अध्याय 150
श्लोक 221
इत्युक्त्वा दानवाः सर्वे परिवार्य समन्ततः निजघ्नुर्विविधैरस्त्रैस् ते तम् आयान्तम् आहवे
ityuktvā dānavāḥ sarve parivārya samantataḥ nijaghnurvividhairastrais te tam āyāntam āhave
हिन्दी अर्थ
जो गृहस्थ इन तीनों गुरुजनोंकी सेवामें कभी असावधानी नहीं करता, वह तीनों लोकोंको जीत लेता है और अपने शरीरसे देवताओंके समान देदीप्यमान होते हुए स्वर्गमें आनन्दका अनुभव करता है भद्रे! तुम्हारा काम पूरा हो बातें पूर्ण होंगी । इस प्रकार हमारे पीछे आनेसे मेरे कार्यमें विघ्न पड़ता है और तुम्हें भी कष्ट हो रहा है, इसीलिये ्तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ २८ मैं इस समय तुमसे ऐसा कह रहा हूँ ॥१३--२८॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने द्वितीयवरलाभो नामैकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
English
Here ends lluhnndrcd and third eliapler describing the greatness of Pray&ga,