Chandogya Upanishad
82
अध्याय 82 / 154

Adhyāya 82

प्रपाठक खण्ड 82

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 82

श्लोक 5.9.1

॥ इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति स उल्बावृतो गर्भो दश वा नव वा मासानन्तः शयित्वा यावद्वाथ जायते

|| iti tu pañcamyāmāhutāvāpaḥ puruṣavacaso bhavantīti sa ulbāvṛto garbho daśa vā nava vā māsānantaḥ śayitvā yāvadvātha jāyate

हिन्दी अर्थ

अथ होवाच जनमित्यादि स- फिर उसने ननसे कहा मानम्‌ । एष वै बहुल आत्मा शादि शर पूववत्‌ है । यह निश्चय ्ैधानरः । बहुरुतरमाकाशस्य ही बहुरसं्ञकं वेशधानर मास्मा है । भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुरे य एतमेवमात्मानं वेदवानर-

English

'For this reason is water in the fifth oblation called Man. This germ, covered in the womb, having dwelt there ten months, or more or less, is born.

अध्याय 82

श्लोक 5.9.2

स जातो यावदायुषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः संभूतो भवति

sa jāto yāvadāyuṣaṃ jīvati taṃ pretaṃ diṣṭamito'gnaya eva haranti yata eveto yataḥ saṃbhūto bhavati

हिन्दी अर्थ

(तुम अन्न भक्षण कर्ते दो ओर प्रियक। दशन करते दो । नो इख प्रकार इस वेदवानर आतमाकी उपास्नना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दशन करता है ओर उसके कुरे ब्रहमतेन होता है । संदेहस्त्वेष संदेहो मध्यमं ¦ रितु यह वैदवानरका संदेह ही दहै । शरीरके मध्यभागको शरीरं वैश्वानरस्य । दिहेर्पच- सदेह कहते है । कथोकि दि स्से तस्माच्छ रयिमान्पुष्टिमानसि

English

'When born, he lives whatever the length of his life may be. When he has departed, his friends carry him, as appointed, to the fire (of the funeral pile) from whence he came, from whence he sprang. Next: V, 10 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।