Matsya Purana
150
अध्याय 150 / 176

Adhyaya 150

242 श्लोकभाग 2/4 · श्लोक 78–150

पूर्ण अध्याय पाठ73 श्लोक

अध्याय 150

श्लोक 78

मुमोच शरवृष्टिं तु तस्मै यक्षाधिपो बली स तं दैत्यः शरव्रातं चिछेद निशितैः शरैः

mumoca śaravṛṣṭiṃ tu tasmai yakṣādhipo balī sa taṃ daityaḥ śaravrātaṃ cicheda niśitaiḥ śaraiḥ

हिन्दी अर्थ

परस्परमनन्वयाः॥ ९३ कारण इन सभीमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध वर्जित है। एते तवोक्ताः प्रवरा द्विजानां नरेश! इस प्रकार मैंने ब्राह्मणोंके वंशप्रवर्तक महानुभावा नृप वंशकाराः। महानुभाव प्रवरोंका वर्णन कर दिया। इन लोगोंके एषां तु नाम्नां परिकीर्तितेन नामोंका कीर्तन करनेसे मानवके सभी पाप नष्ट हो

English

One who gives away a cow in the morning, after passing the night in water, goes to the realm of Varuna. This is (o3) Varntia-Vrata. — 74.

अध्याय 150

श्लोक 79

व्यर्थीकृतां तु तां दृष्ट्वा शरवृष्टिं धनाधिपः शक्तिं जग्राह दुर्धर्षां हेमघण्टाट्टहासिनीम्

vyarthīkṛtāṃ tu tāṃ dṛṣṭvā śaravṛṣṭiṃ dhanādhipaḥ śaktiṃ jagrāha durdharṣāṃ hemaghaṇṭāṭṭahāsinīm

हिन्दी अर्थ

पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ १४ जाते हैं ॥८--१४॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने द्रयधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तनमें अगस्त्यवंश-वर्णन नामक दो सौ दोवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

One V7he gives away a moon of gold at the end of the ChandrAyana ordinance, goes to the realm of the moon. This is (i) Ohandra-Vrata,--75»

अध्याय 150

श्लोक 80

बाहुना रत्नकेयूरकान्तिसंतानहासिना स तां निरूप्य वेगेन कुजम्भाय मुमोच ह

bāhunā ratnakeyūrakāntisaṃtānahāsinā sa tāṃ nirūpya vegena kujambhāya mumoca ha

हिन्दी अर्थ

प्रवरकीर्तनमें धर्मके बंशका वर्णन मत्स्य उवाच मत्स्यभगवानने कहा-राजन्! इस वैवस्वत अस्मिन् वैवस्वते प्राप्ते शृणु धर्मस्य पार्थिव। मन्वन्तरके प्राप्त होनेपर धर्मने दक्षकी कन्याओंके गर्भसे दाक्षायणीभ्यः सकलं वंशं हैवतमुत्तमम्॥ १ जिस उत्तम देव-वंशका विस्तार किया, उसका वर्णन पर्वतादिमहादुर्गशरीराणि नराधिप। सुनिये। नरेश्वर! इस वैवस्वत मन्वन्तरमें धर्मके द्वारा अरुन्धत्याः प्रसूतानि धर्माद् वैवस्वतेऽन्तरे॥ २ अरुन्धतीके गर्भसे पर्वत आदि एवं महादुर्गके समान

English

Ono who gives away cows in the evening, after warming himself with five fires (paficliatapa), on the Stli and the 14th day in the month of Jyai.stha, goes to heaven. This is Rudra-Vrotar- 76.

अध्याय 150

श्लोक 81

सा कुजम्भस्य हृदयं दारयामास दारुणम् वित्तेहा स्वल्पसत्त्वस्य पुरुषस्येव भाविता

sā kujambhasya hṛdayaṃ dārayāmāsa dāruṇam vittehā svalpasattvasya puruṣasyeva bhāvitā

हिन्दी अर्थ

अष्टौ च वसवः पुत्राः सोमपाश्च विभोस्तथा। विशालकाय संतान उत्पन्न हुए तथा उन्हीं सर्वव्यापी धरो श्रुवश्च सोमश्च आपश्चैवानलानिलौ॥ ३ +सि आठ सोमपायी पुत्र उत्पन्न हुए, जो वसु कहलाते हैं। उनके नाम हैं-धर, ध्रुव, सोम, आप, अनल, प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः । हे धरस्य पुत्रो द्रविण: पुत्रो धुवस्य तु॥ ४ अनिल, प्रत्यूष और प्रभास--ये आठ वसु कहे गये हैं। स्य पुत्रा द्र : कालः पुत्रा थु तु धरका पुत्र द्रविण और ध्रुवका पुत्र काल हुआ । नरेश!

English

One who makes a canopy, in a temple of iSiva, on the third day of a month and givs away a cow at the end of the year, goes to the region of iva. This is (55) Bhav/lm-Vrata.— n,

अध्याय 150

श्लोक 82

अथास्य हृदयं भित्त्वा जगाम धरणीतलम् ततो मुहूर्तादस्वस्थो दानवो दारुणाकृतिः

athāsya hṛdayaṃ bhittvā jagāma dharaṇītalam tato muhūrtādasvastho dānavo dāruṇākṛtiḥ

हिन्दी अर्थ

कालस्यावयवानां तु शरीराणि नराधिप। कालके अवयवोंके जितने मूर्तिमान् शरीर हैं, वे सभी मूर्तिमन्ति च कालाद्धि सम्प्रसूतान्यशेषतः॥ ५ कालसे ही उत्पन्न हुए हैं। सोमके प्रभावशाली पत्रको वर्चा सोमस्य भगवान् वर्चाः श्रीमांश्चापस्य कौर्त्यते । और आपके पुत्रको श्रीमान् कहा जाता है। अनेक जन्म अनेकजन्मजननः कुमारस्त्वनलस्य तु॥ ६ धारण करनेवाला कुमार अनलका पुत्र हुआ। अनिलका पुरोजवाश्चानिलस्य प्रत्यूषस्य तु देवलः। पुत्र पुरोजव और प्रत्यूषका पुत्र देवल हुआ। प्रभासका विश्वकर्मा प्रभासस्य त्रिदशानां स वर्धकिः॥ ७ पुत्र विश्वकर्मा हुआ जो देवताओंका बढ़ई है॥ १--७॥ समीहितकराः प्रोक्ता नागवीथ्यादयो नव। नागवीथी आदि नव सन्तति अभीष्टको पूर्ण करनेवाली

English

In the month of Miigha, one who wears wet garments in the night and on the seventh day of the month gives away cows, goes and resides in the* heaven for a kalpa, after whicli he is born as a King. This is (56) Pavana-V rata, — 78.

अध्याय 150

श्लोक 83

जग्राह पट्टिशं दैत्यः प्रांशुं शितशिलामुखम् स तेन पट्टिशेनाजौ धनदस्य स्तनान्तरम्

jagrāha paṭṭiśaṃ daityaḥ prāṃśuṃ śitaśilāmukham sa tena paṭṭiśenājau dhanadasya stanāntaram

हिन्दी अर्थ

है। लम्बाका पुत्र घोष और भानुके पुत्र भानव (बारह ग्रहर्क्षाणां च सर्वेषामन्येषां चामितौजसाम्। आदित्य) कहे गये हैं, जो ग्रहों, नक्षत्रों एवं अन्य सभी मरुत्वत्यां मरुत्वन्तः सर्वे पुत्राः प्रकीर्तिताः॥ ९ अमित ओजस्ियोंमें बढ़-चढ़कर हैं। सभी मरुद्रण संकल्पायाश्च संकल्पस्तथा पुत्रः प्रकीर्तितः। मरुत्वतीके पुत्र हैं तथा संकल्पाका पुत्र संकल्प कहा मुहूर्ताश्च मुहूर्ताया साध्याः साध्यासुताः स्मृताः ॥ १० जाता है। मुहूर्ताके पुत्र मुहूर्त और साध्याके पुत्र साध्यगण मनो मनुश्च प्राणश्च नरोषा नोच वीर्यवान्। चित्तहार्योऽयनश्चैव हंसो नारायणस्तथा

English

One who maintains a fast for three nights and gives away a good

अध्याय 150

श्लोक 84

वाक्येन तीक्ष्णरूपेण मर्मान्तरविसर्पिणा निर्बिभेदाभिजातस्य हृदयं दुर्जनो यथा

vākyena tīkṣṇarūpeṇa marmāntaravisarpiṇā nirbibhedābhijātasya hṛdayaṃ durjano yathā

हिन्दी अर्थ

विभुश्चापि प्रभुश्चैव साध्या द्वादश कीर्तिताः। विश्वायाश्च तथा पुत्रा विश्वेदेवा: प्रकीर्तिताः क्रतुर्दक्षो वसुः सत्यः कालकामो मुनिस्तथा। कुरजो मनुजो वीजो रोचमानश्च ते दश

English

TflE MAT8YA PUR AN AM.

अध्याय 150

श्लोक 85

तेन पट्टिशघातेन धनेशः परिमूर्छितः निपपात रथोपस्थे जर्जरो धूर्वहो यथा

tena paṭṭiśaghātena dhaneśaḥ parimūrchitaḥ nipapāta rathopasthe jarjaro dhūrvaho yathā

हिन्दी अर्थ

एतावदुक्तस्तव धर्मवंशः व्यासेन वक्तुं न हि शक्यमस्ति कहे गये हैं। मन, मनु, प्राण, नरोषा, नोच, वीर्यवान्,

English

house in the month of Plialguna, goes to the domain of ilio Sun. 'rins is (57) Dh&ma-Vrata,—7i).

अध्याय 150

श्लोक 86

तथागतं तु तं दृष्ट्वा धनेशं नरवाहनम् खड्गास्त्रो निरृतिर्देवो निशाचरबलानुगः

tathāgataṃ tu taṃ dṛṣṭvā dhaneśaṃ naravāhanam khaḍgāstro nirṛtirdevo niśācarabalānugaḥ

हिन्दी अर्थ

बारह साध्य कहे गये हैं। विश्वाके पुत्र विश्वेदेव कहे जाते हैं। क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, कालकाम, मुनि, कुरज, मनुज, बीज और रोचमान--ये दस विश्वेदेव हैं। राजवंशश्रेष्ठ ! मैंने आपसे यहाँतक धर्मके वंशका संक्षेपसे वर्णन कर दिया। राजन्! अनेक सैकड़ों वर्षोके बिना इसका विस्तारसे

English

One who adores the Brahmana and his wife with ornaments and gives away cows along with grain, on three evenings, after observing a fast in the day, attains beatitude. This is (58) Indra-Vrata, — 80.

