Harivamsha Purana
16
अध्याय 16 / 318

Parva 1, Adhyāya 16

46 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ46 श्लोक

अध्याय 16

श्लोक 1

श्राद्धकल्प-जनमेजय द्वारा पिता का श्राद्ध तथा पितृस्वरूपनिर्णयसम्बन्धी प्रश्न, शन्तनु का अपने श्राद्ध में स्वयं हाथ बढाकर भीष्म से पिण्ड माँगना कथं वै श्राद्धदेवत्वमादित्यस्य विवस्वतः ।श्रोतुमिच्छामि विप्राग्र्य श्राद्धस्य च परं विधिम्

śrāddhakalpa-janamejaya dvārā pitā kā śrāddha tathā pitṛsvarūpanirṇayasambandhī praśna, śantanu kā apane śrāddha meṃ svayaṃ hātha baḍhākara bhīṣma se piṇḍa mā~ganā kathaṃ vai śrāddhadevatvamādityasya vivasvataḥ | śrotumicchāmi viprāgrya śrāddhasya ca paraṃ vidhim

हिन्दी अर्थ

9ध्याय:———ाण द्ध तथा पितृस्वरूपनिर्णयसम्बन्धी प्रश्न, थ बढ़ाकर भीष्ससे पिण्ड माँगना जनमेजयने पूछा—द्विजश्रेष्ठ! अदितिनन्दन भगवान्‌ सूर्यके पुत्र यम श्राद्धदेव क्यों कहलाते हैं ? और श्राद्धकी उत्तम विधि क्या है? इसे मैं सुनना चाहता हूँ

अध्याय 16

श्लोक 2

पितॄणामादिसर्गं च क एते पितरः स्मृताः ।एवं च श्रुतमस्माभिः कथ्यमानं द्विजातिभिः

pitṝṇāmādisargaṃ ca ka ete pitaraḥ smṛtāḥ | evaṃ ca śrutamasmābhiḥ kathyamānaṃ dvijātibhiḥ

श्लोक 2–3 का हिन्दी अर्थ

पितरोंकी आदि सृष्टि कैसे हुई? ये पितर कौन हैं ? हमने ब्राह्मणोंके मुखसे यह बात सुनी है कि जो पितर स्वर्गमें स्थित हैं, वे देवताओंके भी देवता हैं । वेदके जाननेवाले भी ऐसा ही कहते हैं। अत: मैं इस बातको भलीभाँति जानना चाहता हूँ

अध्याय 16

श्लोक 3

स्वर्गस्थाः पितरो ये च देवानामपि देवताः ।इति वेदविदः प्राहुरेतदिच्छामि वेदितुम्

svargasthāḥ pitaro ye ca devānāmapi devatāḥ | iti vedavidaḥ prāhuretadicchāmi veditum

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 16

श्लोक 4

ये च तेषां गणाः प्रोक्ता यच्च तेषां बलं परम् ।यथा च कृतमस्माभिः श्राद्धं प्रीणाति वै पितॄन्

ye ca teṣāṃ gaṇāḥ proktā yacca teṣāṃ balaṃ param | yathā ca kṛtamasmābhiḥ śrāddhaṃ prīṇāti vai pitṝn

श्लोक 4–5 का हिन्दी अर्थ

उनके जो गण कहे गये हैं, उनका जो परम बल है और हमारा किया हुआ श्राद्ध जिस प्रकार उन्हें तृ्त करता है तथा जो पितर प्रसन्न होकर मनुष्योंका कल्याण करते हैं, उन सबको एवं उत्तम पितृसर्गको मैं जानना चाहता हूँ

अध्याय 16

श्लोक 5

प्रीताश्च पितरो ये स्म श्रेयसा योजयन्ति हि ।एवं वेदितुमिच्छामि पितॄणां सर्गमुत्तमम्

prītāśca pitaro ye sma śreyasā yojayanti hi | evaṃ veditumicchāmi pitṝṇāṃ sargamuttamam

