अध्याय 153
श्लोक 137
क्वचित् तुरंगमण्डली विकृष्यते श्वजातिभिः क्वचित्पिशाचजातकैः प्रपीतशोणितासवैः स्वकामिनीयुतैर्द्रुतं प्रमोदमत्तसंभ्रमैर् ममैतदानयाननं खुरो ऽयमस्तु मे प्रियः
kvacit turaṃgamaṇḍalī vikṛṣyate śvajātibhiḥ kvacitpiśācajātakaiḥ prapītaśoṇitāsavaiḥ svakāminīyutairdrutaṃ pramodamattasaṃbhramair mamaitadānayānanaṃ khuro 'yamastu me priyaḥ
हिन्दी अर्थ
है। वस्त्रोंमें विशेषकर काले धब्बे पड़ जाते हैं। लोहे और मणियोंपर मैल जम जाती है । नृपश्रेष्ठ! शरीरमें लेपन किये जानेवाले द्रव्यो एवं उपयोगमें आनेवाली पुष्प- मालाओंमें दुर्गन्धि तथा रंगकी मलिनता समझनी चाहिए। राजन्! उसी प्रकार जलमें भी पीलेपनका आभास आने लगता है। नृपोत्तम! विषके सेवनसे दाँत, होंठ और चमड़े श्यामल वर्णके हो जाते हैं और शरीरमें क्षीणताका अनुभव होने लगता है-इस प्रकार ये लक्षण जानने चाहिए। इसलिये राजाको सर्वदा मणि, मन्त्र और उपर्युक्त ओषधियोंसे सुरक्षित तथा सावधान रहना चाहिए। सूर्यवंशके चन्द्र! इस पृथ्वीपर प्रजारूपी वृक्षकी जड़ राजा है, अतः उसीको रक्षासे राष्ट्रकी वृद्धि होती है। इसलिये सभीको
English
Here ends the one hundred and fifty-third chapter on the • victory of Tarakasura.