अध्याय 150

श्लोक 87

अभिदुद्राव वेगेन कुजम्भं भीमविक्रमम् अथ दृष्ट्वा तु दुर्धर्षं कुजम्भो राक्षसेश्वरम्

abhidudrāva vegena kujambhaṃ bhīmavikramam atha dṛṣṭvā tu durdharṣaṃ kujambho rākṣaseśvaram

हिन्दी अर्थ

वर्षशतैरनेकैः॥ १४ वर्णन करना सम्भव नहीं है॥८--१४॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे धर्मवंशवर्णने धर्मप्रवरानुकीर्तनं नाम त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके धर्मवंशवर्णनमें धर्म-प्रवरानुकीर्तन नामक दो सौ तीनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

One who gives away a vessel of salt in the name of the moon, on the second day of the bright fortnight, and at the end of the year gives cows to the BrAhmanas, goes to the realm of liva, and at the end of the kalpa becomes the King of Kings. This is (59) Soma-Vrata-Sl.

अध्याय 150

श्लोक 88

चोदयामास सैन्यानि राक्षसेन्द्रवधं प्रति स दृष्ट्वा चोदितां सेनां भल्लनानास्त्रभीषणाम्

codayāmāsa sainyāni rākṣasendravadhaṃ prati sa dṛṣṭvā coditāṃ senāṃ bhallanānāstrabhīṣaṇām

हिन्दी अर्थ

श्राद्धकल्प--पितृगाथा-कीर्तन एतद्वंंशभवा विप्राः श्राद्धे भोज्याः प्रयत्नत: । पितृणां वल्लभं यस्मादेषु श्राद्धं नरेश्वर

English

One who has only one meal a day on each Pratipada (first day of a fortnight), and at the ond of the year give.s away a tawny ol()ured cow (kapila), goes to the domain of Agni. 'I'his is called «S2.

अध्याय 150

श्लोक 89

रथादाप्लुत्य वेगेन भूषणद्युतिभास्वरः खड्गेन कमलानीव विकोशेनाम्बरत्विषा

rathādāplutya vegena bhūṣaṇadyutibhāsvaraḥ khaḍgena kamalānīva vikośenāmbaratviṣā

हिन्दी अर्थ

अतः परं प्रवक्ष्यामि पितृभिर्या: प्रकीर्तिताः। गाथाः पार्थिवशादूंल कामयद्भिः पुरे स्वके अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यः श्राद्धं नित्यमाचरेत्। पयोमूलफलैर्भक्ष्यैस्तिलतोयेन वा पुनः अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं खड्गमांसेन यः सकृत्। श्राद्धं कुर्यात् प्रयत्नेन कालशाकेन वा पुनः

English

One who has only one meal a day (»n tho tenth clay of the month, and after a year gives away ten cows, along witli the images of ten directions made of gold, becomes the lord of the universe. This is c*alle<l lhe(r)(); Vika-Vmta, the destroyer of all ills.

अध्याय 150

श्लोक 90

चिछेद रिपुवक्त्राणि विचित्राणि समन्ततः तिर्यक्पृष्ठमधश्चोर्ध्वं दीर्घबाहुर्महासिना

cicheda ripuvaktrāṇi vicitrāṇi samantataḥ tiryakpṛṣṭhamadhaścordhvaṃ dīrghabāhurmahāsinā

हिन्दी अर्थ

कालशाकं महाशाकं मधु मुन्यन्नमेव च। विषाणवर्जा ये खड्गा आसूर्य तदशीमहि गयायां दर्शने राहोः खड्गमांसेन योगिनाम्। भोजयेत् कः कुलेऽस्माकं छायायां कुञ्जरस्य च

English

One who rends, or relates al)0!i< tlipsn sixty ordinances, remains tht*

अध्याय 150

श्लोक 91

संदष्टौष्ठपुटाटोपभ्रुकुटीविकटाननः प्रचण्डकोपरक्ताक्षो न्यकृन्तद्दानवान्रणे

saṃdaṣṭauṣṭhapuṭāṭopabhrukuṭīvikaṭānanaḥ pracaṇḍakoparaktākṣo nyakṛntaddānavānraṇe

हिन्दी अर्थ

मत्स्यभगवानूने कहा--नरेश्वर ! इन धर्मके वंशमें उत्पन्न हुए विप्रोंको श्राद्धमे प्रयत्नपूर्वक भोजन कराना चाहिए; क्योंकि इन ब्राह्मणोंके सम्बन्धसे किया हुआ श्राद्ध पितरोंको अतिशय प्रिय है। राजसिंह! इसके बाद अब मैं उस गाथाका वर्णन कर रहा हूँ जिसका अपने पुरमें स्थित कामना करनेवाले पितरोंने कथन किया था। क्या हमलोगोंके वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो अधिक एवं शीतल जलवाली नदियोंमें जाकर हमलोगोंको जलाझलि देगा? क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो दूध, मूल, फल और खाद्य सामग्रियोंसे या तिलसहित जलसे नित्य श्राद्ध करेगा? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो वर्षा-ऋतुके

English

lord of OHiidharvaf, for a period of nuo Iiiuulred Mnnvnntnvu.'-Hi

अध्याय 150

श्लोक 92

ततो निःशेषितप्रायां विलोक्य स्वामनीकिनीम् मुक्त्वा कुजम्भो धनदं राक्षसेन्द्रमभिद्रवन्

tato niḥśeṣitaprāyāṃ vilokya svāmanīkinīm muktvā kujambho dhanadaṃ rākṣasendramabhidravan

हिन्दी अर्थ

मघानक्षत्रको त्रयोदशी तिथिको मधु और घीसे मिश्रित दूधमें पका हुआ खाद्य पदार्थ हमें समर्पित करेगा? क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा, जो कालशाकसे श्राद्ध करेगा ? कालशाक, महाशाक, मधु और मुनिजनोंके अनुकूल अन्नोंको हमलोग सूर्यास्तसे पूर्व ही ग्रहण करते हैं। हमारे कुलमें उत्पन्न हुआ कौन व्यक्ति सूर्यग्रहणके अवसरपर अर्थात् राहुके दर्शनकालतक गयातीर्थमें एवं गजच्छायायोगमें योगियोंको फलके गूदेका भोजन करायेगा?

English

Jfwadal I have relavo<\ U) you about d.e sixty ordinances; now let me know what more you desire to liear, which is for the benefit of the world. I shall tell you all. What may 1 not.'ay to my favoured ones?

अध्याय 150

श्लोक 93

लब्धसंज्ञो ऽथ जम्भस्तु धनाध्यक्षपदानुगान् जीवग्राहान्स जग्राह बद्ध्वा पाशैः सहस्रशः

labdhasaṃjño 'tha jambhastu dhanādhyakṣapadānugān jīvagrāhānsa jagrāha baddhvā pāśaiḥ sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

आकल्पकालिकी तृसिस्तेनास्माकं भविष्यति । दाता सर्वेषु लोकेषु कामचारो भविष्यति आभूतसम्प्लवं कालं नात्र कार्या विचारणा । यदेतत्पञ्चकं तस्मादेकेनापि वयं सदा कूपारामतडागानां वापीनां यश्च कारकः

English

flpve enda die one Inmdred and idi-iplev deH'rifdnfj the dit V vninH and their ve.vtJts.

अध्याय 150

श्लोक 94

मूर्तिमन्ति तु रत्नानि विविधानि च दानवाः वाहनानि च दिव्यानि विमानानि सहस्रशः

mūrtimanti tu ratnāni vividhāni ca dānavāḥ vāhanāni ca divyāni vimānāni sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रयायाच्छरणं विष्णुं देवेशं मधुसूदनम् धर्मशास्त्राणि यो दद्याद् विधिना विदुषामपि

English

cnAiTEi} on.

अध्याय 150

श्लोक 95

धनेशो लब्धसंज्ञो ऽथ तामवस्थां विलोक्य तु निःश्वसन्दीर्घमुष्णं च रोषात्ताम्रविलोचनः

dhaneśo labdhasaṃjño 'tha tāmavasthāṃ vilokya tu niḥśvasandīrghamuṣṇaṃ ca roṣāttāmravilocanaḥ

हिन्दी अर्थ

श्राद्धस्य कल्पं मुनिसम्प्रदिष्टम्। पापापहं पुण्यविवर्धनं च लोकेषु मुख्यत्वकरं तथैव इत्येतां पितृगाथां तु श्राद्धकाले तु यः पितृन्।

English

Nandi kerfvara said: — Narada! There cannot be purity of body and mind without balliing, iherofor** to keep the* mind refreshed it is essential to bathe first of all.-~l.

अध्याय 150

श्लोक 96

ध्यात्वास्त्रं गारुडं दिव्यं बाणं संधाय कार्मुके मुमोच दानवानीके तं बाणं शत्रुदारणम्

dhyātvāstraṃ gāruḍaṃ divyaṃ bāṇaṃ saṃdhāya kārmuke mumoca dānavānīke taṃ bāṇaṃ śatrudāraṇam

हिन्दी अर्थ

इन खाद्य पदार्थोसे हमलोगोंको कल्पपर्यन्त तृप्ति बनी रहती है और दाता प्रलयकालपर्यन्त सभी लोकोंमें स्वेच्छानुसार विचरण करता है-इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिए पूर्वकथित. इन पाँचोंमेंसे एकसे भी हमलोग सदा अनन्त तृप्ति प्राप्त करते हे, फिर सभीके द्वारा करनेपर तो कहना ही क्या है? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति उत्पन्न होगा, जो कृष्णमृगचर्मका दान देगा ?

English

"Oin Namo Narayauriya" is the principal mantra, by the recitation of which the tirtlia should be couceived in the water in which hath is lo be taken, whether that water is taken (>ut from the main souyee iejj,, river), or well, tank, etc. '-2.

