Harivamsha Purana
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अध्याय 121 / 318

Parva 2, Adhyāya 66

55 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ55 श्लोक

अध्याय 121

श्लोक 1

श्रीकृष्णेन सत्यभामायाः माननं एवं सत्यभामया मानसिकं खेदं प्रकटयित्वा तपस्यायै अनुमतेः पृच्छा उपविष्टं मुनिं ज्ञात्वा रुक्मिण्या सह केशवः ।निश्चक्रामाप्रमेयात्मा व्यपदेशेन सर्ववित्

śrīkṛṣṇena satyabhāmāyāḥ mānanaṃ evaṃ satyabhāmayā mānasikaṃ khedaṃ prakaṭayitvā tapasyāyai anumateḥ pṛcchā upaviṣṭaṃ muniṃ jñātvā rukmiṇyā saha keśavaḥ | niścakrāmāprameyātmā vyapadeśena sarvavit

हिन्दी अर्थ

बैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सब कुछ जाननेवाले अप्रमेयस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्ण नारदजीको रुक्मिणीके साथ बैठा जान किसी दूसरे कार्यके बहाने वहाँसे निकल गये

अध्याय 121

श्लोक 2

जगाम त्वरितश्चैव सत्यभामागृहं महत् ।रम्ये रैवतकोद्देशै निर्मितं विश्वकर्मणा

jagāma tvaritaścaiva satyabhāmāgṛhaṃ mahat | ramye raivatakoddeśai nirmitaṃ viśvakarmaṇā

हिन्दी अर्थ

वहाँसे निकलकर वे बड़ी उतावलीके साथ सत्यभामाके विशाल भवनमें गये, जिसे रैवतक पर्वतके रमणीय शिखरपर साक्षात्‌ विश्वकर्मानि बनाया था

अध्याय 121

श्लोक 3

अभिमानवतीमिष्टां प्राणैरपि गरीयसीम् ।जानन् सात्राजितीं विष्णुर्विवेश शनकैरिव

abhimānavatīmiṣṭāṃ prāṇairapi garīyasīm | jānan sātrājitīṃ viṣṇurviveśa śanakairiva

हिन्दी अर्थ

सत्राजित्‌की पुत्री सत्यभामा उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय एवं आदरणीय थीं, परंतु वे स्वभावसे मानिनी थीं; इस बातको जानकर श्रीकृष्ण धीरे-धीरे उनके भवनमें घुसे

अध्याय 121

श्लोक 4

रुषितामिव तां देवीं स्नेहात् सङ्कल्पयन्निव ।भीतभीतः स शनकैर्विवेश मधुसूदनः

ruṣitāmiva tāṃ devīṃ snehāt saṅkalpayanniva | bhītabhītaḥ sa śanakairviveśa madhusūdanaḥ

हिन्दी अर्थ

मधुसूदन स्नेहवश देवी सत्यभामाके रूठी होनेका विचार करते हुए भयभीत-से होकर धीरे- धीरे उनके महलमें गये

अध्याय 121

श्लोक 5

सेवकं द्वारदेशे तु तिष्ठेत्युक्त्वा विवेश ह ।नारदस्योपचारार्थं प्रद्युम्नं विनियुज्य सः

sevakaṃ dvāradeśe tu tiṣṭhetyuktvā viveśa ha | nāradasyopacārārthaṃ pradyumnaṃ viniyujya saḥ

हिन्दी अर्थ

अपने साथ आये हुए सेवकको दरवाजेपर खड़े रहनेका आदेश दे और नारदजीके सत्कारके लिये प्रद्युप्नको नियुक्त करके वे उस महलके भीतर प्रविष्ट हुए

अध्याय 121

श्लोक 6

स ददर्श प्रियां दूरात् क्रोधागारगतां तदा ।प्रेष्यामिव स्थितां कोपान्निःश्वसन्तीं मुहुर्मुहुः

sa dadarśa priyāṃ dūrāt krodhāgāragatāṃ tadā | preṣyāmiva sthitāṃ kopānniḥśvasantīṃ muhurmuhuḥ

हिन्दी अर्थ

उन्होंने दूरसे ही अपनी प्रिया सत्यभामाको कोपभवनके भीतर गयी हुई देखा। वे क्रोधवश बास्म्बार लम्बी साँस खींच रही थीं और दासीकी भाँति वहाँ पड़ी थीं

अध्याय 121

श्लोक 7

करजाग्रावलीढं तु पङ्कजं मुखपङ्कजे ।संश्लेषयित्वा निःश्वस्य विहसन्तीं पुनः पुनः

karajāgrāvalīḍhaṃ tu paṅkajaṃ mukhapaṅkaje | saṃśleṣayitvā niḥśvasya vihasantīṃ punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

