Chandogya Upanishad
98
अध्याय 98 / 154

Adhyāya 98

प्रपाठक खण्ड 98

7 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ7 श्लोक

अध्याय 98

श्लोक 6.1.1

षष्ठोऽध्यायः ॥ श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तँ ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यं न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति

ṣaṣṭho'dhyāyaḥ || śvetaketurhāruṇeya āsa tam̐ ha pitovāca śvetaketo vasa brahmacaryaṃ na vai somyāsmatkulīno'nanūcya brahmabandhuriva bhavatīti

हिन्दी अर्थ

४; अन्य रूपसे संदेह फरिे जते हुए किया जाता था वह तेजका खूप है रेखा उन्होने जाना तथा जो खाया हुभा अन्न तीन पकारका हो जाता है । उपतका जो अयन्त स्थूल भाग दोता है, वह मल हो जाता है, नो मध्यम भाग है बह मांस हो नाता है जीर जो भवन्त सूक्ष्म होता है वह मन हो जाता है यतते जाटरेणापरिना पच्यमानं दो जात॒ है मर्थत्‌ युप्रविरय वागादिकरणसंबातस्य खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका

English

Harih, Om. There lived once Svetaketu Âruneya (the grandson of Aruna). To him his father (Uddâlaka, the son of Aruna) said: 'Svetaketu, go to school; for there is none belonging to our race, darling, who, not having studied (the Veda), is, as it were, a Brâhmana by birth only.'

अध्याय 98

श्लोक 6.1.2

स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विँशतिवर्षः सर्वान्वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तँह पितोवाच

sa ha dvādaśavarṣa upetya caturvim̐śativarṣaḥ sarvānvedānadhītya mahāmanā anūcānamānī stabdha eyāya tam̐ha pitovāca

हिन्दी अर्थ

पीया हुभा ज तीन प्रकारका हो जाता है । उसका जो स्थूल्तम भाग होता है वह मूत्र हो जाताहै, जो मध्यभाग है वह रक्त हो जाता है जीर नो सृक्षमतम भाग है वह प्राण हो नाता है आपः पीताच्वेधा विधीयन्ते षीया हुआ जर तीन प्रकारका हो जाता है। उषका नो स्थूख्तम भाग होता है वह मूत्र हो जाता है,

English

Having begun his apprenticeship (with a teacher) when he was twelve years of age , Svetaketu returned to his father, when he was twenty-four, having then studied all the Vedas,--conceited, considering himself well-read, and stern.

अध्याय 98

श्लोक 6.1.3

श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः येनाश्रुतँ श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति

śvetaketo yannu somyedaṃ mahāmanā anūcānamānī stabdho'syuta tamādeśamaprākṣyaḥ yenāśrutam̐ śrutaṃ bhavatyamataṃ matamavijñātaṃ vijñātamiti kathaṃ nu bhagavaḥ sa ādeśo bhavatīti

हिन्दी अर्थ

खाया हा घृतादि तेन तीन भरकारका हो जत है। उसका जो स्थूखतम भाग होता है वह हड़ी हो नाता है, जो मध्यम भाग है वह्‌ मज्जा हो जाता है भौर जो सूक्ष्मतम भाग है वह वाक्‌ हो क्षितं ्रेधा विधीयते । तस्य यः भकार हो जाता दहै । उसका नो स्थविष्ठो धातुः, तदस्थि मवति । । ्थूरुतम अंस होता है वह हड़ी हो यो मध्यमः, स मजास्थ्यन्तगतः जाता है जो मध्यम भाग ह वह्‌ यत एवम्‌-- । वर्योकि पेसा है--

English

His father said to him: 'Svetaketu, as you are so conceited, considering yourself so well-read, and so stern, my dear, have you ever asked for that instruction by which we hear what cannot be heard, by which we perceive what cannot be perceived, by which we know what cannot be known?'

