Harivamsha Purana
120
अध्याय 120 / 318

Parva 2, Adhyāya 65

55 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ55 श्लोक

अध्याय 120

श्लोक 1

रैवतके पर्वतोपरि रुक्मिण्याः व्रतोद्यापनोत्सवं, तस्मिन् पारिजातं दत्त्वा श्रीकृष्णेन रुक्मिण्याः सम्मानं, नारदेन रुक्मिण्याः सर्वाधिकस्य सौभाग्यस्य प्रशंसा एवं सत्यभामायाः कोपभवने प्रवेशं प्रादुर्भावे मुनिश्रेष्ठ माथुरे चरितं शुभम् ।शृण्वन्नैवाधिगच्छामि तृप्तिं कृष्णस्य धीमतः

raivatake parvatopari rukmiṇyāḥ vratodyāpanotsavaṃ, tasmin pārijātaṃ dattvā śrīkṛṣṇena rukmiṇyāḥ sammānaṃ, nāradena rukmiṇyāḥ sarvādhikasya saubhāgyasya praśaṃsā evaṃ satyabhāmāyāḥ kopabhavane praveśaṃ prādurbhāve muniśreṣṭha māthure caritaṃ śubham | śṛṇvannaivādhigacchāmi tṛptiṃ kṛṣṇasya dhīmataḥ

हिन्दी अर्थ

विष्णुपर्वमों पारिजातहरण और द्वारकामें प्रवेशविषयक रा हुआ॥ ४/॥ पी $ध्याय: स्स्स्‍्स्‍्स्स्स्ससस्स—- में पारिजात-पुष्प देकर श्रीकृष्णद्वारा रुक्मिणीका पकी प्रशंसा तथा सत्यभामाका कोपभवनमें प्रवेश जनमेजयने कहा—मुनिश्रेष्ठ ! मथुरामें अवतार लेकर बुद्धिमान्‌ श्रीकृष्णने जो मड़लमयी लीलाएँ की हैं, उन्हें सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती है

अध्याय 120

श्लोक 2

द्वारकायां निवसतः कृतदारस्य षड्गुणम् ।चरितं ब्रूहि कृष्णस्य सर्वं हि विदितं तव

dvārakāyāṃ nivasataḥ kṛtadārasya ṣaḍguṇam | caritaṃ brūhi kṛṣṇasya sarvaṃ hi viditaṃ tava

हिन्दी अर्थ

द्वारकामें निवास करके सपत्लीक हो जानेपर श्रीकृष्णने जो षड्गुणसम्पन्न चरित्र किये हैं, उन्हें बताइये; क्योंकि श्रीकृष्णकी सारी लीलाएँ आपको विदित हैं

अध्याय 120

श्लोक 3

जनमेजय कृष्णस्य कृतदारस्य भारत ।निबोध चरितं चित्रं तस्यैव सदृशं प्रभो

janamejaya kṛṣṇasya kṛtadārasya bhārata | nibodha caritaṃ citraṃ tasyaiva sadṛśaṃ prabho

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन जनमेजय ! पत्नी-परिग्रह करनेके पश्चात्‌ श्रीकृष्णके जो विचित्र चरित्र हैं, उन्हें सुनो । प्रभो ! वे चरित्र उन्हीं के अनुरूप हैं

अध्याय 120

श्लोक 4

प्राप्तदारो महातेजा वासुदेवः प्रतापवान् ।रुक्मिण्या सहितो देव्या ययौ रैवतकं नृप

prāptadāro mahātejā vāsudevaḥ pratāpavān | rukmiṇyā sahito devyā yayau raivatakaṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

नेश्वर! सपत्नीक होनेके पश्चात्‌ एक समय महातेजस्वी एवं प्रतापी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण महारानी रुक्मिणीके साथ रैवतक पर्वतपर गये

अध्याय 120

श्लोक 5

डपवासावसानं हि रुक्मिण्याः प्रतिपूजयन् ।तर्पयिष्यन् स्वयं विप्राञ्जगाम मधुसूदनः

ḍapavāsāvasānaṃ hi rukmiṇyāḥ pratipūjayan | tarpayiṣyan svayaṃ viprāñjagāma madhusūdanaḥ

हिन्दी अर्थ

उस रुक्मिणी देवीके उपवासब्रतका उद्यापन था। उसका समादर करते हुए भगवान्‌ मधुसूदन स्वयं ही ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे तृ्त करनेके लिये वहाँ गये

अध्याय 120

श्लोक 6

कुमाराः प्रययुस्तत्र पुत्रभ्रातर एव च ।प्रेषिता वासुदेवेन नारदस्याभ्यनुज्ञया

kumārāḥ prayayustatra putrabhrātara eva ca | preṣitā vāsudevena nāradasyābhyanujñayā

