर

English

The seasons belong to him, nay, he is always in season (successful) who knowing this meditates on the fivefold Sâman as the seasons. Next: II, 6 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।