Atharva Veda
15
अध्याय 15 / 20

Kanda 15

काण्ड 15

230 श्लोकभाग 2/5 · श्लोक 4.1–5.21

पूर्ण अध्याय पाठ39 श्लोक

अध्याय 15

श्लोक 4.1

१-१८ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१, १३, १६ दैवी जगती; ४, ७, १० प्राजापत्या गायत्री; २, ८ आर्ची अनुष्टुप्; ३, १२ द्विपदा प्राजापत्या जगती; ५ प्राजापत्या पङ्क्तिः, ६ आर्ची गायत्री, ९ भौमार्ची त्रिष्टुप्, ११ साम्नी त्रिष्टुप्, १४ प्राजापत्या बृहती; १५, १८ द्विपदाऽर्ची पङ्क्तिः १७ आर्ची उष्णिक्।तस्मै॒ प्राच्या॑ दि॒शः

1-18 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1, 13, 16 daivī jagatī; 4, 7, 10 prājāpatyā gāyatrī; 2, 8 ārcī anuṣṭup; 3, 12 dvipadā prājāpatyā jagatī; 5 prājāpatyā paṅktiḥ, 6 ārcī gāyatrī, 9 bhaumārcī triṣṭup, 11 sāmnī triṣṭup, 14 prājāpatyā bṛhatī; 15, 18 dvipadā'rcī paṅktiḥ 17 ārcī uṣṇik| tasmai prācyā diśaḥ

हिन्दी अर्थ

छोटे तोते डालियोँ पर बैठे ह । ये फूल वसन्त काल भँ लिलते है । ऋ० १०।८५।२० में सुक्रियुकम् के साथ शल्मलिमू पाठ भी है । चत्मलि का के लिए श्राददं काल फाल्गुन-मास मानां है, जो कि वसन्तकाल है । इसी (निर० १२१८) भे सुकिशुकं भ्रौर शल्मलि के अर्थं निम्नलिखित दिये हँ हामलिभिति” को उपमाथंक कहते हुए “किशुक” का वृक्षरूप तथा पुष्मूप होना भी स्वीकृत किया है 1 इसी प्रकार “शल्मलिः घुशरो भवति, हरवान् व्याख्या- पत्नी जब पितृगरह से पतिगृह की भोर जाने लगे तब - चाहिए, तथा विविध रूपो से रूपित, सुघड़, तथा सुन्दर म्रौर साफ पियो । रथ पर श्रारोहण करे तब उसे कहना चाहिधे कि भ्रव तु इस रथपर

English

answered and said, Let them bring my couch.

अध्याय 15

श्लोक 4.2

वा॒स॒न्तौ मासौ॑ गो॒प्तारा॒वकु॑र्वन् बृ॒हच्च॑ रथंत॒रं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑

vāsantau māsau goptārāvakurvan bṛhacca rathaṃtaraṃ cānuṣṭhātārau

हिन्दी अर्थ

“अश्विना शभस्यती"" श्रथवं० ६।३।३ मे भष्वियो को रोभा या शुभकमोँ कं पति श्र्थात्ु रक्षक कंहाहै। । ७६ भ्रथवंवेद-भाष्यं का० १४ भनु० २। सू०२. को; (च) भौर (पुत्रान् च) पुत्र को, (रथो) तथा (इमाम्) इस जायां को (अदात्) दिया है । सोम की थी, सोम ने इसे गन्धव को दिया, गन्धवं ने इसे भ्रग्ति को दिया, - मन्वे १ से मे, कन्या को चार अ्रवस्था््रौ का वणन, उस के पतियौं भर्थात् रक्षणक सूपमेंदहुप्राहै। । कन्या जब छोटी है तब वह सौम्यगुणा प्रधान होती है । इसीलिये .

English

All creatures become the worshippers of him who possesses this knowledge.

अध्याय 15

श्लोक 4.3

वा॒स॒न्तावे॑नं॒ मासौ॒ प्राच्या॑ दि॒शो गो॑पायतो बृ॒हच्च॑ रथंत॒रं चानु॑ तिष्ठतो॒ य ए॒वं वेद॑

vāsantāvenaṃ māsau prācyā diśo gopāyato bṛhacca rathaṃtaraṃ cānu tiṣṭhato ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

होता है तो उसे “समाय राजं . शब्द द्वारा स्मरण किया हं (भथवं० दृष्टिगोचर होने लगे । सौम्यजीवन कौ पिछली .श्रवस्था में मानसिक- . विकार दानैः शनं: जड पकड़ने लगे । प्रेम -भ्रौर श्रलरुराग के हाव-भाव प्रकट होने लगे । गन्ध, मोद, प्रमोद, रूपसम्पत् शोभा की भावनाए' जागरित - “ग्नि” पति होता हे" रक्ष होता है । रजस्वला मेँ “रजस्” की अरभि- का० १४1 श्रनु९२।सू०२ भ्रथववेद-माष्य ७७ मे स्वाभाविकंरूप से भावों तथा व्यवहारो की शुचिता होतो है, उसमे गानविद्या द्वारा वाणी शिक्षित होती है, जिस सें गनेके भारोह-

English

For him they made the two Spring months protectors from the eastern region, and Brihat and

अध्याय 15

श्लोक 4.4

तस्मै॒ दक्षि॑णाया दि॒शः

tasmai dakṣiṇāyā diśaḥ

हिन्दी अर्थ

रजोददौन नहोनेसे स्त्रियांरूग्ण हो जाती ह। रजोदशेन के ठीके होते साथ न कर.देना. चाहिए, रजोदंन की भ्रवस्था का पूणं परिपाकं कन्या के समय गोदान तथा कन्या की त्रिदाई के समय पिता से मिली वस्त्रादि की भंट को मन्त्रम "“रयि कटा है, जोकि मनुष्यज . पति को मिलती ह । अथो दमाम्”; इन शब्दों की दृष्टि से इन मन्तो के अथं नियोगपरफ भी होते है । इस प्रकार ये चार मन्त्र दरचथंक हँ, विवाहपरक भी रौर नियोग- . “रब पतिर्यो को. संज्ञा कहते ह -(सोमः प्रथमो विविदे) उनमेँसे जो विवाहित पति होता है, उस की सोम संज्ञा है ' क्योंकि वह सुकुमार होने से मृदु, ्रादि गुरणयुक्त होता हैः । (गन्धर्वो विविद उत्तरः) दूसरा पति (तृतीयो अग्निष्टे पतिः) तीसरा पति जो नियोग से होता है, वह श्रग्नि- ६९, आ वामग्स्सुमतिवौजिनीवसू न्यदिवना दत्सु कामां अरंसत ।

English

Rathantara superintendents.

