Matsya Purana
150
अध्याय 150 / 176

Adhyaya 150

242 श्लोकभाग 3/4 · श्लोक 151–220

पूर्ण अध्याय पाठ70 श्लोक

अध्याय 150

श्लोक 151

तद्बलं दानवेन्द्राणां मायया कालनेमिनः तद्दृष्ट्वा दानवानीकं लब्धसंज्ञं दिवाकरः उवाचारुणमुद्भ्रान्तः कोपाल्लोकैकलोचनः

tadbalaṃ dānavendrāṇāṃ māyayā kālaneminaḥ taddṛṣṭvā dānavānīkaṃ labdhasaṃjñaṃ divākaraḥ uvācāruṇamudbhrāntaḥ kopāllokaikalocanaḥ

हिन्दी अर्थ

कहते हैं । ऐसा वृषभ उत्सर्ग कर देना चाहिए, उसे घरमें वृष एवं स मोक्तव्यो न सन्धायों गृहे भवेत्। पालना ठीक नहीं हैं; क्योंकि ऐसे वृषभके लिये लोकमें तदर्थमेषा चरति लोके गाथा पुरातनी॥ ३९ एक ऐसी पुरानी गाथा प्रचलित है कि बहुतेरे पुत्रोंकी एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां ब्रजेत्। कामना करनी चाहिए; क्योंकि उनमेंसे कोई भी तो गौरी चाप्युद्दहेत् कन्यां नीलं वा वृषमुत्सृजेत्॥ ४० गयाकी यात्रा करेगा या गौरी कन्याका दान करेगा या नीले वृषभका उत्सर्ग करेगा। राजन्! ऐसे लक्षणयुक्त वृषभका एवं वृषं kT लक्षणसम्प्रयुक्तं चाहे वह घरमें उत्पन्न हुआ हो या खरीदा गया हो, उत्सर्ग गृहोद्भवं क्रीतमथापि राजन् कर महात्मा पुरुष कभी मृत्युके भयसे शोकग्रस्त नहीं मुक्त्वा न शोचेन्मरणं महात्मा होता; उसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। इसीलिये मैं आपसे

English

'' 1 have killed TVnisma, lU<a»a. \ho niiglity Karna, llio King Duryo- dhana, our kinsmen.and ralitT king', whf> oi-ji-idered l.iiemselves hravo soldiers and lioroe. " lovinda! uliai \:< n.>w tlie gtjnd o>f my life, aiid how and why sl)Oulil 1 rnhi the eij)]>ire'.la*.

अध्याय 150

श्लोक 152

नयारुण रथं शीघ्रं कालनेमिरथो यतः विमर्दस्तत्र विषमो भविता शूरसंक्षयः

nayāruṇa rathaṃ śīghraṃ kālanemiratho yataḥ vimardastatra viṣamo bhavitā śūrasaṃkṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

मोक्षं गतश्चाहमतोऽभिधास्ये॥ ४१ कह रहा हूँ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वृषभलक्षणं नाम सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

" Fie to me I ' 'riin- oppo-ssod with Ijis ilnuigliis, the mighty King Yudliistliira became very much d'Hpraidnut, and liis head l)endin.g down- wards ho fainted. Wlien he eanu' b.n*-k to his senses, he fell into thouglit,

अध्याय 150

श्लोक 153

जित एष शशाङ्को ऽत्र यद्बलं वयमाश्रिताः इत्युक्तश्चोदयामास रथं गरुडपूर्वजः

jita eṣa śaśāṅko 'tra yadbalaṃ vayamāśritāḥ ityuktaścodayāmāsa rathaṃ garuḍapūrvajaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वृषभलक्षण नामक दो सौ सातवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ सावित्री और सत्यवान्का चरित्र सूत उवाच सूतजी कहते हैं-ऋषियो! तदनन्तर अपरिमित ततः स राजा देवेशं पप्रच्छामितविक्रमः। पराक्रमी राजा मनुने भगवान् मत्स्यसे पतित्रता पतिव्रतानां माहात्म्यं तत्सम्बद्धां कथामपि॥ १ रित्रयोंके माहात्म्य तथा तत्सम्बन्धी कथाके विषयमें

English

" Which eould be the best, religions act that wouhl wash oIT all my sins, and which could be the.sacred jdacc of pilgrimage that would purify me aud enable me to go and reside in the world of Visiiu.-'-8dt.

अध्याय 150

श्लोक 154

प्रयत्नविधृतैरश्वैः सितचामरमालिभिः जगद्दीपो ऽथ भगवाञ् जग्राह विततं धनुः

prayatnavidhṛtairaśvaiḥ sitacāmaramālibhiḥ jagaddīpo 'tha bhagavāñ jagrāha vitataṃ dhanuḥ

हिन्दी अर्थ

व्यर्कत मनुजीने पूछा- (प्रभो!) पतिव्रता स्त्रियोंमें कौन पतिव्रतानां का श्रेष्ठा कया मृत्युः पराजितः। श्रेष्ठ है? किस स्त्रीने मृत्युको पराजित किया है? तथा नामसंकीर्तनं कस्याः कीर्तनीयं सदा न॑रैः। मनुष्योंको सदा किस (सती नारी)-का नामोच्चारण सर्वपापक्षयकरमिदानी कथयस्व मे॥२ करना चाहिए? आप अब मुझसे सभी पापोंको नष्ट करनेवाली इस कथाका वर्णन कीजिये

English

" How possibly can ] make enfjniricson siudi points from Sri Krisna, because he has been so much instnimentul in the groat war. How can 1 ask Dbritarastra about these things. I liave slain all his sons to the number of one hundred."

अध्याय 150

श्लोक 155

शरौ च द्वौ महाभागो दिव्यावाशीविषद्युती संचारास्त्रेण संधाय बाणमेकं ससर्ज सः

śarau ca dvau mahābhāgo divyāvāśīviṣadyutī saṃcārāstreṇa saṃdhāya bāṇamekaṃ sasarja saḥ

हिन्दी अर्थ

लबे मत्स्यभगवानूने कहा--धर्मज्ञ ! धर्मराज भी पतिव्रता वैलोम्यं धर्मराजोऽपि नाचरत्यथ योषिताम्। र्त्रियोंके प्रतिकूल कोई व्यवहार नहीं कर सकते; क्योंकि पतिव्रतानां धर्मज्ञ पूज्यास्तस्यापि ताः सदा॥ ३ वे उनके लिये भी सर्वदा सम्माननीय हैं। इस विषयमें अत्र ते वर्णयिष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्। मैं तुमसे पापोंको नष्ट करनेवाली वैसी कथाका वर्णन यथा विमोक्षितो भर्ता मृत्युपाशगतः स्त्रिया ॥ ४ ० हूँ कि किस प्रकार पतिव्रता स्त्रीने मृत्युके पाशमें h शो पक पड़े हुए अपने पतिको बन्धनमुक्त कराया था। प्राचीन

English

Being tliua overpowered witli.grief, Vudltisihira began to weep bitterly

अध्याय 150

श्लोक 156

द्वितीयमिन्द्रजालेन योजितं प्रमुमोच ह संचारास्त्रेण रूपाणां क्षणाच्चक्रे विपर्ययम्

dvitīyamindrajālena yojitaṃ pramumoca ha saṃcārāstreṇa rūpāṇāṃ kṣaṇāccakre viparyayam

हिन्दी अर्थ

मद्रेषु शाकलो राजा बभूवाश्वपतिः पुरा। समयमे मद्रदेश (वर्तमान स्यालकोट जनपद) -में शाकलवंशी अपुत्रस्तप्यमानोऽसौ पुत्रार्थी सर्वकामदाम्॥ ५ अश्वपति नामक एक राजा थे। उनके कोई पुत्र नहीं था। सिद्धार्थकेहूयमानां सावित्रीं प्रत्यहं द्विजैः

English

OU AFTER CIV,

अध्याय 150

श्लोक 157

देवानां दानवं रूपं दानवानां च दैविकम् मत्वा सुरान्स्वकानेव जघ्ने घोरास्त्रलाघवात्

devānāṃ dānavaṃ rūpaṃ dānavānāṃ ca daivikam matvā surānsvakāneva jaghne ghorāstralāghavāt

हिन्दी अर्थ

काले तु दर्शयामास स्वां तनुं मनुजेश्वरम् जगामादर्शनं देवी खे तथा नृप चञ्चला सुषुवे तनयां काले सावित्रीमिव रूपतः

English

and tlio yood men that wore there also fell down on the ground, along with JJniiipadi and Kuuti, and began to weep. — 11-12-

अध्याय 150

श्लोक 158

कालनेमी रुषाविष्टः कृतान्त इव संक्षये कांश्चित्खड्गेन तीक्ष्णेन कांश्चिन् नाराचवृष्टिभिः कांश्चिद्गदाभिर्घोराभिः कांश्चिद्घोरैः परश्वधैः

kālanemī ruṣāviṣṭaḥ kṛtānta iva saṃkṣaye kāṃścitkhaḍgena tīkṣṇena kāṃścin nārācavṛṣṭibhiḥ kāṃścidgadābhirghorābhiḥ kāṃścidghoraiḥ paraśvadhaiḥ

हिन्दी अर्थ

कालेन यौवनं प्राप्तं ददौ सत्यवते पिता नारदस्तु ततः प्राह राजानं दीम्ततेजसम्।

English

At that time, the great Kiigo ilarkundeya was in K/irfi and he knew how lunch the king was upset with grief. lie tliereforc instantly went to flastinapura and appeared at the gate of the palace of Yudhithira. — 13-14.