हिन्दी अर्थ

ग्य और समग्र धर्म—ये छ; भग (ऐश्वर्य) ही छ: गुण हैं अथवा क्तिका होना—ये परमेधरके स्वरूपभूत गुण ही यहाँ छः गुणोंके देवर्षि नारदकी अनुमतिसे भगवान्‌ वासुदेवके भेजनेपर पदुकुलके कुमार, पुत्र और भाई भी वहाँ गये

अध्याय 120

श्लोक 7

षोडश स्त्रीसहस्राणि जग्मुरेव च धीमतः ।ऋद्धया परमया राजन् विष्णोरेवानुरूपया

ṣoḍaśa strīsahasrāṇi jagmureva ca dhīmataḥ | ṛddhayā paramayā rājan viṣṇorevānurūpayā

हिन्दी अर्थ

तजन्‌ ! परम बुद्धिमानू विष्णुस्वरूप श्रीकृष्णके अनुरूप शत्तम समृद्धिसे सम्पन्न सोलह हजार स्त्रियाँ भी उस उत्सवमें सम्मिलित होनेके लिये गयीं

अध्याय 120

श्लोक 8

ततस्तत्र द्विजातीनां कामान् प्रादादधोक्षजः ।अर्थिनां धर्मनित्यानां बन्दिनामिष्टवादिनाम्

tatastatra dvijātīnāṃ kāmān prādādadhokṣajaḥ | arthināṃ dharmanityānāṃ bandināmiṣṭavādinām

श्लोक 8–9 का हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन ! नदनन्तर वहाँ भगवान्‌ श्रीकृष्णने प्रार्थी, नित्य धर्मपरायण, तनन्दी, प्रियवादी, मालिक नाम-गोत्रसे युक्त, महान्‌ पुण्यकर्मा तथा योनि, विद्या और यज्ञके सम्बन्धसे शुद्ध ब्राह्मणोंको मनोवाज्छित पदार्थ दिये

अध्याय 120

श्लोक 9

कल्याणनामगोत्राणां महतां पुण्यकर्मणाम् ।यौनैः श्रौतैश्च माखैश्च शुद्धानां कुरुनन्दन

kalyāṇanāmagotrāṇāṃ mahatāṃ puṇyakarmaṇām | yaunaiḥ śrautaiśca mākhaiśca śuddhānāṃ kurunandana

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 120

श्लोक 10

तर्पयित्वा द्विजान् कामैरिष्टैरिष्टः सतां गतिः ।ज्ञातीन् सन्तर्पयामास यथार्हं भक्तवत्सलः

tarpayitvā dvijān kāmairiṣṭairiṣṭaḥ satāṃ gatiḥ | jñātīn santarpayāmāsa yathārhaṃ bhaktavatsalaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणोंको भभीष्ट वस्तुओंसे तृत करके सत्पुरुषोंके प्रिय आश्रय भक्तवत्सल भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपने भाई-बन्धुओंको भी यथायोग्य संतुष्ट किया

अध्याय 120

श्लोक 11

उपवासावसानेऽथ भगवान् स विशेषतः ।बहुमेने प्रियां भार्यां रुक्मिणीं भीष्मकात्मजाम्

upavāsāvasāne'tha bhagavān sa viśeṣataḥ | bahumene priyāṃ bhāryāṃ rukmiṇīṃ bhīṣmakātmajām

हिन्दी अर्थ

उपवासके अन्तमें भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपनी प्यारी पत्नी भीष्मकराजकुमारी क्मिणीका विशेषरूपसे बहुत आदर किया

अध्याय 120

श्लोक 12

वसतस्तस्य कृष्णस्य सदारस्यामितौजसः ।सहासीनस्य रुक्मिण्या नारदोऽभ्याययौ मुनिः

vasatastasya kṛṣṇasya sadārasyāmitaujasaḥ | sahāsīnasya rukmiṇyā nārado'bhyāyayau muniḥ

हिन्दी अर्थ

अमिततेजस्वी श्रीकृष्ण पत्रियोंसहित वहाँ रहकर जब छक्मिणीदेवीके साथ बैठे हुए थे, उसी समय नारदमुनि उनके निकट आये

अध्याय 120

श्लोक 13

आगतं चाप्रमेयात्मा मुनिमिन्द्रानुजस्तदा ।शास्त्रदृष्टेन विधिना अर्चयामास केशवः

āgataṃ cāprameyātmā munimindrānujastadā | śāstradṛṣṭena vidhinā arcayāmāsa keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

अप्रमेयस्वरूप इन्द्रके छोटे भाई भगवान्‌ श्रीकृष्णने उस समय वहाँ आये हुए नारदमुनिका शास्त्रोक्त विधिसे पूजन किया