अध्याय 15

श्लोक 4.5

ग्रैष्मौ॒ मासौ॑ गो॒प्तारा॒वकु॑र्वन् यज्ञाय॒ज्ञियं॑ च वामदेव्यं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑

graiṣmau māsau goptārāvakurvan yajñāyajñiyaṃ ca vāmadevyaṃ cānuṣṭhātārau

हिन्दी अर्थ

(वाजिनीवसू) उषा-भौ रमूं के सदृश वतं मान (श्ररिवना) है शुभ -कर्मो मे व्याप्त माता-पिता ! (हृतु) हमारे हदर्यो मेँ (कामाः) कामनाए (नि भ्ररंसत) निरतां- रमण कर. रही है (१). (वाम्) तुम दोनो की (सुमतिः) सुमति (शरा भ्रगनू) हमे प्राप्त हो; (२) (शुभस्पती) है शुभकरो कै रक्षको ! या स्वाभियो ! (मिथुना) तुम दोनों एक-दूसरे के भाश्रयर्मे पिता (श्रथवं १४।१।१४) । मिथुना = “मिथुनौ कस्मान्मिनोतिः भयतिकर्मा, थु, इति नामकरणः ( निर०. -५।७।२९) । भयम्एः = भयंभा “योर्ध्यान् के फलो का यथावत् सत्य-सत्य नियमकर्ता है, इसी से उस परमेदवर का

English

The two Spring months protect from the eastern region, and

अध्याय 15

श्लोक 4.6

ग्रैष्मा॑वेनं॒ मासौ॒ दक्षि॑णाया दि॒शो गो॑पायतो यज्ञाय॒ज्ञियं॑ च वामदे॒व्यं चानु॑ तिष्ठतो॒ य ए॒वं वेद॑

graiṣmāvenaṃ māsau dakṣiṇāyā diśo gopāyato yajñāyajñiyaṃ ca vāmadevyaṃ cānu tiṣṭhato ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

व्याश्या-मन्वर मेँ वृद्ध माता-पिता को “वाजिरीवसू" शौर “परदिवना. कहा है ! वाजिनी का श्रं है उषा.श्रौर वसु का भ्रथं है सूयं । माता उषा है पत्नी श्रौर पतिका होना चाहिए । एक-दूसरे से पृथक् रहना पतनी भ्रौर पति के लिए उचित नहीं 1 उषां का स्वरूप सुन्दर तथा. कोमल है, प्रौर सूयं का प्रखर । इस लिये पत्नी मेँ रमणीयता तथा कोमलता का निवास होना चाहिए, रौर पति मे पौरषशक्ति का.। माता-पिता कां पारस्परिकं माता-पिता, वर-वचू के लिए, सच्चे मागं दक होने चाहिए । इसी भ्रा्ला से वर-वधू माता-पिता से कहते ह किह ग्रदिवर्यो ! सद्गुणो से व्याप्त है माता-पिता ! हमारे हृदयो मेँ निम्नलिखित कामनाएः है, भाप इन की पूति में हमारे सहायक बने । यथाः- , (३) श्राप हरमे भास्तिक बनाडये । ताकि न्यायकारीः परमेश्वर प्रदर्शित नियमों के अनुसार जीवनं को ढाल.कर, हम उस के प्रेमपात्र बन (४) तथा है माता-पिता ! श्राप स्वयं हमे दायविभागानुसार गृह्य के उत्तराधिकार भी प्रदान कीजिये।' ।

English

Brihat and Rathantara superintend, the man who possesses this knowledge. For him they

अध्याय 15

श्लोक 4.7

तस्मै॑ प्र॒तीच्या॑ दि॒शः

tasmai pratīcyā diśaḥ

हिन्दी अर्थ

८ भ्रथवेवेद-भाष्य का० १४ । भ्रनु० २। सू०.२ : है पत्नी ! (सा) वहतू ( मन्दसाना). मुदित-प्रमुदित होती हुई, (वहि) श्रमने मे. धारण कर ग्रौर उस का परिपोषण कर । (स्ुमस्पती) (दुमंतिमु) दुमंति. को (भ्रपहतम) दरं कर दो । । २।८७ बाहुलकात्) । रयि = वीयं. । “वीयं वे रयि ” (० ब्रा ° १३।४।२।१३) धेहि इस का प्रयोग गर्भाधान कै लिए भी हृश्रा है। यथा “गर्म ब्द “वर घातुसेबना हैजिस का भ्रथं है तेरना” । तरन्ति येन कितु सदा श्रौर विशेषरूप से गभंकाल मे मुदित-परमुदित रहा कर, तथा मन को रिवेसंकल्पी किया कर। इस विधिसे तु प्रदंसनीय तथा वीर

English

made the two Summer months pro- tectors from the southern region, and Yajnāyajniya and

अध्याय 15

श्लोक 4.8

वार्षि॑कौ॒ मासौ॑ गो॒प्तारा॒वकु॑र्वन् वैरू॒पं च॑ वैरा॒जं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑

vārṣikau māsau goptārāvakurvan vairūpaṃ ca vairājaṃ cānuṣṭhātārau

हिन्दी अर्थ

सन्तति को उत्तम तथा वीर बना सक्ते । है किं -भ्राप दोनों हमारे ग्रहस्य को तीथं बनाइये, ताकि गृहस्थः के नियमो. हम दुःखसागरको तैर जाय। साथही यह्भी प्रार्थना करताहै कि भापके निदंशामुसार हमारा ग्रहं खान-पान की सामग्री से भरा रहे, तथा भ्राषं दोनों सदुपदेदों द्वारा. हमारी दुमंति को दूर कीजिये । दुम॑ति- मागं का० १४। ञमनु० २१ सू०र भ्रथववेद-माष्य ८१ मे स्थित ठ् ठ के सचछ-गरृहस्थजोवन को सुगमता से चलाने मेँ बाघक होती (याः) जो (ओरोषधयः) श्रोषधियां है, (याः) जो (नदः ) नदियां ह उपवन तथा वगीचे है, (ताः) वे प्रोषधियां भ्रादि (रक्षसः) रक्षक हो कर

English

Vāmadevya superintendents. The two Summer months, etc. as in Verse 1,

अध्याय 15

श्लोक 4.9

वार्षि॑कावेनं॒ मासौ॑ प्र॒तीच्या॑ दि॒शो गो॑पायतो वैरू॒पं च॑ वैरा॒जं चानु॑ तिष्ठतो॒ य ए॒वं वेद॑

vārṣikāvenaṃ māsau pratīcyā diśo gopāyato vairūpaṃ ca vairājaṃ cānu tiṣṭhato ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(वधु) है वधु ! (रक्षन्तु) सुरक्षित कर । गर्भवती की भ्रोषधिरयो का सेवन करते रहना चाहिए, ताकि गर्भस्थ भराम) हम श्रारूढ हए है" (सुगम्) जो कि सुगम मा्गं॒है, (स्वस्ति- हा (वोरः) धर्म॑वोर पुरुष (रिष्यति, न) विनाश को प्राप्त नहीं होता, ८ भरथव्विद-माष्य का० १४ । भ्रनु० २। सुर वा" (उरा० ४।१८२) । वाहनम् = वह् परापरे जब कि गृहंस्थ-पथ पर सुमतिपूरवैक श्रौर धर्म॑पूवंक चला जाय । धमेपूरवेक चलने गहस्थी दीधंजीवी हो कर विनाश. कोप्राप्त नहीं होते, रौरवे

English

They made the two Rain months, his protectors from the western region, and Vairūpa and

