वाल्मीकि रामायण

Uttara Kandaश्लोक 9/1040%

Ramayana 7.9

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

जनकीनन्दनो देवो जनकीजनकः स्वयम् ।जनकीकुलकमल्पो वा जनकीकुलदीप्तिमान्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जानकी का पुत्र दिव्य है; जानकी का पति स्वयं ब्रह्मा है। वह जानकी कुल का आभूषण है या जानकी कुल का प्रकाश।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Janaki's son is the divine one; Janaki's husband is himself the creator. He is either the ornament of Janaki's lineage or the illumination of Janaki's lineage.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

जानकीनन्दन और जानकी-पति: "जानकीनन्दनो देवो जानकीजनकः स्वयम्। जानकीकुलकमलपो वा जानकीकुलदीप्तिमान्॥" — जो साक्षात् परमेश्वर सीता जी (जानकी) के पुत्र, पिता, पति और रक्षक के रूप में नाना दिव्य लीलाएं करते हैं; वे जानकी के कुल के कमल को खिलाने वाले सूर्य हैं और जानकी-कुल के परम भूषण हैं। यह श्लोक राम और सीता के अभिन्न अद्वैत संबंध और दिव्य नारी-शक्ति की महिमा का उत्सव मनाता है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यह श्लोक रामायण के उस परम रहस्य को उद्घाटित करता है जिसे 'सीताराम' का अद्वैत तत्त्व कहा जाता है। रामायण केवल श्रीराम की कथा नहीं है; रामायण वास्तव में 'सीतायाश्चरितं महत्' — माता सीता का महान चरित्र है। श्रीराम और सीता परस्पर वैसे ही अभिन्न हैं जैसे सूर्य और उसका प्रकाश, या शब्द और उसका अर्थ। श्रीराम का संपूर्ण जीवन सीता जी के सम्मान, उनकी रक्षा और उनके प्रति अनन्य प्रेम व समर्पण से ओत-प्रोत है। आधुनिक समाज में जहां स्त्री-पुरुष संबंधों में अहंकार का टकराव, शोषण और अलगाव बढ़ रहा है, वहाँ सीताराम का यह पावन संबंध प्रेम और आदर का सर्वोच्च प्रतिमान है। जहाँ पुरुष अपनी शक्ति का उपयोग स्त्री के दमन में नहीं बल्कि उसके सम्मान और संरक्षण में करता है, और जहाँ स्त्री अपने स्वाभिमान और पातिव्रत्य से पुरुष की चेतना को दिव्यता प्रदान करती है। जब तक समाज में नारी-शक्ति को साक्षात् 'जानकी' की भाँति पूज्य नहीं माना जाएगा, तब तक किसी भी समाज में वास्तविक सुख और शांति नहीं आ सकती।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **नारी-शक्ति का पावन आदर**: अपने परिवार और समाज की समस्त स्त्रियों के प्रति सीता जी के समान पवित्र और सम्मानजनक दृष्टिकोण रखें; नारी का अनादर विनाश लाता है। - **संबंधों में पवित्र निष्ठा**: अपने वैवाहिक और पारिवारिक संबंधों में श्रीराम और सीता जैसी अटूट, निःस्वार्थ और समर्पित निष्ठा का पालन करें। - **प्रकृति और चेतना का समन्वय**: अपने जीवन में पुरुषार्थ (ऊर्जा) और करुणा (प्रकृति) का सुंदर संतुलन बनाएं।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मेरे पारिवारिक संबंधों में श्रीराम और जानकी जैसी निःस्वार्थ निष्ठा, परस्पर आदर और पवित्रता है, अथवा मेरे संबंध अहंकार और अपेक्षाओं के तनाव में घुट रहे हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

प्रकृति-पुरुष का अभिन्न संबंध और सुरक्षित आधार (Secure Attachment & Sacred Polarity): वेदांत के अनुसार ब्रह्म (पुरुष) और उसकी आद्या शक्ति माया/प्रकृति (सीता) परस्पर अभिन्न हैं; एक के बिना दूसरे का प्रकटीकरण असंभव है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
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Last updated
2026-10-24
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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.8

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते

Translation / Meaning (भावार्थ)

I am the source of all creation. Everything proceeds from Me. The wise who know this worship Me with all their heart.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next