अध्याय 120

श्लोक 14

सोऽर्चितो वासुदेवेन मुनिरर्च्यतमः सताम् ।पारिजाततरोः पुष्पं ददौ कृष्णाय भारत

so'rcito vāsudevena munirarcyatamaḥ satām | pārijātataroḥ puṣpaṃ dadau kṛṣṇāya bhārata

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! भगवान्‌ वासुदेवसे पूजित हो सत्पुरुषोंके परम पूजनीय मुनिने वहाँ श्रीकृष्णके हाथमें पारिजात- वृक्षका एक फूल दिया

अध्याय 120

श्लोक 15

तद्वृक्षराजकुसुमं रुक्यिण्याः प्रददौ हरिः ।पार्श्वस्था सा हि कृष्णस्य भोज्या नरवराभवत्

tadvṛkṣarājakusumaṃ rukyiṇyāḥ pradadau hariḥ | pārśvasthā sā hi kṛṣṇasya bhojyā naravarābhavat

हिन्दी अर्थ

नरश्रेष्ठ ! वृक्षयाज पारिजातके उस फूलको श्रीहरिने रुक्मिणीदेवीके हाथमें दे दिया; क्योंकि वे भोजकुलनन्दिनी रुक्मिणी श्रीकृष्णके पास उनके बगलमें ही बैठी हुई थीं

अध्याय 120

श्लोक 16

प्रतिगृह्य तु तत् पुष्पं कामारणिरनिन्दिता ।शिरस्यमलपत्राक्षी ददौ कृष्णेङ्गितानुगा

pratigṛhya tu tat puṣpaṃ kāmāraṇiraninditā | śirasyamalapatrākṣī dadau kṛṣṇeṅgitānugā

हिन्दी अर्थ

उस पुष्पको हाथमें लेकर प्र्युप्जजननी सती-साध्वी कमलनयनी रक्मिणीने, जो श्रीकृष्णके संकेतका अनुसरण करनेवाली थीं, अपने सिरके बालोंमें लगा लिया

अध्याय 120

श्लोक 17

त्रैलोक्यनृपसर्वस्वं नारायणमनोहरा ।शुशुभे देवपुष्पेण द्विगुणं भैष्मकी तदा

trailokyanṛpasarvasvaṃ nārāyaṇamanoharā | śuśubhe devapuṣpeṇa dviguṇaṃ bhaiṣmakī tadā

हिन्दी अर्थ

त्रिभुवनकी सारी रूपसम्पत्ति जिनमें निहित थी, वे इन नारायणकी पनोहारिणी लक्ष्मीस्वरूपा रुक्मिणी उस देवपुष्पको धारण करनेसे दुगुनी शोभा पाने लगीं

अध्याय 120

श्लोक 18

तां नारदस्तथोवाच मुनिर्ब्रह्मसुतस्तदा ।तवैवौपयिकं पुष्पमेकं देवि पतिव्रते

tāṃ nāradastathovāca munirbrahmasutastadā | tavaivaupayikaṃ puṣpamekaṃ devi pativrate

हिन्दी अर्थ

उस समय ब्रह्मकुमार नारद मुनि उनसे बोले-'देवि! पतित्रते ! यह एकमात्र पुष्प तुम्हारे ही योग्य था

अध्याय 120

श्लोक 19

अलङ्कृतं पुष्पमेतत् संसर्गात् तव सर्वथा ।अत्यर्हा च मता मे त्वमेतत्पुष्पाद् धृतव्रते

alaṅkṛtaṃ puṣpametat saṃsargāt tava sarvathā | atyarhā ca matā me tvametatpuṣpād dhṛtavrate

हिन्दी अर्थ

ब्रतको धारण करनेवाली देवि ! तुम्हारे संसर्गसे यह फूल सर्वथा अलंकृत हो गया। इस पुष्पको धारण करनेसे तुम मेरी दृष्टिमें अत्यन्त पूजनीय हो गयी हो

अध्याय 120

श्लोक 20

कल्याणगुणसम्पन्ने सततं भर्तृवत्सले ।अम्लानमेतत् सततं पुष्पं भवति कामिनि

kalyāṇaguṇasampanne satataṃ bhartṛvatsale | amlānametat satataṃ puṣpaṃ bhavati kāmini

श्लोक 20–21 का हिन्दी अर्थ

कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न पतिवत्सले! कामिनि! यह फूल एक वर्षतक सदा ताजा बना रहता है, कभी कुम्हलाता नहीं है। मोऊध्याय: + ९७ समयका ज्ञान रखनेवाली, अपने गुणोंसे आदर पानेवाली, वक्ताओंमें श्रेष्ठ रुक्मिणी! यह फूल एक सालतक मनोवाज्छित गन्ध प्रदान करता रहता है

