Chandogya Upanishad
91
अध्याय 91 / 154

Adhyāya 91

प्रपाठक खण्ड 91

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 91

श्लोक 5.18.1

॥ तान्होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वाँसोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति

|| tānhovācaite vai khalu yūyaṃ pṛthagivemamātmānaṃ vaiśvānaraṃ vidvām̐so'nnamattha yastvetamevaṃ prādeśamātramabhivimānamātmānaṃ vaiśvānaramupāste sa sarveṣu lokeṣu sarveṣu bhūteṣu sarveṣvātmasvannamatti

हिन्दी अर्थ

इत्युक्तवति पितयाहितर!- पिताके हत प्रकार कहनेपर दूसरा ( शेतकेतु ) बोका- “निश्चय दी वे मेरे पूज्य गुरुदेव इसे नहीं जानते ये यदि वे जानते तो युक्स क्यो न हते । व भाप ही मुञ्चे वह॒ बतसा्ये तव पिताने कहा-- अच्छा, सोम्ब बतखता है

English

Then he said to them all: 'You eat your food, knowing that Vaisvânara Self as if it were many. But he who worships the Vaisvânara Self as a span long, and as identical with himself, he eats food in all worlds, in all beings, in all Selfs.

अध्याय 91

श्लोक 5.18.2

तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः

tasya ha vā etasyātmano vaiśvānarasya mūrdhaiva sutejāścakṣurviśvarūpaḥ prāṇaḥ pṛthagvartmātmā saṃdeho bahulo bastireva rayiḥ pṛthivyeva pādāvura eva vedirlomāni barhirhṛdayaṃ gārhapatyo mano'nvāhāryapacana āsyamāhavanīyaḥ

हिन्दी अर्थ

ये, वे आपकी कदी हुहै इस बातको अर्थात्‌ उम्हं हस बातिका पता होता अनुगत शिष्यके प्रति क्यो न अन्य पक्षक खण्डनपूवक जगतकी सद्रपताका समर्थन हे सोम्य आरम्भमे यह एकमात्र अद्धितीय सत्‌ ही था । उसके विषयमे किन्दीने पूसा भी कहा कि आरम्भे यह एकमात्र अद्वितीय असत्‌ ही था । उस जसतृसे सतो उतपतति होती है

English

'Of that Vaisvânara Self the head is Sutegas (having good light), the eye Visvarûpa (multiform), the breath Prithagvartman (having various courses), the trunk Bahula (full), the bladder Rayi (wealth), the feet the earth, the chest the altar, the hairs the grass on the altar, the heart the Gârhapatya fire, the mind the Anvâhârya fire, the mouth the Âhavanîya fire.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।