अध्याय 150

श्लोक 159

शिरांसि केषांचिदपातयच्च भुजान्रथान्सारथींश्चोग्रवेगः कांश्चित् पिपेषाथ रथस्य वेगात् कांश्चित्क्रुधा चोद्धतमुष्टिपातैः

śirāṃsi keṣāṃcidapātayacca bhujānrathānsārathīṃścogravegaḥ kāṃścit pipeṣātha rathasya vegāt kāṃścitkrudhā coddhatamuṣṭipātaiḥ

हिन्दी अर्थ

तथापि प्रददौ कन्यां द्युमत्सेनात्मजे शुभे। सावित्र्यपि च भर्तारमासाद्य नृपमन्दिरे चक्रे त्रिरात्रं धर्मज्ञा व्रतं तस्मिस्तदा दिने। दारुपुष्पफलाहारी सत्यवांस्तु ययौ वनम् तब ब्राह्मणोंके निर्देशपर वे पुत्रकी कामनासे सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली सावित्रीकी आराधना करने लगे। वे प्रतिदिन सैकड़ों ब्राह्मणोंके साथ सावित्रीदेवीकी प्रसन्नताके लिये सफेद सरसोंका हवन करते थे। दस

English

The gate-keeper, on seeing the great sage ildrkaiujoyu, ininiediately reported Ids arrival to the king, who, witlioiit the least delay, repaired to the door to accord him a fitting reception, and said "0 Sage! you are most welcome, fly your having so kindly graced me with your presence, 1 feel that the mission of my life has been fulfilled and that my family has been liberated from all sins. 0 Sago! the manes of my deceased ancestors have also become gratified by your presence, and I feel myself purified in yoiir presence." -15.

अध्याय 150

श्लोक 160

रणे विनिहतान्दृष्ट्वा नेमिः स्वान्दानवाधिपः रूपं स्वं तु प्रपद्यन्त ह्य् असुराः सुरधर्षिताः

raṇe vinihatāndṛṣṭvā nemiḥ svāndānavādhipaḥ rūpaṃ svaṃ tu prapadyanta hy asurāḥ suradharṣitāḥ

हिन्दी अर्थ

महीना बीत जानेपर चतुर्थी तिथिको सावित्री (गायत्री) देवीने राजाको दर्शन दिया॥ ३--७॥ सावित्रीने कहा--राजन्! तुम मेरे नित्य भक्त हो, अतः मैं तुम्हें कन्या प्रदान करूँगी। मेरी कृपासे तुम्हें

English

NandikeiJvara said: - Xaradu! After thus aec«»rdiiig him a welcome, the king \vu;ilied hi feet and seating him on his throne, ho worshipped the great sage.

अध्याय 150

श्लोक 161

कालनेमी रुषाविष्टस् तेषां रूपं न बुद्धवान् नेमिदैत्यस्तु तान्दृष्ट्वा कालनेमिमुवाच ह

kālanemī ruṣāviṣṭas teṣāṃ rūpaṃ na buddhavān nemidaityastu tāndṛṣṭvā kālanemimuvāca ha

हिन्दी अर्थ

चरणोंमें पड़े हुए राजासे इतना कहकर वह देवी आकाशमें बिजलीकी भाँति अदृश्य हो गयी। नरेश! उस राजाको मालती नामकी पतिव्रता पत्नी थी। समय आनेपर उसने सावित्रीके समान रूपवाली एक कन्याको जन्म दिया। तब राजाने ब्राह्मणोंसे कहा-तपके द्वारा आवाहन किये जानेपर सावित्रीने इसे मुझे दिया है तथा यह सावित्रीके समान रूपवाली है, अत: इसका नाम सावित्री होगा। नृपश्रेष्ठ! तब उन ब्राह्मणोंने उस कन्याका तब पिताने उसका सत्यवानूके लिये वाग्दान कर दिया। इसी बीच नारदने उस उद्दीप्त तेजस्वी राजासे कहा कि “उस राजकुमारको आयु एक ही वर्षमें समाप्त हो जायगी।' (नारदजीकी वाणी सुनकर) यद्यपि राजाके मनमें

English

Markainleya said: -King! what ails your mind so inucli Pray tell ino at once wiilioul the least reserve the cause of your mental agony. — 10.

अध्याय 150

श्लोक 162

अहं नेमिः सुरो नैव कालनेमे विदस्व माम् भवता मोहितेनाजौ निहता भूरिविक्रमाः

ahaṃ nemiḥ suro naiva kālaneme vidasva mām bhavatā mohitenājau nihatā bhūrivikramāḥ

हिन्दी अर्थ

चिन्ता तो हुई, पर यह विचारकर कि ' कन्यादान एक ही बार किया जाता है' उन्होंने अपनी कन्या सावित्रीको द्युमत्सेनके सुन्दर पुत्र सत्यवान्को प्रदान कर दिया। सावित्री भी पतिको पाकर अपने भवनमें नारदकी अशुभ वाणी सुनकर दुःखित मनसे काल व्यतीत करने लगी। वह वनमें सास-श्वसुर तथा पतिदेवकी बड़ी शुश्रूषा करती थी; किंतु राजा द्युमत्सेन अपने राज्यसे च्युत हो गये थे तथा पल्रीसहित अन्धा होनेके कारण वैसी गुणवती

English

Yiulhisthira said: — " O great sago! my thoughts over my doings for the gtiining of this king<lom haunt me and choke me with intense grief."— 20.

अध्याय 150

श्लोक 163

दैत्यानां दशलक्षाणि दुर्जयानां सुरैरिह सर्वास्त्रवारणं मुञ्च ब्राह्ममस्त्रं त्वरान्वितः

daityānāṃ daśalakṣāṇi durjayānāṃ surairiha sarvāstravāraṇaṃ muñca brāhmamastraṃ tvarānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

राजपुत्रीको पुत्रवधू-रूपमें प्राप्तकर संतुष्ट नहीं थे। ' आजसे चौथे दिन सत्यवान् मर जायगा' ऐसा ब्राह्मणोंके मुखसे सुनकर धर्मपरायणा राजपुत्री सावित्रीने श्वशुरसे आज्ञा लेकर त्रिरात्र-व्रतका अनुष्ठान किया। चौथा दिन आनेपर जब सत्यवानूने लकड़ी, पुष्प एवं फलकी टोहमें जंगलको ओर प्रस्थान किया, तब याचनाभङ्गसे डरती हुई सावित्री भी सास-श्वशुरकी आज्ञा लेकर दुःखत मनसे पतिके साथ उस भयंकर जंगलमें गयी। (नारदके वचनका ध्यान कर) चित्तमें अतिशय कष्ट रहनेपर भी

English

Markai.ideya sahl; — " King! hear the duties of an ideal Ksatriya. It is no sin lor a wise man to light; and for a king there is absolutely )io sill to wage war to accpiire his kingilom. Do jiot therefore allow yourself to be carried away by any such feeling that you have committed a sin."- -21-22.

