Matsya Purana
153
अध्याय 153 / 176

Adhyaya 153

219 श्लोकभाग 3/4 · श्लोक 137–206

पूर्ण अध्याय पाठ70 श्लोक

अध्याय 153

श्लोक 137

क्वचित् तुरंगमण्डली विकृष्यते श्वजातिभिः क्वचित्पिशाचजातकैः प्रपीतशोणितासवैः स्वकामिनीयुतैर्द्रुतं प्रमोदमत्तसंभ्रमैर् ममैतदानयाननं खुरो ऽयमस्तु मे प्रियः

kvacit turaṃgamaṇḍalī vikṛṣyate śvajātibhiḥ kvacitpiśācajātakaiḥ prapītaśoṇitāsavaiḥ svakāminīyutairdrutaṃ pramodamattasaṃbhramair mamaitadānayānanaṃ khuro 'yamastu me priyaḥ

हिन्दी अर्थ

है। वस्त्रोंमें विशेषकर काले धब्बे पड़ जाते हैं। लोहे और मणियोंपर मैल जम जाती है । नृपश्रेष्ठ! शरीरमें लेपन किये जानेवाले द्रव्यो एवं उपयोगमें आनेवाली पुष्प- मालाओंमें दुर्गन्धि तथा रंगकी मलिनता समझनी चाहिए। राजन्! उसी प्रकार जलमें भी पीलेपनका आभास आने लगता है। नृपोत्तम! विषके सेवनसे दाँत, होंठ और चमड़े श्यामल वर्णके हो जाते हैं और शरीरमें क्षीणताका अनुभव होने लगता है-इस प्रकार ये लक्षण जानने चाहिए। इसलिये राजाको सर्वदा मणि, मन्त्र और उपर्युक्त ओषधियोंसे सुरक्षित तथा सावधान रहना चाहिए। सूर्यवंशके चन्द्र! इस पृथ्वीपर प्रजारूपी वृक्षकी जड़ राजा है, अतः उसीको रक्षासे राष्ट्रकी वृद्धि होती है। इसलिये सभीको

English

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अध्याय 153

श्लोक 138

करो ऽयमब्जसंनिभो ममास्तु कर्णपूरकः सरोषमीक्षते ऽपरा वपां विना प्रियं तदा परा प्रिया ह्यवाप यद्भृतोष्णशोणितासवं विकृष्य शवचर्म तत्प्रबद्धसान्द्रपल्लवम्

karo 'yamabjasaṃnibho mamāstu karṇapūrakaḥ saroṣamīkṣate 'parā vapāṃ vinā priyaṃ tadā parā priyā hyavāpa yadbhṛtoṣṇaśoṇitāsavaṃ vikṛṣya śavacarma tatprabaddhasāndrapallavam

हिन्दी अर्थ

प्रयत्नपूर्वक राजाकी रक्षा करनी चाहिए ॥ २७--३४॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मे राजरक्षा नामैकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

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अध्याय 153

श्लोक 139

चकार यक्षकामिनी तरुं कुठारपाटितं गजस्य दन्तमात्मजं प्रगृह्य कुम्भसंपुटम् विपाट्य मौक्तिकं परं प्रियप्रसादमिच्छते समांसशोणितासवं पपुश्च यक्षराक्षसाः

cakāra yakṣakāminī taruṃ kuṭhārapāṭitaṃ gajasya dantamātmajaṃ pragṛhya kumbhasaṃpuṭam vipāṭya mauktikaṃ paraṃ priyaprasādamicchate samāṃsaśoṇitāsavaṃ papuśca yakṣarākṣasāḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें राजरक्षा नामक दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ राजधर्म एवं सामान्य नीतिका वर्णन राजन् पुत्रस्य रक्षा च कर्तव्या पृथिवीक्षिता आचार्यश्चात्र कर्तव्यो नित्ययुक्तश्च रक्षिभिः

English

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अध्याय 153

श्लोक 140

मृताश्वकेशवासितं रसं प्रगृह्य पाणिना प्रियाविमुक्तजीवितं समानयासृगासवम् न पथ्यतां प्रयाति मे गतं श्मशानगोचरं नरस्य तज्जहात्यसौ प्रशस्य किंनराननम्

mṛtāśvakeśavāsitaṃ rasaṃ pragṛhya pāṇinā priyāvimuktajīvitaṃ samānayāsṛgāsavam na pathyatāṃ prayāti me gataṃ śmaśānagocaraṃ narasya tajjahātyasau praśasya kiṃnarānanam

हिन्दी अर्थ

धर्मकामार्थशास्त्राणि धनुर्वेदं च शिक्षयेत्। रथे च कुञ्जरे चैनं व्यायामं कारयेत् सदा मत्स्यभगवानूने कहा-राजन्! राजाको अपने पुत्रकी रक्षा करनी चाहिए। उसकी शिक्षाके लिये पहरेदारोंकी देख-रेखमें एक ऐसे आचार्यकी नियुक्ति करनी चाहिए, जो उसे धर्म, काम एवं अर्थशास्त्र, धनुर्वेद तथा रथ एवं

English

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अध्याय 153

श्लोक 141

स नाग एष नो भयं दधाति मुक्तजीवितो न दानवस्य शक्यते मया तदेकयाननम् इति प्रियाय वल्लभा वदन्ति यक्षयोषितः परे कपालपाणयः पिशाचयक्षराक्षसाः

sa nāga eṣa no bhayaṃ dadhāti muktajīvito na dānavasya śakyate mayā tadekayānanam iti priyāya vallabhā vadanti yakṣayoṣitaḥ pare kapālapāṇayaḥ piśācayakṣarākṣasāḥ

हिन्दी अर्थ

हाथीकी सवारीको शिक्षा दे और सदा व्यायाम कराये। साथ ही उसे शिल्पकलाएँ भी सिखलाये। उसपर ऐसा प्रभाव पड़े कि वह गुरुजनोंके सम्मुख असत्य एवं अप्रिय बात न बोले। उसके शरीरकी रक्षाके व्याजसे रक्षक नियुक्त कर दे। इसे क्रोधी, लोभी और तिरस्कृत व्यक्तियोंकी संगतिमें नहीं जाने देना चाहिए। उसे इस प्रकार जितेन्द्रिय बनाना चाहिए कि जिससे वह युवावस्था आनेपर गुणाधानमशक्यं तु यस्य कर्तु स्वभावतः

English

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अध्याय 153

श्लोक 142

वदन्ति देहि देहि मे ममातिभक्ष्यचारिणः परे ऽवतीर्य शोणितापगासु धौतमूर्तया पितॄन् प्रतर्प्य देवताः समर्चयन्ति चामिषैर् गजोडुपे सुसंस्थितास्तरन्ति शोणितं ह्रदम्

vadanti dehi dehi me mamātibhakṣyacāriṇaḥ pare 'vatīrya śoṇitāpagāsu dhautamūrtayā pitṝn pratarpya devatāḥ samarcayanti cāmiṣair gajoḍupe susaṃsthitāstaranti śoṇitaṃ hradam

हिन्दी अर्थ

बन्धनं तस्य कर्तव्यं गुप्तेशे सुखान्वितम्। अविनीतं कुमारं हि कुलमाशु विशीर्यते अधिकारेषु सर्वेषु विनीतं विनियोजयेत्। आदौ स्वल्पे ततः पश्चात् क्रमेणाथ महत्स्वपि

English

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अध्याय 153

श्लोक 143

इति प्रगाढसंकटे सुरासुरे सुसंगरे भयं समुझ्य दुर्जया भटाः स्फुटन्ति मानिनः

iti pragāḍhasaṃkaṭe surāsure susaṃgare bhayaṃ samujhya durjayā bhaṭāḥ sphuṭanti māninaḥ

हिन्दी अर्थ

एतांस्तु सेवमानास्तु विनष्टाः पृथिवीक्षितः वाकूपारुष्यं न कर्तव्यं दण्डपारुष्यमेव च। परोक्षनिन्दा च तथा वर्जनीया महीक्षिता अर्थस्य दूषणं राजा द्विप्रकारं विवर्जयेत्। अर्थानां दूषणं चैकं तथार्थषु च दूषणम्

English

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अध्याय 153

श्लोक 144

तत शक्रो धनेशश्च वरुणः पवनो ऽनलः यमो ऽपि निरृतिश्चापि दिव्यास्त्राणि महाबलाः

tata śakro dhaneśaśca varuṇaḥ pavano 'nalaḥ yamo 'pi nirṛtiścāpi divyāstrāṇi mahābalāḥ

