अध्याय 15
श्लोक 6.1
१-२७ अथर्वा।अध्यातमं, व्रात्यः।१,४ आसुरी पङ्क्तिः; ७, १०, १३, १६, २५ आसुरी बृहती; २२-३३ परोष्णिक्; २,१७ आर्ची पङ्क्तिः; १९ आर्च्युष्णिक्; ५, ११ साम्नी त्रिष्टुप्; ८ साम्नी पङ्क्तिः; १४,२४ आर्ची त्रिष्टुप्; २० साम्नयनुष्टुप्; २६ आर्च्यनुष्टुप्; ३ आर्षी पङ्क्तिः; ६, १२ निचृद्बहती; ९ प्राजापत्या त्रिष्टुप्; १५, १८ विराट् जगती; २१ आर्ची बृहती; २७ विराड् बृहती।स ध्रु॒वां दिश॒मनु॒ व्यऽचलत्
1-27 atharvā| adhyātamaṃ, vrātyaḥ| 1,4 āsurī paṅktiḥ; 7, 10, 13, 16, 25 āsurī bṛhatī; 22-33 paroṣṇik; 2,17 ārcī paṅktiḥ; 19 ārcyuṣṇik; 5, 11 sāmnī triṣṭup; 8 sāmnī paṅktiḥ; 14,24 ārcī triṣṭup; 20 sāmnayanuṣṭup; 26 ārcyanuṣṭup; 3 ārṣī paṅktiḥ; 6, 12 nicṛdbahatī; 9 prājāpatyā triṣṭup; 15, 18 virāṭ jagatī; 21 ārcī bṛhatī; 27 virāḍ bṛhatī| sa dhruvāṃ diśamanu vya'calat
हिन्दी अर्थ
हो सकती है। उ्ह भी भ्रारीर्वाद ही देने के लिए-प्रेरणा दी गर्द है सूर्याका पालकी में भारोहण तथा विविध (रूपाणि) सूपो को (बिभ्रतम्) धारण की हुई (वह्यम्) पालकी पर, (सावित्री) जीवित पिता वाली (सूर्या) सूर्या-्रह्मचारिणी, (बृहते, सौभगापर) बड़े सौभाग्य के लिए. (कम्) सानन्द (भारोहत्) , भ ज्योति वाली (उषसः प्रति) उषां के कालों मे (जागरासि) तु भ्रषने १०२ . श्रथवंवेइ-भाष्य का० १४। भ्रनुऽ २। सुर (१) दं निक कृत्यो से निवृत्त हो कर, रात्रिके समय तु जब सयनके लिप् चारपाई पर जाया करे तब प्रसन्नचित्त हौ कर चारपाई पर प्रारोहण रहना । तथा ब्राह्म पहृतं में ही जाग कर गृहस्थ के कर्मो के करने मे साव- (देवाः). देव लोग (अग्रे) पूर्वकाल से (पत्नीः) . पत्नियों को (नि,
English
They made Rudra the Archer his deliverer from the intermediate space of the region of the