अध्याय 120

श्लोक 21

संवत्सरपरं कालं कालज्ञे गुणसम्मते ।ईप्सितानपि गन्धांश्च ददाति वदतां वरे

saṃvatsaraparaṃ kālaṃ kālajñe guṇasammate | īpsitānapi gandhāṃśca dadāti vadatāṃ vare

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 120

श्लोक 22

शीतोष्णे चेच्छिते देवि पुष्पमेतत् प्रयच्छति ।स्रवत्यपि रसान्देवि मनसा काङ्क्षितान्वरान्

śītoṣṇe cecchite devi puṣpametat prayacchati | sravatyapi rasāndevi manasā kāṅkṣitānvarān

हिन्दी अर्थ

देवि! जितनी सर्दी या गर्मी अभीष्ट हो, यह फूल उसे देता रहता है तथा मनमें जिन श्रेष्ठ रसोंको प्राप्त करनेकी अभिलाषा हो, उन्हें भी यह पुष्प स्वयं ही झरता रहता है

अध्याय 120

श्लोक 23

सेव्यमानं च सौभाग्यं ददाति वरवर्णिनि ।स्रवत्यपि तथा गन्धानीप्सितान्प्रीतिवर्द्धनान्

sevyamānaṃ ca saubhāgyaṃ dadāti varavarṇini | sravatyapi tathā gandhānīpsitānprītivarddhanān

हिन्दी अर्थ

वरवर्णिनि! इस पुष्पका सेवन किया जाय तो यह सौभाग्य प्रदान करता है तथा मनकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाली अभीष्ट सुगन्ध झरता रहता है

अध्याय 120

श्लोक 24

यानि यानि च पुष्पाणि त्वं देव्यभिलषिष्यसि ।कुसुमं वृक्षराजस्य तानि तानि प्रदास्यति

yāni yāni ca puṣpāṇi tvaṃ devyabhilaṣiṣyasi | kusumaṃ vṛkṣarājasya tāni tāni pradāsyati

हिन्दी अर्थ

देवि ! तुम जिन-जिन फूलोंकी अभिलाषा करोगी, वृक्षराज पारिजातका यह फूल उन सबको प्रस्तुत कर देगा

अध्याय 120

श्लोक 25

एतदेव भगाधानं धर्मिष्ठे पुत्रदं तथा ।मतिं च नाशुभे धत्ते धार्यमाणं सदा शुभे

etadeva bhagādhānaṃ dharmiṣṭhe putradaṃ tathā | matiṃ ca nāśubhe dhatte dhāryamāṇaṃ sadā śubhe

हिन्दी अर्थ

धर्ममें निष्ठा रखनेवाली शुभे! देवि! यह पुष्प ऐश्वर्यकी प्राप्ति करानेवाला तथा पुत्रदायक है। इसे सदा धारण किया जाय तो यह बुद्धिको अशुभ चिन्तनमें नहीं लगने देता

अध्याय 120

श्लोक 26

यद् यदिच्छसि वर्णं च तत्सर्वं धारयिष्यति ।स्वल्पं वा यदि वा स्थूलं छन्दतस्ते भविष्यति

yad yadicchasi varṇaṃ ca tatsarvaṃ dhārayiṣyati | svalpaṃ vā yadi vā sthūlaṃ chandataste bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

तुम इस फूलको जिस-जिस रूप-रंगमें देखना चाहोगी, वह सब यह धारण कर लेगा। तुम्हारी इच्छाके अनुसार यह छोटा-बड़ा, हलका-भारी अथवा स्थूल-सूक्ष्म हो जायगा

अध्याय 120

श्लोक 27

अनिष्टगन्धहरणमेतत् सद्गन्धवर्द्धनम् ।प्रदीपकर्म रात्रौ च करोति कमलेक्षणे

aniṣṭagandhaharaṇametat sadgandhavarddhanam | pradīpakarma rātrau ca karoti kamalekṣaṇe

हिन्दी अर्थ

कमललोचने ! यह पुष्प अप्रिय गन्धका निवारण तथा उत्तम गन्धकी वृद्धि करनेवाला है। रातके समय यह दीपकका भी काम करता है

अध्याय 120

श्लोक 28

सन्तानकस्रजो मालां पुष्पवस्त्रादि वाच्युतम् ।पुष्पमण्डपमुख्यानि चिन्तितेन प्रदास्यति

santānakasrajo mālāṃ puṣpavastrādi vācyutam | puṣpamaṇḍapamukhyāni cintitena pradāsyati

हिन्दी अर्थ

यह चिन्तन करनेमात्रसे संतान नामक दिव्य वृक्षके फूलोंका हार, माला, फूल, कभी नष्ट न होनेवाले वस्त्र आदि तथा अच्छे-अच्छे फूलोंके मण्डप प्रदान करेगा