अपने मुखारविन्दपर नखोंसे कुचला हुआ एक कमल सटाये वे बास्म्बार उच्छवास लेती और कभी-कभी हँस पड़ती थीं

अध्याय 121

श्लोक 8

किञ्चिदाकुलिताग्रेण चरणेन वसुन्धराम् ।कृत्वा पृष्ठेऽथ वदनं विहरन्तीं पुनः पुनः

kiñcidākulitāgreṇa caraṇena vasundharām | kṛtvā pṛṣṭhe'tha vadanaṃ viharantīṃ punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

उनके चरणका अग्रभाग कुछ आकुल एवं चल्नल-सा हो रहा था। उस चरणके द्वारा वे पृथ्वीपर रेखा-सी खींचर्ती और पीछेकी ओर मुँह मोड़कर बार-बार घूमती थीं

अध्याय 121

श्लोक 9

करपद्मे पुनः सव्ये मुखपद्मं निवेश्य च ।वनितां चारुसर्वाङ्गीं ध्यायन्तीं कमलेक्षणाम्

karapadme punaḥ savye mukhapadmaṃ niveśya ca | vanitāṃ cārusarvāṅgīṃ dhyāyantīṃ kamalekṣaṇām

हिन्दी अर्थ

फिर बायें करकमलपर अपने मुखारविन्दको रखकर वे किसी चिन्तामें डूब जाती थीं। उनके सारे अद्भ अत्यन्त मनोहर थे। नेत्र कमलोंकी शोभाको छीन लेते थे। वे एक सुन्दरी वनिता थीं

अध्याय 121

श्लोक 10

सरसं चन्दनं गृह्य प्रेष्याहस्तादनिन्दिताम् ।प्रह्लादयित्वा हृदयं क्षिपन्तीं निर्दयं पुनः

sarasaṃ candanaṃ gṛhya preṣyāhastādaninditām | prahlādayitvā hṛdayaṃ kṣipantīṃ nirdayaṃ punaḥ

हिन्दी अर्थ

दासीके हाथसे सरस चन्दन लेकर वे सती साध्वी सत्यभामा पहले तो उस चन्दनकी प्रशंसा करके उस दासीके हृदयको आह्वादित कर देतीं; परंतु पुनः निर्दयतापूर्वक उसको झिड़कने और फटकारने लगती थीं

अध्याय 121

श्लोक 11

पुनरुत्थाय शयनात् पतन्तीं च पुनः पुनः ।तास्ताश्चेष्टाः प्रियायाश्च तथान्या ददृशे हरिः

punarutthāya śayanāt patantīṃ ca punaḥ punaḥ | tāstāśceṣṭāḥ priyāyāśca tathānyā dadṛśe hariḥ

हिन्दी अर्थ

शय्यासे बार-बार उठकर फिर वहीं गिर पड़ती थीं । श्रीहरिने अपनी प्रियतमाकी वे तथा और भी बहुत-सी चेष्टाएँ देखीं

अध्याय 121

श्लोक 12

अवगुण्ठ्य यदा वक्त्रमुपधाने न्यवेशयत् ।इदमन्तरमित्येवं तदा गत्वा जनार्दनः

avaguṇṭhya yadā vaktramupadhāne nyaveśayat | idamantaramityevaṃ tadā gatvā janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

जब उन्होंने अपने मुँहको वस्त्रसे ढककर तकियेपर रखा, तब यही उपयुक्त अवसर है-'ऐसा सोचकर श्रीकृष्ण उनके पास चले गये

अध्याय 121

श्लोक 13

प्रेष्याजनं स संज्ञाय अनाख्येयोऽस्मि संज्ञया ।स शङ्कितप्रचारश्च वारितोऽन्वगमत्स ताम्

preṣyājanaṃ sa saṃjñāya anākhyeyo'smi saṃjñayā | sa śaṅkitapracāraśca vārito'nvagamatsa tām

हिन्दी अर्थ

वहाँ पहुँचकर उन्होंने संकेतसे दासियोंको समझा दिया कि मेरे आनेकी बात इन्हें बताना मत। दासियोंका शंकित होकर इधर- उधर जाना भी रोक दिया। उस दशामें उन्होंने सत्यभामाका अनुसरण किया (अर्थात्‌ वे उनके पीछे जाकर खड़े हो गये)

अध्याय 121

श्लोक 14

ग्रहाय व्यजनं चैव स्थित्वा स परिपार्श्वतः ।शनैरिवासृजद् वातं जहास शनकैरिव

grahāya vyajanaṃ caiva sthitvā sa paripārśvataḥ | śanairivāsṛjad vātaṃ jahāsa śanakairiva