हिन्दी अर्थ

प्राकाराणां समुच्छेदो दुर्गादीनामसत्क्रिया। अर्थानां दूषणं प्रोक्तं विप्रकीर्णत्वमेव च अदेशकाले यद्दानमपात्रे दानमेव च। अर्थेषु दूषणं प्रोक्तमसत्कर्मप्रवर्तनम्

English

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अध्याय 153

श्लोक 145

आकाशे मुमुचुः सर्वे दानवानभिसंध्य ते अस्त्राणि व्यर्थतां जग्मुर् देवानां दानवान्प्रति

ākāśe mumucuḥ sarve dānavānabhisaṃdhya te astrāṇi vyarthatāṃ jagmur devānāṃ dānavānprati

हिन्दी अर्थ

कामः क्रोधो मदो मानो लोभो हर्षस्तथैव च। एते वर्ज्याः प्रयत्नेन सादरं पृथिवीक्षिता एतेषां विजयं कृत्वा कार्यो भृत्यजयस्ततः। कृत्वा भृत्यजयं राजा पौरान् जानपदान् जयेत् कोशो मित्रं च धर्मज्ञ सप्ताङ्गं राज्यमुच्यते

English

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अध्याय 153

श्लोक 146

संरम्भेणाप्ययुध्यन्त संहतास्तुमुलेन च गतिं न विविदुश्चापि श्रान्ता दैत्यस्य देवताः

saṃrambheṇāpyayudhyanta saṃhatāstumulena ca gatiṃ na vividuścāpi śrāntā daityasya devatāḥ

हिन्दी अर्थ

सप्ताङ्गस्यापि राज्यस्य मूलं स्वामी प्रकीर्तितः। इन्द्रियोंद्वारा अत्यन्त दुर्गम सत्पुरुषोंके मार्गसे अपकृष्ट न किया जा सके। जिस राजकुमारमें स्वभाववश .गुणाधान करना अशक्य हो उसे गुप्तस्थानमें सुखपूर्वक अवरुद्ध कर देना चाहिए, क्योंकि उद्दण्ड राजकुमारसे युक्त कुल शीघ्र

English

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अध्याय 153

श्लोक 147

दैत्यास्त्रभिन्नसर्वाङ्गा ह्य् अकिंचित्करतां गताः परस्परं व्यलीयन्त गावः शीतार्दिता इव

daityāstrabhinnasarvāṅgā hy akiṃcitkaratāṃ gatāḥ parasparaṃ vyalīyanta gāvaḥ śītārditā iva

हिन्दी अर्थ

ही नष्ट हो जाता है। राजाको सभी अधिकारोंपर सुशिक्षित व्यक्तिको नियुक्त करना चाहिए। प्रथमतः उसे छोटे पदपर नियुक्त करे, तत्पश्चात् क्रमशः अधिक शिक्षितकर ऊँचे पदोंपर भी पहुँचा दे। राजसिंह ! राजाको शिकार, मद्यपान तथा द्यूतक्रीड़ाका परित्याग कर देना चाहिए; क्योंकि पूर्वकालमें इनके सेवनसे बहुत-से राजा नष्ट हो चुके हैं, जिनकी गणना नहीं कही जा सकती। राजाके लिये व्यर्थ घूमना तथा विशेषकर दिनमें शयन करना वर्जित है। राजाको कटुवचन बोलना और कठोर दण्ड देना-- ये दोनों कर्म नहीं करना चाहिए। राजाको परोक्षमें किसीकी निन्दा करना उचित नहीं है

English

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अध्याय 153

श्लोक 148

तदवस्थान्हरिर्दृष्ट्वा देवाञ्छक्रमुवाच ह ब्रह्मास्त्रं स्मर देवेन्द्र यस्यावध्यो न विद्यते विष्णुना चोदितः शक्रः सस्मारास्त्रं महौजसम्

tadavasthānharirdṛṣṭvā devāñchakramuvāca ha brahmāstraṃ smara devendra yasyāvadhyo na vidyate viṣṇunā coditaḥ śakraḥ sasmārāstraṃ mahaujasam

हिन्दी अर्थ

राजाको दो प्रकारके अर्थदोषाँसे बचना चाहिए एक अर्थका दोष और दूसरा अर्थ-सम्बन्धी दोष। अपने दुर्गे परकोटोंका तथा मूलदुर्ग आदिकी उपेक्षा और अस्तव्यस्तता-ये अर्थके दोष कहे गये हैं। उसी प्रकार कुदेश और कुसमयमें दिया गया दान, कुपात्रको दिया गया दान और असत्कर्मका प्रचार-ये अर्थ-सम्बन्धी दोष कहे गये हैं। राजाको आदरसहित काम, क्रोध, मद, मान, लोभ तथा हर्षका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना

English

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अध्याय 153

श्लोक 149

सम्पूजितं नित्यमरातिनाशनं समाहितं बाणममित्रघातने धनुष्यजय्ये विनियोज्य बुद्धिमान् अभूत्ततो मन्त्रसमाधिमानसः

sampūjitaṃ nityamarātināśanaṃ samāhitaṃ bāṇamamitraghātane dhanuṣyajayye viniyojya buddhimān abhūttato mantrasamādhimānasaḥ

हिन्दी अर्थ

चाहिए। राजाको इनपर विजय प्राप्त करनेके पश्चात् अनुचरोंको जीतना चाहिए। इस प्रकार अनुचरोंको जीतनेके बाद पुरवासियों और देशवासियोंको अपने अधिकारमें करे। उनको जीतनेके पश्चात् बाहरी शत्रुओंको परास्त करे। तुल्य, आभ्यन्तर और कृत्रिम-भेदसे बाह्य शत्रुओंको अनेकों प्रकारका समझना चाहिए। उनमेंसे क्रमशः एक- एकको बढ़कर समझना चाहिए और उनको जीतनेमें यत्रशील रहे। महाभाग! मित्र तीन प्रकारके होते हैं-- प्रथम वे हैं जो पिता-पितामह आदिके कालसे मित्रताका व्यवहार करते चले आ रहे हैं। दूसरे वे हैं, जो शत्रुके शत्रु हैं तथा तीसरे वे हैं, जो किन्हीं कारणोंसे पीछे मित्र बनते हैं। इन तीनों मित्रोंमें प्रथम मित्र उत्तम होता है,

English

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अध्याय 153

श्लोक 150

स मन्त्रमुच्चार्य यतान्तराशयो वधाय दैत्यस्य धियाभिसंध्य तु विकृष्य कर्णान्तम् अकुण्ठदीधितिं मुमोच वीक्ष्याम्बरमार्गमुन्मुखः

sa mantramuccārya yatāntarāśayo vadhāya daityasya dhiyābhisaṃdhya tu vikṛṣya karṇāntam akuṇṭhadīdhitiṃ mumoca vīkṣyāmbaramārgamunmukhaḥ

हिन्दी अर्थ

उसका आदर करना चाहिए। धर्मज्ञ! स्वामी, मन्त्री, राष्ट्र दुर्ग, सेना, कोश तथा मित्र-ये राज्यके सात अङ्ग कहे गये हैं। इस सप्तङ्गयुक्त राज्यका भी मूल स्वयं राजा कहा गया है। राज्यका तथा राज्याङ्गांका मूल होनेके तन्मूलत्वात् तथाङ्कानां स तु रक्ष्यः प्रयलतः॥ २० कारण वह प्रयत्नपूर्वक रक्षणीय है॥ ११--२०॥

English

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अध्याय 153

श्लोक 151

अथासुरः प्रेक्ष्य महास्त्रमाहितं विहाय मायामवनौ व्यतिष्ठत प्रवेपमानेन मुखेन शुष्यता बलेन गात्रेण च संभ्रमाकुलः

athāsuraḥ prekṣya mahāstramāhitaṃ vihāya māyāmavanau vyatiṣṭhata pravepamānena mukhena śuṣyatā balena gātreṇa ca saṃbhramākulaḥ

हिन्दी अर्थ

षडङ्गरक्षा कर्तव्या तथा तेन प्रयत्नतः। फिर राजाके द्वारा राज्यके शेष छ: अङ्गोंकी प्रयत्नपूर्वक अङ्गेभ्यो यस्तथैकस्य द्रोहमाचरतेऽल्पधीः॥ २९ रक्षा की जानी चाहिए। जो मूर्ख इन छः अङ्गोंमेंसे किसी