अध्याय 98

श्लोक 6.1.4

यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातँ स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्

yathā somyaikena mṛtpiṇḍena sarvaṃ mṛnmayaṃ vijñātam̐ syādvācārambhaṇaṃ vikāro nāmadheyaṃ mṛttiketyeva satyam

हिन्दी अर्थ

इसलियि है सोम्य मन अन्नमय है, प्राण जरमय है जौर वाक्‌ तेजोमयी है । एेसा कहे जनेपर श्वेतकेतु बोका--भगवन्‌ आप्‌ सुने पिर समन्ञाइये ॥ तव णारुणिने च्छा सोम्य देषा कहा अन्नमय ह, प्राण कमय है जर मयः प्राणस्तेजोमयी वार्‌ । वाक्‌ तेजोमयी है । नज केबलाममक्षिण आलु- शङ्का--ितु केवर भन भक्षण

English

'What is that instruction, Sir?' he asked. The father replied: 'My dear, as by one clod of clay all that is made of clay is known, the difference being only a name, arising from speech, but the truth being that all is clay;

अध्याय 98

श्लोक 6.1.5

यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातँ स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम्

yathā somyaikena lohamaṇinā sarvaṃ lohamayaṃ vijñātam̐ syādvācārambhaṇaṃ vikāro nāmadheyaṃ lohamityeva satyam

हिन्दी अर्थ

अन्न जादिकता सूक्ष्म माग ही मन जादि हेताहै हे सोम्य मथे जाते हुए दंहीका जो सूक्ष्म माग होता है बह ऊपर इकष्रा हो जाता है; वह धृत होता है योऽणिमाणुभावः स॒ ध्वे; का नो अणिमा सुक््मांश होता हे मावेन गच्छति तस्सर्पिमवति होकर नवनीतहपसे ऊपर भा नाता

English

'And as, my dear, by one nugget of gold all that is made of gold is known, the difference being only a name, arising from speech, but the truth being that all is gold?

अध्याय 98

श्लोक 6.1.6

यथा सोम्यिकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातँ स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कृष्णायसमित्येव सत्यमेवँसोम्य स आदेशो भवतीति

yathā somyikena nakhanikṛntanena sarvaṃ kārṣṇāyasaṃ vijñātam̐ syādvācārambhaṇaṃ vikāro nāmadheyaṃ kṛṣṇāyasamityeva satyamevam̐somya sa ādeśo bhavatīti

हिन्दी अर्थ

यथायं दष्टान्तः-- । जैसा कि यह दृष्टान्त है-- उसी प्रकार है सोम्य ! खाये हुए जनका जो सृकष्म अरा होता है वद्‌ समयक्‌ भकारे उपर भा जाता है, वहं मन हता है

English

'And as, my dear, by one pair of nail-scissors all that is made of iron (kârshnâyasam) is known, the difference being only a name, arising from speech, but the truth being that all is iron,--thus, my dear, is that instruction.'

अध्याय 98

श्लोक 6.1.7

न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिषुर्यद्ध्येतदवेदिष्यन्कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवाँस्त्वेव मे तद्ब्रवीत्विति तथा सोम्येति होवाच

na vai nūnaṃ bhagavantasta etadavediṣuryaddhyetadavediṣyankathaṃ me nāvakṣyanniti bhagavām̐stveva me tadbravītviti tathā somyeti hovāca

हिन्दी अर्थ

एवमेव खलु सोमभ्यात्नस्यौद्‌- उसी भकार है सोम्य अरयमान न अर्थात्‌ भक्षण किये जाते हुए भात नादेरदयमानस्य शज्यमानस्य- आदि अन्नका नो सुक्ष्म मग दे सोम्य । पीये हुए जलका जो सूक्ष्म भाग होता है वह इक होकर ऊपर आ जाता है, वह प्राण होता है अपां सोभ्य पीयमानानां है सोम्य षीम हए जा ब ८ 5 सक्ष्मभाग होवा है वह इकट्म होकर

English

The son said: 'Surely those venerable men (my teachers) did not know that. For if they had known it, why should they not have told it me? Do you, Sir, therefore tell me that.' 'Be it so,' said the father.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।