Atharva Veda
15
अध्याय 15 / 20

Kanda 15

काण्ड 15

230 श्लोकभाग 5/5 · श्लोक 17.1–18.5

पूर्ण अध्याय पाठ15 श्लोक

अध्याय 15

श्लोक 17.1

१-१० अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१, ५ प्राजापत्या उष्णिक्, २, ७ आसुरी अनुष्टुप्, ३ याजुषी पङ्क्तिः, ४ साम्नी उष्णिक्, ६ याजुषी त्रिष्टुप्, ८ त्रिपदा प्रतिष्ठाऽर्ची पङ्क्तिः, ९ द्विपदा साम्नी त्रिष्टुप्, १० साम्नी अनुष्टुप्।तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य प्रथ॒मो व्या॒नः सेयं भूमिः॑

1-10 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1, 5 prājāpatyā uṣṇik, 2, 7 āsurī anuṣṭup, 3 yājuṣī paṅktiḥ, 4 sāmnī uṣṇik, 6 yājuṣī triṣṭup, 8 tripadā pratiṣṭhā'rcī paṅktiḥ, 9 dvipadā sāmnī triṣṭup, 10 sāmnī anuṣṭup| tasya vrātyasya | yo'sya prathamo vyānaḥ seyaṃ bhūmiḥ

हिन्दी अर्थ

. “वहं खं वसु (षन). के प्रवान में वसुदाता (वनिः -वन संभक्तौ) है, भौर नमस्का- भिक प्रतीत नहीं होता, भमितु श्पापकमं विनारक" प्रथं ही सम्भावित है । का० १५। भ्रनु० २॥ सू० १४ भथर्ववेद-माष्य , २२५ वषट् कारेण =पापकमों भ्रौर उन के संस्कारों को विनष्ट करने , (न्नादम्, कृत्वा) अन्नभोगी करके ईशानः = इस का भर्थे है, शासक । गच्छे शासककेदो क्त्य होते का. भश्रय तेता है, भदिग्यंकमौ को मन्युपरवक निवारित करने के लिए।

English

Svahā as food-eater.

अध्याय 15

श्लोक 17.2

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य द्वि॒तीयो॑ व्या॒नस्तद॒न्तरि॑क्षम्

tasya vrātyasya | yo'sya dvitīyo vyānastadantarikṣam

हिन्दी अर्थ

तथा भोगमावना का स्रा परित्याग करे । जसे कि जिस-जिस शारीरिक रङ्गं के रोग के -निवारणाथं उस-उस भ्रङ्गंके रोगके भनुकुल भरौषधका परमेदवर की सूष्टिर्मे, (यः) जो (भरस्य) इस परमेरवर का (प्रथम - यह् (सः) वह (सः) वह (भ्रन्निः) भ्रगनिहै। मेषवर की सृष्टिमेंृ, (यः) जो (भस्य) इस परमेश्वर का (द्वितीय भ्राणः) दुसरा प्राण है (प्रौढ़ः नाम) वंह “प्रौढ नाम वाला है, (भसौ) बह है (सः भ्रादित्यः) वह सुयं । का० १५। भ्रनु० २। सू० १५ भ्रथवंवेद-माष्य २२९ मेदवर की सृष्टि में, (यः) जो भरस्य) इस परमेश्वर का (तृतीयः प्राणः) (सः, चन्द्रमाः) वह चन्द्रमा । .

English

the exclamation Vashat as food-eater.

अध्याय 15

श्लोक 17.3

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य तृ॒तीयो॑ व्या॒नः सा द्यौः

tasya vrātyasya | yo'sya tṛtīyo vyānaḥ sā dyauḥ

हिन्दी अर्थ

मेचवर की (सृष्टि मे¶ (यः) जो (भस्य) इस परमेदवर का (चतुथं प्राणः) चौथाः प्रारा है, वह (विभूः नाम) “विभ नाम वाला है, (भयम्) मह् है (सः) वह (पवमानः) वायु । । पवमानः गतिमान् तथा पवित्र करने वाला वायु । यह भ्राकाश मदवरकी सृष्टि (यः) जो (भरस्य) इस परमेदवर का (पन्वम प्राणः) पांचवां प्राण है, वह (योनिः) नाम “योनि नाम वाला है, (ताः भर्थातु पृथक् करता है । “यौ ति संयोजयति पृथक् करोति वास योनिः जलम दोनों शण है वस्तुर्भोको मिला देना, तथा पृथक् पृथक् ५११ भ्रथववेद-भाष्य काऽ १५ । भ्रनु० २) सू० १५ है । रतः भ्रापः के लिए योनि शब्द म्रौपचारिक है, गौण है । योनि श्रौर की गई है । यथा “योषा वा गौतमाग्निः तस्या उपस्थ एव समित्“ “““

