Chandogya Upanishad
110
अध्याय 110 / 154

Adhyāya 110

प्रपाठक खण्ड 110

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 110

श्लोक 6.13.1

॥ लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह तथा चकार तँ होवाच यद्दोषा लवणमुदकेऽवाधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद

|| lavaṇametadudake'vadhāyātha mā prātarupasīdathā iti sa ha tathā cakāra tam̐ hovāca yaddoṣā lavaṇamudake'vādhā aṅga tadāhareti taddhāvamṛśya na viveda

हिन्दी अर्थ

रारिदेवो निधिर्वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्या बह्मविदया पराण, वे्दोक्षा वेद॒ ( व्याकरण ), श्राद्धकल्प, ये सब भीनाम ही है तुम नामकी उपासना करो नाम वा छण्वेदो यजुर्वेद ण्वेद नाम ही है, तथा ही है । खतः निस प्रकार विष्णु बरहयेति व्रहमबुद्धया । यथा वुद्धिसे प्रतिमाकी उपासना करते

English

'Place this salt in water, and then wait on me in the morning.' The son did as he was commanded. The father said to him: 'Bring me the salt, which you placed in the water last night.' The son having looked for it, found it not, for, of course, it was melted.

अध्याय 110

श्लोक 6.13.2

यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्तादाचामेति कथमिति लवणमित्यभिप्रास्यैतदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत्संवर्तते तँ होवाचात्र वाव किल तत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति

yathā vilīnamevāṅgāsyāntādācāmeti kathamiti lavaṇamiti madhyādācāmeti kathamiti lavaṇamityantādācāmeti kathamiti lavaṇamityabhiprāsyaitadatha mopasīdathā iti taddha tathā cakāra tacchaśvatsaṃvartate tam̐ hovācātra vāva kila tatsomya na nibhālayase'traiva kileti

हिन्दी अर्थ

स यो नाम ब्रह्मेद्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तक्रस्य कामचारो भवति यो नाम ब्रह्मद्युपा- वह जो कि नामको “यह रहन है' एेसी उपासना करता है उसकी जहोंतक नामकी गति होती है वरहतक यथेच्छ गति हो नाती है, जो कि नामी यह्‌ ब्रहम है रेसी उपा्ना करता दहै । नारद-- वह जो कि "नाम ऋ दहै" एेसी उपासना फरता है उसे जो फर यत्फलं मवति तच्छृणु, -या- । मिरुता है वह सुनो जहतक

English

The father said: 'Taste it from the surface of the water. How is it?' The son replied: 'It is salt.' 'Taste it from the middle. How is it?' The son replied: 'It is salt.' 'Taste it from the bottom. How is it?' The son replied 'It is salt.' The father said Throw it away and then wait on me.' He did so; but salt exists for ever. Then the father said: 'Here also, in this body, forsooth, you do not perceive the True (Sat), my son; but there indeed it is.

अध्याय 110

श्लोक 6.13.3

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच

sa ya eṣo'ṇimaitadātmyamidam̐ sarvaṃ tatsatyam̐ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca

हिन्दी अर्थ

तस्मिन्नामविषयेऽस्य यथाकाम- चारः कामचरणं राज्ञ॒ इव नामकी अपेक्षा वाककरी महता वेदानां वेदं पिन्रयश्राश्ि देवं निधि वाकोवाक्यमेकायनं पदेवजनवि्यां दिवं च एथिवीं च वायुं चाकाशं चापश्च

English

'That which is the subtile essence, in it all that exists has its self. It is the True. It is the Self, and thou, O Svetaketu, art it.' 'Please, Sir, inform me still more,' said the son. 'Be it so, my child,' the father replied.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।