Chandogya Upanishad
19
अध्याय 19 / 154

Adhyāya 19

प्रपाठक खण्ड 19

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 19

श्लोक 2.6.1

॥ पशुषु पञ्चविधँ सामोपासीताजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनम्

|| paśuṣu pañcavidham̐ sāmopāsītājā hiṃkāro'vayaḥ prastāvo gāva udgītho'śvāḥ pratihāraḥ puruṣo nidhanam

हिन्दी अर्थ

यक्कि च वाचो हूमिति स हिंकारो यत्प्रेति स प्रस्तावो अव सृप्तविध सामकी उपासनाका प्रकरण आरम्भ किया जाता है-वाणीमें सक्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये । वाणीम जो कुछ “है' एेसा स्वरूप है वह हिंकार है,जो कुक शभ एेसा स्वरूप है वह भ्म्ताव अथानन्तरं सप्रविधस्य सम- अव इसके पश्चात्‌-यह सपतविध समस्त सामकी साधु उपासना आरम्भ की जाती है । श्रुतम वाचि इस पद्‌-

English

Let a man meditate on the fivefold Sâman in animals. The hiṅkâra is goats, the prastâva sheep, the udgîtha cows, the pratihâra horses, the nidhana man.

अध्याय 19

श्लोक 2.6.2

भवन्ति हास्य पशवः पशुमान्भवति य एतदेवं विद्वान्पशुषु पञ्चविधँ सामोपास्ते

bhavanti hāsya paśavaḥ paśumānbhavati ya etadevaṃ vidvānpaśuṣu pañcavidham̐ sāmopāste

हिन्दी अर्थ

जो दु “उत्‌ एसा शब्दरूप है वह उद्गीथ है, जो कुछ श्रति' रेरा चन्द है वह प्रतिहार है, जो कुछ उप' एेसा शब्द है वह उपद्वव है जर जो कुछ “नि' एसा शब्दरूप है वह निधन है शब्दके आरम्भमे उतः है; जो कुछ वैत्वादुद्रीथस्य । यत्प्रतीति स श्रतिः एेसा शब्दस्वरूप है वह प्रतिहार है, क्योंकि उनमें श्रति' जो इसे इस प्रकार जाननेवाख पुरुप वाणीम सप्तविधं सामकी उपासना करता है उसे वाणी, जो कुछ वाणीका दोह ( सार ) है उसे देती है तथा वह प्रचुर अन्नसे सम्पन्न जर उसका भोक्ता होता है

English

Animals belong to him, nay, he is rich in animals who knowing this meditates on the fivefold Sâman as animals. Next: II, 7 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।