अध्याय 150

श्लोक 97

प्रथमं कार्मुकात्तस्य निश्चेरुर्धूमराजयः अनन्तरं स्फुलिङ्गानां कोटयो दीप्तवर्चसाम्

prathamaṃ kārmukāttasya niścerurdhūmarājayaḥ anantaraṃ sphuliṅgānāṃ koṭayo dīptavarcasām

हिन्दी अर्थ

क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा नरश्रेष्ठ पैदा होगा, जो ब्राह्मणश्रेष्ठको व्याती हुई गायका दान देगा? क्या हमारे बंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा, जो वृषभका उत्सर्ग करेगा? वह वृष विशेषरूपसे सभी रङ्गोंकी अपेक्षा नील अथवा शुक्ल वर्णका होना चाहिए। क्या हमलोगोंके कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति उत्पन्न होगा, जो श्रद्धासम्पन्न होकर सुवर्ण-दान, गो-दान और पृथ्वीदान करेगा ? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा पुरुषश्रेष्ठ पैदा होगा, जो कूप, बगीचा, सरोवर और बावलियोंका निर्माण करायेगा? क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म ग्रहण करेगा जो सभी प्रकारसे मधु हैत्यके नाशक देवेश भगवान् विष्णुकी शरण ग्रहण करेगा? क्या हमारे कुलमें

English

\Sote.~-{a) Tirtha.— A holy place. A place; of water.

अध्याय 150

श्लोक 98

ततो ज्वालाकुलं व्योम चकारास्त्रं समन्ततः ततः क्रमेण दुर्वारं नानारूपं तदाभवत्

tato jvālākulaṃ vyoma cakārāstraṃ samantataḥ tataḥ krameṇa durvāraṃ nānārūpaṃ tadābhavat

हिन्दी अर्थ

कोई ऐसा प्रतिभाशाली विद्वान् होगा, जो विद्दानोंको विधिपूर्वक धर्मशास्त्रकी पुस्तकोंका दान देगा? भूपाल ! मैंने इस प्रकार आपसे मुनियोंद्वारा कही गयी इस श्राद्धकर्मको विधिका वर्णन कर दिया। यह पापनाशिनी, पुण्यको बढानेवाली एवं संसारमें प्रमुखता प्रदान करनेवाली है। जो श्राद्धके समय पितरोंको यह पितृगाथा सुनाता है उसके पितर दिये गये पदार्थोको अक्षयरूपमें

English

(h) iXamo N{iriiyaii{iy:i.— Salutations to NArriyaiiu,

अध्याय 150

श्लोक 99

अमूर्तश्चाभवल्लोको ह्य् अन्धकारसमावृतः ततो ऽन्तरिक्षे शंसन्ति तेजस्ते तु परिष्कृतम्

amūrtaścābhavalloko hy andhakārasamāvṛtaḥ tato 'ntarikṣe śaṃsanti tejaste tu pariṣkṛtam

हिन्दी अर्थ

श्रावयेत्तस्य पितरो लभन्ते दत्तमक्षयम्॥ १९ करते हैं इति श्रीमत्स्ये महापुराणे पितृगाथाकीर्तनं नाम चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितृगाथानुकीर्तन नामक दो सौ चारवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

(c) This means that a |H*rsoii hathinf' at a woii or risuwhoro- other than in tho sacred waters, Z'b.— the Ganges, Iho Narmada, &f.— if one rocitos tho above formula with devotion and philosophically conceives and invokes tho presence of some sacred tfrtha in his bathing water, his fervent devotion fulfils his object. A good bath in a pure and running stream is essential to refresh tho mind thoroughly. Tho Ganges, tho NarmadH,

अध्याय 150

श्लोक 100

कुजम्भस्तत्समालोच्य दानवो ऽतिपराक्रमः अभिदुद्राव वेगेन पदातिर्धनदं नदन्

kujambhastatsamālocya dānavo 'tiparākramaḥ abhidudrāva vegena padātirdhanadaṃ nadan

हिन्दी अर्थ

विधिना केन धर्मज्ञ दानं दद्याच्च किं फलम् कांस्योपदोहनां राजन् सवत्सां द्विजपुङ्गवे

English

GHAPTEIi Oil. 279

अध्याय 150

श्लोक 101

अथाभिमुखम् आयान्तं दैत्यं दृष्ट्वा धनाधिपः बभूव सम्भ्रमाविष्टः पलायनपरायणः

athābhimukham āyāntaṃ daityaṃ dṛṣṭvā dhanādhipaḥ babhūva sambhramāviṣṭaḥ palāyanaparāyaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

तावद् वै पृथिवी ज्ञेया सशैलवनकानना। प्रसूयमानां यो दद्याद् धेनुं द्रविणसंयुताम् ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना। चतुरन्ता भवेद् दत्ता पृथिवी नात्र संशयः तावत्संख्यं युगगणं देवलोके महीयते

English

iVt*'., arc iindoiiiiledly the bcftfc of the rivers for the purpose from many points of view, and <' Mi.se(xiieiifcly so mnch sanctity is uttaehed to such invigorating streams. A true Aryan is expected to batJie daily in such streams, but every one is not so situated as to liave < he benofit of such a bath daily. Those, therefore, who are not so placed, may bathe as stated above which w'ould fulfil their duty of (mthiiig unavoidably in a place other than a lirtha, fur under the influence of a fervent devotion they will feel as If they were bathing in some sacred waters; and tlio fooling of Sdiictity that attaches in the mind of an Aryan to invigorating 8tr«*ams would lie kept evergreen wdiicli would take him oftener to such tirthas.

अध्याय 150

श्लोक 102

ततः पलायतस्तस्य मुकुटं रत्नमण्डितम् पपात भूतले दीप्तं रविबिम्बमिवाम्बरात्

tataḥ palāyatastasya mukuṭaṃ ratnamaṇḍitam papāta bhūtale dīptaṃ ravibimbamivāmbarāt

हिन्दी अर्थ

उद्धरिष्यत्यसंदेहे नरकाद् भूरिदक्षिणः घृतक्षीरवहाः यत्र तत्र गतिस्तस्य द्रुमाश्चेप्सितकामदाः। गोलोकः सुलभस्तस्य ब्रह्मलोकश्च पार्थिव

English

Briefly speaking, therefore, a man should bathe daily to refresh his mind. He should inithe ill a pure and fresh stream, as far as jiossible, iiarri.ig wiiich he should work op his devotion to help hini in not breaking the ride and in keeping ids mind refreshed and his desire fixed on some sacred stream.]

अध्याय 150

श्लोक 103

शूराणामभिजातानां भर्तर्यपसृते रणात् मर्तुं संग्रामशिरसि युक्तं तद्भूषणाग्रतः

śūrāṇāmabhijātānāṃ bhartaryapasṛte raṇāt martuṃ saṃgrāmaśirasi yuktaṃ tadbhūṣaṇāgrataḥ

हिन्दी अर्थ

कुल्या दधिपायसकर्दमाः। मनुजीने पूछा-- धर्मके तत्त्वोंको जाननेवाले भगवन्! श्रेष्ठ ब्राह्मणको ब्याती हुई गौका दान किस विधिसे देना चाहिए और उस दानसे क्या फल प्राप्त होता है ? मत्स्यभगवान् बोले-राजन्! जिसके सींग सुवर्णजटित हों, खुर चाँदीसे मढे गये हों, जिसकी पूँछ मोतियोंसे सुशोभित हो तथा जिसके निकट काँसेकी दोहनी रखी हो, ऐसी सवत्सा गौका दान श्रेष्ठ ब्राह्मणको

English

iJe shonlcl put on the rings of kussla grass and rinse his mouth with a little water — according to the 'jiresoribiui form — and tlien witli a calm mind he should (;uncei\c within a square, measuring four hands, the sacred tianges and invoke Her there thus: (hinges I Thou art born from

अध्याय 150

श्लोक 104

इति व्यवस्य दुर्धर्षा नानाशस्त्रास्त्रपाणयः युयुत्सवः स्थिता यक्षा मुकुटं परिवार्य तम्

iti vyavasya durdharṣā nānāśastrāstrapāṇayaḥ yuyutsavaḥ sthitā yakṣā mukuṭaṃ parivārya tam

हिन्दी अर्थ

देना चाहिए। ब्याती हुई गायका दान करनेपर महान् पुण्यफल प्राप्त होता है। जबतक बछडा योनिके भीतर रहता है एवं जबतक गर्भको नहीं छोड़ता, तबतक उस गौको वन-पर्वतोंसहित पृथ्वी समझना चाहिए। जो व्यक्ति द्रव्यसहित ब्याती हुई गायका दान देता है, उसने मानो सभी समुद्र, गुफा, पर्वत और जंगलोंके साथ चतुर्दिग्व्याप्त पृथ्वीका दान कर दिया, इसमें संदेह नहीं है। नरेश्वर! उस बछड़ेके तथा गौके शरीरमें जितने रोएँ

English

the foot, of Vi.-nu, tlion art a Viwnii force, and loved by Visiiu, Thou art Vinu-devatii; ward my sins oiV from tiie time of my birth to death. The 3 orores of firthas of heaven, earth and sky are absorbed in Thee, as stated by Vnyu — 3-0.

अध्याय 150

श्लोक 105

अभिमानधना वीरा धनदस्य पदानुगाः तानमर्षाच्च सम्प्रेक्ष्य दानवश्चण्डपौरुषः

abhimānadhanā vīrā dhanadasya padānugāḥ tānamarṣācca samprekṣya dānavaścaṇḍapauruṣaḥ

हिन्दी अर्थ

होते हैं उतने युगोंतक दाता देवलोकमें पूजित होता है। विपुल दक्षिणा देनेवाला मनुष्य निश्चय ही अपने पिता, पितामह तथा प्रपितामहका नरकसे उद्धार कर देता है। वह जहाँ-कहां जाता है, वहाँ उसे दही और पायसरूपी कीचड़से युक्त घृत एवं क्षीरकी नदियाँ प्राप्त होती हैं तथा मनोवाञ्छित फल प्रदान करनेवाले वृक्ष प्राप्त होते रहते हैं। राजन्! उसे गोलोक और ब्रह्मलोक सुलभ हो जाते हैं तथा चन्द्रमुखी, तपाये हुए सुवर्णके समान वर्णवाली, स्थूल नितम्बवाली, पतली कमरसे सुशोभित, कमलनयनी

English

Ganges! the Devas call Thee Xandiiii, Xalini, Daksha, Prithwi, Vihaga, Vitfvakaya, Amriti, Siva, Vidyadhari, Suprasfanta, Visva-prasudini, K.senia, Jahnavi, fJ.inta, Santipradayani; these, too, are lliy epithets; and one who recites these sacred names with true devotion, at the time of liis bath, linds TripathagAmini 'going three ways) Ganga there.'' — (5-8.

