Chandogya Upanishad
92
अध्याय 92 / 154

Adhyāya 92

प्रपाठक खण्ड 92

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 92

श्लोक 5.19.1

॥ तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयँ स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृप्यति

|| tadyadbhaktaṃ prathamamāgacchettaddhomīyam̐ sa yāṃ prathamāmāhutiṃ juhuyāttāṃ juhuyātprāṇāya svāheti prāṇastṛpyati

हिन्दी अर्थ

सदेवः-- त्‌" यह अस्तित्व- मात्र वस्तुका बोधक दहै, नोकिं सम्पूणं वेदान्तोसे सक्षम, निर्विरोष तदेतद्विषरीतग्रहणं महावै- इस भकार यदह विपरीतमहणस्प नािकपकषं दशेयित्वा प्रति महावेन शिकका पक दिखलाक्रं जव पेधति- आरुणि उक्षका प्रतिषेध करता है-

English

'Therefore the first food which a man may take, is in the place of Homa. And he who offers that first oblation, should offer it to Prâna (up-breathing), saying Svâhâ. Then Prâna (up-breathing) is satisfied,

अध्याय 92

श्लोक 5.19.2

प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यत्यादित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किंच द्यौश्चादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति

prāṇe tṛpyati cakṣustṛpyati cakṣuṣi tṛpyatyādityastṛpyatyāditye tṛpyati dyaustṛpyati divi tṛpyantyāṃ yatkiṃca dyauścādityaścādhitiṣṭhatastattṛpyati tasyānutṛptiṃ tṛpyati prajayā paśubhirannādyena tejasā brahmavarcaseneti

हिन्दी अर्थ

“कितु है सोम्य ! पेसा कैसे हो सकता है, भल ॥ उत्पत्ति केसे हो सकती है १ अतः है सोम्य आरम्भे 9 एकमात्र कुतस्तु ब्रमाणात्खलु है सो-, पिति है सोम्य देषा फिप मर्दङ्करो जायमानो दृष्टोऽमावा- ननीजाकारसंस्थानम्‌, तद्बीजा- तहैक्षत बह स्था प्रजायेयेति तत्तजोऽखजत ।

English

'If Prâna is satisfied, the eye is satisfied, if the eye is satisfied, the sun is satisfied, if the sun is satisfied, heaven is satisfied, if heaven is satisfied, whatever is under heaven and under the sun is satisfied.. And through their satisfaction he (the sacrificer or eater) himself is satisfied with offspring, cattle, health, brightness, and Vedic splendour.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।