Atharva Veda
15
अध्याय 15 / 20

Kanda 15

काण्ड 15

230 श्लोकभाग 1/5 · श्लोक 1.1–3.11

पूर्ण अध्याय पाठ51 श्लोक

अध्याय 15

श्लोक 1.1

अध्यात्म-प्रकरणम्।१-८ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ साम्नी पङ्क्तिः; २ द्विपदा साम्नी बृहती; ३ एकपदा यजुर्ब्राह्म्यनुष्टुप्; ४ एकपदा विराड् गायत्री; ५ साम्नी अनुष्टुप्; ६ त्रिपदा प्राजापत्या बृहती, ७ आसुरी पङ्क्तिः; ८ त्रिपदा अनुष्टुप्।व्रात्य॑ आसी॒दीय॑मान ए॒व स प्र॒जाप॑तिं॒ समैरयत्

adhyātma-prakaraṇam| 1-8 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 sāmnī paṅktiḥ; 2 dvipadā sāmnī bṛhatī; 3 ekapadā yajurbrāhmyanuṣṭup; 4 ekapadā virāḍ gāyatrī; 5 sāmnī anuṣṭup; 6 tripadā prājāpatyā bṛhatī, 7 āsurī paṅktiḥ; 8 tripadā anuṣṭup| vrātya āsīdīyamāna eva sa prajāpatiṃ samairayat

हिन्दी अर्थ

मीद्व == मिहु सेचने, वौयंसेचन.मे समथं है किरम पितृग्रह के साथ जडे हए कन्यां के प्रमबन्धनो को ढीला करता हं ताकि कन्या पतिगृह मे स्थिर हो सके। वर को “पुषा” "कहा हैँ । यदि पति वीयंवान् न हो तो गरहस्थधमं सफल नहीं हो सकता, तथा पारस्परिक पतिपत्नोसम्वद् ढीला. पड़ सकता हैः श्रौर पत्नी सुपुत्रा नहीं हो सकती । सुभगा का श्रं है उत्तमं भगो बाली । भग के ६ भ्रं होते ह, एेदवयं, चाहिए कि वह् इन ६ भगो का यथादाक्ति उपाजंन करती रहे,ताकि सन्तानं सुंसन्तानें हौ सकें । वर द्वारा वध्र को भ्रारवासन शतस्य योनौ सुकतस्य॑ छोके स्योनं तै अस्तु सषस॑मलायै ।१९। के (योनौ). मेरे गृह मँ, तथा (सुकृतस्य) सुकर्मियों के (लोके) "समाज में

English

The hyperbolical glorification of the Vrātya or Aryan Non-conformist

अध्याय 15

श्लोक 1.2

स प्र॒जाप॑तिः सु॒वर्ण॑मा॒त्मन्न॑पश्य॒त् तत् प्राज॑नयत्

sa prajāpatiḥ suvarṇamātmannapaśyat tat prājanayat

हिन्दी अर्थ

सेवाः = सु + शेदम् सुरूनाम (निष ० २।६) । योनिः गृहनाम (निचं° का० १४ अनु १। सुण ग्रथववेद-माष्य २७ को बि हए हैँ । माता-पिता रौर सन्तानौं का, पति श्रौर पत्नी का पार- मे भो दुष्टिगोचरहो रहीदहै, जिससे प्रारिसृष्टि का सजनहोरहाह। वर कहृतादहैकिहे वधु ! ग्रभो तकं तो इस प्रेमपाचा द्वारा तेरे चुखेद द्वारा बांधता हूं + इमं प्रकार वर श्रपने हादिकंप्रेम का विरवास ववृ को साथही वरः कहता. है कि इस नएघर मे सत्यका राज्यदहै। इस घरमे तू सदा सुखपूवेक रहेगी, श्रौर मै सदा सम्यग्भाषी हो कर तुभे १० मगंस्तवेतो न॑यतु दस्तगृहयाशििनां त्वा प्रवहतां रथन ।

English

There was a roaming Vrātya. He roused Prajāpati to action.

अध्याय 15

श्लोक 1.3

त देक॑मभव॒त् तल्ल॒लाम॑मभव॒त् तन्म॒हद॑भव॒त् तज्ज्ये॒ष्ठम॑भव॒त् तद् ब्रह्मा॑भव॒त् तत् तपो॑ऽभव॒त् तत् स॒त्यम॑भव॒त् तेन॒ प्राजा॑यत

ta dekamabhavat tallalāmamabhavat tanmahadabhavat tajjyeṣṭhamabhavat tad brahmābhavat tat tapo'bhavat tat satyamabhavat tena prājāyata

हिन्दी अर्थ

तेरा हाथ पकड़ कर (नयतु) ले चले, श्रदिवना) वर के माता-पिता (त्वा) (ग्रहान्) पति के. गरहवासियो की प्रोर (गच्छ) तुजा, (यथा) ताकि (गृहपत्नी) पतिगरह की स्वामिनी (श्रः) तुरो सके, (वदिनी) पूत्रो रण ्रथववेद-माष्य . का०.१४। अनु० १। सु° १ है । इस कथन द्वारा पुत्री को पिता पतिक सद्गुणो का परिज्ञान देता है, ताकि पति पर कन्या भरोसा, विदवास, तथा श्रद्धा कर सके । पत्नी को पति, पितृगरृह से,हाथ पकड़ कर रथ तक ले चले, तत्पद्चात् पति के माता-पिता की सुरक्षा में पत्नी, पतिग्रह को रथ द्वारा जाए। कन्या का पिता पूत्रीको यहु भी उपदेदादेतादहैकितूु पति के धर जा कर भ्रपने सद्गुणो के कारण पतिगृह की स्वामिनी बन । पत्नीगरह की तथा गरहवासियो.की सच्ची स्वामिनी तभी बन. सकती है जब कि वह् भ्रयने सेवोभाव तथा कर्तंव्यभावना से सब गरहवा सियो के म्नो को मोह ले । गई ह । मानौ यह् पत्नी का कानुनन हक उदघोषित किया गया है 1

English

Prajāpati beheld gold in himself and engendered it.

अध्याय 15

श्लोक 1.4

सोऽवर्धत॒ स म॒हान॑भव॒त् स म॑हादे॒वोऽभवत्

so'vardhata sa mahānabhavat sa mahādevo'bhavat

हिन्दी अर्थ

. (इह) इस पतिगृह मँ (ते) तेरे लिये (प्रजाये) तथा तेरी सन्तानो के कार्यो के सम्पादन के लिये (जागृहि) है वधु ! तू.ज्ञागरूक रह । (एना, ज्ञानविज्ञान का (भ्रा वदासि) सरवंत्र उपः करते रहना । जिवि; = यो जीवंति । इसी प्रकार पुरुष के सम्बन्धे कहा है कि (उणा० ५।४६) तथा जीविः (४।५५) महषि दयानन्द । “जिवि: का ही रूपान्तर लौकिक संस्कृत मेँ “जितब्रिः"" तथा जीविः प्रतीत होताहै1॥ विदथम्-= विदथा वेदनेन (निर० ३।२।१२); विद्ये वेदने (नि० १।३।७); विदथानि वेदनाति "ज्ञानानि" (नि° ६।२।७)

English

That became unique, that became distinguished, that became great, that became excellent,

अध्याय 15

श्लोक 1.5

स दे॒वाना॑मी॒शां पर्यै॒त् स ईशा॑नोऽभवत्

sa devānāmīśāṃ paryait sa īśāno'bhavat

हिन्दी अर्थ

कि तेरे तथा तेरी सन्तान के लिये पतिगरह मे सदा सुरों की वुद्धिदहो, का० १४। श्रनु° १। सु° १ अथरवेवेद-माष्य २९ भौर तदनन्तर उपदेश देता है कि पतिगृह मेँ गृहस्थ धमं के पालन तथा पति के कार्यो के सम्पादन मे सदा सावधान रहना । तथा यह मी कि मेँ ही निज जीवन यात्राकी समाप्ति न समे । कन्या के पिताका वर-वधू को भ्राशीर्वाद कीडन्तौ पुतरनेष्ठमिमांदंमानौ स्वस्तकौ ॥२२॥ - (इह) इस गरहस्थजीवन मे (एव) ही (स्तम्) रहो, (मा) न (वियौ-

English

that became Devotion, that be- came holy Fervour, that became Truth: through that he was

अध्याय 15

श्लोक 1.6

स ए॑कव्रा॒त्योऽभव॒त् स धनु॒राद॑त्त॒ तदे॒वेन्द्र॑ ध॒नुः

sa ekavrātyo'bhavat sa dhanurādatta tadevendra dhanuḥ

हिन्दी अर्थ

कहता है किं (१) तुम दोन गृहस्थ जीवन भें पति-पत्नीभाव से बने रहो । दो, श्रौर नएक दूसरे से चिरकाल तक श्रलग रहो। (३) गृहस्थ में. जीवनो को नियमपूर्वकं रखो ताकि तुम ॒श्रपनी १०० वर्षो की पं भ्रायु तेथा उसे साफ-सुथरा श्रौर रम्य बनाघ्रो । - ३० अथवेवेद-माष्यं, का० १४। भननु° १ । सु° १ देल-माल करता है, भौर (भ्रन्यः) दूसरी - तु है पत्नि ! (ऋतून्) ऋतुघभों को (विदधत्) प्रकट करती हुई (नवः) नवीन नवीन खूप में (जायसे) प्रकट होती रहती है । ॥ि । न है, इनकी नियमबद्ध गंतियो से. इन के एक बुद्धिमानु नियन्ता का भ्नूमान की भ्रोर नियमित गतियां कर रहेदहैः। - ये दोनों मानों परमेदवरीय माता के शि है, जोकि भन्तरिक्ष की क्रीडाभूमि मेल रहे-ह। इन में एक भ्र्थात् सूयं मानो चलता हभ निज सौर मण्डलके भुवनो का निरीक्षण करता हृभ्रा उर नियमोंमें

English

born.