अध्याय 120

श्लोक 29

बुभुक्षा वा पिपासा वा ग्लानिर्वाप्यथवा जरा ।देववद्धारयन्त्यास्ते स्वच्छन्देन भविष्यति

bubhukṣā vā pipāsā vā glānirvāpyathavā jarā | devavaddhārayantyāste svacchandena bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

देवताओंके समान इसको धारण करते समय तुम्हें भूख-प्यास, ग्लानि अथवा वृद्धावस्था नहीं प्राप्त होगी। ये सारी वस्तुएँ तुम्हारी इच्छाके अधीन हो जायँगी

अध्याय 120

श्लोक 30

अनुगीतानि गीतानि दास्यत्यपि च चिन्तिते ।सुवादित्रान् सुमधुरांस्तथैव तव सम्मतान्

anugītāni gītāni dāsyatyapi ca cintite | suvāditrān sumadhurāṃstathaiva tava sammatān

हिन्दी अर्थ

इतना ही नहीं, यह चिन्तन करनेपर तुम्हें प्रिय लगनेवाले सुन्दर वाद्यों तथा संगीत-शास्त्रके अनुकूल गीतोंका भी आनन्द प्रदान करेगा

अध्याय 120

श्लोक 31

पूर्णे संवत्सरे देवि पुष्पमेतत् तवान्तिकात् ।निर्वर्त्स्यते तरुवरं समयेन प्रयास्यति

pūrṇe saṃvatsare devi puṣpametat tavāntikāt | nirvartsyate taruvaraṃ samayena prayāsyati

हिन्दी अर्थ

देवि! वर्ष पूर्ण होनेपर यह फूल तुम्हारे पाससे समयानुसार चला जायगा और वृक्षप्रवर पारिजातसे जुड़ जायगा

अध्याय 120

श्लोक 32

कृतिरेषा हि भद्रं ते पारिजातस्य सुप्रभे ।निसर्गतः सर्गकृता सत्कारार्थेऽसुरद्विषाम्

kṛtireṣā hi bhadraṃ te pārijātasya suprabhe | nisargataḥ sargakṛtā satkārārthe'suradviṣām

हिन्दी अर्थ

सुप्रभे ! तुम्हारा कल्याण हो । सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने असुरद्रोही देवताओंके सत्कारके लिये स्वभावतः पारिजातकी ऐसी सामर्थ्य रच दी है

अध्याय 120

श्लोक 33

उमा देववरस्येष्टा हिमालयसुता सती ।धारयन्तीश्वरी नित्यं पुष्पाण्येतानि सुप्रभे

umā devavarasyeṣṭā himālayasutā satī | dhārayantīśvarī nityaṃ puṣpāṇyetāni suprabhe

हिन्दी अर्थ

उत्तम प्रभासे प्रकाशित होनेवाली देवि! देवेश्वर शिवकी प्रियतमा हिमालयपुत्री सती-साध्वी सुरेधरी उमा नित्य इन फूलोंको धारण करती हैं

अध्याय 120

श्लोक 34

अदितिश्च सपौलोमी महेन्द्रसुरतारणी ।सावित्री देवमाता च श्रीश्च सर्वगुणोचिता

aditiśca sapaulomī mahendrasuratāraṇī | sāvitrī devamātā ca śrīśca sarvaguṇocitā

श्लोक 34–35 का हिन्दी अर्थ

देवराज इन्द्रकी माता अदिति, देवेन्द्रपत्ली शची, देवमाता सावित्री, सर्वगुणसम्पन्ना लक्ष्मी तथा अन्य देव- पत्रियाँ, देवगण और वसु देवता—ये सब इस पुष्पको धारण करते हैं। उन सबके लिये भी इस पुष्पके धारणका अधिक-से-अधिक समय एक वर्षतक ही है। समें संशय नहीं है

अध्याय 120

श्लोक 35

देवपत्नयस्तथैवान्या देवाश्च वसुदेवताः ।संवत्सरपरः कालः सर्वेषां न तु संशयः

devapatnayastathaivānyā devāśca vasudevatāḥ | saṃvatsaraparaḥ kālaḥ sarveṣāṃ na tu saṃśayaḥ

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 120

श्लोक 36

षोडशस्त्रीसहस्राणां मध्ये त्वं खलु वर्तसे ।अद्येष्टां वासुदेवस्य वेद्मि त्वां भोजनन्दिनि

ṣoḍaśastrīsahasrāṇāṃ madhye tvaṃ khalu vartase | adyeṣṭāṃ vāsudevasya vedmi tvāṃ bhojanandini