हिन्दी अर्थ

बगलमें खड़े हो हाथमें व्यजन लेकर धीरे-धीरे हवा करने और मुसकराने लगे

अध्याय 121

श्लोक 15

स पारिजातपुष्पस्य संसर्गादनुवासितः ।बभार भगवान् गन्धं दिव्यं मानुषदुर्लभम्

sa pārijātapuṣpasya saṃsargādanuvāsitaḥ | babhāra bhagavān gandhaṃ divyaṃ mānuṣadurlabham

हिन्दी अर्थ

उस समय पारिजात-पुष्पके संसर्गसे सुवासित हुए भगवान्‌ श्रीकृष्ण एक ऐसी दिव्य सुगन्ध धारण करते थे, जो मनुष्यमें दुर्लभ है

अध्याय 121

श्लोक 16

अत्यद्भुतं सुगन्धं च जिघ्रित्वा विस्मयान्विता ।अपावृणोन्मुखं सत्या किमेतदिति चाब्रवीत्

atyadbhutaṃ sugandhaṃ ca jighritvā vismayānvitā | apāvṛṇonmukhaṃ satyā kimetaditi cābravīt

हिन्दी अर्थ

उस अत्यन्त अद्भुत सुगन्धको सुँघकर सत्यभामाको बड़ा विस्मय हुआ । उन्होंने मुँहपरसे कपड़ा हटाया और पूछा, 'यह क्या है ?'

अध्याय 121

श्लोक 17

सोत्थिता पृष्ठतो देवमपश्यन्ती शुचिस्मिता ।पर्यपृच्छदथो प्रेष्या गन्धस्य प्रभवे तदा

sotthitā pṛṣṭhato devamapaśyantī śucismitā | paryapṛcchadatho preṣyā gandhasya prabhave tadā

हिन्दी अर्थ

पवित्र मुसकानवाली सत्यभामा उठकर बैठ गयीं और अपने पीछे खड़े हुए भगवान्‌ श्रीकृष्णको न देखकर दासियोंसे पूछने लगीं, यह सुगन्ध कहाँसे प्रकट हुई है ?'

अध्याय 121

श्लोक 18

ताः पृष्टास्त्वप्रभाषन्त्यो जानुभ्यां धरणीं गताः ।अधोमुख्यस्ततस्तस्थुः कृताञ्जलिपुटास्तदा

tāḥ pṛṣṭāstvaprabhāṣantyo jānubhyāṃ dharaṇīṃ gatāḥ | adhomukhyastatastasthuḥ kṛtāñjalipuṭāstadā

हिन्दी अर्थ

स्वामिनीके इस प्रकार पूछनेपर वे कुछ न बोलीं। धरतीपर घुटने टेककर सिर नीचे किये हाथ जोड़कर बैठी रहीं

अध्याय 121

श्लोक 19

तदपूर्वमदृष्ट्वैव गन्धं मुञ्चति मेदिनी ।कथमेकतरस्तस्या गन्धोऽयमिति तत् खलु

tadapūrvamadṛṣṭvaiva gandhaṃ muñcati medinī | kathamekatarastasyā gandho'yamiti tat khalu

हिन्दी अर्थ

गन्धके आश्रयभूत भगवान्‌को न देखकर वे अनुमान करने लगीं कि पृथ्वी ही उस गन्धको प्रकट कर रही है; परंतु उसकी ऐसी उत्कृष्ट गन्ध कैसे हो गयी, यह बात समझमें नहीं आती

अध्याय 121

श्लोक 20

किन्न्विदं स्यादिति च सा विवेक्षन्ती समन्ततः ।ददृशे केशवं देवी सहसा लोकभावनम्

kinnvidaṃ syāditi ca sā vivekṣantī samantataḥ | dadṛśe keśavaṃ devī sahasā lokabhāvanam

हिन्दी अर्थ

तो फिर यह क्या है ? ऐसा कहकर जब देवी सत्यभामाने चारों ओर दृष्टिपात किया, तब उन्हें सहसा विश्वभावन भगवान्‌ श्रीकृष्ण दिखायी दिये

अध्याय 121

श्लोक 21

युज्यतीति ततोवाच सहसास्राविलेक्षणा ।अवतिक्तेव रोषेण बभूव प्रणयान्विता

yujyatīti tatovāca sahasāsrāvilekṣaṇā | avatikteva roṣeṇa babhūva praṇayānvitā

हिन्दी अर्थ

तब सहसा उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये और वे गदूद कण्ठसे उतना ही कह सकीं कि आपके शरीरसे ऐसी सुगन्धका प्रकट होना उचित ही है। भगवान्‌के प्रति प्रेमभावसे युक्त होनेपर भी वे उस समय रोषसे कुछ तिक्त-सी हो उठी थीं