अध्याय 15

श्लोक 1.7

नील॑मस्यो॒दरं॒ लोहि॑तं पृ॒ष्ठम्

nīlamasyodaraṃ lohitaṃ pṛṣṭham

हिन्दी अर्थ

मा कलाग्रों कीः क्षय तथा वृद्धि दवारा नंवौन नवीन रूप धारण करता हृभ्रा मानो प्रतिमास पुनः पुनः पैदा होता है। का० १४. भ्रनु० १। सु° १ भथंववेद-माष्य ३१ पड़ता है । हंसी-खेल की तबियत वाले पति-पत्नी ही इन कष्टों तथा भ्राप- त्िरयो का मुकाबिला बहादुरी के साथ कर पाते है। तथा पृत्रियो के रूप मे नवीन नवीन -रूपों भे प्रकट होती रहती है । सन्तानौं , का निर्माण माता ही करती. है । १० मास माता के पेट में रह् कर बनवा माताके संस्कारो सेही प्रभावित होता रहता है। जन्म के पंदचात् मी

English

He grew, he became great, he became Mahādeva.

अध्याय 15

श्लोक 1.8

नीले॑नै॒वाप्रि॑यं॒ भ्रातृ॑व्यं॒ प्रोर्णो॑ति॒ लोहि॑तेन द्वि॒षन्तं॑ विध्य॒तीति॑ ब्रह्मवा॒दिनो॑ वदन्ति

nīlenaivāpriyaṃ bhrātṛvyaṃ prorṇoti lohitena dviṣantaṃ vidhyatīti brahmavādino vadanti

हिन्दी अर्थ

-माताही प्रों तथापुच्रि्योँ के रूप में समय पर प्रकट होती रहती है। चन्दर नाम से पतनी का वशंन २४. नवोनवो मवसि नाय॑पानोऽडा" केतुऽर्षसामिष्यग्र॑म् । : नवीन नवीन रूपों भं (जायमानः) प्रकट (भवसि) होती रहती है, (म्रह्ञाम्) ३२ भथववेद-माष्य का० १४। भ्रनु° १। सु० १ (देवेभ्यः) देवो.के लिए (मागम) माग का (विदधासि) विधान करती है, तिरसे) बढ़ती हैः याकरतीदहै। । तए नए रूपों मे प्रकट होता रहता है । वह दिनों - भर्थात् तिथिय का केतु

English

He gained the lordship of the Gods. He became Lord.

अध्याय 15

श्लोक 2.1

१-३२ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१, ६, ९, १७, २५, ३० साम्न्यनुष्टुप्; २, १८, २६ साम्नी त्रिष्टुप्; ३ द्विपदाऽर्षी पङ्क्तिः ४, २०, २८ द्विपदा ब्राह्मी गायत्री; ५, १३ २१, २९, द्विपदाऽर्ची गायत्री; १४ साम्नी पङ्क्तिः २२ आसुरी गायत्री; ७, १५, २३, ३१ पदपङ्क्तिः; ८, १६, २४, ३२ त्रिपदा प्राजापत्या त्रिष्टुप्; १० एकपदा उष्णिक्; ११ द्विपदाऽर्षी भुरिक् त्रिष्टुप् १२ आर्षी पराऽनुष्टुप्; १९ द्विपदा विराडार्षी पङ्क्तिः; २७ निचृदार्षी पङ्क्तिः।स उद॑तिष्ठ॒त् स प्राचीं॒ दिश॒मनु॒ व्यऽचलत्

1-32 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1, 6, 9, 17, 25, 30 sāmnyanuṣṭup; 2, 18, 26 sāmnī triṣṭup; 3 dvipadā'rṣī paṅktiḥ 4, 20, 28 dvipadā brāhmī gāyatrī; 5, 13 21, 29, dvipadā'rcī gāyatrī; 14 sāmnī paṅktiḥ 22 āsurī gāyatrī; 7, 15, 23, 31 padapaṅktiḥ; 8, 16, 24, 32 tripadā prājāpatyā triṣṭup; 10 ekapadā uṣṇik; 11 dvipadā'rṣī bhurik triṣṭup 12 ārṣī parā'nuṣṭup; 19 dvipadā virāḍārṣī paṅktiḥ; 27 nicṛdārṣī paṅktiḥ| sa udatiṣṭhat sa prācīṃ diśamanu vya'calat

हिन्दी अर्थ

. (निर० १२१1७) , कृष्णपक्ष के श्रन्तिम दिनों से 6 पूवं मे उषाके देवो को मानों यज्ञका भाग प्रदान करता है श्रौरभ्रायु . बढाता है। होता, तथा प्राणिशरीरों भें रक्त संचार बढ़ता है, इस कारण चन्द्रमा होती रहती है । भिन्न॒ भिन्न गुणौ, ्राकृतियों वाली सन्तानं माताकेही रही होती दहै । यथा “आत्मा वे पूश्च नामासि सं जोव धारवः इतम्" (दात० बरा० १४।९।८।२६) । (२) पत्नी दिन का मानो भण्डा है । राजा के महल. पर फण्डा यदि लगा है तो ज्ञात होता है कि महल मे राजा की उपस्थिति

English

He became Chief Vrātya. He held a bow, even that Bow of

अध्याय 15

श्लोक 2.2

तं बृ॒हच्च॑ रथंत॒रं चा॑दि॒त्याश्च॒ विश्वे॑ च दे॒वा अ॑नु॒व्य॒ऽ चलन्

taṃ bṛhacca rathaṃtaraṃ cādityāśca viśve ca devā anuvya' calan

हिन्दी अर्थ

ग्वाला, तथाः (सविता) गृहपत्नी का या पति का-टत्पादक पिता (वः) - दहै गौभ्रो ! तुमह (भ्रस्मे) इस घर के लिए (सुवाति) प्रेरित करे । .. वे धाता (ते० ब्रा० ३।८।२३।३) । सविता=पत्नी कां पिता (मन्त्र €, १९) , व्यश्या-गौए णेसी खरीदनी चाहिए जिन के साथ बद्छडेन्नछडियां हों, ताफि वे दूष दे सकं । भतः प्रजां समेत गौरो का गृहपति के घर प्रवेद गौए घरमे होने पर उन के दूष, घृत द्वारा देवयज्ञ करने चाहिए ताकि देवो को छनं का भाग मिलता रहे । भ्रग्निहोत्र, दशंपौरंमास भ्रादिं देव, पितृदेव, भावाय .देव श्रादि का सत्कार करना भी देवयज्ञ है । पुष्टि को बनाए रखने कै लिए उसे चाहिए कि वह घर में गौए सदा रखे । सविता पिता दहै -वधू-का। वैदिक विवाहं विधिम सविता, वर वो गोदान

English

the Gods. In the eastern region Faith is his leman, the hymn his panegyrist, knowledge his

अध्याय 15

श्लोक 2.3

बृ॒ह॒ते च॒ वै स र॑थंत॒राय॑ चादि॒त्येभ्य॑श्च॒ विश्वे॑भ्यश्च दे॒वेभ्य॒ आ वृ॑श्चते॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॒ व्रात्य॑मुप॒वद॑ति

bṛhate ca vai sa rathaṃtarāya cādityebhyaśca viśvebhyaśca devebhya ā vṛścate ya evaṃ vidvāṃsaṃ vrātyamupavadati

हिन्दी अर्थ

का० १४। श्रनु° १। सू° १ भ्रथवेवेद-भाष्यं ४९ तथा मानसिक कष्ट देने हिसारूप है, कटुभाषण भी वाचिकं हिसा है,- . की मावनार्भोकाभी परित्याग कर देना चाहिए पत्नी की पवित्रता के तीन प्रकार ४१. से रथ॑स्य खेऽन॑सुः खे युगस्यं शतक्रतो । .: (शतक्रतो). है सौवषोँं की भ्रायु मे कमकरील, यज्ञगील' तथा उत्तम सदुश चमंका दिया है, पवित्र कर दिया है रथस्य =“भ्रात्मानं रथिनं ५९ भ्रयर्ववेद-साष्य का० १४। भअनु० १। सु० १

English

becomes the beloved home of

अध्याय 15

श्लोक 2.4

बृ॒ह॒तश्च॒ वै स र॑थंत॒रस्य॑ चादि॒त्यानां॑ च॒ विश्वे॑षां च दे॒वानां॑ प्रियं धाम॑ भवति॒ तस्य॒ प्राच्यां॑ दि॒शि

bṛhataśca vai sa rathaṃtarasya cādityānāṃ ca viśveṣāṃ ca devānāṃ priyaṃ dhāma bhavati tasya prācyāṃ diśi

हिन्दी अर्थ

का० १४॥ भ्रनु० १। सु० १. भरथवेवेद-माष्य , ५३ के पिता, चचा, ताऊभ्रादि का सुचक है । वतेमान में विवाह के भ्रनन्तर कारण यह हकि पति के सम्बन्धी, नववधू को वह भ्रधिकार नहीं देना चाहते, भ्रादि नववधू को भ्रपनी इष्टि से चलाना चाहती हँ जिससे क्रि वधू उनके (याः) जिन देवीः) देवियों ने (अ्रङ़ृन्तन् ) सूत काता है, (भ्रवयन्) मरौर उसे बुनाहै, (याः च) भरौर जिन देविर्योने (भ्र्भितः) वस्के तुमे, है वधु ! (जरसे) जरावस्था तक के लिये (संव्ययन्तु) हाथ से कते-

English

Night and Full Moon Night are his running attendants, Mind, etc. as in stanza 1.