अध्याय 15

श्लोक 4.10

तस्मा॒ उदी॑च्या दि॒शः

tasmā udīcyā diśaḥ

हिन्दी अर्थ

प्ररूढ होती हृई मानो गृहस्थ रथ षर भ्रारूढ़ हुई है । यह मृहैस्थरथ भमत, का स्थान है (श्रथवं० १४।१।४२), इसे नरक धाम न बनाना । तथा गृहस्थ भें ठेसा व्यवहार करना जिस सेकितेरा पति दस गृहस्थ को सुखधाम ्रनुमव कर सके । तथा पतिगृह म रहने बलि जौ तेरे भ्न्य रक्षक है - यथा सास, दवशुर, देवर भ्रादि उन के साथः भी सदव्यवहार द्वारा उरः भी सुखी रलना । वेदँ के भ्रनुसार यतः पत्नी गृह की सम्नज्ञी है" भौर गृह का १४। भ्रमु १ । सु १ भ्रथववेद-भाष्य ६९ का प्रबन्ध दसी के हाथमे है, इस लिगे सम्भावित हो सकता है किं बुजुर्गों भरदि के साथ व्यवहार म कहीं यह उच्छु्खल न हो जाए, इस लिये पिता का सदुपदेदा समयोचित प्रतीत होता है । . र पति श्नौर पत्नी के चार चार गण. (वरुण) हे. श्वष्ठ तथा पत्नी का वरण करने वाले ! (बृहस्पते)

English

They brought the couch for that Vrātya.

अध्याय 15

श्लोक 4.11

शा॒र॒दौ मासौ॑ गो॒प्तारा॒वकु॑र्वंछ्यै॒तं च॑ नौध॒सं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑

śāradau māsau goptārāvakurvaṃchyaitaṃ ca naudhasaṃ cānuṣṭhātārau

हिन्दी अर्थ

का हनन न करने वाली, (भ्रपशुध्नीम्) पञ्चमो का हनन न करने वालौ, व्याख्या-वरण.करने वाले वर को उस के सम्बन्धी कहते हँ किं तु (१) घरमे भ्रकर भाई बहिन भ्रादि को कष्ट न पहृतराए (्रभातु- (२) जौ पद्युहत्या कर के मांस भक्षिकानहो, तथागौभ्रादिकी पालना करे (्रपलुष्नीम) ।. ‡ "च त (३) जो पतिधातिनी न हो, पति को कष्ट न पहूंाए ( भरपति- . चार गुण पत्नी के है। प्रतिक वारःगु निम्नलिखितर्हैः-..

English

Two of its feet were Summer and Spring, and two were Autumn and the Rains.

अध्याय 15

श्लोक 4.12

शा॒र॒दावे॑नं॒ मासा॒वुदी॑च्या दि॒शो गो॑पायतः श्यै॒तं च॑ नौध॒सं चानु॑ तिष्ठतो॒ य ए॒वं वेद॑

śāradāvenaṃ māsāvudīcyā diśo gopāyataḥ śyaitaṃ ca naudhasaṃ cānu tiṣṭhato ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(२) पति बुहस्पति हो, वेदोका विद्वाच् है (बृहस्पते) । यथा- । “वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम् । (सवितः), ताकि वंश परम्परा चलसके। - . . हैवपथगामिनी पत्नी का भ्रषिकार देवों द्वारा निदिचतत किये हुए (पथि) गृहस्थमागं पर या सुपथ पर वतंभान (कुमायय॑म्) कुमारी नववघू को (मा हिसिष्टम्) तुम दोनों कष्ट न पहू- १ (वधूपथस्) वधु के भ्राने-जाने का मागें (कृण्मः) हम भ्रबांधितत

English

Brihat and Rathantara were the two long boards, Yajnāyajniya and Vāmadevya the two cross boards.

अध्याय 15

श्लोक 4.13

तस्मै॑ ध्रु॒वाया॑ दि॒शः

tasmai dhruvāyā diśaḥ

हिन्दी अर्थ

क्लालायाः- शाला का भ्रभिप्राय है विशाल कोठी । देलौ वेदिक शालाः (अथव ० ९।३।१-२३१) । इसमे एक कमरा चाहिए हविः रखने के लिये कमरा (देवानां . सदः) (्रथवं° ९।३।७); गौरो तथा. भंदवो के लिए गो- मघ्यमाग मेँ शेवधि . भर्थात् 89/08 की निधिरूप, दुढ्निभित कमरां विमानम् उदरं शेवधिभ्यः . (९।३।१५); रसद रखने का कमरा (विद्वान्न बिभ्रती ९।३।१६)। रसोई तथा जल के कमरे(६।३।२२) । इस सूक्तं मे साला व्याख्या-- वर श्रपने माता-पिता से प्राथेना करता है कि राप दोनों इस घर के स्तम्भ हो, ्राघार हो 1 माता-पिता कै भ्राहीर्वाद तथा उन की देखभाल भँ नवयूवक पति-पत्नी गृहस्थजीवन को श्रानन्दमय तथा समुन्नत कर सकते द । इग लिगरे पति-पत्नी को चाहिए किवे माता-पिता को श्रपने गृहजीवन के श्राधार-स्तम्भ समा करे । वर. माता-पिता से यह भीप्राथंना करता है कि दिव्यगणी लोगों

English

Holy verses were the strings lengthwise, and Yajus formulas the cross-tapes.

अध्याय 15

श्लोक 4.14

है॒म॒नौ मासौ॑ गो॒प्तारा॒वकु॑र्व॒न् भूमिं॑ चा॒ग्निं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑

haimanau māsau goptārāvakurvan bhūmiṃ cāgniṃ cānuṣṭhātārau

हिन्दी अर्थ

से श्रष्टहयो कर यदि श्रासुरपथया राक्षसपथ परं चलने लगे तो इसे वे समा कर, सान्त्वना दे कर, साभविधि तथा दण्ड विधि द्वारा इसे देव- मागं पर लने कासदा यत्न करते रर्है। . ॥ पति श्रषने गह को देवी-शाला भ्र्थातु देवगृहं क्रहता है । पति इस . चलने वाली इस पत्नी को स्वयं भी देता है, ्रौर श्रपने माता-पितासेभी इस प्रधिकारको देने की प्रार्थना. करताहै। देवपुरी भें वेदध्वनियां अनाव्याधां देवपुरां भष् शि गा स्योना प॑तिठोके. वि राज. ॥६४॥ होकर, (शिवो) हे. वघु ! कल्याण रूपा तथा (स्योना) सुख दायिनो, तु (पतिलोके) पति के गृह में (विराज) विराजमान हो, या राज्यकर।

English

Sacred lore was the blanket, Devotion the coverlet.