English

He, when he went away to the Gods, went away having become Isana and having made Passion an eater of food. He who hath this knowledge eats food with

अध्याय 15

श्लोक 17.4

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य चतु॒र्थो व्या॒नस्तानि॒ नक्ष॑त्राणि

tasya vrātyasya |yo'sya caturtho vyānastāni nakṣatrāṇi

हिन्दी अर्थ

छठा प्राणा है, कह (प्रियः नाम “प्रिय नाम.वाला है, (ते), वे (इमे) ये वेद में ५ प्रो कौ भ्रधिक महिमा है। वे हैं गावः, भवाः, पुरुषाः अजावयः (अ्रथवं० ११।२।९) । इन में से गौए", भ्रजा प्रर श्रविः (भेड़) मेदवर कौ सृष्टि म, (यःोजो (प्रस्य) इस परमेबवर का(सप्तमः ्रारः) व्व करा प्रदान करते ई, भतःप्राण है। । का० १५। भ्रनु° २। पु० १६ श्रथवरयेद-भाष्य २३१ सातवां प्राण है, वह् (श्र रिमित) “श्रपरिमित” (नाम) नाम वाला (ताः) वे है (इमाः) ये (प्रजाः) प्रजाएं । ख,

English

Passion as food-eater.

अध्याय 15

श्लोक 17.5

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य पञ्च॒मो व्या॒नस्त ऋ॒तवः॑

tasya vrātyasya | yo'sya pañcamo vyānasta ṛtavaḥ

हिन्दी अर्थ

मत्री की भावना ब्रोत्त प्रोत है । यथा-- मेदवर को सृष्टि मेँ, (यः). जो (भस्य) इस. परमेदवर. का (प्रथम) प्रथम (ग्रपानः) अपान है (सा) बह ( पौरोमासी) पौरंभासौ है । वणन समुचित होता है । (काण्ड . १५। भरनु° १। सूक्त २। मत १४) इस. ३३९. तसय वरत्॑स्य । यो ऽस्य दवितीयोऽपादचः साष्टका ॥२॥. ५१५ भयर्ववेद-माष्य का० १५। अनु २। सु° १६ मेकवर की सृष्टि मँ (यः) जो (ग्रस्य ) इस परमेदवर का (द्वितीयः) दुसरा (्रपानः) भ्रपान है (सा) वह (ब्रष्टका) भष्टमीहै। तैमौ ईपकौ द्वितोय प्रपान कहा जा सकता है। प्रथम अपान है, पौण-

English

He, when he went away to creatures, went away having become Prajāpati and having made vital breath an eater of food. He who hath this knowledge eats

अध्याय 15

श्लोक 17.6

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य ष॒ष्ठो व्या॒नस्त आ॑र्त॒वाः

tasya vrātyasya | yo'sya ṣaṣṭho vyānasta ārtavāḥ

हिन्दी अर्थ

नँ एकाष्टका" का वंस है, जो रिं नबसंवत्पर की योतिकादहै। यह “एकाष्टका मन्त्र २ य वाशात प्रतीत नहीं होत मेश्वर कौ सृष्टि मे, (या) जो (भस्य) दस परमेदवर का (तृतीयः) मेदवर की सृष्टि मे, (यः) जो (रस्य) इस परमेश्वर का (चतुर्थं) चौथा है। श्रद्धाह्वारा कमं मेँ रुचिं होती है। का०१५। भनुऽ २१ सुण १७ भ्रथरववेद-माष्य २३३ मेदवर की सृष्टि मे, (यः) जो (भरस्य) इस परमेश्वर का (षष्ठः) छटा परमेश्वर की सृष्टि में, (यः) जो (भस्य) इस परमेदवर का (सप्तम) सातवां (अ्रपानः) भ्रपान दहै, (ताः) वे (इमाः) येह (दक्षिणाः) दक्षि-

English

food with vital breath as foodeater.

