अध्याय 15
श्लोक 4.1
१-१८ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१, १३, १६ दैवी जगती; ४, ७, १० प्राजापत्या गायत्री; २, ८ आर्ची अनुष्टुप्; ३, १२ द्विपदा प्राजापत्या जगती; ५ प्राजापत्या पङ्क्तिः, ६ आर्ची गायत्री, ९ भौमार्ची त्रिष्टुप्, ११ साम्नी त्रिष्टुप्, १४ प्राजापत्या बृहती; १५, १८ द्विपदाऽर्ची पङ्क्तिः १७ आर्ची उष्णिक्।तस्मै॒ प्राच्या॑ दि॒शः
1-18 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1, 13, 16 daivī jagatī; 4, 7, 10 prājāpatyā gāyatrī; 2, 8 ārcī anuṣṭup; 3, 12 dvipadā prājāpatyā jagatī; 5 prājāpatyā paṅktiḥ, 6 ārcī gāyatrī, 9 bhaumārcī triṣṭup, 11 sāmnī triṣṭup, 14 prājāpatyā bṛhatī; 15, 18 dvipadā'rcī paṅktiḥ 17 ārcī uṣṇik| tasmai prācyā diśaḥ
हिन्दी अर्थ
छोटे तोते डालियोँ पर बैठे ह । ये फूल वसन्त काल भँ लिलते है । ऋ० १०।८५।२० में सुक्रियुकम् के साथ शल्मलिमू पाठ भी है । चत्मलि का के लिए श्राददं काल फाल्गुन-मास मानां है, जो कि वसन्तकाल है । इसी (निर० १२१८) भे सुकिशुकं भ्रौर शल्मलि के अर्थं निम्नलिखित दिये हँ हामलिभिति” को उपमाथंक कहते हुए “किशुक” का वृक्षरूप तथा पुष्मूप होना भी स्वीकृत किया है 1 इसी प्रकार “शल्मलिः घुशरो भवति, हरवान् व्याख्या- पत्नी जब पितृगरह से पतिगृह की भोर जाने लगे तब - चाहिए, तथा विविध रूपो से रूपित, सुघड़, तथा सुन्दर म्रौर साफ पियो । रथ पर श्रारोहण करे तब उसे कहना चाहिधे कि भ्रव तु इस रथपर
English
answered and said, Let them bring my couch.