अध्याय 121

श्लोक 22

सा प्रस्फुरितचार्वोष्ठी निःश्वस्याधोमुखी तदा ।मुहूर्तमसितापाङ्गी तस्थावन्यमुखी शुभा

sā prasphuritacārvoṣṭhī niḥśvasyādhomukhī tadā | muhūrtamasitāpāṅgī tasthāvanyamukhī śubhā

हिन्दी अर्थ

उनके मनोहर ओठ फड़कने लगे। उन्होंने लम्बी साँस खींचकर मुँह नीचे कर लिया; फिर कजरारे नेत्रोंवाली वे शुभलक्षणा देवी दो घड़ीतक दूसरी ओर मुँह करके बैठी रहीं

अध्याय 121

श्लोक 23

निबध्य भ्रुकुटिं वामां सम्यग्विक्षिप्य लोचने ।निवेश्य वदनं हस्ते शोभसीत्यब्रवीद्धरिम्

nibadhya bhrukuṭiṃ vāmāṃ samyagvikṣipya locane | niveśya vadanaṃ haste śobhasītyabravīddharim

हिन्दी अर्थ

फिर अपने मुखको हाथपर रखकर बायीं भौंह चढ़ाये भलीभाँति दृष्टिपात करके वे श्रीहरिसे बोली-'बड़ी शोभा पा रहे हैं आप!

अध्याय 121

श्लोक 24

तस्याः सुस्राव नेत्राभ्यां वारि प्रणयकोपजम् ।कुशेशयपलाशाभ्यामवश्यायजलं यथा

tasyāḥ susrāva netrābhyāṃ vāri praṇayakopajam | kuśeśayapalāśābhyāmavaśyāyajalaṃ yathā

श्लोक 24–25 का हिन्दी अर्थ

इतना कहकर उनके नेत्रोंसे प्रणयकोपजनित जलकी धारा बहने लगी, मानो कमलके दलोंसे तुषारका जल गिर रहा हो॥ सर ॥ तब कमलनयन श्रीकृष्ण अत्यन्त उत्तावले हो डछलकर पलंगपर आ गये और प्रियतमाके मुखारविन्दसे गरते हुए अश्रुजलको उन्होंने दोनों हाथोंमें ले लिया

अध्याय 121

श्लोक 25

समुत्पत्य जलं तत्र पतितं वदनाम्बुजात् ।प्रतिजग्राह पद्माक्षः कराभ्यामतिसत्वरः

samutpatya jalaṃ tatra patitaṃ vadanāmbujāt | pratijagrāha padmākṣaḥ karābhyāmatisatvaraḥ

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 121

श्लोक 26

अथोरसि पतत्तोयं श्रीवत्साङ्कोऽम्बुजेक्षणः ।प्रियानयनजं देवः परिमृज्येदमब्रवीत्

athorasi patattoyaṃ śrīvatsāṅko'mbujekṣaṇaḥ | priyānayanajaṃ devaḥ parimṛjyedamabravīt

हिन्दी अर्थ

श्रीवत्सचिह्से सुशोभित कमलनयन भगवान्‌ गोविन्दने प्रयाके नेत्रोंसे गिरते हुए उस जलको लेकर अपनी छातीमें लगा लिया और इस प्रकार कहा—

अध्याय 121

श्लोक 27

स्रवत्यसितपत्राक्षि किमर्थं तव भामिनि ।तोयं सुन्दरि नेत्राभ्यां पुष्कराभ्यामिवोदकम्

sravatyasitapatrākṣi kimarthaṃ tava bhāmini | toyaṃ sundari netrābhyāṃ puṣkarābhyāmivodakam

हिन्दी अर्थ

नील कमलदलके समान नेत्रोंबाली भामिनि! सुन्दरि! नैसे कमलोंसे जल टपक रहा हो, उसी तरह तुम्हारे मुगल नेत्रोंसे यह अश्रुजल कैसे गिर रहा है ?

अध्याय 121

श्लोक 28

प्रभाते पूर्णचन्द्रस्य मध्याह्ने पङ्कजस्य च ।बिभर्ति तव किं वक्त्रं वपुस्तव मनोहरे

prabhāte pūrṇacandrasya madhyāhne paṅkajasya ca | bibharti tava kiṃ vaktraṃ vapustava manohare

हिन्दी अर्थ

ननोहारिणी प्रिये ! तुम्हारा मुख प्रभातकालके शोभाहीन र्ण चन्द्रमा तथा मध्याह्ककालके मुरझाये हुए कमलका वरूप क्यों धारण करता है ?