अध्याय 15

श्लोक 17.7

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य सप्त॒मो व्या॒नः स सं॑वत्स॒रः

tasya vrātyasya | yo'sya saptamo vyānaḥ sa saṃvatsaraḥ

हिन्दी अर्थ

३ उपकारी या साधन होने से भरपान है" मेदवर की सृष्टि मं, (यः) जो (भ्रस्य) इस परमेदवर का (प्रथमः) १. भ्रपानं वायु गुदाद्वारये निःसरणं कर मल को निकाल कर, युख देती है 1 इसी प्रकार ईष्टियां भौर यज्ञ रोगनिवारण हारा सुखकारी होते है । भपानः == ९५११४ प्रथवंवेदनभाष्य का० १५। अनु० २ 1 भुर १७ मेदवर को सृष्टि मँ, (यः) जो अरस्य इस परमेदवर का (तृतीयः) तीसरा (व्यानः) व्यान है, (सा) वह् (चौः) चुलोक है । मेदवर की सृष्टि मे, (यः) जो (भस्य) इस परमेदवर का (चतुर्थः) । मेदवर को सृष्टि, (यः) नो (भस्य) इस परमेद्वर का (पञ्चमः) पचिवा (व्यानः) व्यानं है । (ते) वे (ऋतवः) ऋतुए है । मे्वर क सृष्टि त्र, (यः) जो (भरस्य) इस परमेदवर का (षष्ठः) + ज व्यान है, (ते) वे (भ्रातंवाः) ऋतुभ्रों के भ्रवयव या

English

He, when he went away to all the intermediate spaces, went away having become Parameshthin and having made Devotion an eater of food. He who hath this knowledge eats

अध्याय 15

श्लोक 17.8

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।स॒मा॒नमर्थं॒ परि॑ यन्ति दे॒वाः सं॑वत्स॒रं वा ए॒तदृ॒तवो॑ऽनु॒परि॑यन्ति॒ व्रात्यं॑ च

tasya vrātyasya | samānamarthaṃ pari yanti devāḥ saṃvatsaraṃ vā etadṛtavo'nupariyanti vrātyaṃ ca

हिन्दी अर्थ

भरातवा-=ऋतुभ्रों के भ्वयव मास । समूह उत्तरायण, दक्षि- का० १५। भ्रनु० २। सू० १७ भ्रथवेवेद-भाष्य २३५ परमेश्वर को सृष्टि मँ, (यः) जो (भरस्य) इस परमेश्वर का फफडो मे रक्त मे मिलकर शरीरावयव को पुष्टि देतां है। प्रपानकां -कायंदहैशरीरके मल कोशरीर से बाहिर फकना। फफडो की मलिन , फंकना, तथा मलमूत्र भौर प्रसीने भादि को शरीर से पृथक् कदना,- श्रपान का कायं है । भ्रपान, शाब्द मँ “रप का भरं है पृथक् करना।

English

food with

अध्याय 15

श्लोक 17.9

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।यदा॑दि॒त्यम॑भिसंवि॒शन्त्य॑मावा॒स्यां चै॒व तत् पौ॑र्णमा॒सीं च॑

tasya vrātyasya | yadādityamabhisaṃviśantyamāvāsyāṃ caiva tat paurṇamāsīṃ ca

हिन्दी अर्थ

गई है । इसी गदा के स्थानसे इस के वामभागसे इडा भ्रौर दक्षिणभाग से पिङ्गला नासिकामूलं पर्यन्त चली गई है । सुषुम्णा नाडी, शाखा- सक्रिय बना रही है । यह नाडी-संस्थान, च्यान कास्थानहै। इसी लिंषै सब प्राणरूप हैँ । पाथिव, भ्रग्नि पाकक्रिया में सहायक होने के कारण .. तरथा भौदयं भ्रग्नि भ्रन्न पचा कर शरीर के तापमान को बनाए रखनतैके कारण प्राण है । भरादित्य वर्षा के कारण, तथा ताप-प्रकाशदेनेके कारण प्राण है । चन्द्रमा हारा भरोषधियों में रस संचार हीवादहैजिनकाकिहम सेवन कर जीवित रहते है, इसलिये चश्मा भी प्राण है । + चरमां मोषभी- ढोने, कृषिकमं में सहायक होने, तथा दूध भादि देने से प्राण्य ह। वेयक्तिक, सामाजिक भ्रादि कायो में परस्पर सहायक होने से प्रजाजन १. लो भ्रथर्वं ° १५।१।१।३ को व्याख्या । भ्रौर रोगकीटारषु नष्ट होते, वायु जल स्थल की शुद्धि होती,--इस के भविनाभावरूप म साधक नही, इस लिये प्राणख्प भी नहीं ।

English

Devotion as food-eater. With one and the same object the Gods go round the Year and the Seasons follow round the

