Chandogya Upanishad
58
अध्याय 58 / 154

Adhyāya 58

प्रपाठक खण्ड 58

5 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ5 श्लोक

अध्याय 58

श्लोक 4.2.1

॥ तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायणः षट्शतानि गवां निष्कमश्वतरीरथं तदादाय प्रतिचक्रमे तँ हाभ्युवाद

|| tadu ha jānaśrutiḥ pautrāyaṇaḥ ṣaṭśatāni gavāṃ niṣkamaśvatarīrathaṃ tadādāya praticakrame tam̐ hābhyuvāda

हिन्दी अर्थ

“मद्गु तुञ्े चौथा पाद वतठावेगा' रसा कहकर हं चला गया । दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुर्कीो आर हक दिया । व सायकार्मे जहां एकत्रित हुई" वहीं अमि प्रज्वलित कर गार्योक्ो रोक पाद्‌ बतरवेगाः एसा कहकर चला गया। मदगुः जलचर पक्षीको कहते स चाप्सम्बन्धास्ाणः । स ह है; नरपे सम्बन्ध होनेके कारण वह

English

Then Gânasruti Pautrâyana took six hundred cows, a necklace, and a carriage with mules, went to Raikva and said:

अध्याय 58

श्लोक 4.2.2

रैक्वेमानि षट्शतानि गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथोऽनु म एतां भगवो देवताँ शाधि यां देवतामुपास्स इति

raikvemāni ṣaṭśatāni gavāmayaṃ niṣko'yamaśvatarīratho'nu ma etāṃ bhagavo devatām̐ śādhi yāṃ devatāmupāssa iti

हिन्दी अर्थ

तं मदयुरुपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम ३ इति मदुगुने उसके पास उतरकर कहा--'सत्यकाम तव उसने ब्रह्मणः सोभ्य ते पादं वाणीति वीतु मे भगवानिति तस्मे दोवाच प्राणः कटा चन्तुः करा श्रोत्रं कडा मनः करेष बे सोम्य चतुष्कलाः पादो

English

'Raikva, here are six hundred cows, a necklace, and a carriage with mules; teach me the deity which you worship.'

अध्याय 58

श्लोक 4.2.3

तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति तदु ह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे

tamu ha paraḥ pratyuvācāha hāretvā śūdra tavaiva saha gobhirastviti tadu ha punareva jānaśrutiḥ pautrāyaṇaḥ sahasraṃ gavāṃ niṣkamaśvatarīrathaṃ duhitaraṃ tadādāya praticakrame

हिन्दी अर्थ

मद्गु बोका- है सोम्य । मेँ तुचे ्रहमका पाद्‌ बतलाऊं सत्यकाम गोका-- भगवान्‌ सुस्े बतलावें ॥ तव वह उससे बोख-- प्राण कला है, च्च कला है, श्रोत्र करा है जर मन कला है । हे 5 कला हैः इत्यादि (जायतनवान्‌' इस मेव च दशनुवाच प्राणः नामवाा पाद है, सा कहकर करेत्याद्यायतनवानित्येवं नाम। पनेसे सम्बद्ध दर्नक्षा ही निहूपण

English

The other replied: 'Fie, necklace and carriage be thine, O Sûdra, together with the cows.' Then Gânasruti Pautrâyana took again a thousand cows, a necklace, a carriage with mules, and his own daughter, and went to him.

अध्याय 58

श्लोक 4.2.4

तँ हाभ्युवाद रैक्वेदँ सहस्रं गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जायायं ग्रामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा भगवः शाधीति

tam̐ hābhyuvāda raikvedam̐ sahasraṃ gavāmayaṃ niṣko'yamaśvatarīratha iyaṃ jāyāyaṃ grāmo yasminnāsse'nveva mā bhagavaḥ śādhīti

हिन्दी अर्थ

वह जो इ प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रकषके इस चतुष्क पादकी “जायतनवान्‌ः से गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोक (आयतनवान्‌ होता है ओर आयतनवान्‌ रोकोको जीतसेता है, नो तं पादं तथेबोपास्ते यः स उस्र पादकी नो उी प्रकार आयतनवानाश्रयवानस्मिल्लोके उपासना करता है वह इस रोकं भवति । तथायतनवत आयतनवान्‌--आश्रयवाा होता , सत्यकामका आचाय॑कुलमे पहचकर आचायंद्रारा पुनः उपदेश्च ग्रहण करना स एवं ब्रह्मवित्सन्‌-- इस प्रकार वह ब्रह्मवेत्ता होकर--

English

He said to him: 'Raikva, there are a thousand cows, a necklace, a carriage with mules, this wife, and this village in which thou dwellest. Sir, teach me!'

अध्याय 58

श्लोक 4.2.5

तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति ते हैते रैक्वपर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास स तस्मै होवाच

tasyā ha mukhamupodgṛhṇannuvācājahāremāḥ śūdrānenaiva mukhenālāpayiṣyathā iti te haite raikvaparṇā nāma mahāvṛṣeṣu yatrāsmā uvāsa sa tasmai hovāca

हिन्दी अर्थ

नाना पर्वा । उससे आचायंने कहा -'सयकाम तब प्राप ह॒ प्राप्वानाचायं- आचायकुरमपरहैवा । उससे कुलम्‌ । तमाचाययोऽम्युवाद माचायने सल्यकाम ।' पसा कहा । सत्यकाम ३ इति ।- मगव इति तब उसने “भगवन्‌ पसा उत्तर

English

He, opening her mouth , said: 'You have brought these (cows and other presents), O Sûdra, but only by that mouth did you make me speak.' These are the Raikva-parna villages in the country of the Mahâvrishas (mahâpunyas) where Raikva dwelt under him . And he said to him:

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।