अध्याय 15

श्लोक 2.5

श्र॒द्धा पुं॑श्च॒ली मि॒त्रो मा॑ग॒धो वि॒ज्ञानं॒ वासोऽह॑रु॒ष्णीषं॒ रात्री॒ केशा॒ हरि॑तौ प्रव॒र्तौ क॑ल्म॒लिर्म॒णिः

śraddhā puṃścalī mitro māgadho vijñānaṃ vāso'haruṣṇīṣaṃ rātrī keśā haritau pravartau kalmalirmaṇiḥ

हिन्दी अर्थ

(वासः) वस्रं को (परिधत्स्व) पदहिना कर । बनाना,-देविधों का गहं कौशल दर्शाया है । नववधू को यह् उपदे मीदियाहै कितु हाथ सेकतेबुने वरस््रो को धारण कियाकर,भ्रौर मरायु भर रेस वस्त्र ही धारण किया कर। गरृह-उद्योग कायहएक , 1 परथर्दवेद-माष्थ का०.१४ 1 भ्रनु° १। सू १ के लिए हैउन की श्रवस्था निम्नलिखित हो जाती हैः-- परन्तु १२िणाम में जीवन भर रोते रहते हँ । वे गहस्थघरमं के यज्ञियां को हटा कर गृहरथ को ध्म॑विरुद दिदा भले जते, भ्रौर उसे प्रयज्ञमय बनादेतेरहै। साहस के श्रभाव के. कारण सफलता उन्हे प्राप्त नहीं होती ।

English

He arose and went away to the western region. Vairūpa and

अध्याय 15

श्लोक 2.6

भू॒तं च॑ भवि॒ष्यच्च॑ परिष्क॒न्दौ मनो॑ विप॒थम्

bhūtaṃ ca bhaviṣyacca pariṣkandau mano vipatham

हिन्दी अर्थ

जो कि शिष्टाचार के विरु होते हैं । हे वधु ! (ते) तेरी (प्रजायं ) भावी सन्तान के लिए भाद्चरूप मे, का० १४। भ्रनु° १ । सु० भरथतेदशषमाष्य ५५ तू बड़ी तेजस्विनो है । (सविता ) जगदुत्पादक परमेश्वर (ते) तेरी (ब्रायुः) भ्रायु (दीघम्) लम्बी (कृणोतु) करे । विवाह हौ जाने पर पत्नी को. सदा प्रसन्न रखना,-यह् विवाहधमं है । व्याख्या--विवाहपदढति के भ्रनुसार वध् को रिलारोहण कराया जाता है! शिलारोहण के लिए वर इस मन्व द्वारा वध् को प्रेरित करता है, ताकि वह परख सङके कि शिला कितनी दुद् तथा मजब्रूत है। वर वधू को भ्रनुभव करातादहै कि जसे पृथिवी-माताकी गोद र्म यह् शिला दृढ तथा मजबूत है इसी प्रकार तेरी गोद मेँ भी दृढ तथा मजत्रूत सन्तान व्र वधू को "देव्याः द्वारा देवी कता है। देवी का. प्रथं दिव्यगुौं वाली । माता के.देवी होते सन्ताने भी देव रौर देवरी बन

English

Vairāja, the Waters, and King Varuna followed him. He who reviles the Vrātya possessing

अध्याय 15

श्लोक 2.7

मा॒त॒रिश्वा॑ च॒ पव॑मानश्च विपथवा॒हौ वातः॒ सार॑थी रे॒ष्मा प्र॑तो॒दः

mātariśvā ca pavamānaśca vipathavāhau vātaḥ sārathī reṣmā pratodaḥ

हिन्दी अर्थ

(भ्रथवे० २।१३।४) । भर्थात् तु दारीर को पत्थर बना, तथा तेरा शरीर शरीर का मजबूत तथा- कठोर होना स्वास्थ्य की निदानी है । एरी सन्तानं ही सुंख पा सकतीं (स्योनम्) तथा माता-पिता को सुखी कर भौर विवास के भ्रनूफरुल, जीवनचंर्या हो जाने पर सन्ताने तदनुरूप हो ५६ भ्रथववेद-भाखष्य का० १४ । श्रनु० १ । सू° १ “सुवर्चाः? रा वधू को यह् निदेश दिया है कि गृहुस्थधमं का इस तरह तू पालन कर जिससेतेरा शारीरिक तेजकमन होने पाये, ताकि तू दीर्घायु हो सके । ग्रहृण किया ह, (तेन) उस उदेश्य से है वधु ! ति हस्तं गृह्णाभि) तेस पाणिग्रहण मै करता हूं । (मया सहः) मेरे साथ वतमान तू (प्रजया उत्तम सन्ताने, तथा उन के पालन पोषणार्थं घन 1 वर कहता है वधू को

English

this knowledge is alienated from

अध्याय 15

श्लोक 2.8

की॒र्तिश्च॒ यश॑श्च पुरःस॒रावैनं॑ की॒र्तिर्ग॑च्छ॒त्या यशो॑ गच्छति॒ य ए॒वं वेद॑

kīrtiśca yaśaśca puraḥsarāvainaṃ kīrtirgacchatyā yaśo gacchati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

किमेरे कूल के भरग्रणी पुरुष जिस उदेश्य से पाणिग्रहण करते रहे हैँ उसी उदेश्य से वै तेरा पाणिग्रहण करता हं ताकि प्रजा श्रौर धन के रभाव दवारा तू व्यथा को प्रप्त नहो। पाशिग्रहण तथा पतिके गण .. ४8; देवस्तं खविता हस्तं गृह्णातु सोमो राला खु भजसं इृणोतु । बर (ते) तेरा (दृस्तं गृह्णातु) पाणिग्रहण करे, (सोमः) वीयंवान् (राजा) का० १४। प्ननुऽ १। सुऽ १ . भथववेद-माष्य ७ भगौ अथेमा सविता पुरन्धिभे्ं त्वादुरगापत्याय देवाः.॥५०॥ हे वधु ! (सौभगत्वाय) अपने सौभाग्य के लिए (ते) तेरा (हस्तम्, गृह्णामि) पाणिग्रहण म करता हू, (मया, पत्या) मुक पति के साथ. (यथा) मान करने वाला, श्रेष्ठ मन वाला तथा न्याय्रकारी हु, (सविता) तेरा लिये (त्वा) तुमे (दरुः) दिया है । 4

English

Vairūpa and Vairāja, the Waters and Varuna the King. He who possesses this knowledge

अध्याय 15

श्लोक 2.9

स उद॑तिष्ठ॒त् स दक्षि॑णां॒ दिश॒मनु॒ व्यऽचलत्

sa udatiṣṭhat sa dakṣiṇāṃ diśamanu vya'calat

हिन्दी अर्थ

भग ९ है (्रथवं ° १४।१।४२) । पुरं चिः = बहुघीः (निर० ६।३।१३) । भग, श्र्यमा, सविता, अर पुरधि के श्रथं पतिपरकृ कयि ह । देवाः= देवाइच देव्यश्च, एक हेष “पुमान स्तिया (अष्टा० १।२।६७) व्याख्या--वर वधू कों कहता है कि भै भ्रपने सौभाग्य के लिएतेरा पारिग्रहण करता है। विना पत्नी के पुरुष का सौभाग्य नहीं बनता वतमान रीतिरिवाज मँ पति के कारण पत्नी को सौभाग्यवती कहा जाता उत्तम अगो का निवास नहीं बनता ।-“"गाहंपत्याय' हारा सूचित किया भ्ठ भरथर्ठेविद-माष्य का० १४ । भ्रनुऽ १। सू०.१ सहयोग द्वारा ही होते है भरन्त मे पति कहता है कि इन देवँ भ्रौर देविर्यो ने जोकिं हमारे विवाह के साक्षी ह मेरे प्रति तुमे दिया है 1 . सविता=सु, सुग्रसवे, भरौ च । वर भ्रपने-भाप को गृहपति कता हुप्रा वधू को विवास पिलाता है किम तेरे नवगृहमे तेरा रक्षक हंगा । तु भौर तेरी सन्ताने मेरे रहते भ्ररक्षित ्रनुभव न करेगी ।

English

becomes the dear home of

अध्याय 15

श्लोक 2.10

तं य॑ज्ञाय॒ज्ञियं॑ च वामदे॒व्यं च॑ य॒ज्ञश्च॒ यज॑मानश्च प॒शव॑श्चानु॒व्यऽचलन्

taṃ yajñāyajñiyaṃ ca vāmadevyaṃ ca yajñaśca yajamānaśca paśavaścānuvya'calan

हिन्दी अर्थ

है । दिन के चदृते नई राशां भौर उमरङ्खो काउदयहोतादहैजिनकी सफलता रभे पत्नी सहायक होती है । इस अण्डे के श्रभाव मेँ गृहजनीवन . सूना है । (३) पत्नी को उषा काल से पूवं ही जाग कर गृहकारयो मे व्यापृत हो ४ ५ ५4 ॥ (४) पत्नी के होते ही . देवों भ्र्थात् मातृदेव, पितृदेव, तथा भ्रतिथि देव को उन उन का नियत खाद्य भ्रादि का भाग मिल सकता. काऽ १४।-अनु० १ ४सृ० १ ग्रथर्ववेद-भाष्य ३३ (५) गृहस्थ में पत्नीं यदि प्रेममयी हो तो वह पतिकी भ्रायु के बठृने मे (एषा) यह् (जाया) पत्नी जब मानो (पद्रती) पैरों वाली (कृत्या) कृतिशक्ति (सूत्वा) .हो कर (पतिम) पति के घरमेया हृदय में के प्रति (वसु) धनका (विभजा) विभाग किया कर।

English

Indra.