अध्याय 121

श्लोक 29

किमर्थं कौङ्कुमं वासो महाराजतमेव च ।नानुगृह्णासि सुश्रोणि शुक्लं वासोऽनुगृह्यते

kimarthaṃ kauṅkumaṃ vāso mahārājatameva ca | nānugṛhṇāsi suśroṇi śuklaṃ vāso'nugṛhyate

हिन्दी अर्थ

सुश्रोणि! कुंकुम भर कुसुम्भ रंगकी साड़ी क्यों नहीं धारण करती हो ? वेत वस्त्रपर ही आज इतना अनुग्रह क्यों है ?

अध्याय 121

श्लोक 30

वासस्येते तवाभीष्टे महारजतकौङ्कुमे ।देवाभिगमनादूर्ध्वं शुक्लं नेष्टं हि तत्स्त्रियाः

vāsasyete tavābhīṣṭe mahārajatakauṅkume | devābhigamanādūrdhvaṃ śuklaṃ neṣṭaṃ hi tatstriyāḥ

हिन्दी अर्थ

गे कुसुम्भ और कुंकुमके रंगमें रैगे हुए युगल वस्त्र हैं, नो तुम्हें बहुत प्रिय हैं। देवपूजा करके देवताओंका विसर्जन कर देनेके बाद स्त्रीके लिये श्वेत वस्त्र धारण फरना अभीष्ट नहीं है

अध्याय 121

श्लोक 31

किञ्चानाभरणं गात्रं सुगात्रि तव कथ्यताम् ।चित्रकस्थानमाक्रान्तं कस्मादवरवर्णिनि

kiñcānābharaṇaṃ gātraṃ sugātri tava kathyatām | citrakasthānamākrāntaṃ kasmādavaravarṇini

हिन्दी अर्थ

सुन्दर अज्ञलोंवाली देवि! तताओ, आज तुम्हारा शरीर आभूषणोंसे भूषित क्यों हीं है ? धूसर कान्तिवाली सत्ये ! जो चित्रक—पत्रभज्ञ- चनाका स्थान है, वह तुम्हारा मुख-मण्डल आज आँसुओंसे लिप्त क्यों हो रहा है?

अध्याय 121

श्लोक 32

श्वेतेन तव पट्टेन वाससा प्रियदर्शने ।ललाटं सेव्यते कस्माच्चन्दनेन सुगन्धिना

śvetena tava paṭṭena vāsasā priyadarśane | lalāṭaṃ sevyate kasmāccandanena sugandhinā

श्लोक 32–33 का हिन्दी अर्थ

प्रियदर्शने ! विशाल यनप्रान्तवाली हृदयवल्लभे ! आज तुम्हारा ललाट श्वेत ट्रवस्त्र और सरस सुगन्धित एवं कमनीय चन्दनद्वारा से सेवित हो रहा है ? प्रिये! किस कारणसे तुम अपने ुखकी प्रभाका उपमर्दन (शोभाका निवारण) कर रही गो अथवा यह सब करके क्यों मेरे मनको अत्यन्त लानि पहुँचा रही हो?

अध्याय 121

श्लोक 33

सरसेनायतापाङ्गि कान्तेन हृदयप्रिये ।प्रभोपमर्दं केनापि कारणेनाननस्य च ।करोषि मम वात्यर्थं मनो ग्लापयसि प्रिये

sarasenāyatāpāṅgi kāntena hṛdayapriye | prabhopamardaṃ kenāpi kāraṇenānanasya ca | karoṣi mama vātyarthaṃ mano glāpayasi priye

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 121

श्लोक 34

प्रसृतश्चन्दनरसः कपोलप्रणयी तव ।पत्रलेखासपत्नत्वं प्राप्तो नातिविराजते

prasṛtaścandanarasaḥ kapolapraṇayī tava | patralekhāsapatnatvaṃ prāpto nātivirājate

हिन्दी अर्थ

यह फैला हुआ न्दन-रस तुम्हारे कपोलोंका प्रेमी बनकर पत्र-रचनाका तज्ु बन बैठा है (अर्थात्‌ जहाँ पत्ररचना होनी चाहिये, हाँ यह चन्दनका बेढंगा रस फैल रहा है), अतः मधिक शोभा नहीं पा रहा है

अध्याय 121

श्लोक 35

रत्नैश्चाभरणैर्मुक्ता तव ग्रीवा न शोभते ।ग्रहनक्षत्ररहिता द्यौरिवाव्यक्तशारदी

ratnaiścābharaṇairmuktā tava grīvā na śobhate | grahanakṣatrarahitā dyaurivāvyaktaśāradī

हिन्दी अर्थ

रत्नमय आभूषणोंसे यूनी हुई तुम्हारी यह ग्रीवा, जहाँ शरदू-ऋतुकी शोभा कट नहीं हुई है, उस ग्रह-नक्षत्रोंके दर्शनसे रहित र्षकालके आकाशकी भाँति शोभा नहीं पा रही है