English

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अध्याय 153

श्लोक 152

ततस्तु तस्यास्त्रवराभिमन्त्रितः शरो ऽर्धचन्द्रप्रतिमो महारणे पुरंदरस्यासनबन्धुतां गतो नवार्कबिम्बं वपुषा विडम्बयन्

tatastu tasyāstravarābhimantritaḥ śaro 'rdhacandrapratimo mahāraṇe puraṃdarasyāsanabandhutāṃ gato navārkabimbaṃ vapuṣā viḍambayan

हिन्दी अर्थ

वधस्तस्य तु कर्तव्यः शीघ्रमेव महीक्षिता। न राज्ञा मृदुना भाव्यं मृदुर्हि परिभूयते काले मृदुर्यो भवति काले भवति दारुणः

English

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अध्याय 153

श्लोक 153

किरीटकोटिस्फुटकान्तिसंकटं सुगन्धिनानाकुसुमाधिवासितम् प्रकीर्णधूमज्वलनाभमूर्धजं पपात जम्भस्य शिरः सकुण्डलम्

kirīṭakoṭisphuṭakāntisaṃkaṭaṃ sugandhinānākusumādhivāsitam prakīrṇadhūmajvalanābhamūrdhajaṃ papāta jambhasya śiraḥ sakuṇḍalam

हिन्दी अर्थ

राजा लोकद्वयापेक्षी तस्य लोकद्वयं भवेत्। लोकसंग्रहणार्थाय कृतकव्यसनी भवेत्। शौण्डीरस्य नरेन्द्रस्य नित्यमुद्रिक्तचेतसः जना विरागमायान्ति सदा दु:सेव्यभावतः। स्मितपूर्वाभिभाषी स्यात् सर्वस्यैव महीपतिः

English

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अध्याय 153

श्लोक 154

तस्मिन्विनिहते जम्भे दानवेन्द्राः पराङ्मुखाः ततस्ते भग्नसंकल्पाः प्रययुर्यत्र तारकः

tasminvinihate jambhe dānavendrāḥ parāṅmukhāḥ tataste bhagnasaṃkalpāḥ prayayuryatra tārakaḥ

हिन्दी अर्थ

भाव्यं धर्मभृतां श्रेष्ठ स्थूललक्ष्येण भूभुजा अदीर्घसूत्रश्च भवेत् सर्वकर्मसु पार्थिवः

English

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अध्याय 153

श्लोक 155

तांस्तु त्रस्तान्समालोक्य श्रुत्वारोषमगात्परम् स जम्भदानवेन्द्रं तु सुरै रणमुखे हतम्

tāṃstu trastānsamālokya śrutvāroṣamagātparam sa jambhadānavendraṃ tu surai raṇamukhe hatam

हिन्दी अर्थ

दीर्घसूत्रस्य नृपतेः कर्महानिर्श्नुवं भवेत्। रागे दर्षे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि अप्रिये चैव कर्तव्ये दीर्घसूत्रः प्रशस्यते। राज्ञा संवृतमन्त्रेण सदा भाव्यं नृपोत्तम कृतान्येव तु कार्याणि ज्ञायन्ते यस्य भूपतेः

English

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अध्याय 153

श्लोक 156

सावलेपं ससंरम्भं सगर्वं सपराक्रमम् साविष्कारमनाकारं तारको भावमाविशत्

sāvalepaṃ sasaṃrambhaṃ sagarvaṃ saparākramam sāviṣkāramanākāraṃ tārako bhāvamāviśat

हिन्दी अर्थ

कर्तव्यः पृथिवीपालैर्मन्त्रभेदभयात् सदा। मन्त्रवित्साधितो मन्त्रः सम्पत्तीनां सुखावहः आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च

English

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अध्याय 153

श्लोक 157

स जैत्रं रथमास्थाय सहस्रेण गरुत्मताम् संरम्भाद्दानवेन्द्रस्तु सुरै रणमुखे गतः

sa jaitraṃ rathamāsthāya sahasreṇa garutmatām saṃrambhāddānavendrastu surai raṇamukhe gataḥ

हिन्दी अर्थ

नेत्रवक्त्रविकारेश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः। न यस्य कुशलैस्तस्य वशे सर्वा वसुंधरा एकके साथ द्रोह करता है उसे राजाको शीघ्र ही मार डालना चाहिए। राजाको कोमल वृत्तिवाला नहीं होना चाहिए; क्योंकि कोमल वृत्तिवाला राजा पराजयका भागी होता है। साथ ही अधिक कठोर भी नहीं होना चाहिए; क्योंकि अधिक कठोर शासकसे लोग उद्विग्न हो जाते हैं। जो लोकद्वयापेक्षी राजा समयपर मृदु तथा समयपर कठोर हो जाता है, वह दोनों लोकोंपर विजयी हो जाता है। राजाको अपने अनुचरोंके साथ परिहास नहीं करना

English

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अध्याय 153

श्लोक 158

सर्वायुधपरिष्कारः सर्वास्त्रपरिरक्षितः त्रैलोक्यऋद्धिसम्पन्नः सुविस्तृतमहाननः

sarvāyudhapariṣkāraḥ sarvāstraparirakṣitaḥ trailokyaṛddhisampannaḥ suvistṛtamahānanaḥ

हिन्दी अर्थ

चाहिए; क्योंकि उस समय आनन्दमें निमग्न हुए राजाका अनुचरगण अपमान कर बैठते हैं । राजाको सभी प्रकारके व्यसनोंसे दूर रहना चाहिए, किंतु लोकसंग्रहके लिये उसे कुछ ऊपरसे अच्छी बातोंका व्यसन करना उचित है। गर्वीले एवं नित्य ही उद्धत स्वभाववाले राजासे लोग कठिनतासे अनुकूल होनेके कारण विरक्त हो जाते हैं, अतः राजाको सभीसे मुसकानपूर्वक बातें करनी चाहिए । महाभाग! यहाँतक कि प्राणदण्डके अपराधीको भी वह भूकुटि न

English

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अध्याय 153

श्लोक 159

रणायाभ्यपतत्तूर्णं सैन्येन महता वृतः जम्भास्त्रक्षतसर्वाङ्गं त्यक्त्वैरावतदन्तिनम्

raṇāyābhyapatattūrṇaṃ sainyena mahatā vṛtaḥ jambhāstrakṣatasarvāṅgaṃ tyaktvairāvatadantinam

हिन्दी अर्थ

दिखलाये। धार्मिकश्रेष्ठ! राजाको महान् लक्ष्ययुक्त होना चाहिए; क्योंकि सारी पृथ्वी स्थूललक्ष्य रखनेवाले राजाके अधीन हो जाती है। राजाको सभी कार्योके निर्वाहमें विलम्ब नहीं करना चाहिए; क्योंकि विलम्ब करनेवाले राजाके कार्य निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। केवल अनुराग, दर्प, आत्मसम्मान, द्रोह, पापकर्म तथा अप्रिय कार्योमें दीर्घसूत्री प्रशंसित माना गया है नृपोत्तम! राजाको सदा अपनी मन्त्रणा गुप्त रखनी चाहिए; क्योंकि प्रकट मन्त्रणावाले राजाको निश्चय ही सभी आपत्तियाँ प्राप्त होती हैं। महाभाग! जिस राजाके कार्योको आरम्भके समय नहीं, अपितु पूरा होनेपर ही

English

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अध्याय 153

श्लोक 160

सज्जं मातलिना गुप्तं रथमिन्द्रस्य तेजसा तप्तहेमपरिष्कारं महारत्नसमन्वितम्

sajjaṃ mātalinā guptaṃ rathamindrasya tejasā taptahemapariṣkāraṃ mahāratnasamanvitam

हिन्दी अर्थ

लोग जान पाते हैं उसके वशमें वसुंधरा हो जाती है। राजाओंको उसे सदा सुरक्षित रखना चाहिए। मन्त्रज्ञ

English

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अध्याय 153

श्लोक 161

चतुर्योजनविस्तीर्णं सिद्धसंघपरिष्कृतम् गन्धर्वकिंनरोद्गीतम् अप्सरोनृत्यसंकुलम्

caturyojanavistīrṇaṃ siddhasaṃghapariṣkṛtam gandharvakiṃnarodgītam apsaronṛtyasaṃkulam