अध्याय 15

श्लोक 2.11

य॒ज्ञा॒य॒ज्ञिया॑य च॒ वै स वा॑मदे॒व्याय॑ च य॒ज्ञाय॑ च॒ यज॑मानाय च प॒शुभ्य॒श्चा वृ॑श्चते॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॒ व्रात्य॑मुप॒वद॑ति

yajñāyajñiyāya ca vai sa vāmadevyāya ca yajñāya ca yajamānāya ca paśubhyaścā vṛścate ya evaṃ vidvāṃsaṃ vrātyamupavadati

हिन्दी अर्थ

कायं में सुस्ती भौर हाल यन होने चाहे । तभी वह् पति के हृदय मे प्वेशपा सक्ती है। पतिगृह मेंपत्नीके भ्राजने पर पति को चाहिए प्रम बढता जाए । कदुभाषर, भ्रस हिष्युतापूरं व्यवहार, तथा कठोर व्यवहारो की अधिकतर सम्भावना पतिकीश्रोरस हृभ्रा करती है। इस लिये मन्त्र मँ यह् उपदेश पति को दिया है । दारा किया करे । दस निमित्त पति, निज भ्राय का यथोचित भाग, सत्पात्रं की सेवा के निमित्त विभक्त कर दिया करे । यह सामालिक धमं है । है । पञ्चमहायज्ञा का विधान, जिन द्वारा कि भतिथि भ्रादि देवोँ.का किया जाता है, पत्नीरहित पुरुष के लिए सम्भव नहीं । इसलिये, गो -- त श न भ क ¬ थासा दान वणे += न नवादा» कम ष्य भ्न यकव के 2 क विोने्णदगवेने . च ३३४ अथृववेद-भाष्य का० १४। भ्रनु० १।्०१

English

His belly is dark-blue, his back is red.

अध्याय 15

श्लोक 2.12

य॒ज्ञा॒य॒ज्ञिय॑स्य च॒ वै स वा॑मदे॒व्यस्य॑ च य॒ज्ञस्य॑ च॒ यज॑मानस्य च पशू॒नां च॑ प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ तस्य॒ दक्षि॑णायां दि॒शि

yajñāyajñiyasya ca vai sa vāmadevyasya ca yajñasya ca yajamānasya ca paśūnāṃ ca priyaṃ dhāma bhavati tasya dakṣiṇāyāṃ diśi

हिन्दी अर्थ

लाल (भवति) हो जाता है । तब (भस्याः) इस पत्नी के (ज्ञातयः) पित्र- भी निज व्यवहारो दवारा भ्रभिव्यक्त करनी चाहिए । इससे पति सदां प्रसन्न रह कर निर्बल भी परिपुष्ट हो जातादहै। कमजोरीकेकारण ररीर का लालरक्त नीला पड जाता है। मुख का लाल हौना स्वास्थ्य का चिह् है । मूख पर नीलापन कमजोरी तथा रोग का सुचक है। पत्नी के पितृगृह के सम्बन्धी इस खुशी से बदृते हँ कि हमारी कन्या पतिगृह मेँ बस गरईदहै, रौर उसने पति को निज-प्रेम-वश कर लिया है । . (रुशती) पति की चमकती हुई (तनुः) देह, (भ्रमुया) उस (पापया) हो जाती है, (यद्) जब कि (पतिः) पति (वध्वः) वधू के (वाससः भङ्गो को (भ्यते) भाच्छादितकरताहै। - भ्रनुराग के लाभ दर्शए ह। परन्तु पत्नी यदि परपुरुष के साथ सहवास दारा पापकम करती है, तो वहं पतिधमं से च्युत हुई समी जानी चाहिए, प्रौर उस के साथ गृहस्थधमं का पालन.न करना चाहिए ।.

English

With dark-blue he envelops a detested rival, with red he pierces the man who hates him: so

अध्याय 15

श्लोक 2.13

उ॒षाः पुं॑श्च॒ली मन्त्रो॑ माग॒धो वि॒ज्ञानं॒ वासोऽह॑रु॒ष्णीषं॒ रात्री॒ केशा॒ हरि॑तौ प्रव॒र्तौ क॑ल्म॒लिर्म॒णिः

uṣāḥ puṃścalī mantro māgadho vijñānaṃ vāso'haruṣṇīṣaṃ rātrī keśā haritau pravartau kalmalirmaṇiḥ

हिन्दी अर्थ

, तथा पत्नी जब ऋतुमती हो तब भी पत्नी सहवास. केलिए वजित है । एेसी भ्रवस्था मेँ किया गया सहवास, पति के नीरोग शरीर को दुषित् का० १४ । भ्रनु० १1 सु०१ श्रथर्वेवेद-भाष्य ३५ तथा रूण कर देता है । ऋतुमती को भी पापा काद । इस श्रथ मे पापा का श्रमिभ्रोय पापिन नहीं । भपितु ्पाश्रप द्वारा ऋतुमती के साथ सहवाससे पा (रक्षा) +ग्रप (श्रपगत) हो जाती है) इसलिये ऋतुमती “पापाः है । सी श्रवस्था में सहवाग द्वारा शरीर रक्षारहित हो जाता भभिप्रा्य जी सम्भव है, “उस पापमयी रीति द्वारा पति की सुन्दर तथा चमकती देहं भो श्रीरहित हो जातीहै जबकि पति स्त्रियौँके से वस्वो दारा निज देह को ढापता है, उन वस्त्रों को पहनता है । पुरुष की पौरुष- पणो देह मानो एक सुन्दर तथा चमकती हई देह है । पौरुषशक्ति सम्पन्न पुरुष यदि स्त्रयो कै से कपड़े पहने तो यह रीति पापमयी है, दूषित है । २८. आक्षसंनं विश्रसं नपरथों अभिविकरतनम् । (उत) तथा (ग्रधिविकतंनम्) भ्रधिकार पूरवंक कयडेको विविध प्रकार के (रूपाणि) इन रूपौ को (पय) तु देख । (तानि) उन रूपों को (ब्रह्मा)

English

the theologians say.

अध्याय 15

श्लोक 2.14

अ॒मा॒वा॒स्याऽ च पौर्णमा॒सी च॑ परिष्क॒न्दौ मनो॑ विप॒थम्

amāvāsyā' ca paurṇamāsī ca pariṣkandau mano vipatham

हिन्दी अर्थ

हैः भतः एेसी भवस्था मे सहवास वजि है । ३६ भ्रथवंवेद-भाष्य का० १४ । भ्रनु० १। सू० १ गुखो का वशंन हूभ्रा है । पत्नी को सदा श्राशामय जीवन व्यतीत करना भ्रादामय जीवन के साथ साथ पत्नी को श्रपना जीवन .विहेषतया रिणी ने ब्रह्मचर्य॑काल मेँ वैदिक शिक्षा पाई है रौर तदनुसार निज जीवन को ढाला है, इसलिये इस के योग्य पति भी वेदज्ञ विद्वान् ही होना चाहिए । वह ही विदुषी सूर्या के सद्गुणो मँ शोभारूप बन सकता है, भ्रौर सूर्या के सदुगुरो की शोभा बढ़ा सकता है। ब्रह्मा-कोटि के वर, त॑था सूर्यकोटि सम्बन्ध मेँ मनुस्मृति का लोकं निम्न लिखित है

English

The same, continued

अध्याय 15

श्लोक 2.15

मा॒त॒रिश्वा॑ च॒ पव॑मानश्च विपथवा॒हौ वा॒तः सार॑थी रे॒ष्मा प्र॑तो॒दः

mātariśvā ca pavamānaśca vipathavāhau vātaḥ sārathī reṣmā pratodaḥ

हिन्दी अर्थ

भ्यौ यो ब्रह्मा वेद॒ स द् वारपूयमहति. ॥२९॥ ५ लगमिःवालां तथा. दाहलनकं, है (कटुकम्) यह श्नन्न परिणामे कदटुदहैः. (सः, इत्) वह ही (वाघूयमू) सूर्या के साथ वधूकर्म या विवाह के (ब्रहुंति) कटुकम् यो जिह्वाग्र बाधते, उदधेगं जनयति, शिरो गृह णीते, नासिका लाव- मे से स्रारःनिकल गथा.हो एसा प्रन्न काज्ञान, तंथा उने की पाकविद्या की रिक्षामो देनी चाहिए! वतंमानमें इसे गृह विज्ञान (1101718-80161109) कहते हैँ । जो ब्रह्मा सूर्या के इन गुणौ

English

He arose and went his way to the eastern region. The Brihat, the Rathantara, the Ādityas and

अध्याय 15

श्लोक 2.16

की॒र्तिश्च॒ यश॑श्च पुरःस॒रावैनं॑ की॒र्तिर्ग॑च्छ॒त्या यशो॑ गच्छति॒ य ए॒वं वेद॑

kīrtiśca yaśaśca puraḥsarāvainaṃ kīrtirgacchatyā yaśo gacchati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

दित वधू को, (हरति) निज गृह मेले जाताहै, (यः) जोकि (प्राय को प्राप्त नहीं होती । . = श अ भरध्यथनं करोति . । भरथवा . “वासः” == वस्त्र 4 "विवाहानन्तर वधू के वस्त्रो कौले जाने कैःसाथ . सौध वधूं को भी ब्रह्माले जाताहैः इसलिये वासः.श्ं कँ दवारा वधू-भी भर्ितरेत है, इसीलियें सन्तर मँ जाया शन्द का प्रयोगहृश्रा है।. -.. क उपायो को जानता श्रौर-उन क. श्रध्मरयनः, कररता रहता है, वहं स्वयं भी तथां उख की पत्नी मी सुली रहती है. . । ... कमाई, तथां सत्य-मीटी वाणी । . "(ऋतो्येषु) संत्य. ही जिनं ॐ .बोलना चाहिए उन व्यवहारो में रुचि-कर बना, ताकि-यह (सं लः) सम्यग्माषी . हौ कर (चार) सुचाररूप , अँ पत्नी के प्रति (एता, वाचम्). दसः व्राणी को बोला करे 1. - ...

English

all the Gods followed him.