अध्याय 121

श्लोक 36

पूर्णचन्द्रसपत्नेन स्मेरेणाबहुभाषिणा ।किमु नो भाषसे माद्य मुखेनोत्पलगन्धिना

pūrṇacandrasapatnena smereṇābahubhāṣiṇā | kimu no bhāṣase mādya mukhenotpalagandhinā

हिन्दी अर्थ

म्हारा मुसकराता हुआ मुख पूर्ण चन्द्रमाका प्रतिद्वन्द्वी ना रहता है। यह बहुत कम बोलता और कमलकी- भी सुगन्ध बिखेरता रहता है। ऐसे मनोहर मुखके द्वारा माज तुम मुझसे बात क्यों नहीं करती हो ?'

अध्याय 121

श्लोक 37

अर्द्धाक्ष्णापि हि तावन्मां किमर्थं न निरीक्षसे ।मुञ्चस्येव सनिश्वासं तोयमञ्जनदुर्दिनम्

arddhākṣṇāpi hi tāvanmāṃ kimarthaṃ na nirīkṣase | muñcasyeva saniśvāsaṃ toyamañjanadurdinam

हिन्दी अर्थ

दण्ड “पूरी नहीं तो आधी आँखसे भी मेरी ओर क्यों नहीं देखती हो? लम्बी साँस खींचकर अज्जनसे मलिन हुआ अश्रुजल बहाती ही जा रही हो

अध्याय 121

श्लोक 38

अलमिन्दीवरश्यामे रुदितेन मनस्विनि ।जलमञ्जनकल्माषं मा मोक्षीराननद्विषम्

alamindīvaraśyāme ruditena manasvini | jalamañjanakalmāṣaṃ mā mokṣīrānanadviṣam

हिन्दी अर्थ

नील कमलके समान श्याम कान्तिवाली मनस्विनि! यह रोना-धोना व्यर्थ है। इसे बंद करो। यह अज्ञनमिश्रित अश्रुजल तुम्हारे मुखकी शोभाका वैरी है। इसे अब न बहाओ

अध्याय 121

श्लोक 39

त्वदीयोऽहं यदा देवि ख्यातो जगति किङ्करः ।नाज्ञापयसि किं मां त्वं पुरेव वरवर्णिनि

tvadīyo'haṃ yadā devi khyāto jagati kiṅkaraḥ | nājñāpayasi kiṃ māṃ tvaṃ pureva varavarṇini

हिन्दी अर्थ

देवि! जब सारे संसारमें यह प्रसिद्ध है कि मैं तुम्हारा किड्र हूँ, तब वरवर्णिनि! तुम मुझे पहलेकी ही भाँति अभीष्ट सेवाके लिये आज्ञा क्यों नहीं देती हो ?

अध्याय 121

श्लोक 40

किमकार्षमहं देवि विप्रियं तव भामिनि ।येनातिमात्रमात्मानमायासयसि सुन्दरि

kimakārṣamahaṃ devi vipriyaṃ tava bhāmini | yenātimātramātmānamāyāsayasi sundari

हिन्दी अर्थ

देवि! भामिनि! सुन्दरि! मैंने तुम्हारा कौन-सा ऐसा अप्रिय कार्य (अपराध) किया है, जिससे तुम अपने-आपको अत्यन्त कष्ट दे रही हो

अध्याय 121

श्लोक 41

मनसा कर्मणा वाचा न त्वामतिचराम्यहम् ।सर्वथा सर्वचार्वङ्गि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्

manasā karmaṇā vācā na tvāmaticarāmyaham | sarvathā sarvacārvaṅgi satyametad bravīmyaham

हिन्दी अर्थ

सवज्ञिसुन्दरि! मैं तुमसे यह सर्वथा सत्य कहता हूँ कि मैं मन, वाणी और क्रियाद्वारा भी कभी तुम्हारी आज्ञाका उल्लज्ओन नहीं करता हूँ

अध्याय 121

श्लोक 42

बहुमानोपमान्यासु स्त्रीषु सर्वासु शोभने ।स्नेहश्च बहुमानश्च त्वामृतेऽन्यासु नास्ति मे

bahumānopamānyāsu strīṣu sarvāsu śobhane | snehaśca bahumānaśca tvāmṛte'nyāsu nāsti me

हिन्दी अर्थ

शोभने! यों तो मेरी सभी स्त्रियाँ मेरे द्वारा बहुत सम्मान और आदर पानेकी अधिकारिणी हैं, तथापि मेरा विशेष आदर और स्नेह तुम्हारे सिवा अन्य सब स्त्रयोंमें नहीं है