हिन्दी अर्थ

भोजनन्दिनि! आज मुझे मालूम हो गया कि इन सोलह हजार स्त्रियोंके बीच भगवान्‌ वासुदेवको तुम्हीं सबसे अधिक प्रिय हो

अध्याय 120

श्लोक 37

सपत्न्यस्ते गुणोपेते सर्वाः सर्वेश्वरप्रिये ।अवमानावसेकेन त्वया सिक्ताद्य भामिनि

sapatnyaste guṇopete sarvāḥ sarveśvarapriye | avamānāvasekena tvayā siktādya bhāmini

हिन्दी अर्थ

पर्वेश्वरप्रिये ! सद्गुणवती भामिनि! आज तुमने अपनी पारी सौतोंको अपमानके जलसे सींच दिया

अध्याय 120

श्लोक 38

प्रकाशमद्य सौभाग्यमनिवार्यं यशश्च ते ।मन्दारकुसुमं दत्तं यत् ते मधुनिघातिना

prakāśamadya saubhāgyamanivāryaṃ yaśaśca te | mandārakusumaṃ dattaṃ yat te madhunighātinā

हिन्दी अर्थ

आज तुम्हारा अनिवार्य सौभाग्य और यश प्रकाशमें आ गया, क्योंकि भगवान्‌ मधुसूदनने यह मन्दार-पुष्प केवल तुम्हारे हाथमें दिया है

अध्याय 120

श्लोक 39

अद्य सात्राजिती देवी ज्ञास्यते वरवर्णिनी ।सौभाग्याख्यं सदा वेत्ति याऽऽत्मानं सुभगं सती

adya sātrājitī devī jñāsyate varavarṇinī | saubhāgyākhyaṃ sadā vetti yā''tmānaṃ subhagaṃ satī

हिन्दी अर्थ

आज सत्राजित्‌की पुत्री परम सुन्दरी सती सत्यभामा देवी, जो अपने-आपको पदा सबसे अधिक सौभाग्यशालिनी एवं सुभगा समझती ही हैं, जान लेंगी कि किसका सौभाग्य अधिक है

अध्याय 120

श्लोक 40

साम्बमाता च गान्धारी भार्याश्चान्या महात्मनः ।सौभाग्यार्थोद्यताकाङ्क्षामद्य मोक्ष्यन्ति निःस्पृहाः

sāmbamātā ca gāndhārī bhāryāścānyā mahātmanaḥ | saubhāgyārthodyatākāṅkṣāmadya mokṣyanti niḥspṛhāḥ

हिन्दी अर्थ

पाम्बमाता जाम्बवती तथा गान्धारी आदि, जो महात्मा श्रीकृष्णकी अन्य पत्नियाँ हैं, वे आज निःस्पृह होकर पौभाग्यके लिये उठी हुई आकाड्क्षाका परित्याग कर देंगी

अध्याय 120

श्लोक 41

सौभाग्यैकरथो जैत्रस्तव देव्यद्य निःसृतः ।मनोरथरथानां यः सहस्रैरपि दुर्जयः

saubhāgyaikaratho jaitrastava devyadya niḥsṛtaḥ | manoratharathānāṃ yaḥ sahasrairapi durjayaḥ

हिन्दी अर्थ

देवि! आज तुम्हारे सौभाग्यका एकमात्र विजयशील रथ बाहर निकला है, जो सहसत्रों मनोरथरूपी र्थोंके लिये दुर्जय है

अध्याय 120

श्लोक 42

अद्याहमवगच्छामि सर्वथा सर्वशोभने ।आत्मा द्वितीयः कृष्णस्य भोजे त्वमिति भाभिनि

adyāhamavagacchāmi sarvathā sarvaśobhane | ātmā dvitīyaḥ kṛṣṇasya bhoje tvamiti bhābhini

हिन्दी अर्थ

सवज्धिसुन्दरी भामिनि! भोजराजकन्ये ! आज मैं सर्वथा इस बातको समझ गया कि श्रीकृष्णकी दूसरी आत्मा तुम्हीं हो

अध्याय 120

श्लोक 43

त्रैलोक्यरत्नसर्वस्वमददाद् यत् तवाच्युतः ।जीवितातिशयस्तेन त्वया प्राप्तो हरिप्रिये

trailokyaratnasarvasvamadadād yat tavācyutaḥ | jīvitātiśayastena tvayā prāpto haripriye

हिन्दी अर्थ

हरिप्रिये ! तीनों लोकोंके रत्ोंका सर्वस्वरूप यह पारिजात-पुष्प भगवान्‌ श्रीकृष्णने जो तुम्हें ही दिया है, इससे तुमने आज प्राणोंसे भी अधिक उत्कृष्ट वस्तु प्रात्त कर ली है (अथवा तुम्हें आज समस्त सौभाग्यवती स्त्रियोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट जीवन प्राप्त हुआ है ।) '