अध्याय 15

श्लोक 4.15

है॒म॒नावे॑नं॒ मासौ॑ ध्रु॒वाया॑ दि॒शो गो॑पायतो॒ भूमि॑श्चा॒ग्निश्चानु॑ तिष्ठतो॒ य ए॒वं वेद॑

haimanāvenaṃ māsau dhruvāyā diśo gopāyato bhūmiścāgniścānu tiṣṭhato ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

नगरी मेँ प्रवेश करके पतिगृह मै.विराजमान्टो । ७२ । भ्रथववेद-माष्यः काऽ १४ । श्रचु° १। सू० १ . व्याख्या-घर के बुजुगं नववचू के प्रति कहते ह . कि-हे देवी ! तेरी सत्ता से इस देवपुरी या देवगृह के पूवं के, परिचम के, भ्रन्त के, मध्यं जीवन का यह् सर्वोत्तिम श्रादशं है । वैदिक धनियां तथा वैदिकं सामगान नाभ्रों कांसंचार कर, उनके जनीवनोँंको वेदिक मर्यादाभ्रों मे डालते रहते है । वतमान के रेडियो तथा1. /. कं भह, प्ररलील तथा गंवार गीत गह के वातावरण को दूषित कर रहे । बुजुगं वधू को यह भ्राश्वासन भी देते ह कि यह शाला प्राधि-व्याधिं . से शचुन्य है। तथा यह शाला देवपुरी है। इस कै वासी देवकोटि के है।

English

The Sāman was the Cushion, and chanting the bolster.

अध्याय 15

श्लोक 4.16

तस्मा॑ ऊ॒र्ध्वाया॑ दि॒शः

tasmā ūrdhvāyā diśaḥ

हिन्दी अर्थ

तूने भी इस देवपुरी मेँ भ्रा कर सच्ची देवी बनना । भ्रौर सब का कल्याण करने वाली उथा सुखो की वर्षा करनेवाली बनना । का० १४।. भनु० २। सु० २: भ्रथविद-मष्य ७३ सूर्या का क्रमिकं विकास ६४. तुस्यमगरे पयैवहन्त्सूयौ वंहतुनां सह ।. समथं सूर्या को, (वहतुना सह) विवाहविधि कं साथ या वहन करने वाले रथ कं साथ (दाः) प्रदान कर । वहतुना == वहतुः == विवाह (्रथवं० १४५।१।१३-१४); वहतुः ।५शा¡9- ७४ भ्रथवंवेद-माष्य का० १४1 रनु २।सु०२

English

The Vrātya ascended that couch.

अध्याय 15

श्लोक 4.17

शै॒शि॒रौ मासौ॑ गो॒प्तारा॒वकु॑र्व॒न् दिवं॑ चादि॒त्यं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑

śaiśirau māsau goptārāvakurvan divaṃ cādityaṃ cānuṣṭhātārau

हिन्दी अर्थ

कहा है । रजस् की परांपरिपक्वावस्था लगभग रे वषं मेँ होती है । यही सूर्या के विवाहं का सर्वोत्तम क्राल होता है। वचन द्वार सूचित किया हैक सूर्याका मनुष्यज पति एकदहीहै। इस लिये “पतिभ्यः” मेँ बहुवचन यौगिक विधया नाना-रक्चकों का द्योतक है। जसे राष्टरूपति, सभापति, सेनापति भ्रादि शब्दों मेँ पति काग्रथं है नाना हौगिः--यह भावं पतिभ्यः द्वारा प्रकट किया है। सास्र, इवसुर, विशेष व्यारूया १४।२।२।२-४ मत्र मे की गर्द है । पति है वह (दीर्घायुः) दीं भ्रायु वाला है, (रतम्) सौ (शरदः) वर्षो तक .. पति से पूवं मानो-विवाह किया था, -एेसा वणंन मन्व शमे हृभ्राहै। तेजः सम्मन्न कर के दीर्घायु वाले मनुष्यज-पति को दिया । इस कथन से:

English

The hosts of Gods were his attendants, solemn vows his messengers, and all creatures his

अध्याय 15

श्लोक 4.18

शै॒शि॒रावे॑नं॒ मासा॑वू॒र्ध्वाया॑ दि॒शो गो॑पायतो॒ द्यौश्चा॑दि॒त्यश्चानु॑ तिष्ठतो॒ य ए॒वं वेद॑

śaiśirāvenaṃ māsāvūrdhvāyā diśo gopāyato dyauścādityaścānu tiṣṭhato ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

का पति श्रगनि रै, जोकि रजसू-रूप है । इस अग्नि-पति के साथ रह कर का० १४। श्रमु०२।सूु०२ भ्रथर्ववेद-माष्य ७५ दीर्घायु मेँ विवाह करने का परिणाम यह होतादहैकि सूर्याका पति १०० वर्षो तकं जोवित रहने की क्षमता रखता है । छोरी श्रवस्या मे विवाह होतो है, (ते) तेरा (श्रपरः) दुप्ररा (पतिः) पति (गन्धवंः) .गन्धवं होता है । (ते) तेरा (तृतीयः) तोसरा (पतिः) पतिं (श्रग्निः) . प्रग्नि होता है, (ते). तेरा (तुरीयः) चौथा पति (मनुष्यजाः) मनुष्य से जन्मा हृभ्रा पुरुष व्याख्या--मन्व के चतुथं पाद मेँ चतुथं पति को. मनुष्यजाः कहा है । पटनी के चार-मनुष्यज-पतियों की भराशंका दन मर्न््रोमेन करनी चाहिए। साथही यह भो जानना चाहिए कि वेद में पठित पतिराब्द यौ गिकार्थक है । पति का श्रथ है रक्षक । पति का प्रथं केवल वह रक्षक हौ नहीं किं जिस के साथ विवाह हुभ्रा है, भपितु जाया की "रक्षा करने वाले पति के समीप

English

worshippers.

अध्याय 15

श्लोक 5.1

१-२१ अथर्वा।रुद्रः।१ त्रिपदा समविषमा गायत्री; २ त्रिपदा भुरिगार्ची त्रिष्टुप्; ३,६, ९,१२,१५,१८,२१ द्विपदा प्राजापत्याऽनुष्टुप्; ४ त्रिपदा स्वराट् प्राजापत्या पङ्क्तिः; ५,८,११,१७ त्रिपदा ब्राह्मी गायत्री; ७, १०, १६ त्रिपदा ककुप्; १३, १९ भुरिग् विषमा गायत्री; १४ निचृद्ब्राह्मी गायत्री; २० विराट्।तस्मै॒ प्राच्या॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद् भ॒वमि॑ष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन्

1-21 atharvā| rudraḥ| 1 tripadā samaviṣamā gāyatrī; 2 tripadā bhurigārcī triṣṭup; 3,6, 9,12,15,18,21 dvipadā prājāpatyā'nuṣṭup; 4 tripadā svarāṭ prājāpatyā paṅktiḥ; 5,8,11,17 tripadā brāhmī gāyatrī; 7, 10, 16 tripadā kakup; 13, 19 bhurig viṣamā gāyatrī; 14 nicṛdbrāhmī gāyatrī; 20 virāṭ| tasmai prācyā diśo antardeśād bhavamiṣvāsamanuṣṭhātāramakurvan