अध्याय 150

श्लोक 106

भुशुण्डीं भैरवाकारां गृहीत्वा शैलगौरवाम् रक्षिणो मुकुटस्याथ निष्पिपेष निशाचरान्

bhuśuṇḍīṃ bhairavākārāṃ gṛhītvā śailagauravām rakṣiṇo mukuṭasyātha niṣpipeṣa niśācarān

हिन्दी अर्थ

नलिनाभनेत्रा:ः ॥ ९ स्त्रियाँ निरन्तर उसकी सेवा करती हैं इति श्रीमत्स्ये महापुराणे धेनुदानं नाम पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

jAolr.— Nandiiii.— Lit. gladdening. An epithet i»f the (hinges, for Her waters arc so refreshing and iier How.so pleasing.

अध्याय 150

श्लोक 107

तान्प्रमथ्याथ दनुजो मुकुटं तत्स्वके रथे समारोप्यामररिपुर् जित्वा धनदमाहवे

tānpramathyātha danujo mukuṭaṃ tatsvake rathe samāropyāmararipur jitvā dhanadamāhave

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें धेनु-दान-माहात्म्य नामक दो सौ पाँचवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ कृष्णमृगचर्मके दानकी विधि और उसका माहात्म्य कृष्णाजिनप्रदानस्य विधिकालौ ममानघ।

English

Niiliiii.— Lit. a lotus plant. A place abounding in lotuses. The intoxicating juice of the cocoainit. The Ganges, for Her waters aie so invigorating.

अध्याय 150

श्लोक 108

धनानि रत्नानि च मूर्तिमन्ति तथा निधानानि शरीरिणश्च आदाय सर्वाणि जगाम दैत्यो जम्भः स्वसैन्यं दनुजेन्द्रसिंहः धनाधिपो वै विनिकीर्णमूर्धजो जगाम दीनः सुरभर्तुरन्तिकम्

dhanāni ratnāni ca mūrtimanti tathā nidhānāni śarīriṇaśca ādāya sarvāṇi jagāma daityo jambhaḥ svasainyaṃ danujendrasiṃhaḥ dhanādhipo vai vinikīrṇamūrdhajo jagāma dīnaḥ surabharturantikam

हिन्दी अर्थ

पौर्णमासी तु या माघी ह्याषाढ़ी कार्तिकी तथा कर्तव्यं रुक्मशृङ्गं तद् रौप्यदन्तं तथैव च।

English

Daksa.— Lit. one who moves or acts quickly. The Ganges. I»fcaiise Her stream is so rapid and Her w'atorslinfusc freshness.and vigour so quickly.

अध्याय 150

श्लोक 109

कुजम्भेनाथ संसक्तो रजनीचरनन्दनः मायाममोघामाश्रित्य तामसीं राक्षसेश्वरः

kujambhenātha saṃsakto rajanīcaranandanaḥ māyāmamoghāmāśritya tāmasīṃ rākṣaseśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

रत्नर्गन्धैर्यथाशक्त्या तस्य दिक्षु च विन्यसेत्। कांस्यपात्राणि चत्वारि तेषु दद्याद् यथाक्रमम् यानि कानि च पापानि मया लोभात् कृतानि वै।

English

l»rithivi.— Lit. Iiartli, one of the five elements. The Ganges, because She is so invigorating. There can be no life witliout tive elements, and the life cannot be sustained without there being some vigour.

अध्याय 150

श्लोक 110

मोहयामास दैत्येन्द्रं जगत्कृत्वा तमोमयम् ततो विफलनेत्राणि दानवानां बलानि तु

mohayāmāsa daityendraṃ jagatkṛtvā tamomayam tato viphalanetrāṇi dānavānāṃ balāni tu

हिन्दी अर्थ

मनुजीने पूछा--निष्पाप परमात्मन्! कृष्ण मृगचर्म प्रदान करनेकी विधि, उसका समय तथा कैसे ब्राह्मणको दान देना चाहिए-इसका विधान मुझे बताइये। इस विषयमे मुझे महान् संदेह है मत्स्यभगवान् बोले--राजन् ! वैशाखकी पूर्णिमाको, चन्द्रमा एवं सूर्यके ग्रहणके अवसरपर, माघ, आषाढ़ तथा कार्तिककी पूर्णिमा तिथिमें, सूर्यके उत्तरायण रहनेपर तथा द्वादशी तिथिमें (कृष्णमृगचर्मके) दानका

English

VihagA.— Lit. a bird. An arrow. The Ganges, because she flows so swiftly.

अध्याय 150

श्लोक 111

न शेकुश्चलितं तत्र पदादपि पदं तदा ततो नानास्त्रवर्षेण दानवानां महाचमूम्

na śekuścalitaṃ tatra padādapi padaṃ tadā tato nānāstravarṣeṇa dānavānāṃ mahācamūm

हिन्दी अर्थ

महाफल कहा गया है। जो ब्राह्मण नित्य अग्न्याधान करनेवाला हो उसीको वह दान देना चाहिए। अब जिस प्रकार और जिस विधानसे वह दान देना चाहिए, उसे मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। नरेश्वर! पवित्र स्थानपर गोबरसे लिपी हुई पृथ्वीपर सर्वप्रथम सुन्दर ऊनी वस्त्र बिछाकर फिर खुर और सींगोंसे युक्त उस कृष्णमृगचर्मको बिछा दे। उस मृगचर्मके सींगोंको सुवर्णसे, दाँतोंको चाँदीसे, पूँछको मोतियोंसे अलङ्कत कर उसे तिलोंसे आवृत कर दे। बुद्धिमान् पुरुष उस मृगचर्मको तिलोंसे पूरित कर वस्त्रसे ढक दे। उसकी सुवर्णमय नाभि बनाकर उसे अपनी शक्तिके अनुकूल रत्नों तथा सुगन्धित पदार्थोसे विशेषरूपसे अलङ्कत कर दे। फिर

English

Vis va-KiiyA.— This is a eompouud word inado up of Vi-i'va universe and Kfiya -=GapiUl, abode, Principal, Body. The. expression Visva-kaya Capital, abode, body or' principal (tirtha) of the nni verso, and is an epithet of the Ganges; for she is the Capital of ail the Aryan tirtiias. She is the abode of pious Aryans, who in their lifetime liass their days in contemplation on Her banks and thoir remains] ultimately And an abode ill the sacrod waters. She is tho.principal tirtha oMlie universe. She is the body of the universe, 'in the sense tliat]water is one of the 6 elements in the body: and the water, as such an element, >eans purest water.' The Gauges water being so best can lie compared " with the purest water as one oftlio elements.

अध्याय 150

श्लोक 112

जघान घननीहारतिमिरातुरवाहनाम् वध्यमानेषु दैत्येषु कुजम्भे मूढचेतसि

jaghāna ghananīhāratimirāturavāhanām vadhyamāneṣu daityeṣu kujambhe mūḍhacetasi

हिन्दी अर्थ

क्रमानुसार काँसेके बने हुए चार पात्रोंको उसकी चारों दिशाओंमें रखे। फिर पूर्व आदि दिशाओंमें क्रमशः चार मिट्टीके पात्रोंमें घृत, दुग्ध, दही तथा मधु विधिवत् भर दे। तदुपरान्त चम्पककी एक डाल तथा छिद्ररहित एक कलश बाहर पूर्वकी ओर मङ्गलमय भावनासे स्थापित करे ॥२--१०॥

English

THE MAT8YA PUBANAM.

अध्याय 150

श्लोक 113

महिषो दानवेन्द्रस्तु कल्पान्ताम्भोदसंनिभः अस्त्रं चकार सावित्रम् उल्कासंघातमण्डितम्

mahiṣo dānavendrastu kalpāntāmbhodasaṃnibhaḥ astraṃ cakāra sāvitram ulkāsaṃghātamaṇḍitam

हिन्दी अर्थ

मार्जनके लिये एक सुन्दर महीन पीले वस्त्रका प्रयोग करे तथा धातु-निर्मित पात्र उसके दोनों पैरोंके पास रख दे। तत्पश्चात् ऐसा कहे कि 'मैंने लोभमें पड़कर जिन-जिन पापोंको किया है, वे लौहमय लौहपात्रादिदानेन प्रणश्यन्तु ममाशु वै॥ १२ पात्रादिका दान करनेसे शीघ्र ही नष्ट हो जायँ।' यानि कानि च पापानि कर्मोत्थानि कृतानि च

English

VisvakAya, as one wonl, may also mean produced from the body of tiivA: A f9r Vlnva is and epithet of >.)iva also. It is said that the Ganges fell on the hoad of iiva from tho heaven, and thence she moved on to the w«)rld below, whieli is a simple fact, for tho clouds hang about in the heavens and discharge themselves in form of snows on the lofty poiks of mountains. The KaiiAsa peak in tho IJiiti.iIa'as is the region of perpetual snows> whore the snow being crushed by its own weight tiows downward -, and roaehiiig n certain level is converted into water which in its turn flows onwards in form of a river. Now,KailAsn Is tho abode of 'Siva, and the Ganges has its source in the Ilimalyas near it. The snows of KailAsa being the chief feeder of the rivor.

अध्याय 150

श्लोक 114

विजृम्भत्यथ सावित्रे परमास्त्रे प्रतापिनि प्रणाशमगमत्तीव्रं तमो घोरमनन्तरम्

vijṛmbhatyatha sāvitre paramāstre pratāpini praṇāśamagamattīvraṃ tamo ghoramanantaram

हिन्दी अर्थ

कांस्यपात्रप्रदानेन तानि नश्यन्तु मे सदा। . मधुपूर्णं तु तत् कृत्वा पादे वै दक्षिणे न्यसेत्

English

Ampita,— Lit. irapcrishablc, bonntiful, agreeable, flnal boititude, nectar of im- mortality, beverage of the Gods, sweet An epithet of the Ganges, beeanso she is imperish- able, beautiful, agreeable in tho sense of refreshing. She is considered by the Aryans to bo the giver of Unal beatitude. Her water is sweet and is often compared with I he Xcetar and tho beverage of tho gods.

