Chandogya Upanishad
143
अध्याय 143 / 154

Adhyāya 143

प्रपाठक खण्ड 143

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 143

श्लोक 8.4.1

॥ अथ य आत्मा स सेतुर्धृतिरेषां लोकानामसंभेदाय नैतँ सेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दुष्कृतँ सर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्तेऽपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः

|| atha ya ātmā sa seturdhṛtireṣāṃ lokānāmasaṃbhedāya naitam̐ setumahorātre tarato na jarā na mṛtyurna śoko na sukṛtaṃ na duṣkṛtam̐ sarve pāpmāno'to nivartante'pahatapāpmā hyeṣa brahmalokaḥ

हिन्दी अर्थ

तथा निसे भनाशचकायन ८ नष्ट न होना ) क्य नाता है वह भी नह्मचर्ं ही है, वर्यो नते साधक ब्रहमचयके दवारा प्राप्त होता है दह यह आत्मा नष्ट नदी होता । ओर जिसे भरण्यायन पसा कहा जता अथं यदनाश्चकायनमित्याच- ब्रह्मचर्येणालुविन्दते स एष हयास्मा ब्रह्मचय॑साधनवतो न

English

That Self is a bank , a boundary, so that these worlds may not be confounded. Day and night do not pass that bank, nor old age, death, and grief; neither good nor evil deeds. All evil-doers turn back from it, for the world of Brahman is free from all evil.

अध्याय 143

श्लोक 8.4.2

तस्माद्वा एतँ सेतुं तीर्त्वान्धः सन्ननन्धो भवति विद्धः सन्नविद्धो भवत्युपतापी सन्ननुपतापी भवति तस्माद्वा एतँ सेतुं तीर्त्वापि नक्तमहरेवाभिनिष्पद्यते सकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः

tasmādvā etam̐ setuṃ tīrtvāndhaḥ sannanandho bhavati viddhaḥ sannaviddho bhavatyupatāpī sannanupatāpī bhavati tasmādvā etam̐ setuṃ tīrtvāpi naktamaharevābhiniṣpadyate sakṛdvibhāto hyevaiṣa brahmalokaḥ

हिन्दी अर्थ

तद्य एेतावरं च ण्यं चाणवो ब्रह्मरोके ब्रह्मचर्ये उस ग्रह्मरोकमे जो लोग ॒ब्रह्मचर्यके द्वारा इन “भरः जीर “यः दोनों समुदको प्रात करते है उन्दको इस बरह्रोककी प्राप्ति होती है। उनकी सम्पूणं लोकम यथेच्छ गति हो जाती है तत्तत्र ब्रह्मलोक एतावर्णवौ । उस ब्रह्मलोकम जो ये अर ॥ गये है इन्हे जो ह्म चय॑ूप साधनक साधनेनालुविन्दन्ति ये तेषामे- द्वारः भ्रा करते है उन्ीङञो उप

English

Therefore he who has crossed that bank, if blind, ceases to be blind; if wounded, ceases to be wounded; if afflicted, ceases to be afflicted. Therefore when that bank has been crossed, night becomes day indeed, for the world of Brahman is lighted up once for all .

अध्याय 143

श्लोक 8.4.3

तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषाँ सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति

tadya evaitaṃ brahmalokaṃ brahmacaryeṇānuvindanti teṣāmevaiṣa brahmalokasteṣām̐ sarveṣu lokeṣu kāmacāro bhavati

हिन्दी अर्थ

दी प्रकर स्वपनज्ञानकी अपेक्षा जाग्रकार्पे देखे हुए विषर्थोका मिथ्या है, स्वतः नही। सम्पूणं यस्तु हृदय पुण्डरीकगतं यथो- , नो पुरूष ब्रह्मचर्यादि साषनेपे तृष्णाते निवृत्त होकर अपने गुणविशिष्ट ब्रह्मकी उपासना केरा

English

And that world of Brahman belongs to those only who find it by abstinence--for them there is freedom in all the worlds.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।