अध्याय 120

श्लोक 44

नारदेनैवमुक्तं तु तथ्यं वाक्यं नराधिप ।तत्रस्थाः शुश्रुवुः प्रेष्याः प्रेषिताः सत्यभामया

nāradenaivamuktaṃ tu tathyaṃ vākyaṃ narādhipa | tatrasthāḥ śuśruvuḥ preṣyāḥ preṣitāḥ satyabhāmayā

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! सत्यभामाकी भेजी हुई दासियाँ वहाँ खड़ी थीं । उन्होंने नारदजीके द्वारा इस प्रकार कहे गये यथार्थ वचनोंको सुना

अध्याय 120

श्लोक 45

देवीनां च तथान्यासां पत्नीनां च विशाम्पते ।दृष्ट्वा ताः सविशेषं च नारदेनात्युदाहृतम्

devīnāṃ ca tathānyāsāṃ patnīnāṃ ca viśāmpate | dṛṣṭvā tāḥ saviśeṣaṃ ca nāradenātyudāhṛtam

हिन्दी अर्थ

प्रजानाथ ! अन्य देवियों तथा पत्नियोंकी दासियाँ भी वहाँ खड़ी थीं । उन सबको देखकर नारदजीने उपर्युक्त बातें और भी बढ़ा-चढ़ाकर कही थीं

अध्याय 120

श्लोक 46

तच्च श्रुत्वा सुनिखिलं प्रेष्याभिः स्त्रीस्वभावतः ।प्रकाशीकृतमेवासीद् विष्णोरन्तःपुरे तदा

tacca śrutvā sunikhilaṃ preṣyābhiḥ strīsvabhāvataḥ | prakāśīkṛtamevāsīd viṣṇorantaḥpure tadā

हिन्दी अर्थ

उस समय वे सारी बातें सुनकर उन दूतियोंने स्त्रीस्वभावके कारण भगवान्‌ श्रीकृष्णके अन्तःपुरमें उन्हें प्रकट कर ही दिया

अध्याय 120

श्लोक 47

कर्णाकर्णि ततो देव्यः कौलीनमिव सङ्घशः ।मन्त्रयाञ्चक्रिरे हृष्टा रुक्मिण्यतिगुणोदयम्

karṇākarṇi tato devyaḥ kaulīnamiva saṅghaśaḥ | mantrayāñcakrire hṛṣṭā rukmiṇyatiguṇodayam

हिन्दी अर्थ

कानोंकान वह सब जानकर श्रीकृष्णकी अन्य पत्नियाँ झुंड-की-झुंड एकत्र हो हर्षमें भरकर रुव्मिणीके अत्यन्त गुणयुक्त सौभाग्योदयकी चर्चा करने लगीं, मानो कुलके किसी गूढ़ रहस्यपर गुप्त मन्त्रणा कर रही हों

अध्याय 120

श्लोक 48

अर्हेति पुत्रमातेति ज्येष्ठेति च समागताः ।प्रायेण प्रवदन्ति स्म हृष्टा दामोदरस्त्रियः

arheti putramāteti jyeṣṭheti ca samāgatāḥ | prāyeṇa pravadanti sma hṛṣṭā dāmodarastriyaḥ

हिन्दी अर्थ

मो $ध्याय: + ९९ हर्षसे उत्फुल्ल हुई भगवान्‌ दामोदरकी वे स्प्रियाँ एकत्र होकर प्राय: इस प्रकार कहने लगीं कि वे (रुक्मिणी) हम सब लोगोंकी पूजनीया हैं, ज्येष्ठ पुत्रकी माता हैं और स्वयं भी ज्येष्ठा हैं

अध्याय 120

श्लोक 49

ममृषे न सपत्न्यास्तु तत्सौभाग्यगुणोदयम् ।सत्यभामा प्रिया नित्यं विष्णोरतुलतेजसः

mamṛṣe na sapatnyāstu tatsaubhāgyaguṇodayam | satyabhāmā priyā nityaṃ viṣṇoratulatejasaḥ

हिन्दी अर्थ

परंतु अतुल तेजस्वी श्रीकृष्णकी नित्य प्रिया सत्यभामा अपनी सौतके उस सौभाग्य-गुणका उदय नहीं सहन कर सकीं

अध्याय 120

श्लोक 50

रूपयौवनसम्पन्ना स्वसौभाग्येन गर्विता ।अभिमानवती देवी श्रुत्वैवेर्ष्यावशं गता

rūpayauvanasampannā svasaubhāgyena garvitā | abhimānavatī devī śrutvaiverṣyāvaśaṃ gatā