हिन्दी अर्थ

(नरः) ह नर-नारियो ! भि) मेरे (इदम्) इस कथन को (सुशुणुत) से निमित गदियो पर (भधितस्थुः) भ्रधिष्ठितह, (ते) वे सब (्रस्यै, वध्वै) इस वधू के लिए (स्योनाः) सुखदायक (भवन्तु) हो, भर्थातु सुखी रहने रथस्थ-वंधू को (हिसिषुः, मा हिसित न करे, भ्रवाञ्छनीय भ्रालोचना भथ हो “रह के दो पति". । दस द्वारां गह .पर -पति-पत्नोः कां समान. । भ्रषिकार सूचित होता है ।. व्याकरण के भ्रनुखार जाया को “दम्” भादेद का० १४। श्रनु० २॥ सू०२ भ्थ्ववेद-माष्य , ८३ भी सम्भव है किं वनस्यतियों तथा बडे बडे वृक्षोके वनोँमेंजो निवास करते हैँ ठेसे वानप्रस्थी भी, जोकि विवाह मेँ उपध्थित हृ९ है; निज भ्राही- वदो द्वारा वधू के लिए सुखदायक होँ।

English

Vairaja superintendents. The two

अध्याय 15

श्लोक 5.2

भ॒व ए॑नमिष्वा॒सः प्राच्या॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः

bhava enamiṣvāsaḥ prācyā diśo antardeśādanuṣṭhātānu tiṣṭhati nainaṃ śarvo na bhavo neśānaḥ

हिन्दी अर्थ

यति । सुशेवा = सु शेव (सेवने) । देवृक्रामा = “तु देवर की कमना करती , ह वधु ! (इह) इस पतिगृह में तू (्रदेवृष्नी) देवरो को कष्टन पहुचाने वाली; (श्रपतिष्नी) पति को कष्ट न पहुचाने वाली, (पशुभ्यः) पदयो के लिये (शिवा) उन की सेवा करनेवाली या कल्याण करनेवाली (सुयमा) यम-निय्मो का उत्तम विधि भे पालन करनेवाली या गुह का उत्तम नियमन-परबन्ध करनेवाली, (सुवर्चाः) उत्तमतेज तथाःशारीरिक कान्ति से वाली, (देवृकामा) देवरो की शुभकामना करनेवाली, या नियोगार्थं देवर की कामना करनेवाली, (स्योना) तथा सब को सुख देनेवाली एषि - स्थापना घर मेँ करता है । यह अग्नि गह र्भ सदा वतमान रहना चाद्ये । स्थान में देवकामा (ऋ० १०।८४४४) व्याख्या- वधू को उपदेश-ूने देवरौ रौर पति को मानसिक तथा ' करना, गृहवासियों पर प्र मपूवंक शासन तथा यम-नियर्मो का पालन करना, गृहस्थधमं का पालन करते हए श्रपने शरीर की कान्ति श्रौर तेजं को बनाए रखना, उत्तम श्रौर दीर सन्तानं वासी दोना, सब को सुख देने

English

region. Bhava the Archer, a deliverer, delivers him from the intermediate space of the eastern

अध्याय 15

श्लोक 5.3

नास्य॑ प॒शून् न स॑मा॒नान् हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑

nāsya paśūn na samānān hinasti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

भगो से सम्पन्न तेरे पति की (सुमतौ) सुमति में (श्रसत्) रहे । उपस्तरे == िस्तेरे के समीप यथा “उपद्चवि"" (६।४९।३), भर्थावु व्याख्या- प्रसूतिकाल मेँ गभंवती एेसे कमरे मेँ रहै जिसर्भ कि प्रसूतिकर्मःके हेतु, क्या करना चारिथे । पर बिदधते हो, (चमं च) भ्रौर मृगादि के चमं को. (उस्तृणीथन) उस । १. शमे ःभौर वमं नयु सक लिङ्गी है, इस इष्टि से “एतु” शब्द नपुसकलिङ्खी पठित है । भर्थात् “ ततु श्म, वर्म“ । । ९६ अरथर्ववेद-माष्य का० १४। श्रनु० २।सू०२ (पतिम्) पति को (विन्दते) प्राप्त करती है ।

English

They made Sarva the Archer his deliverer from the intermediate space of the southern region,

अध्याय 15

श्लोक 5.4

तस्मै॒ दक्षि॑णाया दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाच्छ॒र्वमि॑ष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन्

tasmai dakṣiṇāyā diśo antardeśāccharvamiṣvāsamanuṣṭhātāramakurvan

हिन्दी अर्थ

बल्बजम् =€ /95/06 70/98. । चरक में प्रसूतिगरहं मे बल्बज के बिछाने का विधान है (चरक, शरीरस्थ।न, म्ध्याय ठ । प्रसवपीडा के समय, चरक मेँ, भूमि पर शरन का विघान दहै। थथा ' आवी प्रादुभवि चरफ मेँ भसूतिगह का निम्नरूप मेँ वणन हूश्रा है । ' प्राक् चवा.या वारणानां रां वा यानि चान्यान्यपि ब्राहया शाः शसेधुरथव्रवेर विदः । फूलों के गन्धो सं सुगन्धित भूमि मे, सूतिकागृह बनवाना चाहिए । इस का गोदी, भिलावा, वरणा या खेर की समिघाये होनी चाहिय, तथा इसं मँ वह सब साभानं भी होना चाये जसि क्रि अथववेद के विद्वान् करे; थी उस म प्रसूतिकाले दी जाने वाली भ्राहूत्तियां दे।'

English

etc, as in verse 1.

अध्याय 15

श्लोक 5.5

श॒र्व ए॑नमिश्वा॒सो दक्षि॑णाया दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः

śarva enamiśvāso dakṣiṇāyā diśo antardeśādanuṣṭhātānu tiṣṭhati nainaṃ śarvo na bhavo neśānaḥ

हिन्दी अर्थ

का० १४। भ्रनु० २। सू०२ ्रथवंवेद-माष्य ९७ कई मन्व .का प्रथं करते हँ कि “लाल चमं पर बल्वज-घास को बिदा कर, के विपरीत है, तथा मन्त्र रमे भी चमं प्र ही श्रारोहण का विधान है, बल्वज पर नहीं । चरक मँ भी चमंपरहीबेठकर इष्टिका विधान किया है । यथा “ताँ पश्चिमे, अनाहतवस्वरसंचये दवेदषंभो वाप्यजिन उप- बिद्या कर, उस पर सुफेदबेल या मृग का चमं बिला कर बेठे । यह विधि वेदय के घर में रर-मृग या बकरे का चमं बिच्ठाए । वहां बेठ कर ढाक, सम्पादन करे! इस उद्धरण मेँभी चर्म॑ पर बैठने का विधान दहै, ्रावतं चम, पर नहीं । उपस्तुणीहि तथा उपस्तरे (१४।२।२१) समानाभिप्राय है भ्रसूतिकालं में प्रग्निहोत्र से लाभं ८८, आरोह चमोपं सीदाभिभेष देवो हन्ति रक्षांसि सवौ ।

English

They made Pasupati the Archer his deliverer from the inter- mediate space of the western

अध्याय 15

श्लोक 5.6

नास्य॑ प॒शून् न स॑मा॒नान् हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑

nāsya paśūn na samānān hinasti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