अध्याय 15

श्लोक 2.17

स उद॑तिष्ठ॒त् स प्र॒तीचीं॒ दिश॒मनु॒ व्यऽचलत्

sa udatiṣṭhat sa pratīcīṃ diśamanu vya'calat

हिन्दी अर्थ

है कि वह : समय-समयं. पर नैव छवा हितों को उपदेश देता रेः जिस से. (1. कि पति-पत्नी मेँ पारस्परिक बढती रदे, जिस से कि यःदोनों परस्पर : नं रचिकर बने रद, भरर संदा पररस्थरं में मधुर तथां प्रिय वाणीः बोला . ( करं । मत्य मेः पति को “संभवे कहा भर्थात् सम्यरभाषी ।कदु- भाषण कौ सम्भावना परायः पतिर्य कीः शरस हती है पलि कौ . पत्ती को समी. व्यवहा 1 सदा सत्य ही काऽ १४ । भनुर १। सू9 १ प्रथववेद-भाष्य .8 ३९ हि . यमं यतीरसियाः सोम॑रचसो विश्वे देवाः न्निह वो मनासि। २। , , (गावः) है गौम्रौ ! (इह) इस घर भें (साथ, इत्) सदा रहो, (परः) इस गृहपति को (वेया) बदढ़ाती रहौ. 1 (शुभम) : शोभायुक्त गोाला मे (यतीः) है गौभ्रो ! तुम जाग्रो,(उल्ियाः) सूयं की किरणो के सदश शुद्ध,

English

That man is alienated from the Brihat, the Rathantara, the

अध्याय 15

श्लोक 2.18

तं वै॑रू॒पं च॑ वैरा॒जं चाप॑श्च॒ वरु॑णश्च॒ राजा॑नु॒व्यऽचलन्

taṃ vairūpaṃ ca vairājaṃ cāpaśca varuṇaśca rājānuvya'calan

हिन्दी अर्थ

. तथा .(सोमवर्च॑सः) दुग्धरूपी तेज वालो तुम होभ्रो । (विवे देवाः) घर के ४।२३।१९)न=उत्+्. गतौ, जस से किं दुष स्रवित होता है । सोम 36.78 दोही गई गौरो पे सोम भर्थातु दध क्षरित होता है, एेसा व्यास्यां--गु स्थो. को घर भे गौषए रखनी नाय द्व से चुटी गौरो को पराये हाथ ब्ेचना नः चाहिए । गौएं निज संन्तानों भर्थात् बदडे- बचदिर्यो. द्वारा गृहषति को भौर गृहपति. की सन्तानो को दूध, चृत् देकर बढ़ती है। गौरो : की गोशाल सुन्दर भौर शोभायुक्त होनी चाहिए ।

English

Ādityas, and all Gods who reviles the Vrātya who possesses this knowledge. He who hath

अध्याय 15

श्लोक 2.19

वै॒रू॒पाय॑ च॒ वै स वै॑रा॒जाय॑ चा॒द्भ्यश्च॒ वरु॑णाय च॒ राज्ञ॒ आ वृ॑श्चते॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॒ व्रात्य॑मुप॒वद॑ति

vairūpāya ca vai sa vairājāya cādbhyaśca varuṇāya ca rājña ā vṛścate ya evaṃ vidvāṃsaṃ vrātyamupavadati

हिन्दी अर्थ

श्रौर सौफ. रसना चोष्य . जेषे कि सूयं की किरणे शुद्ध ग्रौर साफ होती है चरके बग को चाहिए द . सेवा दारा गौं के मनो को संदा २२. इं गावः मरजया सं विंशाायं देवानां न मिनाति भागम् । . १ (गावः) है गौभ्रो ! (दमु) इस षरं (अजया) -बखड़ा.या बडी. ४० श्रथरव॑वेद-भाष्य. - काऽ ९४ भनुः ११ सू०.१ समेत (सं विशशाथ) मिलकर प्रवे करो, ताकि. (श्रयम्). यह्.गृहपति -(देवानाम्, भागम) देवो के भागः को (न.मिनाति) -नष्ट या विलुप्तन करे ।, गरहवासी, (धाता) पृथिवी या धारणपोषण त्ररने वाला गोपाल अर्थात्

English

this knowledge becomes the beloved home of the Brihat, the Rathantara the Ādityas, and all

अध्याय 15

श्लोक 2.20

वै॒रू॒पस्य॑ च॒ वै स वै॑रा॒जस्य॑ चा॒पां च॒ वरु॑णस्य च॒ राज्ञः॑ प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ तस्य॑ प्र॒तीच्यां॑ दि॒शी

vairūpasya ca vai sa vairājasya cāpāṃ ca varuṇasya ca rājñaḥ priyaṃ dhāma bhavati tasya pratīcyāṃ diśī

हिन्दी अर्थ

चुसारं पतिगरह मेँ सविता है, पति का पिता। १. मानसून वायु जल के भ्रभाव को दरुर करती, तथा छेती के.लिएु उखधकारी बद्डे-गल कृषि कमं के लिए प्राप्त हो सके । ,. २. शौभ्रो के चारे के लिए पृथिवी दी भी भावदयकता है, ताकि गौभोंके चारे की कमी भ्रनुभव न हो ।-गावः में बहुवचन् है, ताकि दुरध-वूतं प्ररत मात्रा मे, तथा का० १५४१ ननु १। सू० १ भयवंवेद-भाष्य ि ५१ गौग्रोःको.चराने के लिए ग्वाले की भी भ्रावदयकता होती है ! तथा गौरो के.चौरेके लिए कृषियोभ्य मूमि भी चाहिए । इन दोनों के लिए धाता- शब्द का प्रयोग मन्व में हु्रा है । इसी प्रकार मानसून वायु कृषिः

English

vesture, day his turban, night his hair, Indra’s two Bays his circular ornaments, the splendour

अध्याय 15

श्लोक 2.21

इ॒रा पुं॑श्च॒ली हसो॑ माग॒धो वि॒ज्ञानं॒ वासोऽह॑रु॒ष्णीषं॒ रात्री॒ केशा॒ हरि॑तौ प्रव॒र्तौ क॑ल्म॒लिर्म॒णिः

irā puṃścalī haso māgadho vijñānaṃ vāso'haruṣṇīṣaṃ rātrī keśā haritau pravartau kalmalirmaṇiḥ

हिन्दी अर्थ

कमं मे सहायक दहै, जिससेकिगौगभ्रों को चारा मिल सके । गौरो के मन्व द्रष्टव्य है, यथा- ... - - हे परभे््वर 1 कपण लोगो मे स्थित तेरी गौए किस प्रयोजन को भ्राते-जाति हैँ । (वाता) विधाता परमेदवर (नः) हमारा (भगेन) रष्वं, धमे, - यषा, श्री, ज्ञान भौर वैराग्य के साथ (सं सृजतु) संसं करे ४, . ् भ्थर्वबेद-भाष्य काठ १५ भनु° १। सू०१ के साय (सं्) हमारा, संसग करे, (वच॑सो) तेन के साथ (सम्) हमारा (अक्षेषु) र्थो की धुरा म (यत्) जो (वचः) तेज (आहितम्) निहित है, (च) श्रौ (सुरायाम्). जल मेँ (यद्)जो तेज निषित है, (च)श्नौर

English

of the stars his jewel. Present and Future are his running footmen, mind is his war-chariot,

अध्याय 15

श्लोक 2.22

अह॑श्च॒ रात्री॑ च परिष्क॒न्दौ मनो॑ विप॒थम्

ahaśca rātrī ca pariṣkandau mano vipatham

हिन्दी अर्थ

(यत्) जो (व्रः तेज, (श्रष्विना) है वर के माता-पिता ! (गोषु) गौरो मे निहितं है, (तेन) उस उस (वचसा) तेज . ढारा (इमाम्). इस वधू को . व्याहया-“भ्रदिवना" दवारा वर के माता-पिता का निदेश हुभा है । (मन्त्र घ, १४, २०). । वर के माता-पिता वच् में ३ तेज स्थापित करं । (१) रथ की धुरा का तेज । (२) जल का तेज.। (३) गौरो का तेज । रथके दो चक्रों या पियो मेँ लगे दण्ड को भक्ष मन्व १२ रथात् धुरा कहते है. ! इस धुराः पर सम्परं रथ भवलम्बित रहता, है, घुरा सम्पूणं रथ का भ्राधार होती है। भ्रतः धुरा भे तेज है “भ्राधारः रूपी गुण" । नववधू को शिक्षा देनी चाधमं कितु ही इस गृहस्थ-रथु जल का.स्वभाव है शीतलता । शीतलता जल का तेज है । नववधू को के प्रभिप्रायं को समफ नहीं सका ।

English

Mātarisvan and

अध्याय 15

श्लोक 2.23

मा॒त॒रिश्वा॑ च॒ पव॑मानश्च विपथवा॒हौ वातः॒ सार॑थी रे॒ष्मा प्र॑तो॒दः

mātariśvā ca pavamānaśca vipathavāhau vātaḥ sārathī reṣmā pratodaḥ

हिन्दी अर्थ

का० १४। प्रनु° १।सू२१ । भयवेवेद-मोष्य. , (म ५३ गौ .सास्विक दष हारा मातेवत् भालन-पौषणे करतौ है । ्रतः गभर मे तेज है “्मतृवत् . पालकताल्पी गुण पतनी. भी पालन-पौषरा की इष्टि से गोरूप वाती - होनी चाये ... -, न (जवनम्) ऊधस् सींचा-गया है, (वा) तथां यिनं) जिस तेज द्वारा (सुरा) जल सचा गया है,.(येन) जिस तेज दवारा (अक्षाः) रथों की घुराए (भम्यषिच्यन्त) सची गई है,(भ्रदिवना) है वर के माता-पिता ! (तेन) उख तेज दारा (दमाम्) इस वधू को तुम (श्रवतम्). कान्तिमती करो या सींचो । को वैश्या बनने काः उपदेश वर केः माता-पिता. देगे ? जघनम् द्वारा यदि गौ की उत्पादक इन्द्रिय-भी भरभिप्रेत होतो. इस दवारा केवल यह भअरभि- तरह । मत्र. ३५ की इष्टि से भमहानघ्नी! द्वारा गौः का है “न हंनन करने योगय । इस सेस्पष्टहै कि वेदोँमगौ की हत्या कृ निषेष है । इसी प्रकार बैल के लिए “परघ्न्यः” शब्द वेदों भे पठित है । यथा ५ यः पतिरघ्न्यः"' (भ्रथवं० ९।४।१७) । इस द्वारा बैल की