अध्याय 150

श्लोक 164

स तेन बोधितो दैत्यः सम्भ्रमाकुलचेतनः योजयामास बाणं हि ब्रह्मास्त्रविहितेन तु

sa tena bodhito daityaḥ sambhramākulacetanaḥ yojayāmāsa bāṇaṃ hi brahmāstravihitena tu

हिन्दी अर्थ

उसने अपने इस महान् भयको अपने पतिसे व्यक्त नहीं किया, किंतु मन-बहलावके लिये वनमें छोटे-बड़े वृक्षोंके बारेमें पतिसे झूठ-मूठ पूछ-ताछ करती रही। शूरवीर सत्यवान् उस भयंकर वनमें विशाल वृक्षों, पक्षियों एवं पशुओंके दलको दिखला-दिखलाकर थकी हुई एवं कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली राजकुमारी

English

thi hearing these worvls of the sage Markuudeya, Viulhisthira fell prostrate at his I'cct and begged him to toll something that would wash olf all his sins, — 23-24.,

अध्याय 150

श्लोक 165

मुमोच चापि दैत्येन्द्रः स स्वयं सुरकण्टकः ततो ऽस्त्रतेजसा व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम्

mumoca cāpi daityendraḥ sa svayaṃ surakaṇṭakaḥ tato 'stratejasā vyāptaṃ trailokyaṃ sacarācaram

हिन्दी अर्थ

तथा मृगाणां विपिने नुवीरः॥ २१ सावित्रीको आश्वासन देता रहा॥ ८--२१॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने सावित्रीवनप्रवेशो नामाष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें सावित्रीवनप्रवेश नामक दो सौ आठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ सत्यवान्का सावित्रीको वनको शोभा दिखाना

English

Markandoya said: — King tell you the way how to destroy all your sins. Hear it with attention. It is very great merit for pious people to go to Prayaga. — 25.

अध्याय 150

श्लोक 166

देवानां चाभवत्सैन्यं सर्वमेव भयान्वितम् संचरास्त्रं च संशान्तं स्वयमायोधने बभौ

devānāṃ cābhavatsainyaṃ sarvameva bhayānvitam saṃcarāstraṃ ca saṃśāntaṃ svayamāyodhane babhau

हिन्दी अर्थ

वनेऽस्मिञ्शाद्ठलाकीर्णे सहकारं मनोहरम्। करोति वायुर्दाक्षिण्यमावयोः क्लमनाशनम्॥ पश्चिमेन विशालाक्षि कर्णिकारैः सुपुष्पितैः । काञ्चनेन विभात्येषा वनराजी मनोरमा॥

English

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अध्याय 150

श्लोक 167

तस्मिन्प्रतिहते ह्यस्त्रे भ्रष्टतेजा दिवाकरः महेन्द्रजालमाश्रित्य चक्रे स्वां कोटिशस्तनुम्

tasminpratihate hyastre bhraṣṭatejā divākaraḥ mahendrajālamāśritya cakre svāṃ koṭiśastanum

हिन्दी अर्थ

रम्या सा चारुसर्वाङ्गि कुसुमोत्करभूषणा॥ मधुमत्तालिझंकारव्याजेन वरवर्णिनि। चापाकृष्टिं करोतीव कामः पान्थजिघांसया॥ फलास्वादलसद्क्त्रपुंस्कोकिलविनादिता । विभाति चारुतिलका त्वमिवैषा वनस्थली ॥ कोकिलश्चूतशिखरे मञ्जरीरेणुपिञ्जरः। पुष्परेणुविलिप्ताङ्ीं प्रियामनुसरन् वने।

English

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अध्याय 150

श्लोक 168

विस्फूर्जत्करसम्पातसमाक्रान्तजगत्त्रयम् तताप दानवानीकं गतमज्जौघशोणितम्

visphūrjatkarasampātasamākrāntajagattrayam tatāpa dānavānīkaṃ gatamajjaughaśoṇitam

हिन्दी अर्थ

सत्यवान्ने कहा--विशाल नेत्रोंवाली सावित्री ! हरी- हरी घासोंसे भरे हुए इस वनमें वसन्तमें रतिकी वृद्धि करनेवाले एवं नेत्र तथा नासिकाको सुख प्रदान करनेवाले इस मनोहर आमके वृक्षको देखो। इस वनमें फूलोंसे लदे हुए इस लाल अशोक-वृक्षको भी देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो यह वसन्त मेरा ही परिहास कर रहा है । दाहिनी ओर दक्षिण दिशामें जलते हुए अंगारकी-सी कान्तिवाले फूलोंसे लदे हुए किंशुक-वृक्षोंसे युक्त इस रमणीय वनस्थलीको

English

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अध्याय 150

श्लोक 169

ततश्चावर्षदनलं समन्ताद् अतिसंहतम् चक्षूंषि दानवेन्द्राणां चकारान्धानि च प्रभुः

tataścāvarṣadanalaṃ samantād atisaṃhatam cakṣūṃṣi dānavendrāṇāṃ cakārāndhāni ca prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

देखो। सुगन्धित पुष्पोंकी सुगन्धसे युक्त वन-पंक्तियोंसे निकली हुई वायु उदारतापूर्वक हमलोगोंकी थकावटका नाश कर रही है। विशाललोचने! इधर पश्चिममें फूले हुए कनेरके पुष्पॉसे युक्त स्वर्णिम शोभावाली वनपङ्कि शोभायमान हो रही है। सुन्दरि! तिनिसके लतासमूहोंसे वनस्थलीका मार्ग अवरुद्ध हो गया है । पुष्पोंके समूहोंसे विभूषित हुई वह पृथ्वी कितनी मनोहर लग रही है । मधुसे उन्मत्त हुए भ्रमर- समूहोंकी गुञ्जारके व्याजसे मालूम पड़ता है कि कामदेव (हम-जैसे) पथिकोंको मारनेके लिये धनुषकी प्रत्यञ्चा खींच रहा है । नाना प्रकारके फलोंके आस्वादनसे उल्लसित मुखवाले कोकिलोंके स्वरसे निनादित एवं सुन्दर तिलक- वृक्षोंसे सुशोभित यह वनस्थली तुम्हारे ही समान शोभा दे

English

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अध्याय 150

श्लोक 170

गजानामगलन्मेदः पेतुश्चाप्यरवा भुवि तुरगा निःश्वसन्तश्च घर्मार्ता रथिनो ऽपि च

gajānāmagalanmedaḥ petuścāpyaravā bhuvi turagā niḥśvasantaśca gharmārtā rathino 'pi ca

हिन्दी अर्थ

रही है । आमकी ऊँची डालीपर बैठी हुई कोकिला मञ्जरीकी धूलसे पीत वर्ण होकर अपने सुरीले शब्दोंसे चेष्टाओंद्वारा कुलीन पुरुषको भाँति अपना परिचय दे रही है । कामी मधुकर वनमें गुनगुनाता हुआ प्रत्येक पुष्पपर पुष्पोंकी धूलिसे धूसरित कुसुमं कुसुमं याति कूजन् कामी शिलीमुखः ॥ १० प्रियतमाका अनुसरण करता हुआ उड़ रहा है

English

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अध्याय 150

श्लोक 171

इतश्चेतश्च सलिलं प्रार्थयन्तस्तृषातुराः प्रच्छायविटपांश्चैव गिरीणां गह्वराणि च

itaścetaśca salilaṃ prārthayantastṛṣāturāḥ pracchāyaviṭapāṃścaiva girīṇāṃ gahvarāṇi ca

हिन्दी अर्थ

मञ्जरीं सहकारस्य कान्ताचञ्च्वाग्रखण्डिताम्। वनमें तरुण पुंस्कोकिल अनेक पुष्पोंके रहते हुए स्वदते बहुपुष्पेऽपि पुंस्कोकिलयुवा वने॥ १९ भी अपनी प्रियतमाकी चोंचके अग्रभागसे खण्डित हुई

English

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अध्याय 150

श्लोक 172

तेषां प्रार्थयतां शीतं द्रुमान्तरविसर्पिणाम् दावाग्निः प्रज्वलंश्चैव घोरार्चिर्दग्धपादपः तोयार्थिनः पुरो दृष्ट्वा तोयं कल्लोलमालिनम्

teṣāṃ prārthayatāṃ śītaṃ drumāntaravisarpiṇām dāvāgniḥ prajvalaṃścaiva ghorārcirdagdhapādapaḥ toyārthinaḥ puro dṛṣṭvā toyaṃ kallolamālinam