अध्याय 15

श्लोक 17.10

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।एकं॒ तदे॑षाममृत॒त्वमित्याहु॑तिरे॒व

tasya vrātyasya | ekaṃ tadeṣāmamṛtatvamityāhutireva

हिन्दी अर्थ

जानकर जहां क्रोध की भ्रावर्यकता हो. वहीं क्रोध करना चाहिय, (यः) जो व्यक्तिं (एवम्) इस भकार के तथ्य कोः (वेद) जानता रौर तदनुसार भ्राचरण. करता हैः वह॒ (भ्रन्नादेन ) भन्न॒मौगी (मधुना). ५२६ भ्रयववेद-माष्य का १५। भनु २। सू० १४ समाधि भ्रलापूर्वंक इतरेषाम्” (योग १।२०) मेँ वीये को योग संवर्धन में सहायक माना है 1 वीयं हारा प्राणदाक्ति बढतीदहै, जो कि प्राणायाम तथा से तदुपयोगी भ्रनन खाता है ३२६, श्राणेनान्नादेना्॑मत्ति य एवं वेद॑ ॥२२॥ परिषुष्टि की दृष्टिसेभ्रनन खाता है, भोगदृष्टि से नहीं । कोऽ १५॥ प्रनु० २) सु° १४ भरथर्वविद-भाष्य २२७ मे बी रहे, एेसे सात्विक, लघु तथा सुपाच्य भ्नन्न का वह सेवन करता

English

He, when he went away to the upper region, went away having become Brihaspati and having made the exclamation Vashat an eater of food. He who hath this knowledge eats food with

अध्याय 15

श्लोक 18.1

अध्यात्म-प्रकरणम्।१-५ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ दैवी पङ्क्तिः, २-३ आर्ची बृहती, ४ आर्ची अनुष्टुप्, ५ साम्नी उष्णिक्।तस्य॒ व्रात्य॑स्य

adhyātma-prakaraṇam| 1-5 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 daivī paṅktiḥ, 2-3 ārcī bṛhatī, 4 ārcī anuṣṭup, 5 sāmnī uṣṇik| tasya vrātyasya

हिन्दी अर्थ

मण मिलकर, यौः है । ऋतु, भरातंव पभ्रौर संवत्सरं कालखूप है । रेष समग्र प्रणि- शरीर मे व्यापी होने के कार, व्यानर्प है.। का० १५। अ्रनु० २। सुऽ १७ भ्रथवं वेद-माष्य २३७ है, (एतत्) इस प्रकार परिक्रमा कर रहे ह, (वं) निर्चय से जसे किं मानो संवत्सर की परिक्रमा कर रहीरै। ऊ्व॑-ज्वाला वाली हो कर प्रदोप्त होती है, कहां जने कौ इच्छा वाला वायु सतत गति कर रहा है। जहां जनि की इच्छा याते वायु-मंवर गति ५३४ भ्रथटविद-माष्य का० १५ । प्रनु० २। सुऽ १८

English

Vrātya.

अध्याय 15

श्लोक 18.2

यद॑स्य॒ दक्षि॑ण॒मक्ष्य॒सौ स आ॑दि॒त्यो यद॑स्य स॒व्यमक्ष्य॒सौ स च॒न्द्रमाः॑

yadasya dakṣiṇamakṣyasau sa ādityo yadasya savyamakṣyasau sa candramāḥ

हिन्दी अर्थ

प्राप्त होते है। पितूृयाणमार्गीं भीयातो सीधे या परम्परया सवसार रहस्थी.भी तैर जतेर्है,जो कि विधिपूर्वेक पितु-ऋण चुका देते ह। भ्रादित्य पद परमेदवरवाचक भी है (यजु ३२।१) । परमात्मा में प्रवेद पाता है च मेखवर का ष्टि रचना भें (एकम) एक प्रयोजन समानथंसू, मन्त्र ८ (इति) यह मोक्ष जो करि (श्राहुति, एव) भ्राहुतिरूप है, भादित्यनामक का० १४। भ्रनु° २। सु० १८ श्रथवेवेद-भाष्य २३९ परमेरवर की (यद्) जो (सन्य) बायीं (भरक्षि) भांख है (सः) कह (चच्रमाः) चांद है। र भ्रादिशरीरयोकोसक्रिय कर रहे." वैसे समष्टि जगत् मेँ भी एक महतो -

English

When they surround the Sun on the day of New Moon, and that time of Full Moon. That one immortality of theirs is just an oblation.

