Chandogya Upanishad
97
अध्याय 97 / 154

Adhyāya 97

प्रपाठक खण्ड 97

5 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ5 श्लोक

अध्याय 97

श्लोक 5.24.1

॥ स य इदमविद्वाग्निहोत्रं जुहोति यथाङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात्तादृक्तत्स्यात्

|| sa ya idamavidvāgnihotraṃ juhoti yathāṅgārānapohya bhasmani juhuyāttādṛktatsyāt

हिन्दी अर्थ

विकारौ नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्‌ आदिल्यका जो रोहित रूप है वह तेजका रूप दहै, नो शु रूप है वह जलका है ओर नो छृष्णरप है वह अन्नका है । इस पक्नार आदिल से जदिव्यत्व निघृत्त हो गया, कर्मोढि आदिवयष्टप विकार वाणीपर

English

'If, without knowing this, one offers an Agnihotra, it would be as if a man were to remove the live coals and pour his libation on dead ashes.

अध्याय 97

श्लोक 5.24.2

अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति

atha ya etadevaṃ vidvānagnihotraṃ juhoti tasya sarveṣu lokeṣu sarveṣu bhūteṣu sarveṣvātmasu hutaṃ bhavati

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमाका जो रोहित खूप है बह तेनका खूप है, नो शुक षप है ब लल्का है ओर जो कृष्ण रूप है वह भन्नका है । इस प्रकार चन्द्रमसे चन्द्रत्व निदत्त हो गया, क्योंकि चन्द्रमाख्प विकार वाणीपर भव- जो रोहित सूप है वह तेजकासख्पर ह, जो शुक्छ रूप है वह जलका है ओर जो हष्ण रूप है वह अन्नका है । इस भ्रकार विचुतूसे विचुवकी निवृत्ति हो गयी, क्योंकि विदुत्रूप विकार वाणीपर्‌ मवलम्बित यदादित्यस्य यच्चन्द्रमसो जो आदि्यका, जो चनमा, जो विधुतकरा इव्यादि अथं पूववत्‌ यदव्य इत्यादि समानम्‌ । समन्ञना चाहिये ।

English

'But he who offers this Agnihotra with a full knowledge of its true purport, he offers it (i.e. he eats food) in all worlds, in all beings, in all Selfs.

अध्याय 97

श्लोक 5.24.3

तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवँहास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति

tadyatheṣīkātūlamagnau protaṃ pradūyetaivam̐hāsya sarve pāpmānaḥ pradūyante ya etadevaṃ vidvānagnihotraṃ juhoti

हिन्दी अर्थ

इस ८ त्रिवरृकरण ) को जाननेवाटे पू॑वतीं महागृहस्थ ओर महा- भ्रोतरियोने यह कहा था कि इस समय हमारे कुमे कोई बात अश्रुत, अमत अथवा अविज्ञात है-एेसा कोई नदीं कद सकेगा, क्योंकि इन इस ( त्रिदृक्तरण ) को जानने. ऽतिकरान्ता महाशाला महा- वारे पूववर्ती अर्थात्‌ अतीकालीन मेवेति विदाश्चकररवि्तातवन्तो य-

English

'As the soft fibres of the Ishîkâ reed, when thrown into the fire, are burnt, thus all his sins are burnt whoever offers this Agnihotra with a full knowledge of its true purport.

अध्याय 97

श्लोक 5.24.4

तस्मादु हैवंविद्यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद्वैश्वानरे हुतँ स्यादिति तदेष श्लोकः

tasmādu haivaṃvidyadyapi caṇḍālāyocchiṣṭaṃ prayacchedātmani haivāsya tadvaiśvānare hutam̐ syāditi tadeṣa ślokaḥ

हिन्दी अर्थ

महागृहस्थः ओर महाश्रोतनियेनि का था। क्याकहाथा? सो बतलते है “उपयुक्त विज्ञानको जाननेवाटे कथम्‌ ? । किस प्रकार जान गये है! खक्ुयदु शुङ्गमिवाभूदिस्यपाशरूपमिति तद्विदाथकरुयंहु तद्विदाचकरुर्यथा लु खल सोभ्येमास्तिखो देवताः पुरुषं ्राप्यं रिच स््िढदेकेका भवति तन्मे विजानी-

English

'Even if he gives what is left of his food to a Kandâla, it would be offered in his (the Kandâla's) Vaisvânara Self. And so it is said in this Sloka:-- 'As hungry children here on earth sit (expectantly) round their mother, so do all beings sit round the Agnihotra, yea, round the Agnihotra.'

अध्याय 97

श्लोक 5.24.5

यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासत एवँ सर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत इति

yatheha kṣudhitā bālā mātaraṃ paryupāsata evam̐ sarvāṇi bhūtānyagnihotramupāsata ityagnihotramupāsata iti

हिन्दी अर्थ

जो कुछ रोदित-सा है वह तेजका रूप है-पेसा उन्न नाना है; नो श्ु्टसा है वह नल्का रूप ॒है-ेसा उन्दोनि नाना है तथा जो ङष्ण-सा है वह अननक रूप है-रेसा उन्होने नाना है तथा नो कुछ विज्ञात-सा है वहं इन देवता्का ही समुदाय है-रे्ा उन्न जाना है । है सोम्य अवतृ मेरेद्वारा यह जान किं क्रिस प्रकार ये तीनो देवता पुरुपको प्राप्त होकर उनमेसे प्रतेक त्रि्रत्‌-तरित्‌

English

'As hungry children here on earth sit (expectantly) round their mother, so do all beings sit round the Agnihotra, yea, round the Agnihotra.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।