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 16

श्लोक 6

हन्त ते कथयिष्यामि पितॄणां सर्गमुत्तमम् ।यथा च कृतमस्माभिः श्राद्धं प्रीणाति वै पितॄन् ।प्रीताश्च पितरो ये स्म श्रेयसा योजयन्ति हि

hanta te kathayiṣyāmi pitṝṇāṃ sargamuttamam | yathā ca kṛtamasmābhiḥ śrāddhaṃ prīṇāti vai pitṝn | prītāśca pitaro ye sma śreyasā yojayanti hi

श्लोक 6–8 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी बोले—बहुत अच्छा, मैं तुमसे पितरोंके उत्तम सर्गका वर्णन करूँगा, हमारा किया हुआ श्राद्ध जिस प्रकार पितरोंको तृप्त करता है तथा जो पितर श्राद्धसे संतुष्ट होकर हमें कल्याणके भागी बनाते हैं, उनका परिचय दूँगा। पूर्वकालमें भीष्मके पूछनेपर मार्कण्डेयजीने उनसे इस विषयका वर्णन किया था। फिर महाभारतकालमें शरशय्यापर पड़े हुए भीष्मजीसे धर्मराज युधिष्टिरने भी पहले ऐसा ही प्रश्न किया था, जैसा इस समय तुम मुझसे पूछ रहे हो। भीष्मजीने युधिष्टिको जिस प्रकार उत्तर दिया था, वह सब मैं तुम्हें क्रमश: बताऊँगा। पहले मार्कण्डेयजीके पूछनेपर सनत्कुमारजीने जो उपदेश दिया था, वही युधिष्टि और भीष्मके संवादमें कहा गया है

अध्याय 16

श्लोक 7

मार्कण्डेयेन कथितं भीष्माय परिपृच्छते ।अपृच्छद् धर्मराजो हि शरतल्पगतं पुरा ।एवमेव पुरा प्रश्नं यन्मां त्वं परिपृच्छसि

mārkaṇḍeyena kathitaṃ bhīṣmāya paripṛcchate | apṛcchad dharmarājo hi śaratalpagataṃ purā | evameva purā praśnaṃ yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi

अर्थ श्लोक 6 के साथ

English

O descendant of Bharata, in his seventh birth Panchika was the fifth, Kandarika the sixth and Brahmadatta the seventh. The remaining ganders were born as brothers in a poor Srotrya family in the city of Kāmpilya (27–28). Their names were Dhritimān, Sumanā, Vidvān and Tatwadarshi. They were well read in the Vedas and gifted with keen observation (29). They were all endowed with the recollection of their pristine birth. When after having attained to the consummation of Yoga practices and welcomed their father they were about to depart he said to them "Verily by your renouncing me you will commit a mighty iniquity. How can you (all) depart, without removing my poverty and satisfying the other duties of a son viz—the spreading of progeny, the performing of Srāddha at Gya, and attending upon me (in my old age) (30-32)."

अध्याय 16

श्लोक 8

तत् तेऽनुपूर्व्या वक्ष्यामि भीष्मेणोदाहृतं यथा ।गीतं सनत्कुमारेण मार्कण्डेयाय पृच्छते

tat te'nupūrvyā vakṣyāmi bhīṣmeṇodāhṛtaṃ yathā | gītaṃ sanatkumāreṇa mārkaṇḍeyāya pṛcchate

अर्थ श्लोक 6 के साथ

English

The twice-born ones again said to their father:—"We will make arrangements by which you will live (33). Do you go to the sinless king Brahmadatta and recite before him and his minister the Sloka pregnant with great import (34). He will then, with great joy, confer upon you many villages and desired-for objects. Therefore O father, go there" (35). Having said this and worshipped their father they attained to beatitude as the result of the practices of Yoga (36).