अध्याय 121

श्लोक 43

नैव त्वां मदनो जह्यान्मृतेऽपि मयि मामकः ।इति मे निश्चितं विद्धि चेतः सुरसुतोपमे

naiva tvāṃ madano jahyānmṛte'pi mayi māmakaḥ | iti me niścitaṃ viddhi cetaḥ surasutopame

हिन्दी अर्थ

देवकन्याओंके समान सुन्दरी सत्यभामे ! मेरा जो तुम्हारे प्रति कामभाव अथवा प्रगाढ़ प्रेम है, वह मेरे मर जानेपर भी तुम्हें नहीं छोड़ सकता—यह मेरी निश्चित धारणा है। इस बातको अच्छी तरह समझ लो

अध्याय 121

श्लोक 44

क्षमादयश्च मेदिन्यां शब्दाद्याश्चाम्बरे गुणाः ।ध्रुवं पङ्कजगर्भाभे त्वयि स्नेहस्तथा मम

kṣamādayaśca medinyāṃ śabdādyāścāmbare guṇāḥ | dhruvaṃ paṅkajagarbhābhe tvayi snehastathā mama

हिन्दी अर्थ

कमलके भीतरी भागकी-सी आभावाली प्राणवल्लभे ! जैसे पृथ्वीमें क्षमा आदि और आकाशमें शब्द आदि गुण नित्य हैं, उसी प्रकार तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह भी अटल है

अध्याय 121

श्लोक 45

रुचिरग्नौ यथा दिव्या प्रभा चैव दिवाकरे ।कान्तिश्च शाश्वती चन्द्रे स्नेहस्त्वयि तथा मम

ruciragnau yathā divyā prabhā caiva divākare | kāntiśca śāśvatī candre snehastvayi tathā mama

हिन्दी अर्थ

जैसे अग्निमें दीप्ति, दिवाकर सूर्यमें दिव्य प्रभा और चन्द्रमामें कान्ति सदा बनी रहती है, उसी प्रकार तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह सदा अविचल है'

अध्याय 121

श्लोक 46

एवंवादिनमात्मेष्टं सत्यभामा जनार्दनम् ।शनैरुवाच नेत्राभ्यां प्रमृज्य सुभगा जलम्

evaṃvādinamātmeṣṭaṃ satyabhāmā janārdanam | śanairuvāca netrābhyāṃ pramṛjya subhagā jalam

हिन्दी अर्थ

जब श्रीकृष्ण इस प्रकार अपनेको प्रिय लगनेवाली बात कह रहे थे, उस समय सौभाग्यशालिनी सत्यभामाने अपने नेत्रोंसे बहते हुए आँसुओंको पोंछकर उनसे धीरेसे इस प्रकार कहा-

अध्याय 121

श्लोक 47

मदीयस्त्वमिति ह्यासीन्मम नित्यं मनः प्रभो ।अद्य साधारणं स्नेहं त्वयि तावद्गतास्म्यहम्

madīyastvamiti hyāsīnmama nityaṃ manaḥ prabho | adya sādhāraṇaṃ snehaṃ tvayi tāvadgatāsmyaham

हिन्दी अर्थ

प्रभो! मेरे मनमें सदा यही विश्वास बना हुआ था कि तुम मेरे हो; परंतु आज यह बात मेरी समझमें आ गयी कि तुम्हारे भीतर मेरे लिये भी साधारण ही स्नेह है (विशेष नहीं)

अध्याय 121

श्लोक 48

नाज्ञासिषमहं पूर्वमनित्यं कालपर्ययम् ।अद्य लोकगतिं कृत्स्नामवगच्छामि न ध्रुवाम्

nājñāsiṣamahaṃ pūrvamanityaṃ kālaparyayam | adya lokagatiṃ kṛtsnāmavagacchāmi na dhruvām

हिन्दी अर्थ

मैं पहले यह नहीं जानती थी कि यहाँका सब कुछ अनित्य है और समय सभी बातोंमें उलट-फेर कर देता है; परंतु अब सम्पूर्ण लोकगतिको ही मैं अस्थिर (क्षणभजुर) समझने लगी हूँ'

अध्याय 121

श्लोक 49

अमृताया द्वितीयोऽपि जन्मौहि मम सर्वथा ।किमत्र बहुनोक्तेन हृदयं वेद्मि तेऽच्युत

amṛtāyā dvitīyo'pi janmauhi mama sarvathā | kimatra bahunoktena hṛdayaṃ vedmi te'cyuta