अध्याय 15

श्लोक 18.3

योऽस्य॒ दक्षि॑णः॒ कर्णो॒ऽयं सो अ॒ग्निर्योऽस्य स॒व्यः कर्णो॒ऽयं स पव॑मानः

yo'sya dakṣiṇaḥ karṇo'yaṃ so agniryo'sya savyaḥ karṇo'yaṃ sa pavamānaḥ

हिन्दी अर्थ

दाहिने कान को अधिक शक्ति शाली. माना प्रतीत होता है, इस लिये दमे भ्रग्निकहादहै, भौर बाए कान को कम रक्ति वाला मानाहै, इसलिये इसे पवमान कहा है ।" जातकर्मसंस्कार" ममी दाहिने कानमे “वेदोऽसि, है शिशु ! तु वेद है, एेसे कथन का विधान है (संस्कार विधि, २४५ भथववेद-माष्य का० १५। भ्रनु० २। सू० १८ के योग्यदहै। इतनातो समफमेंभ्रा सकता हैकिवायु जो वायुरूपं (नासिके) नासिकाके दो छिद्र (म्रहोरत्रै) दिनश्मौरः-रतरिदहै (शोषंकपले) सिर के दो कृपान (दितिः च, भ्रदितिः' च) दितिभश्रौर रादित्य के अ्रधिऽठता परमेश्वर का ग्रहण होता है। दिनके समय,

English

When they surround the Sun on the day of New Moon, and that time of Full Moon.

अध्याय 15

श्लोक 18.4

अ॒हो॒रा॒त्रे नासि॑के॒ दिति॒श्चादि॑तिश्च शीर्षकपा॒ले सं॑वत्स॒रः शिरः॑

ahorātre nāsike ditiścāditiśca śīrṣakapāle saṃvatsaraḥ śiraḥ

हिन्दी अर्थ

है । वासं -प्रश्वास की हस से विपरोत गति रोग का चिह्लदहै। इसप्रकार .२।१०।१६) हारा सूरं भी व्रतेपति होते से व्रात्य है । का० १५। भ्रनु० २।सू० १८ भयववेद-माष्य २४१ मे कई बार वारीवारी से बदलते रहते ह । “हठयोग प्रदीपिका” प्रादिर्मे कहा है । भ्रादित्य का संचालन कालाघीन दहै । यथा “कालेनोदेति सूर्य॑ः काले निंविदाते पूनः" (रथव १९१५४५१) । काल की इकाई संवत्सर है । है, वसे संवत्सर के प्राश्य दिन-रात, मास तथा चऋतुए' भरवलम्बित है । इस संवत्सर केदो विभाय, उत्तरायण तथा दक्षिणायन । यदो मानो संवत्सर कूपी शिरः (सिर) के दों -कपाल ह, खोपड़ी के भदो खण्ड ह। इनमे से उत्तरांयंण-भाग या खण्ड कों भ्रदिति कटाहे, मौर कोहरलेता है। दक्षिण भाग को भ्रसुर-भागःभी कहते है, तथा उत्तर-

English

Day and Night are his nostrils. Diti and Aditi are his head and skull. By day the Vrātya is turned westward, by night he is turned eastward. Worship to the Vrātya!

अध्याय 15

श्लोक 18.5

अह्ना॑ प्र॒त्यङ् व्रात्यो॒ रात्र्या॒ प्राङ् नमो॒ व्रात्या॑य

ahnā pratyaṅ vrātyo rātryā prāṅ namo vrātyāya

हिन्दी अर्थ

गतिं करतादहै, भ्रौर रात्रि के समय पर्चिमसे धूवंकीभोरं गति करता भ्रादित्य-पुरुष की “नमः दारा नमस्कार किया है । योऽसाबादिष्ये पुरुषः. . ९४२ श्रथव्विद-माष्यः का० १५। घ्नु० २। सु० १८ शरी भरोफेसर विष्वनाय विद्यालंकार विदयामातंण्ड कृत ' “प्रथववेद १५ वें काण्ड का "“आप्नुबन्ति शरीरमिति आपः (उणा०२ (६ १ इस से ज्ञात होताहै क्रि महषि को भ्रापः द्वारा “रक्त. भरं भी भरमिप्रेत है भरथवं० १०।२।१२ में भी भ्रापः का श्रथं रक्त प्रतीत होता है। यथा- मन्व मेँ “सिन्धु” पद द्वारा हृदय कंहा है, भ्रौर “पुरषे भापः' हारा धूम्रव्णीः भरादिजो किं रक्त के बोधकं

English

By day the Vrātya is turned westward, by night he is turned eastward. Worship to the Vrātya!

स्रोत: bhavykhatri/DharmicData · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।