अध्याय 150

श्लोक 115

ततो ऽस्त्रं विस्फुलिङ्गाङ्कं तमः कृत्स्नं व्यनाशयत् प्रफुल्लारुणपद्मौघं शरदीवामलं सरः

tato 'straṃ visphuliṅgāṅkaṃ tamaḥ kṛtsnaṃ vyanāśayat praphullāruṇapadmaughaṃ śaradīvāmalaṃ saraḥ

हिन्दी अर्थ

तत्रोत्थितं च मे पापं ताम्रपात्रात् प्रणश्यतु ऊर्ध्वपादे त्विमे कार्य ताम्रस्य रजतस्य च। जन्मान्तरसहस्त्रेषु कृतं पापं कुबुद्धिना प्रशस्तपात्रे श्रवणे खुरे शृङ्गाटकानि च। एवं कृत्वा यथोक्तेन सर्वशाकफलानि च

English

yiva.— Lit, flnal beatitude. Born of. iva

अध्याय 150

श्लोक 116

ततस्तमसि संशान्ते दैत्येन्द्राः प्राप्तचक्षुषः चक्रुः क्रूरेण मनसा देवानीकैः सहाद्भुतम्

tatastamasi saṃśānte daityendrāḥ prāptacakṣuṣaḥ cakruḥ krūreṇa manasā devānīkaiḥ sahādbhutam

हिन्दी अर्थ

ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना कृष्णकृष्णाङ्गलो देवः कृष्णाजिन नमोऽस्तु ते

English

Vidyadhari.-"Lit. a class of doini-gods. The Gauges, on."Comit of her purilic properties, is regarded as such.

अध्याय 150

श्लोक 117

शस्त्रैरमर्षान्निर्मुक्तैर् भुजंगास्त्रं विनोदितम् अथादाय धनुर्घोरम् इषूंश्चाशीविषोपमान्

śastrairamarṣānnirmuktair bhujaṃgāstraṃ vinoditam athādāya dhanurghoram iṣūṃścāśīviṣopamān

हिन्दी अर्थ

सुवर्णदानात् त्वददानाद् धूतपापस्य प्रीयताम्। त्रयस्त्रंशत्सुराणां त्वमाधारत्वे व्यवस्थितः फिर काँसेके पात्रको तिलोंसे भरकर बायें पैरके पास रखे और कहे कि “मैंने प्रसङ्गवश जिन-जिन पापोंका आचरण किया है, मेरे वे सभी पाप इस कांस्य-पात्रके दानसे सदाके लिये नष्ट हो जायँ।' फिर ताम्र-पात्रमें मधु भरकर दाहिने पैरके पास रखे और कहे कि 'दूसरेकी निन्दा या चुगुली करने अथवा किसी अवैध मांसका भक्षण करनेसे उत्पन्न हुआ मेरा पाप इस ताम्र-पात्रका दान करनेसे नष्ट हो जाय।' “कन्या और गौके लिये मिथ्या

English

SuprasAiitA— The giver of traiupiiliiy. Serene.

अध्याय 150

श्लोक 118

कुजम्भो ऽधावत क्षिप्तं रक्षोराजबलं प्रति राक्षसेन्द्रस्तम् आयान्तं विलोक्य सपदानुगः

kujambho 'dhāvata kṣiptaṃ rakṣorājabalaṃ prati rākṣasendrastam āyāntaṃ vilokya sapadānugaḥ

हिन्दी अर्थ

कहनेसे तथा परकीय स्त्रीका स्पर्श करनेसे जो पाप उत्पन्न हुआ हो, मेरा वह पाप चाँदीके पात्रदानसे शीघ्र ही नष्ट हो जाय।' चाँदी तथा ताँबेके बने हुए पात्रोको पैरके ऊपरी भागमें रखना चाहिए। “जनार्दन! मैंने अपनी दुष्ट बुद्धिके द्वारा हजारों जन्मोंमें जो पाप किया है उसे आप सुवर्णपात्रके दानसे शीघ्र ही नष्ट कर दें।' यह मन्त्र सुवर्णपात्र दान करते समय कहे। उस समय सुवर्ण, मोती, मूँगा, अनार और बिजौरा नींबूको अच्छे पात्रमें

English

Visv.1 Prasadini.— The ]nirifter of the universe.

अध्याय 150

श्लोक 119

विव्याध निशितैर्बाणैः क्रूराशीविषभीषणैः तदादानं च संधानं न मोक्षश्चापि लक्ष्यते

vivyādha niśitairbāṇaiḥ krūrāśīviṣabhīṣaṇaiḥ tadādānaṃ ca saṃdhānaṃ na mokṣaścāpi lakṣyate

हिन्दी अर्थ

रखकर उस मृगचर्मके कान, खुर और सींगपर स्थापित कर दे। यथोक्त विधिके अनुसार ऐसा करके सभी प्रकारके शाक-फलोंको भी रख दे। महीपते ! तत्पश्चात् जो ब्राह्मणश्रेष्ठ प्रतिग्रहकी विधिका ज्ञाता, विद्वान् और अग्न्याधान करने- वाला हो तथा स्नानके पश्चात् दो सुन्दर वस्त्रको धारणकर अपनी शक्तिके अनुसार अलंकृत भी हो, ऐसे ब्राह्मणको उस मृगचर्मके पुच्छदेशमें दान देनेका विधान है। उस समय उसके समीप इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिए। जो 'कृष्णाजिनेति०'-इस मन्त्रका उच्चारण कर कृष्णमृगचर्म, सुवर्ण, मधु और घृत ब्राह्मणको दान करता है, वह सभी दुष्कर्मोसे छूट जाता है

English

Ksenia.— The giver of liappinos and comfort.

अध्याय 150

श्लोक 120

चिछेदास्य शरव्रातान् स्वशरैर् अतिलाघवात् ध्वजं परमतीक्ष्णेन चित्रकर्मामरद्विषः

cichedāsya śaravrātān svaśarair atilāghavāt dhvajaṃ paramatīkṣṇena citrakarmāmaradviṣaḥ

हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य खुर तथा सींगसहित कृष्णमृगचर्मको तिलोंसे ढककर एवं सभी प्रकारके वस्त्रोंसे अलङ्कूत कर विशेषतया विशाखा नक्षत्रसे युक्त वैशाखमासकी पूर्णिमा तिथिको दान करता है, उसने निःसंदेह समुद्रों, गुफाओं, पर्वतों एवं जंगलोंसमेत सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका दान कर दिया। कृष्णाजिन! तुम कृष्णस्वरूपधारी देवता हो, तुम्हें नमस्कार है। सुवर्णदान तथा तुम्हारे दानसे जिसके समस्त पाप नष्ट हो गये हैं, ऐसे मुझपर तुम प्रसन्न हो

English

JAhnavt. -The Gauges, when brought down trom U} tbt! aiistoHtie.'s of

अध्याय 150

श्लोक 121

सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् कुजम्भः कर्म तद्दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य संयुगे

sārathiṃ cāsya bhallena rathanīḍādapātayat kujambhaḥ karma taddṛṣṭvā rākṣasendrasya saṃyuge

हिन्दी अर्थ

जाओ। कृष्णाजिन! तुम तैंतीस देवताओंके आधार-स्वरूप तुम्हें प्रणाम है। पुनः वृषभध्वज शंकर मुझपर प्रसन्न हो जायँ--इस भावनासे सुवर्णयुक्त नाभिवाले मृगचर्मका दान कृष्णः कृष्णगलो देवः कृष्णाजिनधरस्तथा। तद्दानाद््धतपापस्य प्रीयतां वृषभध्वजः॥

English

Bhiigirathai Wins forced telliw over earth lo follow him lo the lower ngiops. In its course it inundated the sacrifici.'il ground of the King Jahim who got very much vo seek and swallowed tho stream; but his wrath wms appeas *d by rhe prayers of the Gods, sages and BhAgiratha, and ho discliargod the current Irom fiis ca' s. TIkj Ganges i.s therefore regarded as Ills duugliter and is called Julmvi,

अध्याय 150

श्लोक 122

रोषरक्तेक्षणयुतो रथादाप्लुत्य दानवः खड्गं जग्राह वेगेन शरदम्बरनिर्मलम्

roṣaraktekṣaṇayuto rathādāplutya dānavaḥ khaḍgaṃ jagrāha vegena śaradambaranirmalam

हिन्दी अर्थ

तं दाने श्राद्धकाले च दूरतः परिवर्जयेत्। स्वगृहात् प्रेष्य तं विप्रं मङ्गलस्नानमाचरेत् ततो मण्डलमाविशेत् कृत्वा देवान् प्रदक्षिणम्

English

'iaiiti-pradayiui=Tho giver of peace.