हिन्दी अर्थ

काकः प्रसूतां वृक्षाग्रे स्वामेकाग्रेण चञ्चुना । काकों सम्भावयत्येष पक्षाच्छादितपुत्रिकाम् नाहारमपि चादत्ते कामाक्रान्तः कपिंजल:

English

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अध्याय 150

श्लोक 173

पुरःस्थितमपि प्राप्तुं न शेकुरवमर्दिताः अप्राप्य सलिलं भूमौ व्यात्तास्या गतचेतसः

puraḥsthitamapi prāptuṃ na śekuravamarditāḥ aprāpya salilaṃ bhūmau vyāttāsyā gatacetasaḥ

हिन्दी अर्थ

मुहुर्मुहुर्विशालाक्षि उत्कण्ठयति कामिनः वृक्षशाखां समारूढः शुकोऽयं सह भार्यया। भरेण लम्बयञ् शाखां करोति सफलामिव शेते सिंहयुवा कान्ता चरणान्तरगामिनी

English

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अध्याय 150

श्लोक 174

तत्र तत्र व्यदृश्यन्त मृता दैत्येश्वरा भुवि रथा गजाश्च पतितास् तुरगाश्च समापिताः

tatra tatra vyadṛśyanta mṛtā daityeśvarā bhuvi rathā gajāśca patitās turagāśca samāpitāḥ

हिन्दी अर्थ

ययोनेत्रप्रभालोके गुहा भिन्नेव लक्ष्यते प्रीतिमायाति च तया लिह्यमानः स्वकान्तया

English

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अध्याय 150

श्लोक 175

स्थिता वमन्तो धावन्तो गलद्रक्तवसासृजः दानवानां सहस्राणि व्यदृश्यन्त मृतानि तु

sthitā vamanto dhāvanto galadraktavasāsṛjaḥ dānavānāṃ sahasrāṇi vyadṛśyanta mṛtāni tu

हिन्दी अर्थ

जन्तूद्धरणतः कान्तं सुखयत्येव वानरी शशकः शशकी चोभे संसुप्ते पीडिते इमे। संलीनगात्रचरणे कणैर्व्यक्तिमुपागते कान्तप्रोथसमुत्थानैः कान्तमार्गानुगामिनी। करोति कवलं मुस्तैर्वराही पोतकानुगा

English

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अध्याय 150

श्लोक 176

संक्षये दानवेन्द्राणां तस्मिन्महति वर्तिते प्रकोपोद्भूतताम्राक्षः कालनेमी रुषातुरः

saṃkṣaye dānavendrāṇāṃ tasminmahati vartite prakopodbhūtatāmrākṣaḥ kālanemī ruṣāturaḥ

हिन्दी अर्थ

दुढाङ्कसंधिर्महिषः कर्दमाक्ततनुर्वने। अनुव्रजति धावन्तीं प्रियामुद्धतमुत्सुक: ख्नहार्द्रभावात् कर्षन्ती भर्तारं शृङ्गकोटिना

English

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अध्याय 150

श्लोक 177

अभवत्कल्पमेघाभः स्फुरद्भूरिशतह्रदः गम्भीरास्फोटनिर्ह्रादजगद्धृदयघट्टकः

abhavatkalpameghābhaḥ sphuradbhūriśatahradaḥ gambhīrāsphoṭanirhrādajagaddhṛdayaghaṭṭakaḥ

हिन्दी अर्थ

आम्र-मञ्जरीका स्वाद ले रहा है। कौआ वृक्षके अग्रभागपर बैठकर पंखोंसे बच्चेको छिपाकर बैठी हुई अपनी प्रसूता पल्लीको चोंचके अग्रभागसे आनन्दित कर रहा है। अपनी पत्नीके साथ कामदेवसे अभिभूत हुआ तरुण कपिंजल (तीतर) निचले भूभागपर बैठा हुआ आहार भी नहीं ग्रहण कर रहा है। विशालनेत्रे! चटक (गौरैया) अपनी प्रियाकी गोदमें स्थित हो बारम्बार रमण करता हुआ कामीजनोंको उत्कण्ठित कर रहा है। अपनी प्रियाके साथ वृक्षको डालीपर बैठा हुआ यह शुक पंजेसे शाखाको खींचता हुआ उसे फलयुक्त-सा कर रहा है। इस वनमें मांसाहारसे तृप्त युवा सिंह निद्रामें लीन हो सो रहा है और उसकी प्रियतमा उसके पैरोंके मध्यभागमें

English

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अध्याय 150

श्लोक 178

प्रच्छाद्य गगनाभोगं रविमायां व्यनाशयत् शीतं ववर्ष सलिलं दानवेन्द्रबलं प्रति

pracchādya gaganābhogaṃ ravimāyāṃ vyanāśayat śītaṃ vavarṣa salilaṃ dānavendrabalaṃ prati

हिन्दी अर्थ

शयन कर रही है। पर्वतकी कन्दरामें बैठे हुए व्याघ्र- दम्पत्तिको देखो, जिनके नेत्रोंकी कान्तिसे गुफा भिन्न- सी दिखायी दे रही है। यह गैंडा अपनी प्रियाको जीभके अग्रभागसे बारम्बार चाट रहा है और अपनी उस प्रियाद्वारा चाटे जानेपर आनन्दका अनुभव कर रहा है। वह वानरी अपनी गोदमें सिर रखकर गाढ़ निद्रामें सोते हुए पतिको जूक आदि जन्तुओंको निकालकर सुख दे

English

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अध्याय 150

श्लोक 179

दैत्यास्तां वृष्टिमासाद्य समाश्वस्तास्ततः क्रमात् बीजाङ्कुरा इवाम्लानाः प्राप्य वृष्टिं धरातले

daityāstāṃ vṛṣṭimāsādya samāśvastāstataḥ kramāt bījāṅkurā ivāmlānāḥ prāpya vṛṣṭiṃ dharātale

हिन्दी अर्थ

रही है। वह बिडाल पृथ्वीपर लेटकर पेटको दिखाती हुई अपनी प्रियतमाको नखों और दाँतोंसे काट रहा है, परंतु वास्तवमें बह पीड़ा नहीं दे रहा है ये खरगोश-दम्पति पीड़ित होकर अपने पैरोंको शरीरमें छिपाकर सो रहे हैं। ये कानोंद्वारा ही जाने जा सकते हैं। सूक्ष्माङ्गि! कामार्त हाथी कमलयुक्त सरोवरमें स्नान कर कमल-डंठलोंके ग्रासोंसे प्रियाको संतुष्ट कर

English

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अध्याय 150

श्लोक 180

ततः स मेघरूपी तु कालनेमिर्महासुरः शस्त्रवृष्टिं ववर्षोग्रां देवानीकेषु दुर्जयाम्

tataḥ sa megharūpī tu kālanemirmahāsuraḥ śastravṛṣṭiṃ vavarṣogrāṃ devānīkeṣu durjayām

हिन्दी अर्थ

रहा है। पीछे-पीछे चलनेवाले अपने बच्चोंसे घिरी हुई शूकरी प्रियतमके मार्गपर चलती हुई प्रियतमके द्वारा उखाड़े गये मोथोंको खाती जा रही है। इस वनमें दृढ़ अङ्गोंवाला एवं शरीरमें कीचड़ पोते हुए कामार्त महिष भागती हुई प्रियाके पीछे दौड़ रहा है। सुन्दरि! अपनी प्रियाके सहित इस मृगको देखो, जो कुतूहलवश मुझे मनोहर कटाक्षोंसे देख रहा है। देखो, वह मृगी स्नेहयुक्त हो अपने सींगोंके अग्रभागसे प्रियतमको ढकेलती

English

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अध्याय 150

श्लोक 181

तया वृष्ट्या बाध्यमाना दैत्येन्द्राणां महौजसाम् गतिं कां च न पश्यन्तो गावः शीतार्दिता इव

tayā vṛṣṭyā bādhyamānā daityendrāṇāṃ mahaujasām gatiṃ kāṃ ca na paśyanto gāvaḥ śītārditā iva

हिन्दी अर्थ

हुई पिछले पैरसे मुखको खुजला रही है। अरे, उस अन्वास्ते चमरः कामी मां च पश्यति गर्वितः रोमन्थनं प्रकुर्वाणं काकं ककुदि वारयन्

English

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अध्याय 150

श्लोक 182

परस्परं व्यलीयन्त पृष्ठेषु व्यस्त्रपाणयः स्वेषु बाधे व्यलीयन्त गजेषु तुरगेषु च

parasparaṃ vyalīyanta pṛṣṭheṣu vyastrapāṇayaḥ sveṣu bādhe vyalīyanta gajeṣu turageṣu ca

