वाल्मीकि रामायण

Uttara Kandaश्लोक 8/1030%

Ramayana 7.8

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

रामो विग्रहवान् धर्मः सर्वस्य जगतो गतिः ।रामो राजा सर्वदेवानां रामो वेदो निगूढः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

राम धर्म का साक्षात रूप है; राम सारे जगत की गति है। राम सभी देवों का राजा है; राम वेद का गूढ़ रूप है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Rama is dharma in embodied form; Rama is the goal of all the world. Rama is the king of all gods; Rama is the hidden Veda.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

श्रीराम का परब्रह्म स्वरूप: "रामो विग्रहवान् धर्मः सर्वस्य जगतो गतिः। रामो राजा सर्वदेवानां रामो वेदो निगूढकः॥" — श्रीराम केवल एक ऐतिहासिक राजा या मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं हैं; वे संपूर्ण ब्रह्मांड के परम अधिष्ठान, समस्त वेदों के परम गूढ़ रहस्य, सभी देवताओं के स्वामी और इस चराचर जगत की अंतिम गति (परम लक्ष्य) हैं!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
अध्यात्म रामायण का यह श्लोक श्रीराम के ऐतिहासिक मानवीय रूप को उनके सनातन ब्रह्मांडीय स्वरूप (Cosmic Divinity) के साथ जोड़ देता है। श्रीराम वह परम सत्ता हैं जो समस्त वेदों का सार हैं, जिनके भीतर संपूर्ण ब्रह्मांड गति कर रहा है। जब कोई साधक श्रीराम का स्मरण करता है, तो वह केवल एक धनुर्धर राजा का ध्यान नहीं कर रहा होता; वह ब्रह्मांडीय व्यवस्था, करुणा, सत्य और मर्यादा के उस सर्वोच्च प्रकाश का ध्यान कर रहा होता है जो संपूर्ण सृष्टि को संभाले हुए है। आज के संशयवादी युग में मनुष्य का जीवन दिशाहीन हो चुका है क्योंकि उसके पास कोई 'सर्वोच्च आदर्श' (Supreme Ideal) नहीं बचा। जब जीवन में कोई उदात्त केंद्र नहीं होता, तो मनुष्य क्षुद्र स्वार्थों और तुच्छ वासनाओं में भटक कर अपना जीवन व्यर्थ कर लेता है। श्रीराम वह ध्रुव तारा हैं जिनकी ओर देखकर मनुष्य अपनी जीवन-नौका को भवसागर के तूफानों में भी सही दिशा में ले जा सकता है। श्रीराम का ध्यान मनुष्य की चेतना को क्षुद्रता से उठाकर दिव्यता की ऊंचाइयों पर प्रतिष्ठित कर देता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **उदात्त आदर्श का नित्य स्मरण**: अपने दैनिक जीवन में श्रीराम के आदर्शों (सत्य, मर्यादा, करुणा, कर्तव्य) को अपना मार्गदर्शक प्रकाश-स्तंभ बनाएं। - **राम-नाम का जप**: मानसिक तनाव, भय और भटकाव के क्षणों में 'राम' नाम की दिव्य ध्वनि का ध्यान करें; यह चित्त को तुरंत स्थिर और पवित्र कर देता है। - **समस्त कर्मों का समर्पण**: अपने समस्त कार्यों को उस परम सत्ता की पूजा मानकर निष्काम भाव से करें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मेरा जीवन बिना किसी दिशा और आदर्श के अंधकार में भटक रहा है, अथवा मैंने श्रीराम को अपने जीवन की परम गति और आदर्श मानकर अपनी चेतना को प्रकाशित किया है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

ब्रह्मांडीय संरेखण और सर्वोच्च आदर्श (Cosmic Teleology & Supreme Ideal): चेतना का अंतिम विकास उस बिंदु पर होता है जहाँ व्यक्ति स्वयं को संपूर्ण ब्रह्मांडीय व्यवस्था (कॉस्मिक धर्म) के साथ पूर्णतः एकाकार अनुभव करता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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2026-10-24
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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next