अध्याय 16

श्लोक 9

पुष्टिकामेन धर्मज्ञ कथं पुष्टिरवाप्यते ।एतद्वै श्रोतुमिच्छामि किं कुर्वाणो न शोचति

puṣṭikāmena dharmajña kathaṃ puṣṭiravāpyate | etadvai śrotumicchāmi kiṃ kurvāṇo na śocati

हिन्दी अर्थ

युधिष्टिने पूछा—धर्मज्ञ! पुष्टि चाहनेवाला पुरुष किस प्रकार पुष्टि पा सकता है और कैसा कर्म करनेसे मनुष्यको शोक नहीं करना पड़ता? इसे मैं सुनना चाहता हूँ

अध्याय 16

श्लोक 10

श्राद्धैः प्रीणाति हि पितॄन् सर्वकामफलैस्तु यः ।तत्परः प्रयतः श्राद्धी प्रेत्य चेह च मोदते

śrāddhaiḥ prīṇāti hi pitṝn sarvakāmaphalaistu yaḥ | tatparaḥ prayataḥ śrāddhī pretya ceha ca modate

हिन्दी अर्थ

भीष्मजीने कहा—युधिष्टि! जो. समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले श्राद्धोंद्वारा तत्पर होकर पितरोंको तृप्त करता है, वह पितरोंकी प्रीतिमें लीन रहनेवाला श्राद्धकर्ता इस संसारमें आनन्दभागी होता है और मरनेके बाद परलोकमें सुख भोगता है

English

⁴⁷ There are two classes of Brahmins, one of them who are the superior is called _Kulsa_ and another next to them is called

अध्याय 16

श्लोक 11

पितरो धर्मकामस्य प्रजाकामस्य च प्रजाम् ।पुष्टिकामस्य पुष्टिं च प्रयच्छन्ति युधिष्ठिर

pitaro dharmakāmasya prajākāmasya ca prajām | puṣṭikāmasya puṣṭiṃ ca prayacchanti yudhiṣṭhira

हिन्दी अर्थ

युधिष्टिर ! पितर धर्म चाहनेवालेको धर्म, संतान चाहने- वालेको संतान और पुष्टि चाहनेवालेको पुष्टि भी प्रदान करते हैं

अध्याय 16

श्लोक 12

वर्तन्ते पितरः स्वर्गे केषाञ्चिन्नरके पुनः ।प्राणिनां नियतं वापि कर्मजं फलमुच्यते

vartante pitaraḥ svarge keṣāñcinnarake punaḥ | prāṇināṃ niyataṃ vāpi karmajaṃ phalamucyate

हिन्दी अर्थ

युथिष्टिरने पूछा—किन्हींके पितर स्वर्गमें रहते हैं और किन्हींके नरकमें; क्योंकि यह बात प्रसिद्ध है कि प्राणियोंको (अपने) कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाला फल अवश्य भोगना पड़ता है

अध्याय 16

श्लोक 13

श्राद्धानि चैव कुर्वन्ति फलकामा सदा नराः ।अभिसन्धाय पितरं पितुश्च पितरं तथा

śrāddhāni caiva kurvanti phalakāmā sadā narāḥ | abhisandhāya pitaraṃ pituśca pitaraṃ tathā

श्लोक 13–14 का हिन्दी अर्थ

फल चाहनेवाले पुरुष सदा पिता, पितामह और प्रपितामहकों लक्ष्य करके श्राद्ध करते हैं। सर्वदा इन तीन पिण्डोंमें ही दिये गये श्राद्ध पितरोंको कैसे प्राप्त होते हैं 2

अध्याय 16

श्लोक 14

पितुः पितामहं चैव त्रिषु पिण्डेषु नित्यशः ।तानि श्राद्धानि दत्तानि कथं गच्छन्ति वै पितॄन्

pituḥ pitāmahaṃ caiva triṣu piṇḍeṣu nityaśaḥ | tāni śrāddhāni dattāni kathaṃ gacchanti vai pitṝn

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 16

श्लोक 15

कथं च शक्तास्ते दातुं नरकस्थाः फलं पुनः ।के वा ते पितरोऽन्ये स्म कान् यजामो वयं पुनः

kathaṃ ca śaktāste dātuṃ narakasthāḥ phalaṃ punaḥ | ke vā te pitaro'nye sma kān yajāmo vayaṃ punaḥ

हिन्दी अर्थ

और वे पितर (जब स्वयं) नरकमें निवास कर रहे हैं, तब वे फल भी कैसे दे सकते हैं ? अथवा यदि वे पितर उनसे भिन्न हैं तो कौन हैं—उनका क्या परिचय है? हम किन पितरोंकी पूजा करें ?

