Chandogya Upanishad
89
अध्याय 89 / 154

Adhyāya 89

प्रपाठक खण्ड 89

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 89

श्लोक 5.16.1

॥ अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वँरयिमान्पुष्टिमानसि

|| atha hovāca buḍilamāśvatarāśviṃ vaiyāghrapadya kaṃ tvamātmānamupāssa ityapa eva bhagavo rājanniti hovācaiṣa vai rayirātmā vaiśvānaro yaṃ tvamātmānamupāsse tasmāttvam̐rayimānpuṣṭimānasi

हिन्दी अर्थ

यथा स॒ आदेश्लो भवति ¦ पिता-वह भदेश जिस पकार यथा सोम्येकेन सपििण्डेन सर्व ्नन्मयं विज्ञात . स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं सत्तिकेत्येव सत्यम्‌ हे सोम्य जिस प्रकार एक गृतिकाके पिण्डके दवाा सपं मृन्मय पदार्थोका ज्ञान हो जाता है कि विकार केव वाणीके आश्रयमू नाममात्र है, सत्य तो केवर पृत्तिका ही हे हे सोभ्य यथा रोक एकेन मृतिपण्डेन करककम्भादिकारण- कारजातं मृन्मयं सदिकारजातं

English

Then he said to Budila Âsvatarâsvi, 'O Vaiyâghrapadya, whom do you meditate on as the Self?' He replied: 'Water only, venerable king.' He said; 'The Self which you meditate on is the Vaisvânara Self, called Rayi (wealth). Therefore are you wealthy and flourishing.

अध्याय 89

श्लोक 5.16.2

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते बस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्यन्मां नागमिष्य इति

atsyannaṃ paśyasi priyamattyannaṃ paśyati priyaṃ bhavatyasya brahmavarcasaṃ kule ya etamevamātmānaṃ vaiśvānaramupāste bastistveṣa ātmana iti hovāca bastiste vyabhetsyadyanmāṃ nāgamiṣya iti

हिन्दी अर्थ

वस्तुतो एकमात्र मृत्तिका ही ६ै।४॥ यथा सोम्येकेन लोहमणिना सर्वं रोहमयं विन्ञातशस्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं रोह हे सोम्य निस प्रकार एक ॒लोहमणिका ज्ञान होनेपर सम्पूण लोहमय ८ सुव्णंमय ) पदाथ जान िमि जाते है, वरयोकिं विकार वाणी- पर्‌ भवम्बित नाममात्र है, सत्य केव घुवणं ही है

English

'You eat food and see your desire, and whoever thus meditates on that Vaisvânara Self, eats food and sees his desire, and has Vedic glory in his house. 'That, however, is but the bladder of the Self, and your bladder would have burst, if you had not come to me.' Next: V, 17 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।