हिन्दी अर्थ

देनेवाला होता है। मन्त्रके छलसे बहुत-से राजा विनष्ट हो चुके हैं। आकृति, संकेत, गति, चेष्टा, वचन, नेत्र तथा मुखके विकारोंसे अन्तःस्थित मनोभावोंका पता लगता है। राजपुत्र! जिस राजाके मनका इन उपर्युक्त उपायोंद्वारा कुशल लोग भी पता न लगा सकें, वसुंधरा उसके वशमें सदा बनी रहती है नैकस्तु मन्त्रयेन्मन्त्रं राजा न बहुभिः सह

English

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अध्याय 153

श्लोक 162

सर्वायुधम् असंबाधं विचित्ररचनोज्ज्वलम् तं रथं देवराजस्य परिवार्य समन्ततः

sarvāyudham asaṃbādhaṃ vicitraracanojjvalam taṃ rathaṃ devarājasya parivārya samantataḥ

हिन्दी अर्थ

नारोहेद् विषमां नावमपरीक्षितनाविकाम्। तथा राज्ञा प्रकर्तव्यं स्वराष्ट्रं परिरक्षता। मोहाद् राजा स्वराष्ट्रं यः कर्शयत्यनवेक्षया

English

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अध्याय 153

श्लोक 163

दंशिता लोकपालास्तु तस्थुः सगरुडध्वजाः ततश्चचाल वसुधा ततो रूक्षो मरुद्ववौ

daṃśitā lokapālāstu tasthuḥ sagaruḍadhvajāḥ tataścacāla vasudhā tato rūkṣo marudvavau

हिन्दी अर्थ

भृतो वत्सो जातबलः कर्मयोग्यो यथा भवेत् तथा राष्ट्रं महाभाग भृतं कर्मसहं भवेत्। यो राष्ट्रमनुगृह्णाति राज्यं स परिरक्षति राष्ट्राद्धिरण्यं धान्यं च महीं राजा सुरक्षिताम्

English

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अध्याय 153

श्लोक 164

ततो ऽम्बुधय उद्भूतास् ततो नष्टा रविप्रभा ततस्तमः समुद्भूतं नातो ऽदृश्यन्त तारकाः

tato 'mbudhaya udbhūtās tato naṣṭā raviprabhā tatastamaḥ samudbhūtaṃ nāto 'dṛśyanta tārakāḥ

हिन्दी अर्थ

सर्व॑ कर्मेदमायत्तं विधाने हैवमानुषे। तयोर्हैबमचिन्त्यं च पौरुषे विद्यते क्रिया लोकानुरागः परमो भवेत्तु। लोकानुरागप्रभवा च लक्ष्मी- लक्ष्मीवतश्चापि परा च कीर्तिः

English

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अध्याय 153

श्लोक 165

ततो जज्वलुरस्त्राणि ततो ऽकम्पत वाहिनी एकतस्तारको दैत्यः सुरसंघस्तु चैकतः

tato jajvalurastrāṇi tato 'kampata vāhinī ekatastārako daityaḥ surasaṃghastu caikataḥ

हिन्दी अर्थ

राजाको कभी केवल एक व्यक्तिके या एक ही साथ अनेक लोगोंके साथ मन्त्रणा नहीं करनी चाहिए। राजा जिसकी परीक्षा न की गयी हो ऐसी विषम नौकापर सवार न हो। राजाके जो भूमिविजेता शत्रु हों, उन सबको सामादि उपायोंद्वारा वशमें लाना चाहिए! अपने राष्ट्रकी रक्षामें तत्पर राजाका यह कर्तव्य है कि वह उपेक्षाके कारण प्रजाओंको दुर्बल न होने दे। जो अज्ञानवश असावधानीसे अपने राष्ट्रको दुर्बल कर देता है, वह शीघ्र ही भाई-बन्धुओंसहित राज्य एवं जीवनसे च्युत हो जाता है । महाभाग! जिस प्रकार पालतू बछड़ा बलवान् होनेपर कार्य करनेमें समर्थ होता है उसी तरह पालन-पोषणकर समृद्ध किया हुआ राष्ट्र भी भविष्यमें

English

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अध्याय 153

श्लोक 166

लोकावसादमेकत्र जगत्पालनमेकतः चराचराणि भूतानि सुरासुरविभेदतः

lokāvasādamekatra jagatpālanamekataḥ carācarāṇi bhūtāni surāsuravibhedataḥ

हिन्दी अर्थ

कार्यक्षम हो जाता है। जो अपने राष्ट्रके ऊपर अनुग्रहकी दृष्टि रखता है, वस्तुतः वही राज्यकी रक्षा कर सकता है। जो उत्पन्न हुई प्रजाओंकी रक्षा करता है, वह महान् फलका भागी होता है। राजा राष्ट्रसे सुवर्ण, अन्न और सुरक्षित पृथ्वी प्राप्त करता है। माता और पिताके समान अपने राष्ट्रकी रक्षामें तत्पर रहनेवाला नृपति विशेष प्रयत्नसे नित्यप्रति स्वकीय एवं परकीय दोनों ओरसे होनेवाली बाधाओंसे अपने राष्ट्रकी रक्षा करे। अपनी

English

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अध्याय 153

श्लोक 167

तद्द्विधाप्येकतां यातं ददृशुः प्रेक्षका इव यद्वस्तु किंचिल् लोकेषु त्रिषु सत्तास्वरूपकम् तत् तत्रादृश्यद् अखिलं खिलीभूतविभूतिकम्

taddvidhāpyekatāṃ yātaṃ dadṛśuḥ prekṣakā iva yadvastu kiṃcil lokeṣu triṣu sattāsvarūpakam tat tatrādṛśyad akhilaṃ khilībhūtavibhūtikam

हिन्दी अर्थ

इन्द्रियोंको संयत तथा गुप्त रखे और सर्वदा उनका प्रयोग गोपनीय रूपसे करे, तभी उनसे उत्तम फल प्राप्त होता है। जीवनके सभी कार्य हैव और पौरुष-इन दोनोंके अधिकारमें रहते हैं। उन दोनोंमें हैव तो अचिन्त्य है, किंतु पौरुषमें क्रिया विद्यमान रहती है। इस प्रकार पृथ्वीका पालन करनेवाले राजाके प्रति प्रजाका परम अनुराग हो जाता है प्रजाके अनुरागसे राजाको लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है तथा लक्ष्मीवान् राजाको ही परम यशकी प्राप्ति होती है॥ ३७--४७॥

English

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अध्याय 153

श्लोक 168

अस्त्राणि तेजांसि धनानि धैर्यं सेनाबलं वीर्यपराक्रमौ च सत्त्वौजसां तन्निकरं बभूव सुरासुराणां तपसो बलेन

astrāṇi tejāṃsi dhanāni dhairyaṃ senābalaṃ vīryaparākramau ca sattvaujasāṃ tannikaraṃ babhūva surāsurāṇāṃ tapaso balena

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मानुकीर्तने विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें राजधर्मकीर्तन नामक दो सौ बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

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अध्याय 153

श्लोक 169

अथाभिमुखम् आयान्तं नवभिर्नतपर्वभिः बाणैरनलकल्पाग्रैर् बिभिदुस्तारकं हृदि

athābhimukham āyāntaṃ navabhirnataparvabhiḥ bāṇairanalakalpāgrair bibhidustārakaṃ hṛdi

हिन्दी अर्थ

दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय हैव और पुरुषार्थका वर्णन हैवे पुरुषकारे च किं ज्यायस्तद् ब्रवीहि मे। अत्र मे संशयो देव छेत्तुमर्हस्यशेषतः

English

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अध्याय 153

श्लोक 170

स तानचिन्त्य दैत्येन्द्रः सुरबाणान्गतान्हृदि नवभिर्नवभिर्बाणैः सुरान्विव्याध दानवः

sa tānacintya daityendraḥ surabāṇāngatānhṛdi navabhirnavabhirbāṇaiḥ surānvivyādha dānavaḥ

हिन्दी अर्थ

स्वमेव कर्म हैवाख्यं विद्द्रि देहान्तरार्जितम्। तस्मात् पौरुषमेवेह श्रेष्ठमाहुर्मनीषिण: प्रतिकूलं तथा हैवं पौरुषेण विहन्यते। मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यमुत्थानशालिनाम्

English

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अध्याय 153

श्लोक 171

जगद्धरणसम्भूतैः शल्यैरिव पुरःसरैः ततो ऽच्छिन्नं शरव्रातं संग्रामे मुमुचुः सुराः

jagaddharaṇasambhūtaiḥ śalyairiva puraḥsaraiḥ tato 'cchinnaṃ śaravrātaṃ saṃgrāme mumucuḥ surāḥ