हिन्दी अर्थ

विपुले बदरीस्कन्धे बदराशनकाम्यया सभार्यश्चक्रवाकोऽयं कमलाकरमध्यगः। करोति पद्मिनीं कान्तां सुपुष्पामिव सुन्दरि

English

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अध्याय 150

श्लोक 183

रथेषु त्वमरास्त्रस्तास् तत्र तत्र निलिल्यिरे अपरे कुञ्चितैर्गात्रैः स्वहस्तपिहिताननाः

ratheṣu tvamarāstrastās tatra tatra nililyire apare kuñcitairgātraiḥ svahastapihitānanāḥ

हिन्दी अर्थ

इन्धनं न कृतं सुश्रु तत्करिष्यामि साम्प्रतम् एवमेतत् करिष्यामि मम दृष्टिपथस्त्वया । दूरं कान्त न कर्तव्यो बिभेमि गहने वने

English

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अध्याय 150

श्लोक 184

इतश्चेतश्च संभ्रान्ता बभ्रमुर्वै दिशो दश एवंविधे तु संग्रामे तुमुले देवसंक्षये

itaścetaśca saṃbhrāntā babhramurvai diśo daśa evaṃvidhe tu saṃgrāme tumule devasaṃkṣaye

हिन्दी अर्थ

ततः स काष्ठानि चकार तस्मिन् श्वेत चमरी गायको देखो, जो चमरके पीछे चली जा रही है। इधर कामार्तत चमर खड़ा है और गर्वके साथ मेरी ओर देख रहा है। धूपमें बैठे हुए उस नीलगायको देखो, जो अपनी प्रियाके साथ आनन्दपूर्वक जुगाली कर रहा

English

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अध्याय 150

श्लोक 185

दृश्यन्ते पतिता भूमौ शस्त्रभिन्नाङ्गसंधयः विभुजा भिन्नमूर्धानस् तथा छिन्नोरुजानवः

dṛśyante patitā bhūmau śastrabhinnāṅgasaṃdhayaḥ vibhujā bhinnamūrdhānas tathā chinnorujānavaḥ

हिन्दी अर्थ

है और ककुद्पर बैठे हुए कौवेका निवारण कर रहा है। प्रियाके साथ उस बकरेको देखो, जो वेर वृक्षकी मोटी शाखापर फल खानेकी इच्छासे अगले दोनों पैरोंको रखे हुए है। सरोवरमें विचरण करते हुए हंसिनीसहित उस अत्यन्त निर्मल हंसको देखो, जो सुप्रकाशित चन्द्रबिम्बकी शोभा धारण कर रहा है। सुन्दरि! चक्रवाक अपनी प्रियाके साथ कमलोंसे सुशोभित सरोवरमें अपनी प्रियाको फूली हुई पद्मिनीके समान कर रहा है। (ऐसा कहकर सत्यवानूने फिर कहा--) सुन्दर भौंहोंबाली ! मैं फलोंको एकत्र कर चुका तथा तुम पुष्पोंको एकत्र कर चुकी, किंतु अभी ईधनका कोई प्रबन्ध नहीं किया गया, अतः अब मैं उसे एकत्र करूँगा। भामिनि! तबतक तुम इस

English

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अध्याय 150

श्लोक 186

विपर्यस्तरथासङ्गा निष्पिष्टध्वजपङ्क्तयः निर्भिन्नाङ्गैस्तुरंगैस्तु गजैश्चाचलसंनिभैः

viparyastarathāsaṅgā niṣpiṣṭadhvajapaṅktayaḥ nirbhinnāṅgaisturaṃgaistu gajaiścācalasaṃnibhaiḥ

हिन्दी अर्थ

सरोवरके तटपर वृक्षकी छायामें बैठकर क्षणभर प्रतीक्षा करते हुए विश्राम करो॥ २१--३३॥ सावित्री बोली-कान्त! जैसा आप कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगी, परंतु आप मेरे नेत्रोके सामनेसे दूर न जायं; क्योंकि मैं इस घने वनमें डर रही हूँ

English

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अध्याय 150

श्लोक 187

स्रुतरक्तह्रदैर्भूमिर् विकृताविकृता बभौ एवमाजौ बली दैत्यः कालनेमिर्महासुरः

srutaraktahradairbhūmir vikṛtāvikṛtā babhau evamājau balī daityaḥ kālanemirmahāsuraḥ

हिन्दी अर्थ

मत्स्यभगवानने कहा--राजन्! सावित्रीके ऐसा कहनेपर सत्यवान् उस वनमें राजपुत्रीके सम्मुख ही उस सरोवरसे थोड़ी ही दूरपर काष्ठ एकत्र करने लगे, परंतु राजपुत्री उतनी मेने च सा तं मृतमेव राजन्॥ ३५ दूर जानेपर भी उन्हें मरा हुआ-सा मानने लगी इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित््युपाख्याने वनदर्शनं नाम नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

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अध्याय 150

श्लोक 188

जघ्ने मुहूर्तमात्रेण गन्धर्वाणां दशायुतम् यक्षाणां पञ्च लक्षाणि रक्षसामयुतानि षट्

jaghne muhūrtamātreṇa gandharvāṇāṃ daśāyutam yakṣāṇāṃ pañca lakṣāṇi rakṣasāmayutāni ṣaṭ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें वनदर्शन नामक दो सौ नवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ यमराजका सत्यवानके प्राणको बाँधना तथा सावित्री और यमराजका वार्तालाप

English

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अध्याय 150

श्लोक 189

त्रीणि लक्षाणि जघ्ने स किंनराणां तरस्विनाम् जघ्ने पिशाचमुख्यानां सप्त लक्षाणि निर्भयः

trīṇi lakṣāṇi jaghne sa kiṃnarāṇāṃ tarasvinām jaghne piśācamukhyānāṃ sapta lakṣāṇi nirbhayaḥ

हिन्दी अर्थ

तस्य पाटयतः काष्ठं जज्ञे शिरसि वेदना। स वेदनार्तः संगम्य भार्या वचनमब्रवीत् आयासेन ममानेन जाता शिरसि वेदना। तमश्च प्रविशामीव न च जानामि किञ्जन पतिव्रता महाभागा ततः सा राजकन्यका

English

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अध्याय 150

श्लोक 190

इतरेषामसंख्याताः सुरजातिनिकायिनाम् जघ्ने स कोटीः संक्रुद्धश् चित्रास्त्रैरस्त्रकोविदः

itareṣāmasaṃkhyātāḥ surajātinikāyinām jaghne sa koṭīḥ saṃkruddhaś citrāstrairastrakovidaḥ

हिन्दी अर्थ

ददर्श धर्मराजं तु स्वयं तं देशमागतम्। नीलोत्पलदलश्यामं पीताम्बरधरं प्रभुम् तथानुगम्यमानं च कालेन सह मृत्युना

English

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अध्याय 150

श्लोक 191

एवं परिभवे भीमे तदा त्वमरसंक्षये संक्रुद्धावश्विनौ देवौ चित्रास्त्रकवचोज्ज्वलौ

evaṃ paribhave bhīme tadā tvamarasaṃkṣaye saṃkruddhāvaśvinau devau citrāstrakavacojjvalau

हिन्दी अर्थ

अनुवव्राज गच्छन्तं धर्मराजमतन्द्रिता। कृताञ्जलिरुवाचाथ हृदयेन प्रवेपता इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्या तु मध्यमम्। गुरुशुश्रूषया चैव ब्रह्मलोकं समश्नुते सर्वे तस्यादृता धर्मा यस्यैते त्रय आदृताः। अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः

English

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अध्याय 150

श्लोक 192

जघ्नतुः समरे दैत्यं कृतान्तानलसंनिभम् तमासाद्य रणे घोरम् एकैकः षष्टिभिः शरैः

jaghnatuḥ samare daityaṃ kṛtāntānalasaṃnibham tamāsādya raṇe ghoram ekaikaḥ ṣaṣṭibhiḥ śaraiḥ

हिन्दी अर्थ

तेषां च नित्यं शुश्रूषां कुर्यात् प्रियहिते रतः तत्तन्निवेदयेत् तेभ्यो मनोवचनकर्मभिः।