English

Pavamāna are they who draw it, Vita is his charioteer, Storm his goad, Fame and Glory are

अध्याय 15

श्लोक 2.24

की॒र्तिश्च॒ यश॑श्च पुरःस॒रावैनं॑ की॒र्तिर्ग॑च्छ॒त्या यशो॑ गच्छति॒ य ए॒वं वेद॑

kīrtiśca yaśaśca puraḥsarāvainaṃ kīrtirgacchatyā yaśo gacchati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

का प्रयोग हृभ्रा है, इस से गौ को "महा-मवघ्या कहा है, क्योंकि गौ दूष श्रादि द्वाराः महोपकारिणी है । च गौ के ऊधः स्थल भं दुधरूपी तेजं होता है, जिस द्वारा गौ श्रपने बच्चे. ४४८. , “र पथर्ववैद-मोष्य " काऽ १४१ अनुः -१.1 ०.१ को तेजस्वी बनाती है । नववधू पातां. ननं करं शपे उत्तम भौर सोत्विक . . सुरा भर्थात् भल,. भौर; भकं भर्थातु शरा, कर तेज से.जौ उपदेश नववधू को लेना चाहिए उस का वणन मन्त्र रेवं भं क्रिया गा हँ 1. तथा वीयरूपी जलं के भोतर (दीदयत्) प्रदीप्त होता ह, (यम्) -जिस कौ उपासना करते ह । (भरपां नपात्). है वीय॑रूपी जलो का न पतन होने देने

English

his harbingers. Fame and

अध्याय 15

श्लोक 2.25

स उद॑तिष्ठ॒त् स उदी॑चीं॒ दिश॒मनु॒ व्यऽ चलत्

sa udatiṣṭhat sa udīcīṃ diśamanu vya' calat

हिन्दी अर्थ

वी्ेवाला हो कर (वावृधे) बढता हं । "4, (अथवं० १०।२।११) । भरथवं० १६।१।१-१३ तवोप कामी वणन भ्रापः शब्द द्वारा हृभरा है । दीदयत् दीदयति ज्वलतिकमा (निधं ११६) ॥ , ौ भरपांनपात्=श्नपां +-न+-पात् (पत्) -बीयंरूपी जलो का न पतन होतते कऽ १४ । भमनु० १। सु १ (०१ भथवेद-भाष्य ४५ परमाहमाग्नि जलो प्रकट होता है । उपनिषदो मे.हृदगर को परमा- द्धौ षंरमात्माका साक्षाद्. कर सकता द । योगद मै वीयं को योग- . -मेषुवीःजनः ही परमात्मा की. स्तुति उपासंना त्था पूजा करते है। , " परमात्मा की कृपां - वीरय॑हूपी जलः का -पतन नहीं होने देती ¶

English

Glory come to him who hath this knowledge.

अध्याय 15

श्लोक 2.26

तं श्यै॒तं च॑ नौध॒सं च॑ सप्त॒र्षय॑श्च॒ सोम॑श्च॒ राजा॑नु॒व्यऽचलन्

taṃ śyaitaṃ ca naudhasaṃ ca saptarṣayaśca somaśca rājānuvya'calan

हिन्दी अर्थ

विधिसे रहता है। उस का वीर्यं कामवासना सेप्रेरित हो कर पतित होती है + -इसलिये मन्त्रम उत्तम .व "यं की पटिचान, उस की रक्षा, उस का पतनः न हने देना, भरौर.उस के लाभो का व्णंन हरा है । विशेषः--श्राधि- प्रकरणा भेँःविचु (सम्बन्धी वणन अनुपम्रोगी है ।.‡ : ˆ + कामग्रह श्रोर भद्रकाम भ्रौर शरीर को दूषित करने वाने (ग्राभम्) कुकामरूपी ग्राह को (भपो- हामि) त्याग देता हूं, (यः) भौर जो (मद्रः) सुखकारी भ्रौर कल्याणकारी ४६ . - , श्रधुववेद-भाष्य ˆ काण १४। प्रनु° १। सु०.१ ॥ ॥ जाता है । श्रतः गृहस्थघमं के पालन -लिंएन तो कामं उग्ररूप में.होना चाहिए, भ्रौरन इसका सवथा त्याग ही । ४ = मन्व मे उग्र-कामः को ग्राह कहाहै। ्राहदहै नक्र यानाका। जसे नाकरां प्राणी को पकड करउसका व्रिनाश करदेता है, वैसे उग्रकाम भी विनादक हैः हिस्र है,. हिसाकरारी है। तथा शरीर को दूषित कर देता

English

He arose and went away to the southern region. Yajnāyajniya and Vāmadevya and Sacrifice

अध्याय 15

श्लोक 2.27

श्यै॒ताय॑ च॒ वै स नौ॑ध॒साय॑ च सप्त॒र्षिभ्य॑श्च॒ सोमा॑य च॒ राज्ञ॒ आ वृ॑श्चते॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ व्रात्य॑मुप॒वद॑ति

śyaitāya ca vai sa naudhasāya ca saptarṣibhyaśca somāya ca rājña ā vṛścate ya evaṃ vidvāṃsaṃ vrātyamupavadati

हिन्दी अर्थ

रोचन कहा है । सदुगृहस्थी इस श्रेयरूप वले काम..को- स्वीकारं करे । भीश्लारीरिक श्नौर मानसिक शक्तियों.के हास मं कारण होतादहे। परन्तु श्रेयरूप काम का स्वीकार करना भी तबं तक सम्भव नहीं जब १. काम भ्रादि भग्वियों के लिए देखो, भ्रयवं० (१६।१।१-१६) । हीं हो सकेता । परन्तु.काम. के उग्ररूपः मे गृहस्थधमं भ्रषमं मेँ परिणत हौ. . । का० १४। श्रनु० १।सु०६ . अर्थवंवेदमाष्य , , ... ४७ 6 चिकित्सा के लिए प्रयुक्त करता है।. तौ हमः रोगी. को कष्टौ से.पार करः. , ,

English

and Sacrificer and sacrificial victims followed him. The man who reviles the Vrātya

अध्याय 15

श्लोक 2.28

श्यै॒तस्य॑ च॒ वै स नौ॑ध॒सस्य॑ च सप्तर्षी॒णां च॒ सोम॑स्य च॒ राज्ञः॑ प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ तस्योदी॑च्यां दि॒शि

śyaitasya ca vai sa naudhasasya ca saptarṣīṇāṃ ca somasya ca rājñaḥ priyaṃ dhāma bhavati tasyodīcyāṃ diśi

हिन्दी अर्थ

रेष रहे घृत को वच् लेके, स्नान केषर मजा करःउसधी कापगके “ होने के चौथे दिनः वधू के लिए स्नानयोग्य जल को लाए । यह्.-जल नानाः दवारा स्नान करती रहे । इस से गर्भं स्थापन हो जाता दहै । तथा गभस्थ. संसार मेँ भ्राते है। चरक में 'गभंस्थापनीय प्रकरण में लिखाहैकि हरड, नीम, खरेटा, शतमूली इन सब श्रोषधियों के साथ सिद्ध कयि हृए दुग भ्रौर घृत का पान करे । तथा इन श्रोषधिर्यो के साथ सिद्ध किये गए जल यै स्नान करे” (चरक, शरीर स्थान, भ्र ° ८) संमय पति परमेषवर का ध्यान करता हुभ्रा साप्विक भावना से गर्भाघान द , भरथववेदभाष्य काऽ १४।.भनु०.१ । सुर

English

possessing this knowledge is alienated from Yajnāyajniya and

अध्याय 15

श्लोक 2.29

वि॒द्युत् पुं॑श्च॒ली स्त॑नयि॒त्नुर्मा॑ग॒धो वि॒ज्ञानं॒ वासोऽह॑रु॒ष्णीषं॒ रात्री॒ केशा॒ हरि॑तौ प्रव॒र्तौ क॑ल्म॒लिर्म॒णिः

vidyut puṃścalī stanayitnurmāgadho vijñānaṃ vāso'haruṣṇīṣaṃ rātrī keśā haritau pravartau kalmalirmaṇiḥ

हिन्दी अर्थ

करे, वषयिकेः मावना-से. नहीं । गर्भाधान के समय विचारों का प्रभाव : . -चादहियेः कि प्रमेदवर.जिसं प्रकार प्रकृति मेँ निज कामना रूपी गमका . . . धारणंःकरतां है इसी प्रकारे जै भी पत्नी में गृभषिान करू । (“'अयंस्णो अगिन - पयतु" को यह भभिप्रायर मी सम्भव है किं गर्भा १. गर्भाधान के समय शान्त भावना लिए (लतपवित्रा भ्रापः) सकडों एकार की भरोषकधियो द्वारा पवित्र कथि - र वीच मीके है । यथां "स्याकरीयं यदि म न तेजः” (रघुवंश १४५६५) “ भ सीतांनेकतिकीःउक्ि द्वारा राम के वीयं को तेजः कहा है । तथातेजः . क १५ प्रदीप्तकी गई भगिनि की परिक्रमा, पत्नी करे ।

English

Vāmadevya, Sacrifice, Sacrificer and sacrificial victims. He who hath this knowledge

अध्याय 15

श्लोक 2.30

श्रु॒तं च॒ विश्रु॑तं च परिष्क॒न्दौ मनो॑ विप॒थम्

śrutaṃ ca viśrutaṃ ca pariṣkandau mano vipatham

हिन्दी अर्थ

तथा स्थलों को भी पवित्र करदेती ह। पत्नी. .भी पवित्रतामेंसूयंकी किरणों के सदुदा स्वयं पवित्र होनी चाहिपरे । उस के स्वयं पवित्र होने पर, होना चाहिए । इस लिये पति को रातक्रतु भौर इन्द्र महा है । जो उत्तम वह् भ्रपवित्र हो ही नहीं सकता । सन्तानो की देखभाल तथा सुषशिक्षा ज पति रौर पत्नी दोनों ही नौकरी में पत्नी की विभरूतियां तथा मोक्षकामना . उत्तम भंग की -सत्ता (रयिम्) तथा धन को (भ्रालासाना) चाहती. हुई है : का० १४ । भ्नु०° १। सु० १ भरथवेवेद-भाष्य ४५१.