हिन्दी अर्थ

येषां पूर्वकृतं कर्म सात्तिचकं मनुजोत्तम। पौरुषेण विना तेषां केषांचिद् दूश्यते फलम् कर्मणा प्राप्यते लोके राजसस्य तथा फलम्। कृच्छेण कर्मणा विद्द्रि तामसस्य तथा फलम् हैवमेव विजानन्ति नराः पौरुषवर्जिताः

English

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अध्याय 153

श्लोक 172

अनन्तरं च कान्तानाम् अश्रुपातमिवानिशम् तदप्राप्तं वियत्येव नाशयामास दानवः

anantaraṃ ca kāntānām aśrupātamivāniśam tadaprāptaṃ viyatyeva nāśayāmāsa dānavaḥ

हिन्दी अर्थ

तस्मात् त्रिकालं संयुक्तं हैवं तु सफलं भवेत्। पौरुषं हैवसम्पत्त्या काले फलति पार्थिव हैवं पुरुषकारश्च कालश्च पुरुषोत्तम। त्रयमेतन्मनुष्यस्य पिण्डितं स्यात् फलावहम्

English

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अध्याय 153

श्लोक 173

शरैर्यथा कुचरितैः प्रख्यातं परमागतम् सुनिर्मलं क्रमायातं कुपुत्रः स्वं महाकुलम्

śarairyathā kucaritaiḥ prakhyātaṃ paramāgatam sunirmalaṃ kramāyātaṃ kuputraḥ svaṃ mahākulam

हिन्दी अर्थ

तास्तु काले प्रदृश्यन्ते नैवाकाले कथञ्चन ९ तस्मात् सहैव कर्तव्यं सधर्म पौरुषं नरैः। विपत्तावपि यस्येह परलोके श्रुंबं फलम् नालसाः: प्राप्नुवन्त्यर्थान्न च हैवपरायणाः। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पौरुषे यत्नमाचरेत् त्यक्त्वाऽऽलसान् हैवपरान् मनुष्या-

English

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अध्याय 153

श्लोक 174

ततो निवार्य तद्बाणजालं सुरभुजेरितम् बाणैर्व्योम दिशः पृथ्वीं पूरयामास दानवः

tato nivārya tadbāṇajālaṃ surabhujeritam bāṇairvyoma diśaḥ pṛthvīṃ pūrayāmāsa dānavaḥ

हिन्दी अर्थ

मनुने पूछा--देव ! भाग्य और पुरुषार्थ--इन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? यह मुझे बतलाइये। इस विषयमें मुझे संदेह है, अत: आप उसका सम्पूर्णरूपसे निवारण कीजिये मत्स्यभगवान्ने कहा- राजन्! अन्य जन्ममें अपने द्वारा किया गया पुरुषार्थ (कर्म) ही हैव कहा जाता है, इसी कारण इन दोनोंमें मनीषियोंने पौरुषको ही श्रेष्ठ माना है; क्योंकि माङ्गलिक आचरण करनेवाले एवं

English

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अध्याय 153

श्लोक 175

चिछेद पुङ्खदेशेषु स्वके स्थाने च लाघवात् बाणजालैः सुतीक्ष्णाग्रैः कङ्कबर्हिणवाजितैः

cicheda puṅkhadeśeṣu svake sthāne ca lāghavāt bāṇajālaiḥ sutīkṣṇāgraiḥ kaṅkabarhiṇavājitaiḥ

हिन्दी अर्थ

नित्य-प्रति अभ्युदयशील पुरुषोंका प्रतिकूल उुर्देव भी पुरुषार्थद्वारा नष्ट हो जाता है । मानवश्रेष्ठ ! जिन्होंने पूर्वजन्ममें सात्त्विक कर्म किया है, उन्हींमें किन्हीं-किन्हींको पुरुषार्थके बिना भी अच्छे फलकी प्राप्ति देखी जाती है। लोकमें रजोगुणी पुरुषको कर्म करनेसे फलकी प्राप्ति होती है और तमोगुणी पुरुषको कठिन कर्म करनेसे फलकी प्राप्ति जाननी चाहिए राजन्! मनुष्योंको पुरुषार्थद्वारा अभिलषित पदार्थकी प्राप्ति होती है, किंतु जो लोग पुरुषार्थसे हीन हैं, वे हैवको ही सब कुछ मानते हैं। अतः तीनों कालोंमें पुरुषार्थयुक्त हैव ही सफल होता है। राजन्! भाग्ययुक्त मनुष्यका

English

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अध्याय 153

श्लोक 176

कर्णान्तकृष्टैर्विमलैः सुवर्णरजतोज्ज्वलैः शास्त्रार्थैः संशयप्राप्तान् यथार्थान्वै विकल्पितैः

karṇāntakṛṣṭairvimalaiḥ suvarṇarajatojjvalaiḥ śāstrārthaiḥ saṃśayaprāptān yathārthānvai vikalpitaiḥ

हिन्दी अर्थ

पुरुषार्थ समयपर फल देता है पुरुषोत्तम! हैव, पुरुषार्थ और काल-ये तीनों संयुक्त होकर मनुष्यको फल देनेवाले होते हें । कृषि और वृष्टिका संयोग होनेसे फलकी सिद्धियाँ देखी जाती हैं, किंतु वे भी समय आनेपर ही दिखायी पड़ती हैं, बिना समयके किसी प्रकार भी नहीं। इसलिये मनुष्यको सर्वदा धर्मयुक्त पुरुषार्थ करना चाहिए। उसके इस लोकमें आपत्तियोंमें पड़ जानेपर भी परलोकमें उसे निश्चय ही फल प्रात होगा। आलसी और भाग्यपर

English

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अध्याय 153

श्लोक 177

ततः शतेन बाणानां शक्रं विव्याध दानवः नारायणं च सप्तत्या नवत्या च हुताशनम्

tataḥ śatena bāṇānāṃ śakraṃ vivyādha dānavaḥ nārāyaṇaṃ ca saptatyā navatyā ca hutāśanam

हिन्दी अर्थ

निर्भर रहनेवाले पुरुषोंको अर्थोकी प्रापि नहीं होती। इसलिये सभी प्रयत्नोंसे पुरुषार्थ करनेमें तत्पर रहना चाहिए । राजेन्द्र! लक्ष्मी भाग्यपर भरोसा रखनेवाले एवं आलसी पुरुषोंको छोड़कर पुरुषार्थ करनेवाले पुरुषोंको यत्नपूर्वक ढूँढ़कर वरण करती है, इसलिये सर्वदा पुरुषार्थशील तस्मात् सदोत्थानवता हि भाव्यम्॥ १२ होना चाहिए॥ ६--१२॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे हैवपुरुषकारवर्णनं नामैकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

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अध्याय 153

श्लोक 178

दशभिर्मारुतं मूर्ध्नि यमं दशभिरेव च धनदं चैव सप्तत्या वरुणं च तथाष्टभिः

daśabhirmārutaṃ mūrdhni yamaṃ daśabhireva ca dhanadaṃ caiva saptatyā varuṇaṃ ca tathāṣṭabhiḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीमत्स्यमहापुराणमें हैव-पुरुषका वर्णन नामक दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ साम-नीतिका वर्णन

English

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अध्याय 153

श्लोक 179

विंशत्या निरृतिं दैत्यः पुनश्चाष्टाभिरेव च विव्याध पुनरेकैकं दशभिर्दशभिः शरैः

viṃśatyā nirṛtiṃ daityaḥ punaścāṣṭābhireva ca vivyādha punarekaikaṃ daśabhirdaśabhiḥ śaraiḥ

हिन्दी अर्थ

साम भेदस्तथा दानं दण्डश्च मनुजेश्वर। महाकुलीना ऋजवो धर्मनित्या जितेन्द्रियाः । तथ्यं साम च कर्तव्यं कुलशीलादिवर्णनम्।

English

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अध्याय 153

श्लोक 180

तथा च मातलिं दैत्यो विव्याध त्रिभिराशुगैः गरुडं दशभिश्चैव स विव्याध पतत्रिभिः

tathā ca mātaliṃ daityo vivyādha tribhirāśugaiḥ garuḍaṃ daśabhiścaiva sa vivyādha patatribhiḥ