English

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अध्याय 150

श्लोक 193

जघ्ने मर्मसु तीक्ष्णाग्रैर् असुरं भीमदर्शनम् ताभ्यां बाणप्रहारैः स किंचिदायस्तचेतनः

jaghne marmasu tīkṣṇāgrair asuraṃ bhīmadarśanam tābhyāṃ bāṇaprahāraiḥ sa kiṃcidāyastacetanaḥ

हिन्दी अर्थ

मत्स्यभगवानूने कहा-राजन्! लकड़ी काटते हुए सत्यवानूके सिरमें पीड़ा उत्पन्न हुई, तब वे पीड़ासे व्याकुल हो पत्नीके पास आकर इस प्रकार कहने लगे--'इस परिश्रमसे मेरे सिरमें बहुत पीड़ा हो रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मैं अन्धकारमें प्रविष्ट हो रहा हूँ । मुझे कुछ भी सूझ नहीं रहा है। इस समय मैं तुम्हारी गोदमें सिर रखकर सोना चाहता हूँ ।' राजन्! राजपुत्रीसे ऐसा कहकर सत्यवान् उस समय उसको गोदमें सो गये । जब सावित्रीकी गोंदमें सिर रखकर सोते हुए सत्यवानूके नेत्र निद्रावश मुँद

English

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अध्याय 150

श्लोक 194

जग्राह चक्रमष्टारं तैलधौतं रणान्तकम् तेन चक्रेण सो ऽश्विभ्यां चिछेद रथकूबरम्

jagrāha cakramaṣṭāraṃ tailadhautaṃ raṇāntakam tena cakreṇa so 'śvibhyāṃ cicheda rathakūbaram

हिन्दी अर्थ

स्थानपर आये हुए सामर्थ्यशाली स्वयं धर्मराजको देखा, जो नीले कमलके-से श्यामवर्णसे सुशोभित और पीताम्बर धारण किये हुए थे। वे चमकती हुई बिजलियोंसे युक्त जलपूर्ण मेघ-जैसे दीख रहे थे तथा सूर्यके समान तेजस्वी मुकुट और दो कुण्डलोंसे सुशोभित थे। उनके वक्ष:स्थलपर हार लटक रहा था। वे बाजूबंदसे विभूषित थे तथा उनके पीछे मृत्युसहित महाकाल भी था। धर्मराजने उस स्थानपर पहुँचकर उस समय सत्यवान्के शरीरसे अंगूठेके परिमाणवाले

English

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अध्याय 150

श्लोक 195

जग्राहाथ धनुर्दैत्यः शरांश्चाशीविषोपमान् ववर्ष भिषजो मूर्ध्नि संछाद्याकाशगोचरम्

jagrāhātha dhanurdaityaḥ śarāṃścāśīviṣopamān vavarṣa bhiṣajo mūrdhni saṃchādyākāśagocaram

हिन्दी अर्थ

पुरुषको पाशमें बाँधकर अपने अधीन किया और उसे खींचकर शीघ्रतापूर्वक दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान किया। तब आलस्यरहित हो सुन्दरी सावित्री पतिको प्राणरहित देखकर जाते हुए धर्मराजके पीछे-पीछे चली और काँपते हुए हृदयसे अञ्जलि बाँधकर धर्मराजसे बोली--'माताकी भक्तिसे इस लोक, पिताकी भक्तिसे मध्यम लोक और गुरुको शुश्रूषासे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। जो इन तीनोंका आदर करता है, उसने मानो सभी धर्मोका पालन कर लिया तथा जिसने इन तीनोंका आदर नहीं किया, उसकी सारी सत्क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। जबतक ये तीनों जीवित रहें, तबतक किसी अन्य धर्मके पालनकी आवश्यकता नहीं है। उनके प्रिय एवं सुखके कार्योमें

English

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अध्याय 150

श्लोक 196

तावप्यस्त्रैश्चिछिदतुः शितैस्तैर्दैत्यसायकान् तच्च कर्म तयोर्दृष्ट्वा विस्मितः कोपमाविशत्

tāvapyastraiścichidatuḥ śitaistairdaityasāyakān tacca karma tayordṛṣṭvā vismitaḥ kopamāviśat

हिन्दी अर्थ

तत्पर रहकर नित्य उनको शुश्रूषा करनी चाहिए। उनकी आज्ञासे यदि कभी परतन्त्रता भी स्वीकार करनी पड़े तो वह सब मन-वचन-कर्मद्वारा उन्हें निवेदित कर देना चाहिए। पुरुषके सारे कर्म माता, पिता और गुरु--इन्हीं त्रिष्वप्येतेषु कृत्यं हि पुरुषस्य समाप्यते॥ १४ तीनोंमें समाप्त हो जाते हैं

English

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अध्याय 150

श्लोक 197

महता स तु कोपेन सर्वायोमयसादनम् जग्राह मुद्गरं भीमं कालदण्डविभीषणम्

mahatā sa tu kopena sarvāyomayasādanam jagrāha mudgaraṃ bhīmaṃ kāladaṇḍavibhīṣaṇam

हिन्दी अर्थ

कामेन निवर्तयाशु धर्मो न तेभ्योऽपि हि उच्यते च। विनिवर्तस्व धर्मज्ञे ग्लानिर्भवति तेऽधुना पतिर्हि हैवतं स्त्रीणां पतिरेव परायणम्।

English

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अध्याय 150

श्लोक 198

स ततो भ्राम्य वेगेन चिक्षेपाश्विरथं प्रति तं तु मुद्गरम् आयान्तम् आलोक्याम्बरगोचरम्

sa tato bhrāmya vegena cikṣepāśvirathaṃ prati taṃ tu mudgaram āyāntam ālokyāmbaragocaram

हिन्दी अर्थ

अमितस्य प्रदातारं भर्तारं का न पूजयेत् पतिमादाय गच्छन्तमनुगन्तुमहं यदा। त्वां देव न हि शक्ष्यामि तदा त्यक्ष्यामि जीवितम्

English

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अध्याय 150

श्लोक 199

त्यक्त्वा रथौ तु तौ वेगाद् आप्लुतौ तरसाश्विनौ तौ रथौ स तु निष्पिष्य मुद्गरो ऽचलसंनिभः

tyaktvā rathau tu tau vegād āplutau tarasāśvinau tau rathau sa tu niṣpiṣya mudgaro 'calasaṃnibhaḥ

हिन्दी अर्थ

मनस्विनी तु या काचिद्वैधव्याक्षरदूषिता। मुहूर्तमपि जीवेत मण्डनाहा ह्यमण्डिता विनष्टचक्षुषो राज्यं चक्षुषा सह कारय। च्युतराष्ट्रस्य धर्मज्ञ श्वशुरस्य महात्मनः यमराजने कहा-तुम हमसे जिस कामनाको पूर्ण करानेके लिये आ रही हो उस कामनाको छोड़ दो और शीघ्र लौट जाओ। सचमुच संसारमें माता-पिता तथा गुरुकी सेवासे बढ़कर कोई अन्य धर्म नहीं है। तुम्हारे

English

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अध्याय 150

श्लोक 200

दारयामास धरणीं हेमजालपरिष्कृतः तस्य कर्माश्विनौ दृष्ट्वा भिषजौ चित्रयोधिनौ

dārayāmāsa dharaṇīṃ hemajālapariṣkṛtaḥ tasya karmāśvinau dṛṣṭvā bhiṣajau citrayodhinau

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार पीछे-पीछे आनेसे मेरे काममें विघ्न पड़ रहा है और तुम भी थकावटसे चूर हो रही हो। इसलिये मैं इस समय तुमसे ऐसा कह रहा हूँ। धर्मज्ञे! तुम्हारा पति सचमुच गुरुजनोंकी पूजामें प्रेम करनेवाला है और तुम भी पतिव्रता साध्वी हो। इस समय तुम्हें कष्ट हो रहा है, अतः तुम लौट जाओ

English

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अध्याय 150

श्लोक 201

वज्रास्त्रं तु प्रकुर्वाते दानवेन्द्रनिवारणम् ततो वज्रमयं वर्षं प्रावर्तद् अतिदारुणम्

vajrāstraṃ tu prakurvāte dānavendranivāraṇam tato vajramayaṃ varṣaṃ prāvartad atidāruṇam