English

⁴⁹ A Brahman versed in the Yayurveda.

अध्याय 16

श्लोक 16

देवा अपि पितॄन्स्वर्गे यजन्तीति च नः श्रुतम् ।एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महाद्युते

devā api pitṝnsvarge yajantīti ca naḥ śrutam | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ vistareṇa mahādyute

हिन्दी अर्थ

हमने सुना है कि स्वर्गमें (रहनेवाले) देवता भी पितरोंका पूजन करते हैं । महाद्युते ! इन सब बातोंको मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ

अध्याय 16

श्लोक 17

स भवान् कथयत्वेतां कथाममितबुद्धिमान् ।यथा दत्तं पितॄणां वै तारणायेह कल्पते

sa bhavān kathayatvetāṃ kathāmamitabuddhimān | yathā dattaṃ pitṝṇāṃ vai tāraṇāyeha kalpate

हिन्दी अर्थ

पितरोंके निमित्त किया हुआ श्राद्ध किस प्रकार प्राणियोंका उद्धार करता है? इस कथाका आप वर्णन कीजिये, क्योंकि आपकी बुद्धि अथाह है

अध्याय 16

श्लोक 18

अत्र ते कीर्तयिष्यामि यथाश्रुतमरिन्दम ।ये च ते पितरोऽन्ये स्म यान्यजामो वयं पुनः ।पित्रा मम पुरा गीतं लोकान्तरगतेन वै

atra te kīrtayiṣyāmi yathāśrutamarindama | ye ca te pitaro'nye sma yānyajāmo vayaṃ punaḥ | pitrā mama purā gītaṃ lokāntaragatena vai

हिन्दी अर्थ

भीष्मजीने कहा—शत्रुमर्दन ! हमलोग जिनकी पूजा करते हैं, इस विषयको जैसा मैंने सुना है, वह सब तुमसे कहूँगा। जो अन्य (पिंता-पितामह आदिसे भिन्न) पितर हैं, इस विषयमें मेरे परलोकवासी पिताने भी गाथा पायी है

अध्याय 16

श्लोक 19

श्राद्धकाले मम पितुर्मया पिण्डः समुद्यतः ।तं पिता मम हस्तेन भित्त्वा भूमिमयाचत

śrāddhakāle mama piturmayā piṇḍaḥ samudyataḥ | taṃ pitā mama hastena bhittvā bhūmimayācata

हिन्दी अर्थ

श्राद्धके समय जब मैं अपने पिताको पिण्ड देने लगा, तब उनका हाथ भूमिको फाड़कर निकल आया और वे उस हाथमें ही मुझसे पिण्ड माँगने लगे

English

⁴⁹ A Brahman versed in the Yayurveda.

अध्याय 16

श्लोक 20

हस्ताभरणपूर्णेन केयूराभरणेन च ।रक्ताङ्गुलितलेनाथ यथा दृष्टः पुरा मया

hastābharaṇapūrṇena keyūrābharaṇena ca | raktāṅgulitalenātha yathā dṛṣṭaḥ purā mayā

हिन्दी अर्थ

उनका बाजूबंद आदि हाथके भाभूषणोंसे विभूषित और लाल-लाल अज्भुलियोंवाला त्रह हाथ वैसा ही था जैसा मैंने पहले (जीवित अवस्थामें ) देखा था

अध्याय 16

श्लोक 21

नैष कल्पे विधिर्दृष्ट इति सञ्चिन्त्य चान्यहम् ।कुशेष्वेव ततः पिण्डं दत्तवानविचारयन्

naiṣa kalpe vidhirdṛṣṭa iti sañcintya cānyaham | kuśeṣveva tataḥ piṇḍaṃ dattavānavicārayan