हिन्दी अर्थ

अच्युत! मैं जबतक जीवित हूँ, तबतक तुम्हीं मेरे लिये द्वितीय (आत्मा, जीवन-सज्गी, सहायक एवं प्रियतम पति) हो। इसी प्रकार तुम्हारे लिये मैं ही द्वितीया ( आत्मा, जीवनसद्धिनी, सहायिका एवं प्राणवल्लभा पत्नी) हूँ। ऐसा मानकर मैंने अपने जन्म और जीवनको पर्वथा सफल समझा था, परंतु अब यहाँ बहुत कहनेसे क्या लाभ? तुम्हारा हदय कैसा है, यह मैं अच्छी तरह जान गयी

अध्याय 121

श्लोक 50

वाङ्मात्रमेव पश्यामि माधुर्यं सम्प्रयुज्यते ।मयि स्नेहश्च कृतकस्तवान्यत्र न कृत्रिमः

vāṅmātrameva paśyāmi mādhuryaṃ samprayujyate | mayi snehaśca kṛtakastavānyatra na kṛtrimaḥ

हिन्दी अर्थ

देखती हूँ कि तुम मेरे पास (केवल मीठी-मीठी बातें ही बनाया करते हो) वाणीमात्रके ही माधुर्यका प्रयोग करते हो। मेरे प्रति तुम्हारा स्नेह कृत्रिम (बनावटी) है; परंतु दूसरी जगह कृत्रिम नहीं स्वाभाविक है

अध्याय 121

श्लोक 51

ऋजुस्वभावां भक्तां च सर्वथा पुरुषोत्तम ।अवजानासि जानन् मां कैतवीं वृत्तिमास्थितः

ṛjusvabhāvāṃ bhaktāṃ ca sarvathā puruṣottama | avajānāsi jānan māṃ kaitavīṃ vṛttimāsthitaḥ

हिन्दी अर्थ

पुरुषोत्तम! मेरा प्वभाव सरल है और सर्वथा तुम्हारे प्रति भक्तिभाव [खती हूँ-इस बातको जानते हुए तुम छल-कपटका आश्रय लेकर मेरी अवहेलना करते हो

अध्याय 121

श्लोक 52

एतावदस्तु पर्याप्तं दृष्टं द्रष्टव्यमव्ययम् ।श्रुतं चाप्यद्य यच्छ्राव्यं दृष्टः स्नेहफलोदयः

etāvadastu paryāptaṃ dṛṣṭaṃ draṣṭavyamavyayam | śrutaṃ cāpyadya yacchrāvyaṃ dṛṣṭaḥ snehaphalodayaḥ

हिन्दी अर्थ

अस्तु, इतना ही बहुत है। जो कुछ अपरिवर्तनीय दृश्य देखना था, वह मैंने देख लिया। जो सुननेयोग्य बात थी, तह मैंने सुन ली। तुम्हारे स्नेहके फलका उदय कहाँ केस प्रकार होता है, यह भी प्रत्यक्ष हो गया

अध्याय 121

श्लोक 53

यदि त्वहमनुग्राह्या मामनुज्ञातुमर्हसि ।तपस्येऽहं परं कृत्वा निश्चयं पुरुषोत्तम

yadi tvahamanugrāhyā māmanujñātumarhasi | tapasye'haṃ paraṃ kṛtvā niścayaṃ puruṣottama

हिन्दी अर्थ

पुरुषोत्तम! यदि मैं तुम्हारे अनुग्रहका पात्र होऊँ तो मुझे आज्ञा दे दो। मैं उत्तम निश्चय लेकर तपस्या करूँगी

अध्याय 121

श्लोक 54

भर्तुश्छन्देन नारीणां तपो वा व्रतकानि वा ।निष्फलं खलु यद् भर्तुरच्छन्देन क्रियेत हि

bhartuśchandena nārīṇāṃ tapo vā vratakāni vā | niṣphalaṃ khalu yad bharturacchandena kriyeta hi

हिन्दी अर्थ

क्योंकि पतिकी इच्छासे ही किये गये गारियोंके तप अथवा व्रत सफल होते हैं। स्वामीकी च्छाके बिना जो कुछ भी किया जाय, वह निश्चय ही निष्फल हो जाता है'

अध्याय 121

श्लोक 55

इतीदमुक्त्वा पुनरेव शोभना मुमोच तोयं नयनोद्भवं सती ।ग्रहाय पीतं हरिवाससः शुभा पटान्तमाधाय मुखे शुचिस्मिता

itīdamuktvā punareva śobhanā mumoca toyaṃ nayanodbhavaṃ satī | grahāya pītaṃ harivāsasaḥ śubhā paṭāntamādhāya mukhe śucismitā

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर पवित्र पुसकानवाली सुन्दरी शुभलक्षणा सती सत्यभामा भगवान्‌ श्रीकृष्णके पीतवस्त्रका अज्ञल ले उसीसे अपने मुँहको ढककर पुन: नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.