English

Yajnāyajniya,Vāmadevya, Sacrifice, Sacrificer, and sacrificial victims. In the southern region

अध्याय 15

श्लोक 2.31

मा॒त॒रिश्वा॑ च॒ पव॑मानश्च विपथवा॒हौ वातः॒ सार॑थी रे॒ष्मा प्र॑तो॒दः

mātariśvā ca pavamānaśca vipathavāhau vātaḥ sārathī reṣmā pratodaḥ

हिन्दी अर्थ

हो हो ततन भौ माताके मन मेँ यह भावना सदा जागरित रहे। तथा बच्चा व पाले तबश्रौर.मी माता के-मन में यह् भावना जागरित रहनी गहजी वन“ अधिकं . सुखी . हौ जाताः है । इस, लिये मन्त्र में ““पत्युरनुब्रता पत्नी शहस्थजीवन मे, रहस्य के ठेहलौकरिक कृत्यो के साथ साथ (यथा). जसे (वषा) वर्षा करने वाले. सिनबुः) समुद्र ने (नदीनाम्) ध्र . - भय्ेवेद-माष्य . का० १४ नु १ । सूं९.१ ॥ द. (परेत्य) जाकर, (सम्राज्ञो) राण (एधि) बन ।. . इसी प्रकार गृहवासियो को चाहिए कि वे श्रपनी समग्र कमाई इस नववधू . के प्रति भेँट कर दिया करे । क्योंकि नववधू पतिगृह की सन्नाजञीहैः,. +.

English

Dawn is his leman, Mitra his panegyrist, knowledge his vesture, day his turban, night his hair,

अध्याय 15

श्लोक 2.32

की॒र्तिश्च॒ यश॑श्च पुरःस॒रावैनं की॒र्तिर्ग॑च्छ॒त्या यशो॑ गच्छति॒ य ए॒वं वेद॑

kīrtiśca yaśaśca puraḥsarāvainaṃ kīrtirgacchatyā yaśo gacchati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

परन्तु समुद्र नदियों दवारा -दी गरर्भेदको नि स्वां के विएुं . नहीं रख लेता । वह वृषा .है, वर्ष का कारण है ।- नद्यो द्वारा भेट. ले कर समुद्र, वर्षारूप में उस भेंट. को पुनः नदिय. तथा पृथिवी कै द्मन्थ. , गुहवासि्यौ की समृन्नति म .व्यय कंरे. 1 तथा .समुद्र जल की वर्षां करता हश्रा मौ सदा मरां सा रहता है, इसी रकार पत्नी भी धन क्रा व्यय हसं . विक्तिसे.करे कि वह व्यय करती हृई भी धन-सम्यत्ति, से सदा षरिपं . नाहिये कि गृह-साभ्राज्य मे. पनी सजनो है, तो गृह-साङनज्य मँ पति . . सम्राट् है। शेष गृहवासी इन दोनों दवारा पालनोय . तथा ' रक्षणीय है1: . के लिए करै, केवल स्वां सिद्धि. के लिए नहीं। र „ पलनी.का साम्राज्य (तं (एषि) हो, (उत) भौर (देवृषु) देवर म (सम्राज्ञी) राजेर्वरी हो ॥: : ¦ । : (उत) भरौर ((इवंभूवाः) सास के सम्बन् मे (भ्राज) राजेश्वरी हो ।

English

Indra’s two Bays are his circular ornaments, New Moon

अध्याय 15

श्लोक 3.1

१-११ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ पिपीलिकमध्या गायत्री; २ साम्नी उष्णिक्; ३ याजुषी जगती; ४ द्विपदाऽर्च्युष्णिक्; ५ आर्ची बृहती; ६ आसुर्यनुष्टुप्; ७ साम्नी गायत्री; ८ आसुरी पङ्क्तिः; ९ आसुरी जगती; १० प्राजापत्या त्रिष्टुप्; ११ विराड् गायत्री।स सं॑वत्स॒रमू॒र्ध्वोऽतिष्ठ॒त् तं दे॒वा अ॑ब्रुव॒न् व्रात्य॒ किं नु ति॑ष्ठ॒सीति॑

1-11 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 pipīlikamadhyā gāyatrī; 2 sāmnī uṣṇik; 3 yājuṣī jagatī; 4 dvipadā'rcyuṣṇik; 5 ārcī bṛhatī; 6 āsuryanuṣṭup; 7 sāmnī gāyatrī; 8 āsurī paṅktiḥ; 9 āsurī jagatī; 10 prājāpatyā triṣṭup; 11 virāḍ gāyatrī| sa saṃvatsaramūrdhvo'tiṣṭhat taṃ devā abruvan vrātya kiṃ nu tiṣṭhasīti

हिन्दी अर्थ

(इयम्) यह वधू (मम) मेरी (पोष्या) पोषणोया (रस्तु) हो, हे वाली ! त्रु (सम्) मेरे साथ (शतमु, शरदः) सौ. वषो की भायु पर्यन्त बहस्पतिः = बरृहस्यति वे देवानां. पुरोहितः (एेत० त्रा० ८।२६) जनता के प्रति .कहता है कि यह वधू मुर द्वारा पोष्या होगी.। चै सदा इस का भरण-पोषण करता रंगा । तथा उत्तराघं द्वारा . वधू को कहता है किं मुभ से भिन्न क्रिस परपुरुष हारा तूने प्रजावतो नहीं होना ।, (बृहस्पतेः) वेदो के विद्वा पुरोहित के तथा (कवीनाम्) विदानो इव) सूर्या को जेते, वसे (दमाम्, नारीसु) इस विवाहित नारी को(प्रजया) सन्तानो समेत (परि . घत्तामू) ढांपा करर नुसार वधूके वस्त्रक निर्माण करने.को ज्ञा कारीगरों को देनी

English

Vairūpa and Vairāja, the Waters and King Varuna. In the western region Irā is his leman,

अध्याय 15

श्लोक 3.2

सो॑ऽब्रवीदास॒न्दीं मे॒ सं भ॑र॒न्त्विति॑

so'bravīdāsandīṃ me saṃ bharantviti

हिन्दी अर्थ

कम करती,-कृषिकमं को बढ़ाकर, भन्न श्रौैर श्रोषधियो को पैदा.करती जिनके मेवन से स्वास्थ्य बढता है । महती वेदवाणी के पति परमेदवर ने, (सूर्यायाः) इस सूर्या ब्रह्मनारिणी के (भ्रषिविना) है वर के याः वधू के माता-पिता ! (तेन) उस कैशकलाप द्वारा (इमाम, नारीम्) इस नारी को, (पत्ये) पति के लिये, (संमू, शोभयामसि) हम सम्यक् परकारसे शोभायमान करतेदहै। बहस्पतिः = परमेश्वर बृहती वेदवाणी का पति है यथा “बृहस्पते पति कोः प्रनुराग उसपर हो सके 1 वधू की रूपसम्पत् तथाः मननरशक्ति

English

Mind, etc., as above.

अध्याय 15

श्लोक 3.3

तस्मै॒ व्रात्या॑यास॒न्दीं सम॑भरन्

tasmai vrātyāyāsandīṃ samabharan

हिन्दी अर्थ

६२ भरथरगविद-माष्य का १४। भनु १। सु १ (इमान्) इन (पाशान्) प्रेमपारशो को (विं चचतं) विशेषतया ग्रथित किया. स्तुतौ) + गु (गति) ।-कः = को वं नास प्रजापतिः (एे० ब्रा० ३।२९) । वि नारी कै रूपसौन्दयं का. श्याल कर वर कहता है कि यह सम्पत् भी एक नहीं बन सकता! इस के लिए यह श्रावद्यक . है कि पत्नी में मानसिक विचार शक्ति भी हो, वह मननकरीलाः रौर विचारश्ीला भी हो, ताकि गृह्य तथा सामाजिक कत्तव्यो को. वंह विचाय्पुवेक निभा सके । वेद के अनुसार वरेशी ही वधू का जिज्ञासु है। वर कहता है कि एसी ववू कातो मै भ्नुवतीं हौ जाऊंगा । क्यों किं विचारशीला वधू भ्रषने पत्नी को सामाजिक लीयन से वञ्चित नहीं करना चाहिए । पति के भिक्रोंकं साथ भीपत्नीका परिचय करा देना चाहिए ।

English

He arose and went away to the northern region. Syaita and

अध्याय 15

श्लोक 3.4

तस्या॑ ग्री॒ष्मश्च॑ वस॒न्तश्च॒ द्वौ पादा॒वास्तां॑ श॒रच्च॑ व॒र्षाश्च॒ द्वौ

tasyā grīṣmaśca vasantaśca dvau pādāvāstāṃ śaracca varṣāśca dvau

हिन्दी अर्थ

पति के मित्ररेसे होने चाहिए जोकि स्तुत्य भ्राचार-विचार वाल भर्थातु सदाचारी हौं.। दुराचारी मित्रौ के सङ्क से दुराचार के पंक मेँ फंसने का.भयं होता है । भरौरन दुराचारी परिचितो के साथ परिचय ही पत्नी कोऽ १४ श्नु १। सु -१ भरय्विद-भाष्य ६३ नहीं बांधा । इन प्रेमबन्धनों के विना गृहस्थ जीवन तथा सामाजिकं जीवन निःसारो जाते हैः सूखेसूखे हो जाते हँ । व्यास्था- पति कहता है रि नै पत्नी के दोनो स्वरूपो को,- शारी- रिकि तथा मानसिक स्वरूपो. को, निज हृदयं मेँ बाध लेता हूं । श्रभिभ्राय. विचलित न ह्ंगा । पति यह् भी कहता है कि नँ प्रपने मनरूपी पक्षीका घोसला इस पत्नो को जान रहा ह श्रौर साक्षात् देख रहा हं । घोसले में

English

Naudhasa, the Seven Rishis, and King Soma followed him.

