वाल्मीकि रामायण

Bala Kandaश्लोक 3/1225%

Ramayana 1.3

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

हे निषाद! तू अनंत काल तक प्रतिष्ठा न प्राप्त कर — क्योंकि तूने काम-मोहित क्रौञ्च-युगल में से एक को मार डाला।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

O hunter, you shall not attain glory for long years — for you have slain one of a pair of krauncha birds, lost in love.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

विश्व-साहित्य का प्रथम श्लोक (आदिकव्य): व्याध द्वारा काम-मोहित क्रौंच पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी को मारे जाने पर, मादा पक्षी के कारुणिक विलाप को देखकर महर्षि वाल्मीकि के शोक-विह्वल हृदय से स्वतः श्लोक फूट पड़ा: "मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः..." — करुणा का यह शोक ही छंदोबद्ध श्लोक बन गया!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
रामायण का जन्म किसी दार्शनिक गोष्ठी या राजमहल के सुख में नहीं हुआ; इसका जन्म एक निर्दोष पक्षी के वध पर उपजी असीम करुणा और शोक में हुआ। 'शोकः श्लोकत्वमागतः' — जब किसी संवेदनशील हृदय में दूसरों के दुख को देखकर गहरा शोक उठता है और वह शोक किसी प्रतिशोध या व्यक्तिगत अवसाद में नहीं बदलता, बल्कि संपूर्ण मानवता के उद्धार का 'श्लोक' (काव्य) बन जाता है, तभी रामायण जैसे कालजयी महाकाव्य जन्म लेते हैं। आधुनिक समाज की सबसे बड़ी बीमारी संवेदनहीनता (Empathy Deficit) है। लोग सड़क पर तड़पते हुए व्यक्ति की वीडियो बना लेते हैं किन्तु सहायता के लिए हाथ नहीं बढ़ाते। वाल्मीकि हमें सिखाते हैं कि सच्ची रचनात्मकता और आध्यात्मिक जागरण की शुरुआत दूसरों के दर्द को गहराई से महसूस करने से होती है। यदि आपके भीतर किसी का दुख देखकर करुणा नहीं जागती, तो आपकी सारी बौद्धिक और तकनीकी प्रगति निरर्थक है। अपने निजी दुखों और संसार की पीड़ा को रचनात्मक सृजन, सेवा और कला में रूपांतरित करना ही मानवीय चेतना की सार्थकता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **सहानुभूति और करुणा का जागरण**: दूसरों के दुख, पीड़ा और अभाव के प्रति अपनी संवेदनशीलता को कभी कुंद न होने दें; पीड़ा को देखकर द्रवित होना ही मनुष्यता है। - **दुख का उदात्तीकरण (Sublimation)**: जीवन में आने वाले व्यक्तिगत आघातों, हानियों और निराशाओं को व्यर्थ के अवसाद में गंवाने के बजाय किसी रचनात्मक कार्य, लेखन या सेवा में लगाएं। - **अन्याय के विरुद्ध नैतिक स्वर**: निर्दोषों और बेजुबानों पर होने वाले अत्याचार के विरुद्ध अपनी आवाज उठाने में संकोच न करें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं दूसरों के दुखों को देखकर केवल मूकदर्शक बना रहता हूँ, अथवा मेरे भीतर वाल्मीकि जैसी वह पावन करुणा है जो पीड़ा को समाज के कल्याणकारी सृजन में बदल सके?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

आघात-पश्चात रचनात्मक रूपांतरण (Post-Traumatic Growth & Artistic Sublimation): गहन व्यक्तिगत या सामाजिक पीड़ा जब करुणा और परा-संज्ञान से जुड़ती है, तो वह विनाशकारी अवसाद बनने के बजाय कालजयी कला और साहित्य में रूपांतरित हो जाती है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
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Translation
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Last updated
2026-10-24
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