हनन करती है । (इह) यहां पर (भस्मे, पत्ये) इस पतिः के लिथे (प्रजाम्) “बल्वज धास को भरमि पर निचा, (तत्र) उस पर बरि्ाए रोहिते चर्मणि प्रधि लाल, था रोहित नाम वाले मूग पर (उपविश्य) बैठ कर, शेष देवः = द्योतनाद् वा दीपनाद् वा (निर० अ४।१५) ) मन्त पे निरावृत्त चमं पर बैठने का विधान है, रावत चमं पर नहीं । सन्तानं जन्म से पशुवत् होती हैँ (भस्याः) इस (मातुः) माता के (उपस्थात्) गभं से (जायमानाः) जन्म धार -करते हुए (नानारूपाः) ननागणों भौर श्राकृतियों वाले -यज्ञाग्नि के (उप सीद) समीप तु बैठा कर, भ्रौर (सं पत्नी) पति के साथ के प्रकट होने पर श्रौर मननरील होने पर वे वस्तुतः मनुष्य होती है । तभी कहा है कि “जन्मना जायते श्रः" । ्रथवं ° ११।२।९ भी इस सम्बन्ध में

English

They made the Awful God, the Archer, his deliverer from the intermediate space of the

अध्याय 15

श्लोक 5.7

तस्मै॑ प्र॒तीच्या॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शात् प॑शु॒पति॑मिष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन्

tasmai pratīcyā diśo antardeśāt paśupatimiṣvāsamanuṣṭhātāramakurvan

हिन्दी अर्थ

इसे पुरुषो को पशु कहा है । सद्गुणो से रहित, केवल श्राहार, निद्रा. भय श्रौर भेथून वाले पुरुष पशु सदश ही हैँ । जन्मना पुरुष सन्तानो को पशु कर । स से सन्तार्नो पर पिता का ही भ्रधिकार प्रतीत होता है! जो माता लगभग १० महीनों तक गर्भं धारण करने, उस के जनने, तथा पालन-पोषण मेँ कष्ट सहती का० १४। भ्रनु० २। सू०२ भ्रथर्रवेद-भाष्य ९ पतनी निन व्यवहारो तथा कतं दवारं अपने आप को मङ्कलमंयी भमङ्गेल काम करे। जिस गृण की सन्तान चाहे उसी सद्गुण का वह चिन्तन रौर मनन करती रहे । । (सुशेवा) उत्तम सेवा करने वाली तथा उत्तम-सुख देने वाली, इवदुराय) सवशर के लिए (शम्भः) शान्ति पदा करने वाली, (श्वशूवं) सास के लिए (सुशेवा = सु शेव (सेवने), तथा शेवम् सुखनाम (निषं० ३।६) । स्योना सुखनाम (निषं० ३/६) । प्रतरणी =प्र+-तरणी (नौका) ; 08 (भष्टे) गरहस्थ-सागर से सुख पूर्वक पार उतरने के लिए -सुशीला पत्नी नौका रूप है । उत्तम नौका द्वारा समुद्र या नदी-नद पार किया जा सकता है, इसो प्रकार गुणवती पत्नी के सहारे गृहस्य-जीवन को सुख से निभाया दे वधु 1 (श्वशुरम्यः) ववशुरो के लिए (स्योना) सुखस्वसूपा (व)

English

region, etc.

अध्याय 15

श्लोक 5.8

प॒शु॒पति॑रेनमिष्वा॒सः प्र॒तीच्या॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः

paśupatirenamiṣvāsaḥ pratīcyā diśo antardeśādanuṣṭhātānu tiṣṭhati nainaṃ śarvo na bhavo neśānaḥ

हिन्दी अर्थ

(स्योना) त सुलस्वरूपा हो 1 (भस्य) इस (सवस्य) सव (विधे) भरता के १०० भ्रथवंवेद-भाष्य का० १४ । भ्रनु० २।सु०२ को (पुष्टाय) पुष्टि के लिए (भव) हो । श्वदुरेम्यः पति का पिता, चाचा, ताज धै सब वधू के सवशर है तथा पुष्टि को चिन्ता पत्नी को सदा करनी चाहिए । मनुष्य समाज तथा. समग्र प्रजा के लिए पत्नी को सुखमयी होना चाहिए ॥ पत्नी के उदार तथा गृहस्थ की प्रत्येक गरहिणो के हृदय मेँ होनी चाहिए ।

English

They made the Awful God, the Archer, his deliverer from the intermediate space of the

अध्याय 15

श्लोक 5.9

नास्य॑ प॒शून् न स॑मा॒नान् हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑

nāsya paśūn na samānān hinasti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(सुमङ्गलः) उत्तम-मङ्गल वाली (इयम्) यह. (वधूः) वधू है । . होने के आदीर्वाद, क्रमं से, देकर निज स्थानों पर जाद्ये 1 ् (च) भ्रौर (याः) जो (जरतीः) बढी स्वरियां (रपि) भी (इह) यहां (भरस्तम्) ्रपने भ्रपने धरों को (वि परेतन) लौटो । भावार्थं विवाह मे उपस्थित सज्जनो के प्रति कहा है कि भाप इस का9 १४ . भ्रनु° २। सूऽ२ भ्थवंवेद-भाष्य ॥ ि १०१ यवतयःयुवति्यो मेँ ईर्ष्याकी सम्भावना एसे शुभ भ्रवसरों पर

English

northern region, etc, as above.

अध्याय 15

श्लोक 5.10

तस्मा॒ उदी॑च्या दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॒ग्रं दे॒वमि॑ष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन्

tasmā udīcyā diśo antardeśādagraṃ devamiṣvāsamanuṣṭhātāramakurvan

हिन्दी अर्थ

पुनस्तान् य्गियां देवा नयन्तु यत॒ आग॑ताः ॥१०॥ ग्रनु) रथ के साय साथ या पीछे पीछे (यन्ति) चलते है, तथा (जनान् श्नु) वरपक्ष के जनों के साथ-साथ या. पीपी (यन्ति) चलते हँ (तान्) उन्हे, के लोग, (पुनः) फिर (नयन्तु) पहुंचा दे, (यतः) जहां जहांसेकिवे भर्थात् विवाहु-यज् मेँ संगत हुए पूजनीय लोगं यर श्रथव्विद-माष्य का० १४। भ्नु० २। घु०र व्याख्या-- वधू जिस रथ पर चद कर पतिगरह की प्रोर जाने लगे चाहिए मन्त १४।१,६१। पतिगृह की भ्रोर कन्या के जाते हए, रथ के

English

Rain months, etc. as above.