हिन्दी अर्थ

एवं साम्ना च कर्तव्या वशगा धर्मतत्पराः॥ तथाप्येतदसाधूनां प्रयुक्तं नोपकारकम्॥

English

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अध्याय 153

श्लोक 181

पुनश्च दैत्यो देवानां तिलशो नतपर्वभिः चकार वर्मजातानि चिछेद च धनूंषि तु ततो विकवचा देवा विधनुष्काः शरैः कृताः

punaśca daityo devānāṃ tilaśo nataparvabhiḥ cakāra varmajātāni cicheda ca dhanūṃṣi tu tato vikavacā devā vidhanuṣkāḥ śaraiḥ kṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

धर्मे स्थिताः सत्यपरा विनीताः। मनुने पूछा-महान् झुतिशील भगवन्! अब आप साम आदि उपायोंका वर्णन कीजिये। देवश्रेष्ठ! साथ ही उनका लक्षण और प्रयोग भी बतलाइये मत्स्यभगवान्ने कहा-मनुजेश्वर! (राजनीतिमें)

English

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अध्याय 153

श्लोक 182

अथान्यानि चापानि तस्मिन्सरोषा रणे लोकपाला गृहीत्वा समन्तात् शरैरक्षयैर्दानवेन्द्रं ततक्षुस् तदा दानवो ऽमर्षसंरक्तनेत्रः

athānyāni cāpāni tasminsaroṣā raṇe lokapālā gṛhītvā samantāt śarairakṣayairdānavendraṃ tatakṣus tadā dānavo 'marṣasaṃraktanetraḥ

हिन्दी अर्थ

तथा इन्द्रजाल-ये सात प्रयोग बतलाये गये हैं। राजन्! उन्हें मैं बतला रहा हूँ, सुनिये! साम तथ्य और अतथ्यभेदसे दो प्रकारका कहा गया है। उनमें भी अतथ्य (झूठी प्रशंसा) साधु पुरुषोंकी अप्रसन्नताका ही कारण बन जाती है। नरोत्तम! इसलिये सज्जन व्यक्तिको प्रयत्नपूर्वक तथ्य साम (सच्ची प्रशंसा)-से वशमें करना चाहिए। जो उन्नत कुलमें उत्पन्न, सरलप्रकृति, धर्मपरायण और जितेन्द्रिय हैं, वे (तथ्य) सामसे ही साध्य होते हैं, अतः उनके

English

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अध्याय 153

श्लोक 183

शरानग्निकल्पान्ववर्षामराणां ततो बाणमादाय कल्पानलाभम् जघानोरसि क्षिप्रमिन्द्रं सुबाहुं महेन्द्रो व्यकम्पद्रथोपस्थ एव

śarānagnikalpānvavarṣāmarāṇāṃ tato bāṇamādāya kalpānalābham jaghānorasi kṣipramindraṃ subāhuṃ mahendro vyakampadrathopastha eva

हिन्दी अर्थ

प्रति अतथ्य सामका प्रयोग नहीं करना चाहिए। उनके प्रति तथ्य सामका प्रयोग, उनके कुल और शील- स्वभावका वर्णन, किये गये उपकारोंकी चर्चा तथा अपनी कृतज्ञताका कथन करना चाहिए। इसी युक्ति तथा इस प्रकारके सामसे धर्में तत्पर रहनेवालोंको अपने वशमें करना चाहिए। यद्यपि राक्षस भी साम-नीतिके द्वारा वशमें किये जाते हैं--ऐसी पराश्रुति है, तथापि असत्पुरुषोंके प्रति इसका प्रयोग उपकारी नहीं होता। दुर्जन पुरुष सामकी बातें करनेवालेको अतिशय डरा हुआ समझते हैं, इसलिये उनके प्रति इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। राजन्! जो पुरुष शुद्ध वंशमें उत्पन्न, सरलप्रकृतिवाले, विनम्र, धर्मिष्ठ, सत्यवादी, विनयी एवं सम्मानी हैं, वे ही निरन्तर

English

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अध्याय 153

श्लोक 184

विलोक्यान्तरिक्षे सहस्रार्कबिम्बं पुनर्दानवो विष्णुमुद्भूतवीर्यम् शराभ्यां जघानांसमूले सलीलं ततः केशवस्यापतच्छार्ङ्गमग्रे

vilokyāntarikṣe sahasrārkabimbaṃ punardānavo viṣṇumudbhūtavīryam śarābhyāṃ jaghānāṃsamūle salīlaṃ tataḥ keśavasyāpatacchārṅgamagre

हिन्दी अर्थ

मानोन्नता ये सततं च राजन्॥ १० सामद्वारा साध्य बतलाये गये हैं इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मे सामबोधो नाम द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽघ्यायः

English

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अध्याय 153

श्लोक 185

ततस्तारकः प्रेतनाथं पृषत्कैर् वसुं तस्य सव्ये स्मरन्क्षुद्रभावम् शरैरग्निकल्पैर्जलेशस्य कायं रणे ऽशोषयद्दुर्जयो दैत्यराजः

tatastārakaḥ pretanāthaṃ pṛṣatkair vasuṃ tasya savye smarankṣudrabhāvam śarairagnikalpairjaleśasya kāyaṃ raṇe 'śoṣayaddurjayo daityarājaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें सामबोध नामक दो सौ बाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ नीति चतुष्टयीके अन्तर्गत भेद-नीतिका वर्णन सद्यः स्वकार्यमुद्दिश्य कुशलैर्ये हि भेदिताः। भेदितास्ते विनिर्दिष्टा नैव राज्ञाऽर्थवादिभिः

English

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अध्याय 153

श्लोक 186

शरैरग्निकल्पैश्चकाराशु दैत्यस् तथा राक्षसान्भीतभीतान्दिशासु पृषत्कैश्च रूक्षैर्विकारप्रयुक्तं चकारानिलं लीलयैवासुरेशः

śarairagnikalpaiścakārāśu daityas tathā rākṣasānbhītabhītāndiśāsu pṛṣatkaiśca rūkṣairvikāraprayuktaṃ cakārānilaṃ līlayaivāsureśaḥ

हिन्दी अर्थ

अन्तःकोपो बहिःकोपो यत्र स्यातां महीक्षिताम्। अन्तःकोपो महांस्तत्र नाशकः पृथिवीक्षिताम् सामन्तकोपो बाह्यस्तु कोपः प्रोक्तो महीभृतः । महिषीयुवराजाभ्यां तथा सेनापतेर्नृप

English

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अध्याय 153

श्लोक 187

क्षणाल्लब्धचित्ताः स्वयं विष्णुशक्रानलाद्याः सुसंहत्य तीक्ष्णैः पृषत्कैः ।प्रचक्रुः प्रचण्डेन दैत्येन सार्धं महासंगरं संगरग्रासकल्पम्

kṣaṇāllabdhacittāḥ svayaṃ viṣṇuśakrānalādyāḥ susaṃhatya tīkṣṇaiḥ pṛṣatkaiḥ / pracakruḥ pracaṇḍena daityena sārdhaṃ mahāsaṃgaraṃ saṃgaragrāsakalpam

हिन्दी अर्थ

अन्तःकोपो विनिर्दिष्टो दारुणः पृथिवीक्षिताम् ९ बाह्यकोपे समुत्पन्ने सुमहत्यपि पार्थिव: । शुद्धान्तस्तु महाभाग शीघ्रमेव जयी भवेत् अपि शक्रसमो राजा अन्तःकोपेन नश्यति। सोऽन्तःकोपः प्रयत्नेन तस्माद् रक्ष्यो महीभृता परतः कोपमुत्पाद्य भेदेन विजिगीषुणा

English

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अध्याय 153

श्लोक 188

अथानम्य चापं हरिस्तीक्ष्णबाणैर् हनत्सारथिं दैत्यराजस्य हृद्यम् ध्वजं धूमकेतुः किरीटं महेन्द्रो धनेशो धनुः काञ्चनानद्धपृष्ठम् यमो बाहुदण्डं रथाङ्गानि वायुर् निशाचारिणाम् ईश्वरस्यापि वर्म

athānamya cāpaṃ haristīkṣṇabāṇair hanatsārathiṃ daityarājasya hṛdyam dhvajaṃ dhūmaketuḥ kirīṭaṃ mahendro dhaneśo dhanuḥ kāñcanānaddhapṛṣṭham yamo bāhudaṇḍaṃ rathāṅgāni vāyur niśācāriṇām īśvarasyāpi varma