हिन्दी अर्थ

उस समय मैंने विचारा कि कल्पसूत्रोंमें तो मैंने ऐसी विधि कहीं नहीं देखी है, यह विचारकर मैंने बिना कुछ परवा किये ही पिण्डको कुशाओंपर ही रख दिया

अध्याय 16

श्लोक 22

ततः पिता मे सुप्रीतो वाचा मधुरया तदा ।उवाच भरतश्रेष्ठ प्रीयमाणो मयानघ

tataḥ pitā me suprīto vācā madhurayā tadā | uvāca bharataśreṣṭha prīyamāṇo mayānagha

हिन्दी अर्थ

निष्पाप भरतश्रेष्ठ! उस समय मेरे द्वारा संतुष्ट किये गये पिता परम प्रसन्न हुए और मधुर वाणीमें मुझसे कहने लगे

English

⁴⁹ A Brahman versed in the Yayurveda.

अध्याय 16

श्लोक 23

त्वया दायादवानस्मि कृतार्थोऽमुत्र चेह च ।सत्पुत्रेण त्वया पुत्र धर्मज्ञेन विपश्चिता

tvayā dāyādavānasmi kṛtārtho'mutra ceha ca | satputreṇa tvayā putra dharmajñena vipaścitā

हिन्दी अर्थ

पुत्र! तू धर्मज्ञ और विद्वान्‌ है। तुझ-सरीखा सुपुत्र होनेसे मुझे पुत्रवान्‌ होनेका फल मिल गया तथा मैं इस लोक और परलोक—दोनोंमें कृतार्थ हो गया

English

⁴⁹ A Brahman versed in the Yayurveda.

अध्याय 16

श्लोक 24

मया तु तव जिज्ञासा प्रयुक्तैषा दृढव्रत ।व्यवस्थानं तु धर्मेषु कर्तुं लोकस्य चानघ

mayā tu tava jijñāsā prayuktaiṣā dṛḍhavrata | vyavasthānaṃ tu dharmeṣu kartuṃ lokasya cānagha

हिन्दी अर्थ

दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्य- व्रतका पालन करनेवाले निष्पाप भीष्म! धर्ममें लोगोंकी आस्था दूढ़ करनेके लिये ही मैंने यह तेरी परीक्षा ली है

अध्याय 16

श्लोक 25

यथा चतुर्थं धर्मस्य रक्षिता लभते फलम् ।पापस्य हि तथा मूढः फलं प्राप्नोत्यरक्षिता

yathā caturthaṃ dharmasya rakṣitā labhate phalam | pāpasya hi tathā mūḍhaḥ phalaṃ prāpnotyarakṣitā

हिन्दी अर्थ

धर्मकी रक्षा करनेवालेको जैसे धर्मका चौथाई फल मिलता है, इसी प्रकार धर्मकी रक्षा न करनेवाला मूढ़ मनुष्य पापके चौथाई फलको पाता है

English

⁴⁹ A Brahman versed in the Yayurveda.

अध्याय 16

श्लोक 26

प्रमाणं यद्धि कुरुते धर्माचारेषु पार्थिवः ।प्रजास्तदनुवर्तन्ते प्रमाणाचरितं सदा

pramāṇaṃ yaddhi kurute dharmācāreṣu pārthivaḥ | prajāstadanuvartante pramāṇācaritaṃ sadā

हिन्दी अर्थ

धर्मविषयक आचारमें राजा जिस बातको प्रामाणिक बता देता है, प्रजा उस प्रमाणभूत राजाके आचरणका अनुकरण करती है

English

⁴⁹ A Brahman versed in the Yayurveda.

अध्याय 16

श्लोक 27

त्वया च भरतश्रेष्ठ वेदधर्माश्च शाश्वताः ।कृताः प्रमाणं प्रीतिश्च मम निर्वर्तितातुला

tvayā ca bharataśreṣṭha vedadharmāśca śāśvatāḥ | kṛtāḥ pramāṇaṃ prītiśca mama nirvartitātulā

हिन्दी अर्थ

भरतश्रेष्ठ! तूने सनातन वैदिक धर्मको ही प्रमाण माना है, इसलिये मैं तुमपर बहुत ही प्रसन्न हुआ हूँ

English

⁴⁹ A Brahman versed in the Yayurveda.