अध्याय 15

श्लोक 5.11

उ॒ग्र ए॑नं दे॒व इ॑ष्वा॒स उदी॑च्या दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑न

ugra enaṃ deva iṣvāsa udīcyā diśo antardeśādanuṣṭhātānu tiṣṭhati nainaṃ śarvo na bhavo neśāna

हिन्दी अर्थ

यह पद्धति वरपक् सत्कारं है। तथा जो पूजनीय लोग विवाह मेँ .. भी कन्यापक्ष के नगो क करना चाहिए । हे जाया भ्रौर पति (परिपन्थिन ) गह्स्थ-पथ के विरोषी,- (ये) का विना ६ देते है" वे (मा विदन्) तुम प्राप्त न हो, तुम्है जाने तक नहीं । तुम दोनों (दुम्) दुर्गम पथ को, (सुगेन) सुगम पथ द्वारा (भ्रती- परिपन्थिनः गृहस्थ-पथ के विरोघी ईहै,--काम, क्रो, लोभ, मोह, परस्पर के कलह भ्रादि । पथ का भ्रभिप्राय सडको या १०४८७ से नहीं । पथ के सम्बन्ध मेँ देलो (मन्व १४।१।६३; १४।२।६.) । ये परिपन्थी जब पति-पत्नी पर सवार हो जाते ह, उन पर कावर पालेते ह तब पति- पत्ती विनाराकी भोर पग बढ़ते हँ । सुमति का मागे “सुग” मागं है मन्व .१५२ ।६८, सुगम मागं ह, रौर दुर्मति का मागं दुगं है, दुर्गम है । सुंमति द्वारा दुमंति के विना होजाने पर भ्रराति भ्र्थातु कुजूसी भौर

English

They made the two Autumn months his protectors from the northern region, and Syaita and

अध्याय 15

श्लोक 5.12

नास्य॑ प॒शून् न स॑मा॒नान् हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑

nāsya paśūn na samānān hinasti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

वेषं के भ्राभूषणों .का प्रदगंन. 9५ ७६, सं कायाम वहतुं बरह्मणा गृहैरवौरेण चक्वा मिश्रेण । का० १४। भअनु० २। सू०२ भ्रथविद-माष्य ८५ रक्षको के (कृणोतु) सुपुदं करदे। इ्वशुर श्रादि के सुपुर्द कर दे, ताकि मागं म उन श्राभरुषरों भ्रादिके गुम घर (भ्रा भ्ग्) भराई है! (घाता) जगत् के धारण करने वाले परभेदवर ने (भस्य) इस नारी के लिए (इमम, लोकम्) यह पतिग्रह (दिदेश) (¬ भ्रथवेवेद-भाष्य का० १४। भ्रनु० २। सू०२

English

Naudhasa superintendents.

अध्याय 15

श्लोक 5.13

तस्मै॑ ध्रु॒वाया॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद् रु॒द्रमि॑ष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन्

tasmai dhruvāyā diśo antardeśād rudramiṣvāsamanuṣṭhātāramakurvan

हिन्दी अर्थ

वाली सन्तानो कौ पालना श्रौर रक्षा करने मे समथं पति, तथा (भरिवना उभा) पति के दोनों माता-पिता (ताम्) उस नारी को प्रजया) सन्तानं व्याख्या - वधू जब पतिगृह में प्रवेश करे तब गृहपुरोहित कटे कि यह नारी शिवरूपा है, कल्यांणस्वरूपा है जो कि इस घर में आई है । तथा के कि पति-पत्नी के इस र्म्बन्ध को विधाता ने निरिचत किया है इस जितना किं पति काहै। पतिम तीन गुण होने चाहिए । वहु परमेद्वर को मानने वाला नारी, (नरः) है पौरुषदाक्ति वालो ! (बीजम्) बीज (वपत) बोभ्ो, वीर्याधान करो । (सा) वह नारी (ऋषभस्य) श्रेष्टपति के (रेतः) वीयं को (बिभ्रती) चारणं तथा पोषित. करती हुई. (वः) तुम्हरे लिये १४।१।१ मे मातृशक्तिं को भूमि कहा है । भूमि का श्रथं है, उत्पादनशक्ति बीजात्रप न करना. चाहिए । नन्ध्या में बोजावाप में केवल मोगेच्छा (मूनुस्मृति) । श्रथवा उवैरा = उश+-वरा = महाश्रेष्ठा नारी. । यह नारी

English

The two Autumn months. etc. as above.

अध्याय 15

श्लोक 5.14

रु॒द्र ए॑नमिष्वा॒सो ध्रु॒वाया॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शादनु॑ष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः

rudra enamiṣvāso dhruvāyā diśo antardeśādanuṣṭhātānu tiṣṭhati nainaṃ śarvo na bhavo neśānaḥ

हिन्दी अर्थ

नरः यह शब्द “नु” से उत्पन्न बहुवचन मेँ है, भौर “तर र्द से दाब्दः मानने पर “वपत” मेँ वचनव्यत्यय कर “नरः वपतु का भ्रथं जानना कै श्रनुसार, शरीर भ रस-रक्त-दूघ को प्रवाहित करने वाली नाडियां वाली नारी, वैराग्यप्रवणा होने के कारण, गृहस्थजीवन के लिए सुखकर नहीं हो सकती । तथा केवल उत्पादनक्क्ति वाली नारी, भोगमय जीवन के कारण, गृहस्थ को अधिकं भोगमय बना सकती है । इस लिये नारी मे दोनों शक्तियो का समन्वय होना चाहिए, तभी वह किवास्वरूप हो १. एक काल मँ एक पति की वृष्टि से “ऋछषमस्य रेतः बिश्नती” मेँ ऋष- भस्य मँ एकवचन षयुक्त हृभादहै। बीज भीः निष्फल रहता है । कोई . किसान प्रनुपजाऊ भूमि मेँ बीजावाप नहीं करता । इस भाव को हृदयङ्गत कराने के लिए मन्त्र मेँ उवंरा शाब्द कां प्रयोग हूश्रा है ।

English

They made the two Winter months his protectors from the region of the nadir, and earth and

अध्याय 15

श्लोक 5.15

नास्य॑ प॒शून् न स॑मा॒नान् हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑

nāsya paśūn na samānān hinasti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

“दुग्धं जनयत् द्वारा यह प्रकट किया है कि चिशयुके लिए निज निकट काल मेँ .दुग्धोत्पादक भ्रोषधियों का सेवन भी माताःको करते रहना विज्ञान वाली देवी - ! (इह) ईस गृह म तू (विष्णुः इव) सूयं के सद्द . वाली (प्रजायताम्) तु से सन्तान पदा हो, जोकिं (भगस्य) भगोंसे सम्पन्न पिता की (सुमतौ) सुमति में (असत्) रहे । का० १४ । भ्रनु० २ सू०.२ ग्रथर्ववेद-भाष्य ठर पुरः” ॥ (यजुः ३१।५). मे विराट्" को प्रकृतिरूप तथा परमपुरुष परमेदवर मे भी, वधू को विराट् कहते हुए, पति को गृहस्थ मे म्रधीदवर सूचित किया

English

Agni superintendents. The two Winter months, etc.