अध्याय 150

श्लोक 123

चर्म चोदयखण्डेन्दुदशकेन विभूषितम् अभ्यद्रवद्रणे दैत्यो रक्षो ऽधिपतिमोजसा

carma codayakhaṇḍendudaśakena vibhūṣitam abhyadravadraṇe daityo rakṣo 'dhipatimojasā

हिन्दी अर्थ

मार्जयेन्मुक्तिकामं तु ब्राह्मणेन घटेन वै श्रीकामं वैष्णवेनेह कलशेन तु पार्थिव। राज्यकामं तथा मूर्धि ऐन्द्रेण कलशेन तु द्रव्यप्रतापकामं तु आग्नेयघटवारिणा। मृत्युञ्जयविधानाय याम्येन कलशेन तु

English

Nflnta=The poaceful,

अध्याय 150

श्लोक 124

तं रक्षो ऽधिपतिः प्राप्तं मुद्गरेणाहनद्धृदि स तु तेन प्रहारेण क्षीणः संभ्रान्तमानसः

taṃ rakṣo 'dhipatiḥ prāptaṃ mudgareṇāhanaddhṛdi sa tu tena prahāreṇa kṣīṇaḥ saṃbhrāntamānasaḥ

हिन्दी अर्थ

ततस्तु तिलकं कार्य ब्राह्मणेभ्यस्तु दक्षिणाम्। दत्त्वा तत्कर्मसिद्धयर्थ ग्राह्माऽऽशीस्तु विशेषत: सर्वाल्लोकांश्च जयति कामचारी विहङ्गवत्

English

< ino slioiiltl linlfi water in ilie iia!]*i.<,;iinl aller 7 liniois reeitiri rlie mantra inoiitinnefl.sprinLIc ii on liis -I,.1 an>l 7 times

अध्याय 150

श्लोक 125

तस्थावचेष्टो दनुजो यथा धीरो धराधरः स मुहूर्तं समाश्वस्तो दानवेन्द्रो ऽतिदुर्जयः

tasthāvaceṣṭo danujo yathā dhīro dharādharaḥ sa muhūrtaṃ samāśvasto dānavendro 'tidurjayaḥ

हिन्दी अर्थ

करना चाहिए। जो श्यामवर्ण, कृष्णकण्ठ तथा कृष्णचर्म धारण करनेवाले देवता हैं, आपके दानसे पापशून्य हुए मुझपर वे शंकर प्रसन्न हों। राजन्! उपर्युक्त विधिसे कृष्णमृगचर्मका दान देनेके पश्चात् उस प्रतिगृहीता ब्राह्मणका स्पर्श नहीं करना चाहिए; क्योंकि वह (श्मशानस्था अस्पृश्या) चिताके खूँटेके समान हो जाता है। उसका श्राद्ध और दानके समय दूरसे ही परित्याग कर देना चाहिए। उस ब्राह्मणको अपने घरसे विदाकर फिर मङ्गलस्नान करनेका विधान है॥ २३--३० ॥

English

and then bathe, after nihhino some earth on liis body vitll proper invoka- tion thus; —9.

अध्याय 150

श्लोक 126

रथमारुह्य जग्राह रक्षो वामकरेण तु केशेषु निरृतिं दैत्यो जानुनाक्रम्य धिष्ठितम्

rathamāruhya jagrāha rakṣo vāmakareṇa tu keśeṣu nirṛtiṃ daityo jānunākramya dhiṣṭhitam

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र! तत्पश्चात् आचार्य चम्पककी शाखासे युक्त जलपूर्ण कलशके जलसे दाताके मस्तकपर ' आप्यायस्व समुद्रज्येष्ठा० ' आदि सोलह ऋचाओंसे अभिषेचन करे, तब वह दो बिना फटे वस्त्रोंको पहनकर आचमन करके पवित्र होता है। पुनः उस वस्त्रको कलशमें डालकर उसे चौराहेपर फेंक दे। इसके बाद देवताओंकी प्रदक्षिणा कर मण्डपमें प्रवेश करे। तदनन्तर ब्राह्मण उस पीत वस्त्रधारी सपत्नीक यजमानका मार्जन करे। यदि

English

"() Kartli I irofhlcn by the.VrfvalvMiiti. and the chariid

अध्याय 150

श्लोक 127

ततः खड्गेन च शिरश् छेत्तुमैच्छदमर्षणः तस्मिंस्तदन्तरे देवो वरुणो ऽपांपतिर्द्रुतम्

tataḥ khaḍgena ca śiraś chettumaicchadamarṣaṇaḥ tasmiṃstadantare devo varuṇo 'pāṃpatirdrutam

हिन्दी अर्थ

यजमान मुक्तिकी इच्छा रखता हो तो ब्राह्मणसम्बन्धी घटसे उसका मार्जन करे। राजन्! यदि यजमान लक्ष्मीका अभिलाषी हो तो विष्णुसम्बन्धी कलशके जलसे उसका मार्जन करे। यदि राज्यकी कामना हो तो इन्द्रसम्बन्धी कलशके जलसे यजमानके मस्तकपर अभिषेक करे। द्रव्य और प्रतापकी कामना करनेवाले यजमानका अग्निसम्बन्धी कलशके जलसे सिंचन करे। मृत्युपर विजय पानेके विधानके लिये यमसम्बन्धी कलशके जलसे अभिषेक करे। तत्पश्चात् यजमानको तिलक लगाये। दाता ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर कृष्णमृगचर्म-दानकी सिद्धिके लिये उनसे विशेष रूपसे आशीर्वाद ग्रहण करे

English

{liath.akrauti' and belonging l<i rhe liase of the temple of \'i.smi iVksiiu- kranti) dispel my sins stored from generations." -IG.

अध्याय 150

श्लोक 128

पाशेन दानवेन्द्रस्य बबन्ध च भुजद्वयम् ततो बद्धभुजं दैत्यं विफलीकृतपौरुषम्

pāśena dānavendrasya babandha ca bhujadvayam tato baddhabhujaṃ daityaṃ viphalīkṛtapauruṣam

हिन्दी अर्थ

नृपतिश्रेष्ठ! इसके करनेसे जो तुष्टि प्राप्त होती है, उसका वर्णन करनेकी शक्ति यद्यपि देवताओंमें भी नहीं है तथापि मैं संक्षेपमें बतला रहा हूँ, सुनिये। वह दाता निश्चय ही समग्र पृथ्वीके दानका फल प्रात करता है, सभी लोकोंको जीत लेता है, पक्षीके समान सर्वत्र स्वेच्छानुसार विचरण करता है, महाप्रलयकालपर्यन्त निःसंदेह स्वर्गलोकमें स्थित रहता है, पिता पुत्रकी मृत्यु और पत्नीके वियोगको नहीं देखता ।

English

"OKarth! Kvi>na hast dn- Thoc out by assuming? the form of the wild boar with a Imndred hands. Thou art tlio (doinent employed wlien empowered by tlie mantra of Kurfyapu in tho creation of all beings, by BrahniA. By your contact (as yon oncirclo my body) purify my body of all sins.— 11.

अध्याय 150

श्लोक 129

ताडयामास गदया दयामुत्सृज्य पाशभृत् स तु तेन प्रहारेण स्रोतोभिः क्षतजं वमन्

tāḍayāmāsa gadayā dayāmutsṛjya pāśabhṛt sa tu tena prahāreṇa srotobhiḥ kṣatajaṃ vaman

हिन्दी अर्थ

८० मत्स्यपुराण उसे मर्त्यलोकमें कहीं भी धन और देशके परित्यागका अवसर नहीं प्राप्त होता। जो मनुष्य समाहितचित्त हो कुलीन ब्राह्मणको श्रीकृष्णकी प्रिय वस्तु कृष्ण- डला द्विजेन््राय समाहितात्मा। मृगचर्मका दान करता है वह कभी मृत्युकी चिन्तासे यथोक्तमेतन्मरणं न शोचेत् शोकग्रस्त नहीं होता और अपने मनके अनुकूल सभी

English

Kai'th, in iboe- are all things. Thou givest us nourisIiinoMt. Thou art the source of all lokas (worlds'-. I salute Thee."--!!?.

अध्याय 150

श्लोक 130

दधार रूपं मेघस्य विद्युन्मालालतावृतम् तदवस्थागतं दृष्ट्वा कुजम्भं महिषासुरः

dadhāra rūpaṃ meghasya vidyunmālālatāvṛtam tadavasthāgataṃ dṛṣṭvā kujambhaṃ mahiṣāsuraḥ

हिन्दी अर्थ

प्राप्नोत्यभोष्टं मनसः फलं तत् ॥ ४१ फलोंको प्राप्त कर लेता है॥ ३८--४१॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कृष्णाजिनप्रदानं नाम षडधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कृष्णमृगचर्मप्रदान नामक दो सौ छठा अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

After thus taking his bath, one should again rinse his mouth and change his clothes, putting on white garments and present libations of water as folloAvs 13.

अध्याय 150

श्लोक 131

व्यावृत्तवदने ऽगाधे ग्रस्तुमैच्छत् सुरावुभौ निरृतिं वरुणं चैव तीक्ष्णदंष्ट्रोत्कटाननः

vyāvṛttavadane 'gādhe grastumaicchat surāvubhau nirṛtiṃ varuṇaṃ caiva tīkṣṇadaṃṣṭrotkaṭānanaḥ

हिन्दी अर्थ

उत्सर्ग किये जानेवाले वृषके लक्षण, वृषोत्सर्गका विधान और उसका महत्त्व मनोहराकृतिं सौम्यां सुप्रमाणामनुद्धताम् सप्तचतुर्दशदन्ता तथा वा श्यामतालुका

English

on AFTER on.

अध्याय 150

श्लोक 132

तावभिप्रायमालक्ष्य तस्य दैत्यस्य दूषितम् त्यक्त्वा रथपथं भीतौ महिषस्यातिरंहसा

tāvabhiprāyamālakṣya tasya daityasya dūṣitam tyaktvā rathapathaṃ bhītau mahiṣasyātiraṃhasā

हिन्दी अर्थ

षडुन्नताः के भगवन् के च पञ्च समायताः। मनुजीने कहा-भगवन्! अब मैं उत्सर्ग किये जानेवाले वृषभके लक्षणों, वृषोत्सर्गकी विधि और वृषोत्सर्गसे प्राप्त होनेवाले महान् पुण्यफलको सुनना चाहता हुँ

English

•"Pevas, Yakgas, NAgas, Ganrlharvas, Apsarsis, Aaiiras, ferocious.Herpents, auparnaa {a class of bird like beings of a semi-Divine characteiM, trees, jackals Ac., the beings living in the air, the beings living in "valer. the beings traversing in the sk}', the beings without any one to offer them libations, the pious ones, I offer you all these libations." Libations to the Devas should be made with the sacred thread on the right shoulder. --15.

