Chandogya Upanishad
56
अध्याय 56 / 154

Adhyāya 56

प्रपाठक खण्ड 56

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 56

श्लोक 3.19.1

॥ आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत् ।तत्सदासीत्तत्समभवत्तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम्

|| ādityo brahmetyādeśastasyopavyākhyānamasadevedamagra āsīt | tatsadāsīttatsamabhavattadāṇḍaṃ niravartata tatsaṃvatsarasya mātrāmaśayata tannirabhidyata te āṇḍakapāle rajataṃ ca suvarṇaṃ cābhavatām

हिन्दी अर्थ

तब उससे सांडने सत्यकाम पे कदा । उसने भगवन्‌ " फसा उत्तर दिया । वह बोला- है सोम्य हम एक सहल हो गये दहै, अव तृ हम ाचार्यकुरमे पषा दे, अथ॒ हैनमृषभोऽभ्युवादा- तब उससे सांडने सकाम भ्युक्तवान्सत्यकाम २ इति इस प्रकार सम्बोधन करते हए संबोध्य, तमसौ सत्यकामो कदा । उते सत्यकामे भगवन्‌

English

Âditya (the sun ) is Brahman, this is the doctrine, and this is the fuller account of it:-- In the beginning this was non-existent . It became existent, it grew. It turned into an egg . The egg lay for the time of a year. The egg broke open. The two halves were one of silver, the other of gold.

अध्याय 56

श्लोक 3.19.2

तद्यद्रजतँ सेयं पृथिवी यत्सुवर्णँ सा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बँ समेघो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकँ स समुद्रः

tadyadrajatam̐ seyaṃ pṛthivī yatsuvarṇam̐ sā dyauryajjarāyu te parvatā yadulbam̐ samegho nīhāro yā dhamanayastā nadyo yadvāsteyamudakam̐ sa samudraḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मणश्च ते पादं वाणीति व्रवीतु मे भगवा- पादो ब्रह्मणः पकारावान्नाम क्या मेँ तुञ्च ब्रह्मका एक पाद बतलाऊ" ! तन सत्यकामने कहा- "भगवान्‌ सुञ्ञे अवदय बतखवे ॥ सोंड उससे बोका-- पूवं दिक्षा, पश्चिम दिक्घला, दक्षिण दिकसा ओर उत्तर दिक्कला, है सोम्य अहं ब्रह्मणः परस्य ते तुभ्यं इत्युक्त ऋऋषभस्तस्मं सत्यका- ब्रह्मणः पादस्य चतुर्थो भागः

English

The silver one became this earth, the golden one the sky, the thick membrane (of the white) the mountains, the thin membrane (of the yoke) the mist with the clouds, the small veins the rivers, the fluid the sea.

अध्याय 56

श्लोक 3.19.3

अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्तं जायमानं घोषा उलूलवोऽनूदतिष्ठन्त्सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामास्तस्मात्तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं प्रति घोषा उलूलवोऽनूत्तिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामाः

atha yattadajāyata so'sāvādityastaṃ jāyamānaṃ ghoṣā ulūlavo'nūdatiṣṭhantsarvāṇi ca bhūtāni sarve ca kāmāstasmāttasyodayaṃ prati pratyāyanaṃ prati ghoṣā ulūlavo'nūttiṣṭhanti sarvāṇi ca bhūtāni sarve ca kāmāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकाङावानिस्युपास्ते प्रकाशवानरस्मिररोके भवति प्रकारावतो ह॒ खोकाञज्जयति य एतमेवं विद्रा्तु- ष्कटं पादं ब्रह्मणा; प्रकारावानित्युपास्ते वह, जो इस प्रकार जाननेवाखा पुरुष व्रह्मके इस चुतुष्फरर पादकौ श्रकारावान्‌" इस गुणसे युक्तं उपासना करता है, इस रोक प्रकाशवान्‌ होता है ओर प्रकाशवान्‌ छोकोक्रो जीत छेतादहै, नो करि इसे इस

English

And what was born from it that was Âditya, the sun. When he was born shouts of hurrah arose, and all beings arose, and all things which they desired. Therefore whenever the sun rises and sets, shouts of hurrah arise, and all beings arise, and all things which they desire.

अध्याय 56

श्लोक 3.19.4

स य एतमेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनँ साधवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निम्रेडेरन्निम्रेडेरन्

sa ya etamevaṃ vidvānādityaṃ brahmetyupāste'bhyāśo ha yadenam̐ sādhavo ghoṣā ā ca gaccheyurupa ca nimreḍerannimreḍeran

हिन्दी अर्थ

स यः कश्चिदेवं यथोक्तमेतं वह, नो कोई विद्वान्‌ ब्रहम ब्रह्मणश्चतुष्कलं पादं बिद्रान्प्र- इस ॒चतुप्कल पादको इस प्रकार काशवानित्यनेन गुणेन विशि- काशवान्‌। ह भ अगनिनिद्रारा ब्रह्मे दवितीय पदका उपदे पया्कार । ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्रागनिसुपसमा- “अग्नि तुज्ञे दूसरा पाद्‌ बतलवेगा"-रेसा कहकर दृषभ मोन हो गया । दूसरे दिन उसने गौओंको गुस्करुलकी ओर होक दिया। वे सायंकालमे हँ एकत्रित इई वहीं अग्नि प्रञ्वङ्ति कर गौर्मोको रोक

English

If any one knowing this meditates on the sun as Brahman, pleasant shouts will approach him and will continue, yea, they will continue.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।