हिन्दी अर्थ

मत्स्यभगवानूने कहा--राजन्! जो परस्पर वैर रखनेवाले, क्रोधी, भयभीत तथा अपमानित हैं, उनके प्रति भेद-नीतिका प्रयोग करना चाहिए; क्योंकि वे भेदद्वारा साध्य माने गये हैं । जो लोग जिस दोषके कारण दूसरेसे भयभीत नहीं होते उन्हें उसी दोषके द्वारा भेदन करना चाहिए। उनके प्रति अपनी ओरसे आशा प्रकट करे और दूसरेसे भयकी आशङ्का दिखलाये। इस प्रकार उन्हें फोड़ ले तथा फूट जानेपर उन्हें अपने बशमें कर

English

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अध्याय 153

श्लोक 189

दृष्ट्वा तद्युद्धममरैर् अकृत्रिमपराक्रमम् दैत्यनाथः कृतं संख्ये स्वबाहुयुगबान्धवः

dṛṣṭvā tadyuddhamamarair akṛtrimaparākramam daityanāthaḥ kṛtaṃ saṃkhye svabāhuyugabāndhavaḥ

हिन्दी अर्थ

ले। संगठित लोग भेद-नीतिके बिना इन्द्रद्वारा भी दुःसाध्य होते हैं । इसीलिये नीतिज्ञलोग भेद-नीतिकी ही प्रशंसा करते हैं। इस नीतिको अपने मुखसे तथा दूसरेके मुखसे भेद्य व्यक्तिसे कहे या कहलाये, परंतु अपने करके ठीक मानना चाहिए। अपने कार्यके उद्देश्यसे सुनिपुण नीतिज्ञोद्वारा जो तुरंत भेदित किये जाते हैं, वे ही सच्चे अर्थमें भेदित कहे जाते हैं, अर्थवादियों एवं राजाद्वारा किये गये नहीं। जहाँ राजाओंके सम्मुख आन्तरिक (दुर्गके अन्तर्गतका) कोप और बाहरी कोप--दोनों उपस्थित हों, वहाँ आन्तरिक कोप ही महान् है; क्योंकि बह राजाओंके लिये विनाशकारी होता है॥१--७॥

English

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अध्याय 153

श्लोक 190

मुमोच मुद्गरं भीमं सहस्राक्षाय संगरे दृष्ट्वा मुद्गरम् आयान्तम् अनिवार्यमथाम्बरे

mumoca mudgaraṃ bhīmaṃ sahasrākṣāya saṃgare dṛṣṭvā mudgaram āyāntam anivāryamathāmbare

हिन्दी अर्थ

छोटे राजाओंका क्रोध राजाके लिये बाह्य क्रोध कहा गया है तथा रानी, युवराज, सेनापति, अमात्य, कोप कहा गया है। इन सबोंका कोप राजाओंके लिये भयानक बतलाया गया है। महाभाग! अत्यन्त भीषण बाह्य कोपके उत्पन्न होनेपर भी यदि राजाका अन्तःपुर

English

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अध्याय 153

श्लोक 191

रथादाप्लुत्य धरणीम् अगमत्पाकशासनः मुद्गरो ऽपि रथोपस्थे पपात परुषस्वनः

rathādāplutya dharaṇīm agamatpākaśāsanaḥ mudgaro 'pi rathopasthe papāta paruṣasvanaḥ

हिन्दी अर्थ

एवं अनुकूल है तो वह शीघ्र ही विजय-लाभ करता है। यदि राजा इन्द्रके समान हो तो भी वह अन्तः (दुर्गस्थ रानी, युवराज, मन्त्री आदिके)-कोपसे नष्ट हो जाता है। इसलिये राजाको प्रयत्नपूर्वक उस आन्तरिक कोपकी रक्षा करनी चाहिए। शत्रुओंको जीतनेकी इच्छावाले राजाको ज्ञातीनां भेदनं कार्य परेषां विजिगीषुणा॥ १२ चाहिए कि दूसरेसे भेद-नीतिद्वारा क्रोध पैदा कराकर

English

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अध्याय 153

श्लोक 192

स रथं चूर्णयामास न ममार च मातलिः गृहीत्वा पट्टिशं दैत्यो जघानोरसि केशवम्

sa rathaṃ cūrṇayāmāsa na mamāra ca mātaliḥ gṛhītvā paṭṭiśaṃ daityo jaghānorasi keśavam

हिन्दी अर्थ

तथापि तेषां कर्तव्यं सुगम्भीरेण चेतसा। ग्रहणं दानमानाभ्यां भेदस्तेभ्यो भयंकरः न ज्ञातिमनुगृह्णन्ति न ज्ञातिं विश्वसन्ति च। ज्ञातिभिर्मेदनीयास्तु रिपवस्तेन पार्थिवैः

English

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अध्याय 153

श्लोक 193

स्कन्धे गरुत्मतः सो ऽपि निषसाद विचेतनः खड्गेन राक्षसेन्द्रस्य निचकर्त च वाहनम्

skandhe garutmataḥ so 'pi niṣasāda vicetanaḥ khaḍgena rākṣasendrasya nicakarta ca vāhanam

हिन्दी अर्थ

उसकी जातिमें भेद उत्पन्न कर दे और प्रयत्नपूर्वक अपने जाति-भेदकी रक्षा करे। यद्यपि संतप्त भाई-बन्धु राजाकी उन्नति देखकर जलते रहते हैं, तथापि राजाको दान और सम्मानद्वारा उनको मिलाये रखना चाहिए; क्योंकि जातिगत भेद बड़ा भयंकर होता है। जातिवालोंपर प्रायः लोग अनुग्रहका भाव नहीं रखते और न उनका विश्वास ही करते हैं, इसलिये राजाओंको चाहिए कि जातिमें फूट डालकर शत्रुको उनसे अलग कर दें। इस भेद-नीतिद्वारा भिन्न किये गये शत्रुओंके विशाल समूहको भी संग्रामभूमिमें थोड़ी-सी सुसंगठित सेनासे ही नष्ट किया जा सकता है, अतएव नीतिकुशल लोगोंको सुसंगठित शत्रुओंके

English

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अध्याय 153

श्लोक 194

यमं च पातयामास भूमौ दैत्यो भुशुण्डिना वह्निं च भिन्दिपालेन ताडयामास मूर्धनि

yamaṃ ca pātayāmāsa bhūmau daityo bhuśuṇḍinā vahniṃ ca bhindipālena tāḍayāmāsa mūrdhani

हिन्दी अर्थ

कार्यो रिपूणां नयशास्त्रविद्धिः ॥ १६ प्रति भी भेदनीतिका ही प्रयोग करना चाहिए ॥८--१६॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मे भेदप्रशंसा नाम त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

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अध्याय 153

श्लोक 195

वायुं च दोर्भ्यामुत्क्षिप्य पातयामास भूतले धनेशं च धनुष्कोट्या कुट्टयामास कोपनः

vāyuṃ ca dorbhyāmutkṣipya pātayāmāsa bhūtale dhaneśaṃ ca dhanuṣkoṭyā kuṭṭayāmāsa kopanaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें भेद-प्रशंसा नामक दो सौ तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ दान-नीतिकी प्रशंसा सुदत्तेनेह भवति दानेनोभयलोकजित्

English

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अध्याय 153

श्लोक 196

ततो देवनिकायानाम् एकैकं समरे ततः जघानास्त्रैरसंख्येयैर् दैत्येन्द्रो ऽमितविक्रमः

tato devanikāyānām ekaikaṃ samare tataḥ jaghānāstrairasaṃkhyeyair daityendro 'mitavikramaḥ

हिन्दी अर्थ

दानेन वशगा देवा भवन्तीह सदा नृणाम् प्रियो हि दानवाँल्लोके सर्वस्यैबोपजायते

English

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अध्याय 153

श्लोक 197

लब्धसंज्ञः क्षणाद्विष्णुश् चक्रं जग्राह दुर्धरम् दानवेन्द्रवसासिक्तं पिशिताशनकोन्मुखम्

labdhasaṃjñaḥ kṣaṇādviṣṇuś cakraṃ jagrāha durdharam dānavendravasāsiktaṃ piśitāśanakonmukham

हिन्दी अर्थ

दानवानचिरेणैव तथा राजा परान् जयेत्। दानवानेव शक्नोति संहतान् भेदितुं परान् अन्यत्रापि कृतं दानं करोत्यन्यान् यथा वशे। उपायेभ्यः प्रशंसन्ति दानं श्रेष्ठतमं जनाः मत्स्यभगवानूने कहा--दान सभी उपायोंमें सर्वश्रेष्ठ है। प्रचुर दान देनेसे मनुष्य दोनों लोकोंको जीत लेता है। राजन्! ऐसा कोई नहीं है जो दानद्वारा वशमें न किया जा सके। दानसे देवतालोग भी सदाके लिये