अध्याय 150

श्लोक 133

भृशं द्रुतौ जवाद् दिग्भ्याम् उभाभ्यां भयविह्वलौ जगाम निरृतिः क्षिप्रं शरणं पाकशासनम्

bhṛśaṃ drutau javād digbhyām ubhābhyāṃ bhayavihvalau jagāma nirṛtiḥ kṣipraṃ śaraṇaṃ pākaśāsanam

हिन्दी अर्थ

मत्स्यभगवान् बोले-राजन्! सर्वप्रथम धेनुकी परीक्षा करनी चाहिए। जो सुशीला, गुणवती, अविकृत अङ्गोवाली, मोटी-ताजी, जिसके बछडे जीते हों, रोगरहित, अर्थात् मध्यम कदवाली, अचञ्चल, भँवरीवाली, विशेषतः दाहिनी ओरको भँवरियाँ दाहिनी ओर और बायीं ओरकी हुए लाल होठोंवाली, लाल गलेसे सुशोभित, काली एवं

English

Then libations should be oUerod with devotion to the manes, sons of Brahma and the Riijts. "Sannka, Sananda, Sanitana, Kapila, Bodhn, Pancharfikha, receive and l)o gratified with the libations T offer you."- 16-17.

अध्याय 150

श्लोक 134

क्रुद्धस्तु महिषो दैत्यो वरुणं समभिद्रुतः तमन्तकमुखासक्तम् आलोक्य हिमवद्द्युतिः

kruddhastu mahiṣo daityo varuṇaṃ samabhidrutaḥ tamantakamukhāsaktam ālokya himavaddyutiḥ

हिन्दी अर्थ

निर्मल नेत्रोंवाली, सुदृढ़ एवं सटे हुए खुरोंवाली, वैदूर्य, मधु अथवा जलके बुद्बुदके समान रंगोंबाली, लाल चिकने नेत्र और लाल कनीनिकासे युक्त, इक्कीस दाँत और श्यामवर्णके तालुसे सम्पन्न हो, जिसके छः स्थान विस्तृत तथा बगल और ऊरु देश सुन्दर हों, वह गौ शुभ लक्षणोंसे युक्त मानी गयी है

English

Afterwards, i\fari(']]i, Alri, Angira, Pulastya, Piilaha, Kratu, Prachelfi, Vaiistha, Bhrigu, iS'.bada, Devarsis and Brahmarsis shoiTld be offered libations with uncooked riee and water. — 18.

अध्याय 150

श्लोक 135

चक्रे सोमास्त्रनिःसृष्टं हिमसंघातकण्टकम् वायव्यं चास्त्रमतुलं चन्द्रश्चक्रे द्वितीयकम्

cakre somāstraniḥsṛṣṭaṃ himasaṃghātakaṇṭakam vāyavyaṃ cāstramatulaṃ candraścakre dvitīyakam

हिन्दी अर्थ

मनुने पूछा-भगवन्! आपने जो यह बतलाया कि गौओंके छः स्थान उन्नत, पाँच स्थान सम तथा आठ स्थान आयत होने चाहिए, वे शुभदायक स्थान कौन- आयताश्च तथैवाष्टौ धेनूनां के शुभावहाः॥ ९ कौन हैं ? कर्णौ नेत्रे ललाटं च पञ्च भास्करनन्दन। समायतानि शस्यन्ते पुच्छं सास्ना च सक्थिनी

English

'I'lien, with the sacred thread on the left shoulder and reclining on the left knee the Pitris, Agnisvata, Sanmvit, Havismanta, Umapa, Suk&lina, Barhisada, and Ajyapa, should be offered libations with water, seRamnni and sandal, &c.~l9-2().

अध्याय 150

श्लोक 136

वायुना तेन चन्द्रेण संशुष्केण हिमेन च व्यथिता दानवाः सर्वे शीतोच्छिन्ना विपौरुषाः

vāyunā tena candreṇa saṃśuṣkeṇa himena ca vyathitā dānavāḥ sarve śītocchinnā vipauruṣāḥ

हिन्दी अर्थ

मल्लिकाक्षश्च मोक्तव्यो गृहेऽपि धनधान्यदः पृथुकर्णो महास्कन्धः श्लक्ष्णरोमा च यो भवेत्। रक्ताक्षः कपिलो यश्च रक्तशृङ्खतलो भवेत्

English

After reciting the names which are synonyms of Yama,?'?>., Dhanna- raja, Mfityu, Antaka, Vaivaswata, Kala, SarvahhQtaksaya, Audunnbara, Dadhna, Nila, Paraniethi, Vfikodara, Chitra and Chitragupta libations.should be offered to him; and then after holding the Kiirfa in hand as jirescribed, libations to the manes should be otiered by the wise.— 21-22.

अध्याय 150

श्लोक 137

न शेकुश्चलितुं पद्भ्यां नास्त्राण्यादातुमेव च महाहिमनिपातेन शस्त्रैश्चन्द्रप्रचोदितैः

na śekuścalituṃ padbhyāṃ nāstrāṇyādātumeva ca mahāhimanipātena śastraiścandrapracoditaiḥ

हिन्दी अर्थ

काञ्चनाभेन वैश्यस्य कृष्णेनाप्यन्त्यजन्मनः। यस्य प्रागायते भृङ्गे भ्रूमुखाभिमुखे सदा करटः पिङ्गलश्चैव श्वेतपादस्तथैव च आकर्णमूलं श्वेतं तु मुखं यस्य प्रकाशते।

English

After reciting the names and the gotras of fathers and maternal grandfathers, libations should be otiered to them, after which the following mantra should be uttered with devotion: — 23.

अध्याय 150

श्लोक 138

गात्राण्यसुरसैन्यानाम् अदह्यन्त समन्ततः महिषो निष्प्रयत्नस्तु शीतेनाकम्पिताननः

gātrāṇyasurasainyānām adahyanta samantataḥ mahiṣo niṣprayatnastu śītenākampitānanaḥ

हिन्दी अर्थ

मत्स्यभगवानने कहा--पृथ्वीपते! छाती, पीठ, सिर, दोनों कोख तथा कमर-- इन छः उन्नत स्थानोंवाली धेनुओंको विज्ञलोग श्रेष्ठ मानते हें । सूर्यपुत्र! दोनों कान, दोनों नेत्र तथा ललाट--इन पाँच स्थानोंका सम-आयत होना प्रशंसित है। पूँछ, गलकम्बल, दोनों सक्थियाँ (घुटनोंसे नीचेके भाग) और चारों स्तन-ये आठ तथा सिर और गर्दन-ये दो मिलाकर दस स्थान आयत होनेपर श्रेष्ठ माने गये हैं। भूपते! ऐसी सर्वलक्षणसम्पन्न

English

" Those who may be my kith and kin, those who may have been my kith and kin in some other previous birth, may feel gratified by the libations that 1 offer them." — 24.

अध्याय 150

श्लोक 139

कक्षावालम्ब्य पाणिभ्याम् उपविष्टो ह्यधोमुखः सर्वे ते निष्प्रतीकारा दैत्याश्चन्द्रमसा जिताः

kakṣāvālambya pāṇibhyām upaviṣṭo hyadhomukhaḥ sarve te niṣpratīkārā daityāścandramasā jitāḥ

हिन्दी अर्थ

धेनुके शुभ लक्षणोंसे युक्त बछड़ेकी भी परीक्षा करनी चाहिए। जिसका कंधा और ककुद् ऊँचा हो, पूँछ और गलेका कम्बल (चमड़ा) कोमल हो, कटितट और स्कन्ध विशाल हो, वैदूर्य मणिके समान नेत्र हों, सींगोंका अग्रभाग प्रबाल (मूँगे)-के सदृश हो, पूँछ लम्बी तथा हों तथा मल्लिका-पुष्पोंकी तरह श्वेत आँखें हों, ऐसे वृषका उत्सर्ग करना चाहिए, उसके गृहमें रहनेसे भी धन-धान्यकी वृद्धि होती है

English

After this, the devotee should again rinse his mouth and draw the figure of a lotus in front of him on which libations of water (arghya), mixed with imcooked rice, flowers and red sandal should be offered to the Sun, after which His (Sun'sj names should be recited. — 25.

अध्याय 150

श्लोक 140

रणेच्छां दूरतस्त्यक्त्वा तस्थुस्ते जीवितार्थिनः तत्राब्रवीत्कालनेमिर् दैत्यान्कोपेन दीपितः

raṇecchāṃ dūratastyaktvā tasthuste jīvitārthinaḥ tatrābravītkālanemir daityānkopena dīpitaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणके लिये ताम्रके समान लाल अथवा कपिल वर्णका वृषभ उत्तम है। जो सफेद, लाल, काला, भूरा, पाटल, पूरा ऊँचा लाल पीठवाला, पाँच प्रकारके रोएँसे चितकबरा, स्थूल कानोंवाला विशाल कंधेसे युक्त, चिकने रोमोंवाला, लाल आँखोंवाला, कपिल, सींगका निचला

English

salute Thee, 0 Sun! Thou art Visiui. Thou art the mouth of Viuu. Thou hast thousands of rays. Thou art full of lustre and potency." — 26.

अध्याय 150

श्लोक 141

भो भोः शृङ्गारिणः शराः सर्वे शस्त्रास्त्रपारगाः एकैको ऽपि जगत्सर्वं शक्तस्तुलयितुं भुजैः

bho bhoḥ śṛṅgāriṇaḥ śarāḥ sarve śastrāstrapāragāḥ ekaiko 'pi jagatsarvaṃ śaktastulayituṃ bhujaiḥ

हिन्दी अर्थ

हो, ऐसा वृषभ ब्राह्मणके लिये श्रेष्ठ कहा गया है। लाल रंगके चिकने रोमवाला वृषभ क्षत्रिय जातिके लिये, सुवर्णके समान वर्णवाला वृषभ वैश्यके लिये और काले रंगका वृष शूद्रके लिये उत्तम माना गया है। जिस वृषभके सींग आगेकी ओर विस्तृत तथा भौहें मुखकी ओर झुकी हों, वह सभी वर्णोके लिये सर्वार्थ-सिद्ध करनेवाला होता है। बिलावके समान पैरोंवाला, कपिल या पीले रंगका मिश्रित वृषभ धन्य होता है। श्वेत रंगका, बिल्लीके समान पैरवाला और मणिके समान आँखोंवाला वृषभ धन्य है। कौवेके समान काले और पीले रंगवाला तथा श्वेत पैरोंवाला वृष धन्य है। जिसके सभी पैर अथवा दो पैर श्वेतवर्णके हों और जिसका रंग कपिञ्जल अथवा

English

" 0 iSiva! 0 Lord of all, 0 Father of all! I salute Thee. 0 Lord of the univerae, whose body is painted with sandal, I salute Thee." — 27.