अध्याय 15

श्लोक 3.5

बृ॒हच्च॑ रथंत॒रं चा॑नू॒च्ये॒३ आस्तां॑ यज्ञाय॒ज्ञियं॑ च वामदे॒व्यं च॑ तिर॒श्च्ये

bṛhacca rathaṃtaraṃ cānūcye3 āstāṃ yajñāyajñiyaṃ ca vāmadevyaṃ ca tiraścye

हिन्दी अर्थ

१. भाष्यकारो ने शध्नानः का भयं किया है, रिथिल करता हमरा, ठीला विचार भी न कश्ना.- इस ते प्रेमपाश दृढ़ होते है, न कि शिथिल । कहता है कि. विचारशीला भ्रौर सुौन्दयं कौ प्रतिमारूप पत्नीकोपाकर मेरा मन भस्केगा नहीं 1 । पति यह भी प्रण करता है कि वहु पत्नीसे छिप कर कोई श्रननभोग . न करेगा, श्रपितु हम लोनों का खान-पान इकट्ठा हृश्रा.करेगा । चिप कर खान-पान के मानसिकं .विचारको भी त्यागः देने का प्रण पति करता है। गरन्त मेँ पति कहता है कि इस प्रकार स्वयं जै गृहस्थ लीनः मेँ पर- मेरव रीय प्रेभपालो को दृढ बद्ध करता रहूगा, ताकि" हम मँ पारस्परिक स्परोपेक्षा का लेरामान्र मी न रहे ।

English

He who reviles the Vrātya possessing this knowledge is alienated from Syaita, etc. He who

अध्याय 15

श्लोक 3.6

ऋचः॒ प्राञ्च॒स्तन्त॑वो॒ यजूं॑षि ति॒र्यञ्चः॑

ṛcaḥ prāñcastantavo yajūṃṣi tiryañcaḥ

हिन्दी अर्थ

व्याख्या- सन्तान के साथ माता-पिता का परेम स्वाभाविकं होता है । माता-पिता स्वभावतः श्रपनी सन्तानो के साथ प्रम करते ह । यही कारण हैकरि सन्तानं भी माता-पिता के प्रेमपाश्च मेँ बंधी रहती है । विवाह कं बाद कन्या जब पतिगृह मेँ जाती है तन उसे भ्रपने भाता-पिता का स्वा- भाविक प्रेमबन्वन ढीला करना पड़ता है । इस क्षति की पूति, पति द्वारा डाले नए प्रेमपाशसेही हो सकती है। पति इसलिये श्रपनी पत्नी से साथबांधाहुभ्राथा उससे मै तुभे द्डाता हू, भौर भ्रपने प्रेमपाशे तुभे धाता विप्चित् पतिमस्ये विवेद भगो राजां पुर एतु भजानन्॥५९॥

English

hath this knowledge be- comes the dear home of Syaita, etc. In the northern region

अध्याय 15

श्लोक 3.7

वेद॑ आ॒स्तर॑णं॒ ब्रह्मो॑प॒बर्ह॑णम्

veda āstaraṇaṃ brahmopabarhaṇam

हिन्दी अर्थ

भपगत करो, दुर करो, याउस का हनन करो, (दमाभर) इस (नारीम्) तारी को .(सूकृते) सुकर्मो भे (दधात) लगाभ्रो । (विपदिचित्) मेधावी षाता) विधोता ने (श्रस्ये) इस नारी के लिए (पतिम्) पति (विवेद) हनाथः = हनु गतौ । निषण्टु भें हनु धातु का प्रयोग “गति” के लिए हृभा भ्रथं हिसा भी होता है । -विपरिचत् मेधाविनाम (निषं० ३।१५)¶ चाहिए, तमी उन की सन्तानं भी उद्यमी होगी । शृहस्यधमं पालन करते हृए भी कामग्राहं को नियन्त्रण में .रखना चाहिए + भनिग्रन्तरित कामग्राह राकस है । प भावो भौर राक्षसी कमो का नाच्च करने वाली बनाएं ६६ भ्रथर्वैवेद-भाष्य का० १४। भरनु° १। सु°. १ पति गृहस्थ के कर्तंव्यपथ को जाने । उस पर पति स्वयं पिले चले ।

English

Lightning is his leman, thunder his panegyrist, etc. as above.

अध्याय 15

श्लोक 3.8

सामा॑सा॒द उ॑द्गी॒थोऽपश्र॒यः

sāmāsāda udgītho'paśrayaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभाव पत्नी के जीवन पर पडता है। है । वदिक विवाहपद्धति में पति भ्रौर पत्नी के हृदयो मे यह मावना सदा जागरूक रहनी चाहिए कि पति का पत्नी को मिलना, तथा पत्नी का पति को मिलना, इस मेँ परमेश्वरीय च्छा काम करती है; भरतः पति-पत्नी परस्पर परेम को बढ़ते हए गरहस्थधमं का पालन करते रहः , परमेदवर ने (चतुरः) पुरुषां के चार (पादान्) पादो को (ततक्ष) निमित किया है,. (भगः) उसी परमेश्वर ने (चत्वारि, उष््लानि) जीवन के च्रार , पलो को (ततक्ष) निमित किया है॥ (त्वष्टा) ूपं भरने वाले कारीगर (सा). वह पत्नी (नः) हनारे लिये (सु मङ्गली) उत्तमं मङ्गलमयी

English

Revelation and Tradition are his running attendants, Mind, etc., as above.

अध्याय 15

श्लोक 3.9

तामा॑स॒न्दीं व्रात्य॒ आरो॑हत्

tāmāsandīṃ vrātya ārohat

हिन्दी अर्थ

ग्रौर संन्यास ये चार भाश्रमहै। इसी रचयिताकारीगरने जीवनयात्रा कव भ्रा चेरे । तभी कहा है कि "गृहीत इव केषु भूत्युना धर्ममाचरेत्" । वस्तुतः जीवन को पल सदृशं क्षणिक जानकर निज वतं व्यो कौ नियतकासं क भ्रनुसार करते रहना चाहिए । वि वधु कां रथारोहण, तथा पिता कौ उपदेश सुवणं की नक्कारी वाले, . (सुवृतं) सुघड़ं ग्रा उत्तम॒रीति से चलने वाले . ६ भरथर्ववेद-माष्य . का० ९४ । श्ननु? १ । सु° १ सुमज्जित । ढाक के फूलों को किंशुक कहते है । भ्राकृति भँ ये फूल “शुक " भर्थात् तोतो जैसे होते है, इन्द देखते एेसा प्रतीत होता है कि मानो छोटे-.

English

For a whole year he stood erect. The Gods said unto him, Why standest thou, O Vrātya? He

अध्याय 15

श्लोक 3.10

तस्य॑ देवज॒नाः प॑रिष्क॒न्दा आस॑न्त्संक॒ल्पाः प्र॑हा॒य्या॒३ विश्वा॑नि भू॒तान्यु॑प॒सदः॑

tasya devajanāḥ pariṣkandā āsantsaṃkalpāḥ prahāyyā3 viśvāni bhūtānyupasadaḥ

हिन्दी अर्थ

ववू का पिता, तथा वधू का वर, दनं उन वस्त्रौ को वधू श्रौर उस की भावी सन्तानो को पहनने के लिए दिम्रा करं । वि वस्त्र शोभाजनक होने चाहिए, तथा सुखदायक भी । केवल शोभा- रिणी के विवाह का वंन मुख्यरूप गे हुश्रा है । यह् भ्रादशँ विवाह है । चन्द्रमा, (बृहस्पतिः) वेदो का विद्वानु पुरोहित, (मरूतः) मानसून वायु, . सेवन, (इमायु, नारीषु) इस नारी को (प्रजया) प्रजासमेत (व्यन्तु) शहोरात्रौ (तां०. २५।१०।१०) । भगः-एेडवय, धर्म, ज्ञान, वराग्य । की किरणों का प्रवेदा। चौथा साधन है पृथिवी । स्वास्थ्यवर्घेन के लिए मकान की भूमि

English

Laughter his panegyrist, knowledge, etc., as above. Day and Night are his running attendants,

अध्याय 15

श्लोक 3.11

विश्वा॑न्ये॒वास्य॑ भू॒तान्यु॑प॒सदो॑ भवन्ति॒ य ए॒वं वेद॑

viśvānyevāsya bhūtānyupasado bhavanti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

विस्तृत होनी चाहिए, तथा घर स्वास्थ्यकारी पृथिवी पर बनाना चाये । पाचवा साधन है मातरिश्वा भ्र्थातुः वायु । मकानों का इस विधि से निर्माण करना जिस सेकमर्रो मेवायु कासंचार हौ सकै। छटा साधन है दिन प्रौर रात का नियमपूवंक होना । लम्बे दिनों उत्तरध व, दक्षिरध्रव तथा इन के संमीप के प्रदेश । सातवां साधन है भग भर्थात् एेष्वयं का होरा, धर्मानुसार जीवन, का० १४ भ्रनु०° १। सू भ्रथवंधेद-माष्यै ६१ धार्मिक कृत्यो, यज्ञो तथा संस्कारो को कराते रहना ।

English

Mind, etc., as above.

स्रोत: bhavykhatri/DharmicData · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।