English

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अध्याय 153

श्लोक 198

मुमोच दानवेन्द्रस्य दृढं वक्षसि केशवः पपात चक्रं दैत्यस्य हृदये भास्करद्युति

mumoca dānavendrasya dṛḍhaṃ vakṣasi keśavaḥ papāta cakraṃ daityasya hṛdaye bhāskaradyuti

हिन्दी अर्थ

मनुष्योंके वशमें हो जाते हैं। नृपोत्तम! सारी प्रजाएँ दानके बलसे ही पालित होती हैं । दानी मनुष्य संसारमें सभीका प्रिय हो जाता है। दानशील राजा शीघ्र ही शत्रुओंको जीत लेता है। दानशील ही संगठित शत्रुओंका भेदन करनेमें समर्थ हो सकता है। यद्यपि निर्लोभ तथा समुद्रके समान गम्भीर स्वभाववाले मनुष्य स्वयं दानको अङ्गीकार नहीं करते, तथापि वे (भी दानी व्यक्तिके) पक्षपाती हो जाते हैं। अन्यत्र किया गया दान भी

English

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अध्याय 153

श्लोक 199

व्यशीर्यत ततः काये नीलोत्पलमिवाश्मनि ततो वज्रं महेन्द्रस्तु प्रमुमोचार्चितं चिरम्

vyaśīryata tataḥ kāye nīlotpalamivāśmani tato vajraṃ mahendrastu pramumocārcitaṃ ciram

हिन्दी अर्थ

अन्य लोगोंको अपने वशमें कर लेता है, इसलिये लोग सभी उपायोंमें श्रेष्ठतम दानकी प्रशंसा करते हैं। दानं श्रेयस्करं पुंसां दानं श्रेष्ठतमं परम्। दान पुरुषोंका कल्याण करनेवाला तथा परम श्रेष्ठ है। दानवानेब लोकेषु पुत्रत्वे श्चियते सदा॥ ७ लोकमें दानशील व्यक्तिकी सर्वदा पुत्रकी भाँति प्रतिष्ठा

English

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अध्याय 153

श्लोक 200

यस्मिञ्जयाशा शक्रस्य दानवेन्द्ररणे त्वभूत् तारकस्य सुसंप्राप्य शरीरं शौर्यशालिनः

yasmiñjayāśā śakrasya dānavendraraṇe tvabhūt tārakasya susaṃprāpya śarīraṃ śauryaśālinaḥ

हिन्दी अर्थ

न केवलं दानपरा जयन्ति भूर्लोकमेकं पुरुषप्रवीराः । जयन्ति ते राजसुरेन्द्रलोकं होती है । दानपरायण पुरुषश्रेष्ठ केवल एक भूलोकको ही अपने वशमें नहीं करते, प्रत्युत वे अत्यन्त दुर्जय देवराज इन्द्रके लोकको भी, जो देवताओंका

English

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अध्याय 153

श्लोक 201

व्यशीर्यत विकीर्णार्चिः शतधा खण्डतां गतम् विनाशमगमन्मुक्तं वायुनासुरवक्षसि

vyaśīryata vikīrṇārciḥ śatadhā khaṇḍatāṃ gatam vināśamagamanmuktaṃ vāyunāsuravakṣasi

हिन्दी अर्थ

सुदुर्जयं यो विबुधाधिवासः॥ ८ निवासस्थान है, जीत लेते हैं ॥१--८॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मदानप्रशंसा नाम चतुर्विशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें दान-प्रशंसा नामक दो सौ चौबीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ दण्डनीतिका वर्णन

English

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अध्याय 153

श्लोक 202

ज्वलितं ज्वलनाभासम् अङ्कुशं कुलिशं यथा विनाशमागतं दृष्ट्वा वायुश्चाङ्कुशमाहवे

jvalitaṃ jvalanābhāsam aṅkuśaṃ kuliśaṃ yathā vināśamāgataṃ dṛṣṭvā vāyuścāṅkuśamāhave

हिन्दी अर्थ

न शक्या ये वशे कर्तुमुपायत्रितयेन तु। सम्यक् प्रणयनं तस्य तथा कार्य महीक्षिता। धर्मशास्त्रानुसारेण सुसहायेन धीमता॥ तस्य सम्यकू प्रणयनं यथा कार्य महीक्षिता। वानप्रस्थाश्च धर्मज्ञान् निर्ममान् निष्परिग्रहान्॥

English

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अध्याय 153

श्लोक 203

रुष्टः शैलेन्द्रमुत्पाट्य पुष्पितद्रुमकन्दरम् चिक्षेप दानवेन्द्राय पञ्चयोजनविस्तृतम्

ruṣṭaḥ śailendramutpāṭya puṣpitadrumakandaram cikṣepa dānavendrāya pañcayojanavistṛtam

हिन्दी अर्थ

स्वदेशे परदेशे वा धर्मशास्त्रविशारदान्। नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यःस्वधर्मेण तिष्ठति॥ अदण्ड्यान् दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन्। तस्माद् राज्ञा विनीतेन धर्मशास्त्रानुसारतः। दण्डप्रणयनं कार्य लोकानुग्रहकाम्यया॥

English

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अध्याय 153

श्लोक 204

महीधरं तम् आयान्तं दैत्यः स्मितमुखस्तदा जग्राह वामहस्तेन बालकन्दुकलीलया

mahīdharaṃ tam āyāntaṃ daityaḥ smitamukhastadā jagrāha vāmahastena bālakandukalīlayā

हिन्दी अर्थ

यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा। देवहैत्योरगगणाः सर्वे भूतपतत्रिणः।

English

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अध्याय 153

श्लोक 205

ततो दण्डं समुद्यम्य कृतान्तः क्रोधमूर्छितः दैत्येन्द्रं मूर्ध्नि चिक्षेप भ्राम्य वेगेन दुर्जयः

tato daṇḍaṃ samudyamya kṛtāntaḥ krodhamūrchitaḥ daityendraṃ mūrdhni cikṣepa bhrāmya vegena durjayaḥ

हिन्दी अर्थ

मत्स्यभगवानूने कहा--राजन् ! जो (पूर्वोक्त सामादि) तीनों उपायोंके द्वारा वशमें नहीं किये जा सकते, उन्हें दण्डनीतिके द्वारा वशमें करे; क्योंकि दण्ड मनुष्योंको निश्चयरूपसे वशमें करनेवाला है । बुद्धिमान् राजाको सम्यक्- रूपसे उस दण्डनीतिका प्रयोग धर्मशास्त्रके अनुसार पुरोहित आदिको सहायतासे करना चाहिए। उस दण्डनीतिका सम्यक् प्रयोग जिस प्रकार करना चाहिए, उसे सुनिये। राजाको अपने देशमें अथवा पराये देशमें वानप्रस्थाश्रमी, धर्मशील, ममतारहित, परिग्रहहीन और धर्मशास्त्रप्रवीण विद्वान् पुरुषोंको परिषद्द्वारा भलीभाँति विचार कर दण्डनीतिका प्रयोग करना चाहिए; क्योंकि सब कुछ दण्डपर ही प्रतिष्ठित है। सभी आश्रमधर्मके व्यक्ति, ब्रह्मचारी,

English

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अध्याय 153

श्लोक 206

सो ऽसुरस्यापतन्मूर्ध्नि दैत्यस्तं च न बुद्धवान् कल्पान्तदहनालोकाम् अजय्यां ज्वलनस्ततः

so 'surasyāpatanmūrdhni daityastaṃ ca na buddhavān kalpāntadahanālokām ajayyāṃ jvalanastataḥ

हिन्दी अर्थ

पूज्य, गुरु, महापुरुष तथा अपने धर्में स्थित रहनेवाला कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है, जो राजाके द्वारा दण्डनीय न हो; किंतु अदण्डनीय पुरुषोंको दण्ड देने तथा दण्डनीय पुरुषोंको दण्ड न देनेसे राजा इस लोकमें राज्यसे च्युत हो जाता है और मरनेपर नरकमें पड़ता है । इसलिये विनयशील राजाको लोकानुग्रहकी कामनासे धर्मशास्त्रे अनुसार ही दण्डनीतिका प्रयोग करना चाहिए। जिस राज्यमें श्यामवर्ण, लाल नेत्रवाला और पापनाशक दण्ड विचरण

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।