अध्याय 150

श्लोक 142

एकैको ऽपि क्षमो ग्रस्तुं जगत्सर्वं चराचरम् एकैकस्यापि पर्याप्ता न सर्वे ऽपि दिवौकसः

ekaiko 'pi kṣamo grastuṃ jagatsarvaṃ carācaram ekaikasyāpi paryāptā na sarve 'pi divaukasaḥ

हिन्दी अर्थ

तीतरके समान हो, वह भी धन्य है जिस वृषभका मुख कानतक श्वेत दिखायी पड़ता हो तथा विशेषतया वह लाल

English

TRli ytAT?iYA milARAM.

अध्याय 150

श्लोक 143

कलां पूरयितुं यत्नात् षोडशीमतिविक्रमाः किं प्रयाताश्च तिष्ठध्वं समरे ऽमरनिर्जिताः

kalāṃ pūrayituṃ yatnāt ṣoḍaśīmativikramāḥ kiṃ prayātāśca tiṣṭhadhvaṃ samare 'maranirjitāḥ

हिन्दी अर्थ

नन्दीमुख्ः स विज्ञेयो रक्तवर्णो विशेषतः॥ २३ वर्णका हो, उसे नन्दीमुख जानना चाहिए। मल्लिकापुष्पचित्रश्च धन्यो भवति पुङ्गवः। कमलैर्मण्डलैश्चापि चित्रो भवति भाग्यदः एते धन्यास्तथाधन्यान् कीर्तयिष्यामि ते नृप

English

" 0 Thou, soalefl on a lotus, salutniions he lo 'I'hee, tulonu'd witli ear-rings and bracelets, i In* Lfml of all tlie worlds ' Th- m briuiifest ligld lo the worlds! I salute Thee."— 2S.

अध्याय 150

श्लोक 144

न युक्तमेतच्छूराणां विशेषाद्दैत्यजन्मनाम् राजा चान्तरितो ऽस्माकं तारको लोकमारकः

na yuktametacchūrāṇāṃ viśeṣāddaityajanmanām rājā cāntarito 'smākaṃ tārako lokamārakaḥ

हिन्दी अर्थ

कुण्ठाः काणास्तथा खञ्जाः केकराक्षास्तथैव च स्वस्तिकाकारशृङ्गाश्च तथा मेघौघनिःस्वनाः

English

"Thou soest good and had deeds of oy('ry <>.»■, always. Thou porvadest all.- O Satya Deva! salutations bo to I'heo. 'I iiou, • ' Rhaskara ' be propitious to me.— 29.

अध्याय 150

श्लोक 145

विरतानां रणादस्मात् क्रुद्धः प्राणान्हरिष्यति शीतेन नष्टश्रुतयो भ्रष्टवाक्पाटवास्तथा

viratānāṃ raṇādasmāt kruddhaḥ prāṇānhariṣyati śītena naṣṭaśrutayo bhraṣṭavākpāṭavāstathā

हिन्दी अर्थ

महोरस्का महोच्छाया महाबलपराक्रमा: । शिरः कर्णौ ललाटं च वालधिश्वरणास्तथा भूमौ कर्षति लाङ्गूलं प्रलम्बस्थूलवालधिः। पुरस्तादुद्यतो नीलो वृषभश्च प्रशस्यते शक्तिध्वजपताकाढ्या येषां राजी विराजते। अनड्वाहस्तु ते धन्याश्चित्रसिद्धिजयावहाः

English

dajMiiaker! 1 salute Thee." After thus saluting the Sun, the devotee should oircumanilndate three limes, and then, after touching a BrAhtnaua, cow and gold, should go to the temple of Vismi. —?»0,

अध्याय 150

श्लोक 146

मूकास्तदाभवन्दैत्या रणद्दशनपङ्क्तयः तान्दृष्ट्वा नष्टचेतस्कान् दैत्याञ्छीतेन सादितान्

mūkāstadābhavandaityā raṇaddaśanapaṅktayaḥ tāndṛṣṭvā naṣṭacetaskān daityāñchītena sāditān

हिन्दी अर्थ

जिस वृषभका पेट तथा पीठ श्वेतवर्ण हो, वह समुद्राक्ष नामक वृषभ कहा जाता है। वह सर्वदा कुलकी वृद्धि करनेवाला होता है। जो वृष मल्लिकाके फूलके समान चितकबरे रंगवाला होता है, वह धन्य है। जो कमल- मण्डलके समान चितकबरा होता है, वह सौभाग्यवर्द्धक होता है तथा अलसीके फूलके समान नीले रंगवाला बैल धन्यतर कहा गया है। राजन्! ये उत्तम लक्षणोंवाले वृष हैं। अब मैं आपसे अशुभ लक्षणसम्पन्न वृषभोंका

English

Rove Biids the one Iniuflvofl n))fl ftceoml ehapler rlnscvilnvn the vtofliod

अध्याय 150

श्लोक 147

मत्वा कालक्षमं कार्यं कालनेमिर्महासुरः आश्रित्य दानवीं मायां वितत्य स्वं महावपुः

matvā kālakṣamaṃ kāryaṃ kālanemirmahāsuraḥ āśritya dānavīṃ māyāṃ vitatya svaṃ mahāvapuḥ

हिन्दी अर्थ

वर्णन कर रहा हूँ। जो काले तालु, ओंठ और मुखवाले, तथा सिंहके समान भयानक, कौवे और गृध्रके समान रंगवाले या मूषकके समान अल्पकाय, मन्द स्वभाववाले, काने, लँगड़े, नीची-ऊँची आँखोंबाले, विषम (तीन या एक) पैरोंमें श्वेत रंगवाले तथा चञ्चल नेत्रोंवाले हों, ऐसे वृषभोंका न तो उत्सर्ग करना चाहिए और न उन्हें अपने घरमें ही रखना ठीक है। मैं पुनः उत्सर्ग करने तथा पालने योग्य (श्रेष्ठ) वृषभोंका लक्षण बतला रहा हूँ। जिनके सींग स्वस्तिकके आकारके हों और स्वर बादलकी

English

i\f hnthivf/.

अध्याय 150

श्लोक 148

पूरयामास गगनं दिशो विदिश एव च निर्ममे दानवेन्द्रेशः शरीरे भास्करायुतम्

pūrayāmāsa gaganaṃ diśo vidiśa eva ca nirmame dānavendreśaḥ śarīre bhāskarāyutam

हिन्दी अर्थ

गर्जनाके सदृश हो, जो ऊँचे कदवाले, हाथीके समान पराक्रमसे युक्त हों तथा चन्द्रमाके समान श्वेत वर्णके जिन वृषभोंके सिर, दोनों कान, ललाट, पूँछ, चारों पैर, दोनों नेत्र, दोनों बगलें काले रंगके हों एवं काले रंगवाले वृषभोंके ये स्थान श्वेत हों तो वे उत्तम माने गये हैं।

English

CHAPTRIt ('III

अध्याय 150

श्लोक 149

दिशश्च मायया चण्डैः पूरयामास पावकैः ततो ज्वालाकुलं सर्वं त्रैलोक्यमभवत्क्षणात्

diśaśca māyayā caṇḍaiḥ pūrayāmāsa pāvakaiḥ tato jvālākulaṃ sarvaṃ trailokyamabhavatkṣaṇāt

हिन्दी अर्थ

जिसको लम्बी और मोटी पूँछ पृथ्वीपर रगड़ खाती हो और जिसका अगला भाग उठा हुआ हो, वह नील वृषभ प्रशंसनीय माना गया है ॥२३--३३॥ जिनके शरीरमें शक्ति, ध्वज और पताकाओंकी रेखा बनी हो, वे वृषभ धन्य हैं और विचित्र सिद्धि एवं विजय प्रदान करनेवाले हैं। जो घुमाये जानेपर या स्वयं घूमनेपर दाहिनी ओर घूमते हों तथा जिनके सिर एवं कंधे समुन्नत हों, वे धन्य तथा अपने समूहके वृद्धिकारक हैं। जिसके सींगोंके अग्रभाग तथा नेत्र लाल हों और वह यदि श्वेतवर्णका हो तथा उसके खुर प्रवालके समान लाल हों तो उससे श्रेष्ठ कोई

English

Nandike>(\'ara said: — Narad?} ' I shall n-.w ndafe (o you vdiat the sage Markandeya nariated Vudihi-tldra Jih-Mit I'rayaLM, in the day gone by. — 1.

अध्याय 150

श्लोक 150

तेन ज्वालासमूहेन हिमांशुरगमच्छमम् ततः क्रमेण विभ्रष्टं शीतदुर्दिनम् आबभौ

tena jvālāsamūhena himāṃśuragamacchamam tataḥ krameṇa vibhraṣṭaṃ śītadurdinam ābabhau

हिन्दी अर्थ

वृषभ नहीं होता। ऐसे वृषभोंका प्रयत्नपूर्वक पालन अथवा उत्सर्ग करना चाहिए; क्योंकि ये रखने अथवा उत्सर्ग करने-दोनों दशाओंमें धन-धान्यको बढ़ाते हैं। चरणानि मुखं पुच्छं यस्य श्वेतानि गोपतेः। जिस वृषभके चारों चरण, मुख और पूँछ श्वेत हों तथा लाक्षारससवर्णश्च तं नीलमिति निर्दिशेत्॥ ३८ शेष शरीरका रंग लाह-रसके समान हो, उसे नील वृषभ

English

Yudlii-nthira. the -'•!] nl ICniui hee;u;/»;]<«' l.■ I n| ih** w««i'l'l affei- the great.Vah/ih/iaratn wni. IL' '.jy /niich h/.ir •..-d l>\ »hf' gi'i rd'..f I lio death of his kin'-'iieu, Ih' - d 1 odiii-elf ' Kh,-:. h»iry.vllian:i, tlie master of armies of ele\''ij nK' mlih-,,': i!;-! \'U' ■il.er kinis win) were Ills allies, are slain, ('an-siiii; me Jirneii utdi and uiguiNh, and wo, live brothers,.'ons of IVindii, are a'dr. e nudor ti}*' -!]o!|r'r n\' l/.-)rd Kri'na.-- 2-1.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।