हिन्दी अर्थ

सावित्री बोली--स्त्रियोंका पति ही देवता है, पति ही उसको शरण देनेवाला है, इसलिये साध्वी रित्रयोंको प्राणपति प्रियतमका अनुगमन करना चाहिए। पिता, भाई तथा पुत्र परिमित सम्पत्ति देनेवाले हैं, किंतु पति अपरिमित सम्पत्तिका दाता है। भला, ऐसे पतिकी कौन स्त्री पूजा नहीं करेगी। सुरोत्तम! आप मेरे पतिको जहाँ ले जा रहे हैं अथवा स्वयं जहाँ जा रहे हैं, वहीं मुझे भी यथाशक्ति जाना चाहिए। देव! मेरे प्राणपतिको ले जाते हुए आपके पीछे चलनेमें यदि मैं समर्थ न हो सकूँगी तो प्राणोंको त्याग दूँगी । जो कोई मनस्विनी स्त्री वैधव्य-धर्मसे दूषित होकर मुहूर्तभर जीवित रहती है तो वह सभी आभूषणोंसे अलंकृत होते हुए भी भाग्यहीन है ॥१७--२१॥

English

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अध्याय 150

श्लोक 202

घोरवज्रप्रहारैस्तु दैत्येन्द्रः स परिष्कृतः रथो ध्वजो धनुश्चक्रं कवचं चापि काञ्चनम्

ghoravajraprahāraistu daityendraḥ sa pariṣkṛtaḥ ratho dhvajo dhanuścakraṃ kavacaṃ cāpi kāñcanam

हिन्दी अर्थ

यमने कहा-महाभाग्यशालिनी पतिव्रते ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, अतः शुभे! सत्यवानके प्राणोंको छोड़कर कोई भी वरदान माँग लो, देर मत करो सावित्री बोली धर्मज्ञ! जो राज्यसे च्युत हो गये हैं तथा जिनकी आँखें नष्ट हो गयी हैं, ऐसे मेरे महात्मा श्वशुरको राज्य और नेत्रसे संयुक्त कर दीजिये

English

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अध्याय 150

श्लोक 203

क्षणेन तिलशो जातं सर्वसैन्यस्य पश्यतः तद्दृष्ट्वा दुष्करं कर्म सो ऽश्विभ्यां भीमविक्रमः

kṣaṇena tilaśo jātaṃ sarvasainyasya paśyataḥ taddṛṣṭvā duṣkaraṃ karma so 'śvibhyāṃ bhīmavikramaḥ

हिन्दी अर्थ

यमराजने कहा--भद्रे! तुम बहुत दूरतक चली आयी हो, अतः अब लौट जाओ। तुम्हारी यह सब अभिलाषा पूर्ण होगी। तुम्हारे मेरे पीछे चलनेसे' मेरे काममें विघ्न पड़ेगा और तुम्हें भी थकावट होगी, इसीलिये इस समय मैं तुमसे ऐसा कह रहा हूँ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्रुपाख्याने प्रथमवरलाभो नाम दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

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अध्याय 150

श्लोक 204

नारायणास्त्रं बलवान् मुमोच रणमूर्धनि वज्रास्त्रं शमयामास दानवेन्द्रो ऽस्त्रतेजसा

nārāyaṇāstraṃ balavān mumoca raṇamūrdhani vajrāstraṃ śamayāmāsa dānavendro 'stratejasā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें प्रथम वरलाभ नामक दो सौ दसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ सावित्रीको यमराजसे द्वितीय वरदानकी प्राप्ति

English

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अध्याय 150

श्लोक 205

तस्मिन्प्रशान्ते वज्रास्त्रे कालनेमिरनन्तरम् जीवग्राहं ग्राहयितुम् अश्विनौ तु प्रचक्रमे

tasminpraśānte vajrāstre kālanemiranantaram jīvagrāhaṃ grāhayitum aśvinau tu pracakrame

हिन्दी अर्थ

अकारणजगद्वैरिखलेभ्यो जायते तथा त्यजत्यसूनयं लोकस्तृणवद् यस्य कारणात्। परोपघातशक्तास्तं परलोकं तथासतः

English

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अध्याय 150

श्लोक 206

तावश्विनौ रणाद्भीतौ सहस्राक्षरथं प्रति प्रयातौ वेपमानौ तु पदा शस्त्रविवर्जितौ

tāvaśvinau raṇādbhītau sahasrākṣarathaṃ prati prayātau vepamānau tu padā śastravivarjitau

हिन्दी अर्थ

निकायेषु निकायेषु तथा ब्रह्मा जगदुरुः। असतामुपघाताय राजानं ज्ञातवान् स्वयम्

English

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अध्याय 150

श्लोक 207

तयोरनुगतो दैत्यः कालनेमिर्महाबलः प्राप्येन्द्रस्य रथं क्रूरो दैत्यानीकपदानुगः

tayoranugato daityaḥ kālanemirmahābalaḥ prāpyendrasya rathaṃ krūro daityānīkapadānugaḥ

हिन्दी अर्थ

नरान् परीक्षयेद् राजा साधून् सम्मानयेत् सदा । निग्रहं चासतां कुर्यात् स लोके लोकजित्तमः ७ निग्रहेणासतां राजा सतां च परिपालनात्। एतावदेव कर्तव्यं राज्ञा स्वर्गमभीप्सुना

English

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अध्याय 150

श्लोक 208

तं दृष्ट्वा सर्वभूतानि वित्रेसुर्विह्वलानि तु दृष्ट्वा दैत्यस्य तत्क्रौर्यं सर्वभूतानि मेनिरे

taṃ dṛṣṭvā sarvabhūtāni vitresurvihvalāni tu dṛṣṭvā daityasya tatkrauryaṃ sarvabhūtāni menire

हिन्दी अर्थ

राजकृत्यं हि लोकेषु नास्त्यन्यज्जगतीपते। असतां निग्रहादेव सतां च परिपालनात् तेन त्वमधिको देवो देवेभ्यः प्रतिभासि मे

English

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अध्याय 150

श्लोक 209

पराजयं महेन्द्रस्य सर्वलोकक्षयावहम् चेलुः शिखरिणो मुख्याः पेतुरुल्का नभस्तलात्

parājayaṃ mahendrasya sarvalokakṣayāvaham celuḥ śikhariṇo mukhyāḥ peturulkā nabhastalāt

हिन्दी अर्थ

सावित्रीने कहा-देवश्रेष्ठ ! सत्पुरुषोंके साथ समागम होनेपर कैसा परिश्रम? और कैसा दुःख? आप-जैसे महानुभावोंके समीपमें मुझे किसी प्रकारकी भी ग्लानि नहीं है। चाहे साधु प्रकृतिके हों या असाधु प्रकृतिके, सभीके निर्वाहक सदा सत्पुरुष ही होते हैं, किंतु असत्पुरुष न तो सञ्जनोंके काम आ सकते हैं, न असत्पुरुषोंके ही और न स्वयं अपना ही कल्याण कर सकते हें । विष, अग्नि, सर्प तथा शस्त्रसे लोगोंको उतना भय नहीं होता, जितना अकारण जगतूसे वैर करनेवाले दुष्टोसे होता है। जैसे सत्पुरुष अपने प्राणोंका विसर्जन करके भी परोपकार करते हैं, उसी प्रकार दुर्जन भी अपने प्राणोंका परित्याग कर दूसरेको कष्ट देनेमें तत्पर रहते हैं। जिस

English

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अध्याय 150

श्लोक 210

जगर्जुर्जलदा दिक्षु ह्य् उद्भूताश्च महार्णवाः तां भूतविकृतिं दृष्ट्वा भगवान्गरुडध्वजः

jagarjurjaladā dikṣu hy udbhūtāśca mahārṇavāḥ tāṃ bhūtavikṛtiṃ dṛṣṭvā bhagavāngaruḍadhvajaḥ

हिन्दी अर्थ

परलोककी प्रा्तिके लिये सत्पुरुष अपने प्राणोंको भी तृणके समान त्याग देते हैं, उसी परलोककी परायी हानिमें निरत रहनेवाले दुर्जन कुछ भी चिन्ता नहीं करते। स्वयं जगदुरु ब्रह्माने सभी प्राणि-समूहोंमें असत्प्राणियोंके निग्रहके लिये राजाको नियुक्त किया है। राजा सर्वदा पुरुषोंकी परीक्षा करे। जो सज्जन हों उनका आदर करे और दुष्टोंको दण्ड दे। जो ऐसा करता है, वह सभी लोकविजेता राजाओंमें श्रेष्ठ है। सत्पुरुषोंको सम्मान देने

