Chandogya Upanishad
111
अध्याय 111 / 154

Adhyāya 111

प्रपाठक खण्ड 111

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 111

श्लोक 6.14.1

॥ यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षमानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत्स यथा तत्र प्राङ्वोदङ्वाधराङ्वा प्रत्यङ्वा प्रध्मायीताभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः

|| yathā somya puruṣaṃ gandhārebhyo'bhinaddhākṣamānīya taṃ tato'tijane visṛjetsa yathā tatra prāṅvodaṅvādharāṅvā pratyaṅvā pradhmāyītābhinaddhākṣa ānīto'bhinaddhākṣo visṛṣṭaḥ

हिन्दी अर्थ

वाक्‌ ही नामसे बढ़कर है; वाक्‌ ही चछग्ेदको विज्ञापित करती पुराण, वेदों के वेद्‌ व््रकरण, श्रद्धकरद्प, गणित, उत्पाता, निधिज्ञान, संगीतशास, चुरोक, प्रथिवी, वायु, आकाश, जर, तेज, देव, मनुष्य, च्यते । कायाद्धि कारणं दृष्टं रोके यथा पुत्रासिपिता तदत्‌ । वाग्बावः-- वाक्‌ यह जिहामूर यथाकामचारो भवति थो वाचं ब्रमस्युपास्तेऽस्ति

English

'As one might lead a person with his eyes covered away from the Gandhâras , and leave him then in a place where there are no human beings; and as that person would turn towards the east, or the north, or the west, and shout, "I have been brought here with my eyes covered, I have been left here with my eyes covered,"

अध्याय 111

श्लोक 6.14.2

तस्य यथाभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद्ग्रामं पृच्छन्पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसम्पद्येतैवमेवेहाचार्यवान्पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्य इति

tasya yathābhinahanaṃ pramucya prabrūyādetāṃ diśaṃ gandhārā etāṃ diśaṃ vrajeti sa grāmādgrāmaṃ pṛcchanpaṇḍito medhāvī gandhārānevopasampadyetaivamevehācāryavānpuruṣo veda tasya tāvadeva ciraṃ yāvanna vimokṣye'tha sampatsya iti

हिन्दी अर्थ

वह नो वाणीकी प्य ब्रह्म है" इस प्रकार उपासना करता है उसकी जहोंतक वाणीकी गति है वर्तकं स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि वाणीकी यह ब्रह द" इस प्रकार उपासना करता है । नारद- वाक्‌ अवेक्षा मनकी श्रेष्ठता मनो वाव वाचो भूयो यथा वे दवे वामलके वा कोठे दवो वाक्षौ सुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नाम्‌ च

English

'And as thereupon some one might loose his bandage and say to him, "Go in that direction, it is Gandhâra, go in that direction;" and as thereupon, having been informed and being able to judge for himself, he would by asking his way from village to village arrive at last at Gandhâra,--in exactly the same manner does a man, who meets with a teacher to inform him, obtain the true knowledge . For him there is only delay so long as he is not delivered (from the body); then he will be perfect .

अध्याय 111

श्लोक 6.14.3

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच

sa ya eṣo'ṇimaitadātmyamidam̐ sarvaṃ tatsatyam̐ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca

हिन्दी अर्थ

मन ही वाणीसे उ्कृष्ट है । जिन्त प्रकार दो ओंवे, दो वेर अथव दो बेढे युद्ीमे आनजाते है उही प्रकार वाक्‌ जौर नामकषा मनर अन्तभवि हो नता है । यह पुरुष निस समथ मनते विचार करता है करणं वाचो भूयः । तद्धि मन- कष्ण वाणीसे उक्ष है 8 वत्तव्य विषयं परसि करता है यच ॒वास्मनन्तभवति तत्तस्य नो निके अन्तर्गत होता £ मन दही भात्मा है; क्योफि मनक रहनेपर दौ आत्माका क्ल. भोक्तृत्व सिद्ध होता है, अन्यधा

English

'That which is the subtile essence, in it all that exists has its self. It is the True. It is the Self, and thou, O Svetaketu, art it.' 'Please, Sir, inform me still more,' said the son. 'Be it so, my child,' the father replied.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।