अध्याय 16

श्लोक 28

तस्मात् तवाहं सुप्रीतः प्रीत्या च वरमुत्तमम् ।ददामि तं प्रतीच्छ त्वं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम्

tasmāt tavāhaṃ suprītaḥ prītyā ca varamuttamam | dadāmi taṃ pratīccha tvaṃ triṣu lokeṣu durlabham

हिन्दी अर्थ

अब इस प्रसन्नताके कारण मैं तुम्हें श्रेष्ठ वर देना चाहता हूँ। तू तीनों लोकोंमें दुर्लभ वरको ग्रहण कर

अध्याय 16

श्लोक 29

न ते प्रभविता मृत्युर्यावज्जीवितुमिच्छसि ।त्वत्तोऽभ्यनुज्ञां सम्प्राप्य मृत्युः प्रभविता तव

na te prabhavitā mṛtyuryāvajjīvitumicchasi | tvatto'bhyanujñāṃ samprāpya mṛtyuḥ prabhavitā tava

हिन्दी अर्थ

तू जबतक जीवित रहना चाहेगा, तबतक तुझपर मृत्युका प्रभाव न होगा। तेरी आज्ञा पानेपर ही तुझपर मृत्यु प्रभाव डाल सकेगी

English

⁴⁹ A Brahman versed in the Yayurveda.

अध्याय 16

श्लोक 30

किं वा ते प्रार्थितं भूयो ददामि वरमुत्तमम् ।तद् ब्रूहि भरतश्रेष्ठ यत् ते मनसि वर्तते

kiṃ vā te prārthitaṃ bhūyo dadāmi varamuttamam | tad brūhi bharataśreṣṭha yat te manasi vartate

हिन्दी अर्थ

भरतश्रेष्ठ! और जो बात तेरे मनमें हो उसे बता, मैं तुझे तेरी प्रार्थथाके अनुसार और कौन-सा उत्तम वर दूँ?'

अध्याय 16

श्लोक 31

इत्युक्तवन्तं तमहमभिवाद्य कृताञ्जलिः ।अब्रवं कृतकृत्योऽहं प्रसन्ने त्वयि सत्तम

ityuktavantaṃ tamahamabhivādya kṛtāñjaliḥ | abravaṃ kṛtakṛtyo'haṃ prasanne tvayi sattama

हिन्दी अर्थ

पिताजीके इस प्रकार कहनेपर मैंने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा—' श्रेष्ठतम पुरुष! मैं आपकी प्रसन्नतासे ही कृतकृत्य हो गया

अध्याय 16

श्लोक 32

यदि त्वनुग्रहं भूयस्त्वत्तोऽर्हामि महाद्युते ।प्रश्नमिच्छामि वै किञ्चिद् व्याहृतं भवता स्वयम्

yadi tvanugrahaṃ bhūyastvatto'rhāmi mahādyute | praśnamicchāmi vai kiñcid vyāhṛtaṃ bhavatā svayam

हिन्दी अर्थ

महाद्युते! यदि मैं इससे भी अधिक आपके अनुग्रहका पात्र होऊँ, तो मैं आपके मुखसे एक प्रश्नका उत्तर सुनना चाहता हूँ'

अध्याय 16

श्लोक 33

स मामुवाच धर्मात्मा ब्रूहि भीष्म यदिच्छसि ।छेत्तास्मि संशयं सर्वं यन्मां पृच्छसि भारत

sa māmuvāca dharmātmā brūhi bhīṣma yadicchasi | chettāsmi saṃśayaṃ sarvaṃ yanmāṃ pṛcchasi bhārata

हिन्दी अर्थ

तब उन धर्मत्माने मुझसे कहा—' भीष्म! बता, तू मुझसे क्या पूछना चाहता है? भारत! तू मुझसे जो कुछ पूछेगा, तेरे उस संदेहको मैं दूर करूँगा'