हिन्दी अर्थ

ते रूप और यौवनसे सम्पन्न थीं। उन्हें अपने सौभाग्यपर गर्व था; अत: अभिमानिनी देवी सत्यभामा सौतके अभ्युदयका समाचार सुनते ही ईष्यकि वशीभूत हो गयीं

अध्याय 120

श्लोक 51

समुत्सृजन्ती वसनं सकुङ्कुमं शुचिस्मिता शुक्लतमैकमंशुकम् ।जग्राह रोषाकुलितेन चेतसा वह्नेस्तदा श्रीरिव वर्द्धितेन्धना

samutsṛjantī vasanaṃ sakuṅkumaṃ śucismitā śuklatamaikamaṃśukam | jagrāha roṣākulitena cetasā vahnestadā śrīriva varddhitendhanā

हिन्दी अर्थ

पवित्र मुसकानवाली सत्यभामाने कुंकुममें रँगी हुई साड़ी उतारकर रोषाकुल चित्तसे एकमात्र श्वेत वस्त्र धारण कर लिया। वे उस समय अधिक ईंधन डाल देनेसे बढ़ी हुई अग्रिकी दीतिमती शिखाके समान प्रतीत होती थीं

अध्याय 120

श्लोक 52

दन्दह्यमाना ज्वलनेन वर्द्धता ईर्ष्यासमुत्थेन गतप्रभेव ।क्रोधान्विता क्रोधगृहं विविक्तं विवेश तारेव घनं सतोयम्

dandahyamānā jvalanena varddhatā īrṣyāsamutthena gataprabheva | krodhānvitā krodhagṛhaṃ viviktaṃ viveśa tāreva ghanaṃ satoyam

हिन्दी अर्थ

उनके मनमें इंष्यजनित आग बढ़ती जा रही थी, जिससे अत्यन्त दग्ध होनेके कारण वे श्रीहीन-सी हो गयी थीं। जैसे तारा सजल जलधरकी ओटमें चली जाय, उसी प्रकार रोषभरी सत्यभामाने वहाँ एकान्त कोपभवनमें प्रवेश किया

अध्याय 120

श्लोक 53

बद्ध्वा ललाटे हिमचन्द्रशुक्लं दुकूलपट्टं प्रियरोषचिह्नम् ।पर्यन्तदेशं सरसेन देवी विलिप्य सा लोहितचन्दनेन

baddhvā lalāṭe himacandraśuklaṃ dukūlapaṭṭaṃ priyaroṣacihnam | paryantadeśaṃ sarasena devī vilipya sā lohitacandanena

हिन्दी अर्थ

देवी सत्यभामाने ललाठमें प्रियतमके प्रति रोषसूचक चिह्नकके तौरपर हिम और चन्द्रमाके समान श्वेत दुकूलपट्ट बाँध लिया और उस ललाटके किनारे-किनारे सरस (गीला) लाल चन्दन पोत लिया

अध्याय 120

श्लोक 54

संस्मृत्य संस्मृत्य शिरः सरोषं प्रकम्पमाना समुपोपविष्टा ।दीर्घोपधाने शयनेऽपनीय विभूषणान्येव निबद्धवेणी

saṃsmṛtya saṃsmṛtya śiraḥ saroṣaṃ prakampamānā samupopaviṣṭā | dīrghopadhāne śayane'panīya vibhūṣaṇānyeva nibaddhaveṇī

हिन्दी अर्थ

उन बातोंको याद कर- करके वहाँ बड़े तकियेवाले पलंगपर बैठी हुई वह देवी रोषपूर्वक सिर हिला रही थी और सारे आभूषणोंको उतारकर उसने अपने केशोंको एक बेणीके रूपमें बाँध लिया था

अध्याय 120

श्लोक 55

अकारणार्थेन विकृष्यमाणा प्रेष्याजनस्याभिजनान्वितापि ।विचूर्णयामास कुशेशयं सा निःश्वस्य निःश्वस्य नखैर्नतभ्रूः

akāraṇārthena vikṛṣyamāṇā preṣyājanasyābhijanānvitāpi | vicūrṇayāmāsa kuśeśayaṃ sā niḥśvasya niḥśvasya nakhairnatabhrūḥ

हिन्दी अर्थ

आपको अकारण ही क्रोध हुआ है' ऐसा कहकर जब दासियोंने उन्हें कोप-भवनसे बाहर चलनेके लिये खींचा, उस समय उत्तम कुलमें उत्पन्न (अथवा परिजनोंसे युक्त) होनेपर भी झुकी भौंहोंवाली सत्यभामाने रोषवश बार्म्बार लम्बी साँस खींचकर हस्तगत क्रीड़ाकमलको नखोंसे नोच-नोचकर चूर्ण-सा कर दिया

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.