अध्याय 15

श्लोक 5.16

तस्मा॑ ऊ॒र्ध्वाया॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शान्म॑हादे॒वमि॑ष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन्

tasmā ūrdhvāyā diśo antardeśānmahādevamiṣvāsamanuṣṭhātāramakurvan

हिन्दी अर्थ

पत्नी श्रौर पति.का होना चाहिए यह भावना “विराट् पद द्वाराः सर" वतीकारूपहै। माताके सुशिक्षिता होने परर बह बच्चों की सच्ची जगत् की परमदेवता रूपटै। विष्ुका भर्थंसू्यंभीदटै जोकि निज धारित कर रहाहै। इसी प्रकारपत्नीकोभी चाहिए कि वह निज वधू “सिनीवाली है । वह सिनी है, घर के खाद्य-पेय सामभ्री की वंह बने, तथा “वाली” भर्थात् केश प्रादि को संवार कर निनी शोभा बनाए रखे । सिनीवाली को निरक्तकार ने "देवपत्नी" कहा है “सिनीवाली

English

They made the two Dewy months his protectors from the region of the zenith, and Heaven

अध्याय 15

श्लोक 5.17

म॒हा॒दे॒व ए॑नमिष्वा॒स ऊ॒र्ध्वाया॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः

mahādeva enamiṣvāsa ūrdhvāyā diśo antardeśādanuṣṭhātānu tiṣṭhati nainaṃ śarvo na bhavo neśānaḥ

हिन्दी अर्थ

लेकर पञ्धतन्मातराभों तक प्रकृति-विृति रूप तथा “विराद् केवल विङंतिरूप है । ९० अथरववेद-माष्य का० १४ भनु २ । सू० ६ रूप प्रति की पत्नी है, श्रासुर तथा तामसः प्रकृति वाले पुरुष की नहीं । इस को इस प्रकार सुशिक्षित करे किवे श्रपने पिता की सुमतिम सदा रहै ताकिंवेदुमंति-मा्गं पर नं चलें । ष नारियों के हृदयो मे शान्ति की लहे (श्रापः) जलवत् शीतल हेनारियों (वः) तुम में से प्रत्येकके 0९ 70ृ€ एङ कालो का - वणा 15 तत्व ४ चह कृणगल् म ॐ १. योक्त ४०७ == रथ का बुध्रा । पति-पत्नी को शदस्य-रथ-के चष मेँ

English

and the Ādityas superintendents.

अध्याय 15

श्लोक 5.18

नास्य॑ प॒शून् न स॑मा॒नान् हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑

nāsya paśūn na samānān hinasti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

का० १४. श्रनु० २1 सू०२ भ्रथर्ववेद-भाष्य ९१ य़ा समुद्र की लहरो का. तथा “उदुहन्तु" द्वारा उन लहर के उठने का निदेश मिलता है । वेद मेँ हृदय को भी “समुद्र'कहा है, यथा-हद्यात्समुदरात् (यजुः १७१९२) तथाः “सिन्धु सिन्धुसृत्याय (अथं २०१११) । इसतिये दायक होना चाहिए,यह भाव द्योतित किया है । मन्त क पूर्वाधं द्वारा नारियों को, तथा उत्तरां द्वारा वर-वघू. या पति-पत्नी को उपदेशा दिया है । हृदय से यदि पति भ्रादिकेप्रति प्रेममयी लहरं उठती ररह तोये प्रेममयी लहर पति श्रादिके लिये बन्धन रूपहो जाती है। यथा “पतिर्बन्धेषु भ्रति, सेवा श्रादि प्रेम-बन्धन.ह। होना । भ्रगुन = म +-शुनम् (सुखनाम, निषं० ३।६) । इन में परस्पर काय-

English

The two Dewy months, etc.

अध्याय 15

श्लोक 5.19

तस्मै॒ सर्वे॑भ्यो अन्तर्दे॒शेभ्य॒ ईशा॑नमिष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन्

tasmai sarvebhyo antardeśebhya īśānamiṣvāsamanuṣṭhātāramakurvan

हिन्दी अर्थ

है। एक “सुख का न होना" श्रौर दसरा दुःख का होना । “सुख कान होना भौर “दुःख का होना-ये दोनों भ्रवस्थाएुं उपादेय नहीं । मनुष्य दुःख .. से तौ सदा रहित होना चाहता है, परन्तु सुखाभाव को भी वह नहीं वाहता । वीरस्देढकामा सं त्वथैषिषीमहि छमनस्यमंना ॥१७॥ श्र भ्रयवेद-भाष्य का० १४। भ्रनु २। सु०२. न पहटंचाने वाली, (गृहेभ्यः) ग्रहवासि्योँ के निये (स्योना) सुखदाय, - (शग्मा) शान्ति देनेवाली, (सुशेवा) उत्तम सेवा करनेवाली, (सुयमा) यम-निय्मौ का उत्तमविधि से पालन करनेवाली, (वीरसरः) वीर सन्तानं . पदा करनेवाली, (देवृकामा) देवरो की शुम कामना करनेवाली, श्रौर संग द्वारा (समू, एधिषीमहि) हम सब वृद्धि प्राप्त करर, बदु ।

English

For him they made the Archer Bhava a deliverer from the inter- mediate space of the eastern

अध्याय 15

श्लोक 5.20

ईशा॑न एनमिष्वा॒सः सर्वे॑भ्यो अन्तर्दे॒शेभ्यो॑ऽनुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः

īśāna enamiṣvāsaḥ sarvebhyo antardeśebhyo'nuṣṭhātānu tiṣṭhati nainaṃ śarvo na bhavo neśānaḥ

हिन्दी अर्थ

तेरी (ईडे) स्तुति करता हं, तेरे सदगु्णो का कथन करता हं । है पत्नी ! . ह, (शून्येषो) तु घर कै .जीवन को शून्य बना देने की एषणा वाली है, (्रराति) है शतररूप श्रापत्ति ! (प्र पत) सीघ्र चली जा, (इह) इस धर मे (मा) न (रंस्थाः) रमण कर । प्रदान सामाजिक जीवन का रातु है लीदन को ढाल सके जो पनी भ्रपने गृहस्थ जीवने के उदेश्य को सम कर, तदनुसार व्यवहार करे, उस गुणवती देती के सद्गु की प्रशंसा पति किया करे । पतनी गृह्यकष्टो तथा भ्रापत्तियों के निरसन के लिये"

English

region. Neither Sarva nor Bhava nor Isāna slays him who possesses this knowledge, or his

अध्याय 15

श्लोक 5.21

नास्य॑ प॒शून् न स॑मा॒नान् हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑

nāsya paśūn na samānān hinasti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

निज उग्रभावनाभों को जागरित रखे । मववा--(निक ते) है मूत्तिमयी भ्रापत्ति ! (इतः) इस घर से गृहात्) भ्रपने घर से (त्वा) तुमे (इडे) निकाल देती हं. (शः ये्री) शून्यता दौड़ जा, भाग जा, (दहं) इस घर में (मा) न (रस्थाः) तू रमण कर । कर ले, (भ्रधा) . तदनन्तर (नारि) .हे नारि! है वषु !. तू (सरस्वत्यं) का० १४। श्रनु० २। सू०र -अथर्गविद-भाष्य ९५ नमस्कार वधू करेःपभ्रौरघरके बुजुगों को भी नमस्कार किया करै । प्रसूतिगरृह में हैनिक भ्रग्निहोत्र

English

cattle, or his kinsmen.

स्रोत: bhavykhatri/DharmicData · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।