अध्याय 16

श्लोक 34

अपृच्छं तमहं तातं तत्रान्तर्हितमेव च ।गतं सुकृतिनां लोकं कौतूहलसमन्वितः

apṛcchaṃ tamahaṃ tātaṃ tatrāntarhitameva ca | gataṃ sukṛtināṃ lokaṃ kautūhalasamanvitaḥ

हिन्दी अर्थ

तब मैंने वहाँ अदृश्य होकर खड़े और पुण्यात्माओंके लोकोंमें पहुँचे हुए अपने पितासे कौतूहलमें भरकर पूछा

अध्याय 16

श्लोक 35

श्रूयन्ते पितरो देवा देवानामपि देवताः ।वाश्च पितरोऽन्ये वा कान् यजामो वयं पुनः

śrūyante pitaro devā devānāmapi devatāḥ | vāśca pitaro'nye vā kān yajāmo vayaṃ punaḥ

हिन्दी अर्थ

भीष्मजीने पूछा—पिताजी! पितृगण देवताओंके भी देवता सुने जाते हैं। देवता ही पितर हैं या दोनों भिन्न-भिन्न हैं? हम किनकी पूजा करें*

अध्याय 16

श्लोक 36

कथं च दत्तमस्माभिः श्राद्धं प्रीणात्यथो पितॄन् ।लोकान्तरगतांस्तात किन्नु श्राद्धस्य वा फलम्

kathaṃ ca dattamasmābhiḥ śrāddhaṃ prīṇātyatho pitṝn | lokāntaragatāṃstāta kinnu śrāddhasya vā phalam

हिन्दी अर्थ

तात! दूसरे लोकोंमें गये हुए पितरोंको हमारा दिया हुआ श्राद्ध कैसे तृप्त करता है ? और श्राद्धका क्या फल है ?

अध्याय 16

श्लोक 37

न् यजन्ति स्म लोका वै सदेवनरदानवाः ।सयक्षोरगगन्धर्वाः सकिन्नरमहोरगाः

n yajanti sma lokā vai sadevanaradānavāḥ | sayakṣoragagandharvāḥ sakinnaramahoragāḥ

हिन्दी अर्थ

देवता, दानव और मनुष्य तथा यक्ष, नाग, गन्धर्व, किन्नर और महासर्प आदि किसकी पूजा करते हैं ?

अध्याय 16

श्लोक 38

अत्र मे संशयस्तीव्रः कौतूहलमतीव च ।तद् ब्रूहि मम धर्मज्ञ सर्वज्ञौ ह्यसि मे मतः ।एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य भीष्मस्योवाच वै पिता

atra me saṃśayastīvraḥ kautūhalamatīva ca | tad brūhi mama dharmajña sarvajñau hyasi me mataḥ | etacchrutvā vacastasya bhīṣmasyovāca vai pitā

हिन्दी अर्थ

धर्म! इस विषयमें मुझे बड़ा कौतूहल और संदेह है; अत: आप इसका मुझसे वर्णन कीजिये, क्योंकि मेरे विचारसे आप सर्वज्ञ हैं। भीष्मके इस वचनको सुनकर पिता (शन्तनु) बोले

अध्याय 16

श्लोक 39

सङ्क्षेपेणैव ते वक्ष्ये यन्मां पृच्छसि भारत ।पितरश्च यथोद्भूताः फलं दत्तस्य चानघ

saṅkṣepeṇaiva te vakṣye yanmāṃ pṛcchasi bhārata | pitaraśca yathodbhūtāḥ phalaṃ dattasya cānagha

श्लोक 39–40 का हिन्दी अर्थ

शन्तनुजीने कहा—भारत! जो बात तू मुझसे पूछता है, उसे मैं संक्षेपसे कहता हूँ। निष्पाप! पितर जिस प्रकार उत्पन्न हुए हैं और उनको (अन्न आदि) देनेसे जो फल मिलता है, श्राद्धमें पितरोंके कारणको अर्थात्‌ जिनके ये कार्य हैं, उनको तू सावधान होकर सुन। तात ! स्वर्गमें स्थित पितृदेवता आदिदेव ब्रह्माजीके पुत्र हैं

अध्याय 16

श्लोक 40

पितॄणां कारणं श्राद्धे शृणु सर्वै समाहितः ।दिदेवसुतास्तात पितरो दिवि देवताः

pitṝṇāṃ kāraṇaṃ śrāddhe śṛṇu sarvai samāhitaḥ | didevasutāstāta pitaro divi devatāḥ

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 16

श्लोक 41

तान् यजन्ति स्म वै लोका सदैवासुरमानुषाः ।सयक्षोरगगन्धर्वाः सकिन्नरमहोरगाः

tān yajanti sma vai lokā sadaivāsuramānuṣāḥ | sayakṣoragagandharvāḥ sakinnaramahoragāḥ

हिन्दी अर्थ

देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष, नाग, गन्धर्व, किन्नर और महासर्प आदि उनकी ही पूजा करते हैं

अध्याय 16

श्लोक 42

आप्यायिताश्च ते श्राद्धे पुनराप्याययन्ति च ।जगत् सदेवगन्धर्वमिति ब्रह्मानुशासनम्

āpyāyitāśca te śrāddhe punarāpyāyayanti ca | jagat sadevagandharvamiti brahmānuśāsanam

हिन्दी अर्थ

वे श्राद्धोंमें तृुत किये जानेपर देवताओं और गन्धर्वॉंसहित जगत्‌को तृप्त करते हैं—यह वेद (अथवा ब्रह्माजी ) -का अनुशासन है

अध्याय 16

श्लोक 43

तान् यजस्व महाभाग श्राद्धैरग्र्यैरतन्द्रितः ।ते ते श्रेयो विधास्यन्ति सर्वकामफलप्रदाः

tān yajasva mahābhāga śrāddhairagryairatandritaḥ | te te śreyo vidhāsyanti sarvakāmaphalapradāḥ

हिन्दी अर्थ

महाभाग ! तू आलस्य- रहित होकर श्रेष्ठ श्राद्धोंद्वारा उन पितरोंका यजन कर, तब वे सब कामनाओंका फल देनेवाले पितर तेरा कल्याण करेंगे

अध्याय 16

श्लोक 44

त्वया चाराध्यमानास्ते नामगोत्रादिकीर्तनैः ।अस्मानाप्याययिष्यन्ति स्वर्गस्थानपि भारत

tvayā cārādhyamānāste nāmagotrādikīrtanaiḥ | asmānāpyāyayiṣyanti svargasthānapi bhārata

हिन्दी अर्थ

भारत! यदि तू नाम-गोत्र आदिका उच्चारण करके उनकी आराधना करेगा तो वे पितर हमें और हमारे स्वर्गीय पितरोंको भी तृप्त करेंगे

अध्याय 16

श्लोक 45

मार्कण्डेयस्तु ते शेषमेतत् सर्वं प्रवक्ष्यति ।एष वै पितृभक्तश्च विदितात्मा च भारत

mārkaṇḍeyastu te śeṣametat sarvaṃ pravakṣyati | eṣa vai pitṛbhaktaśca viditātmā ca bhārata

हिन्दी अर्थ

और बाकी सब बातोंको मार्कण्डेयजी तुझसे कहेंगे। भारत! वे पितृभक्त और आत्मज्ञानसे परिपूर्ण हैं

अध्याय 16

श्लोक 46

उपस्थितश्च श्राद्धेऽद्य ममैवानुग्रहाय वै ।एनं पृच्छ महाभागमित्युक्त्वान्तरधीयत

upasthitaśca śrāddhe'dya mamaivānugrahāya vai | enaṃ pṛccha mahābhāgamityuktvāntaradhīyata

हिन्दी अर्थ

आज ये मेरे ऊपर अनुग्रह करनेके लिये ही श्राद्धमें आये हैं, अत: इन महाभाग्यवान्‌ मार्कण्डेयजीसे ही तू इन प्रश्नोंको पूछ । इतना कहकर शन्तनुजी अन्तर्धान हो गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.