English

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अध्याय 150

श्लोक 211

व्यबुध्यताहिपर्यङ्के योगनिद्रां विहाय तु लक्ष्मीकरयुगाजस्रलालिताङ्घ्रिसरोरुहः

vyabudhyatāhiparyaṅke yoganidrāṃ vihāya tu lakṣmīkarayugājasralālitāṅghrisaroruhaḥ

हिन्दी अर्थ

तथा दुष्टोंका निग्रह करनेके कारण ही वह राजा है।. स्वर्ग-प्रा्िकी इच्छा करनेवाले राजाको इन दोनों कार्योंका पालन करना चाहिए। जगतीपते! राजाओंके लिये सत्पुरुषोंके परिपालन तथा दुष्टोंके नियमनके अतिरिक्त दूसरा कोई राजधर्म संसारमें नहीं है। उन राजाओंद्वारा भी जो दुष्ट शासित नहीं किये जा सकते, ऐसे दुर्जनोंके शासक आप हैं, इसी कारण आप मुझे सभी देवताओंसे अधिक महत्त्वशाली देवता प्रतीत हो रहे हैं। यह जगत् सत्पुरुषोंद्वारा धारण किया जाता है तथा आप उन सत्पुरुषोंके अग्रणी हैं, इसलिये देव! आपके पीछे चलते

English

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अध्याय 150

श्लोक 212

शरदम्बरनीलाब्जकान्तदेहछविर्विभुः कौस्तुभोद्भासितोरस्कः कान्तकेयूरभास्वरः

śaradambaranīlābjakāntadehachavirvibhuḥ kaustubhodbhāsitoraskaḥ kāntakeyūrabhāsvaraḥ

हिन्दी अर्थ

तेन त्वामनुयान्त्या मे क्लमो देव न विद्यते॥ १९ हुए मुझे कुछ भी क्लेश नहीं है तुष्टोऽस्मि ते विशालाक्षि वचनैर्धर्मसङ्गतैः। विना सत्यवतः प्राणाद् वरं वरय मा चिरम्

English

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अध्याय 150

श्लोक 213

विमृश्य सुरसंक्षोभं वैनतेयं समाह्वयत् आहूते ऽवस्थिते तस्मिन् नागावस्थितवर्ष्मणि

vimṛśya surasaṃkṣobhaṃ vainateyaṃ samāhvayat āhūte 'vasthite tasmin nāgāvasthitavarṣmaṇi

हिन्दी अर्थ

सहोदराणां भ्रातृणां कामयामि शतं विभो। अनपत्यः पिता प्रीतिं पुत्रलाभात् प्रयातु मे और्ध्वदेहिककार्येषु यत्नं भर्तुः समाचर नानुगन्तुमयं शक्यस्त्वया लोकान्तरं गतः। पतिव्रतासि तेन त्वं मुहूर्त मम यास्यसि

English

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अध्याय 150

श्लोक 214

दिव्यनानास्त्रतीक्ष्णार्चिर् आरुह्यागात् सुरान्स्वयम् तत्रापश्यत देवेन्द्रम् अभिद्रुतमभिप्लुतैः

divyanānāstratīkṣṇārcir āruhyāgāt surānsvayam tatrāpaśyata devendram abhidrutamabhiplutaiḥ

हिन्दी अर्थ

एतावदेव कर्तव्यं पुरुषेण विजानता। मातुः पितुश्च शुश्रूषा गुरोश्च वरवर्णिनि तपसा ब्रह्मचर्येण अग्निशुश्रूषया शुभे। पुरुषाः स्वर्गमायान्ति गुरुशुश्रूषया तथा

English

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अध्याय 150

श्लोक 215

दानवेन्द्रैर्नवाम्भोदसच्छायैः पौरुषोत्कटैः यथा हि पुरुषं घोरैर् अभाग्यैर्वंशशालिभिः

dānavendrairnavāmbhodasacchāyaiḥ pauruṣotkaṭaiḥ yathā hi puruṣaṃ ghorair abhāgyairvaṃśaśālibhiḥ

हिन्दी अर्थ

आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः। माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता वै मूर्तिरात्मनः न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तु वर्षशतैरपि न च तैरननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत्

English

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अध्याय 150

श्लोक 216

परित्राणायाशु कृतं सुक्षेत्रे कर्म निर्मलम् अथापश्यन्त दैतेया वियति ज्योतिर्मण्डलम्

paritrāṇāyāśu kṛtaṃ sukṣetre karma nirmalam athāpaśyanta daiteyā viyati jyotirmaṇḍalam

हिन्दी अर्थ

त एव हि त्रयो लोकास्त एव त्रय आश्रमाः। त एव च त्रयो वेदास्तथैवोक्तास्त्रयोऽग्नयः यमराज बोले--विशालाक्षि! तुम्हारे इन धर्मयुक्त वचनोंसे मैं प्रसन्न हूँ, अतः सत्यवानुके प्राणोंके अतिरिक्त दूसरा वर माँग लो, देर न करो

English

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अध्याय 150

श्लोक 217

स्फुरन्तमुदयाद्रिस्थं सूर्यमुष्णत्विषा इव प्रभावं ज्ञातुमिच्छन्तो दानवास्तस्य तेजसः

sphurantamudayādristhaṃ sūryamuṣṇatviṣā iva prabhāvaṃ jñātumicchanto dānavāstasya tejasaḥ

हिन्दी अर्थ

सावित्रीने कहा-विभो ! मैं सौ सहोदर भाइयोंकी अभिलाषिणी हूँ । मेरे पिता पुत्रहीन हैं, अतः वे पुत्रलाभसे प्रसन्न हों तब यमराजने सावित्रीसे कहा--' अनिन्दिते ! तुम जैसे आयी हो, वैसे ही लौट जाओ तथा अपने पतिके और्ध्वहैहिक क्रियाओंके लिये यत्र करो। अब यह दूसरे लोकमें चला गया है, अत: तुम इसके पीछे नहीं चल मेरे साथ चल सकती हो। भद्रे! सत्यवानूने गुरुजनोंकी शुश्रूषा कर महान् पुण्य अर्जित किया है, अतः मैं स्वयं इसे ले जा रहा हूँ। सुन्दरि! विद्वान् पुरुषको माता, पिता तथा गुरुको सेवामें सदा तत्पर रहना चाहिए। सत्यवानूने वनमें

English

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अध्याय 150

श्लोक 218

गरुत्मन्तमपश्यन्तः कल्पान्तानलसंनिभम् तमास्थितं च मेघौघद्युतिमक्षयमच्युतम्

garutmantamapaśyantaḥ kalpāntānalasaṃnibham tamāsthitaṃ ca meghaughadyutimakṣayamacyutam

हिन्दी अर्थ

इन तीनोंको अपनी शुश्रूषासे प्रसन्न किया है। शुभे! इसके साथ तुमने भी स्वर्गको जीत लिया है । शुभे ! मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्यं तथा अग्नि और गुरुकी शुश्रूषासे स्वर्गको प्राप्त करते हैं, अतः विशेषरूपसे ब्राह्मणको आचार्य, पिता, माता तथा बड़े भाईका कभी अपमान नहीं करना चाहिए; क्योंकि आचार्य ब्रह्माका, पिता प्रजापतिका, माता पृथ्वीका और भाई अपना ही स्वरूप है। मनुष्यके जन्मके समय माता और पिता जो कष्ट सहन करते हैं, उसका बदला सैकड़ों

English

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अध्याय 150

श्लोक 219

तम् आलोक्यासुरेन्द्रास्तु हर्षसम्पूर्णमानसाः अयं वै देवसर्वस्वं जिते ऽस्मिन्निर्जिताः सुराः

tam ālokyāsurendrāstu harṣasampūrṇamānasāḥ ayaṃ vai devasarvasvaṃ jite 'sminnirjitāḥ surāḥ

हिन्दी अर्थ

वर्षोमें भी नहीं चुकाया जा सकता । अतः मनुष्यको माता, पिता तथा आचार्यका सर्वदा प्रिय कार्य करना चाहिए; क्योंकि इन तीनोंके संतुष्ट होनेपर सभी तपस्याएँ सम्पन्न हो जाती हैं। इन तीनोंकी शुश्रूषा परम तपस्या कही गयी है, अत: उनकी आज्ञाके बिना किसी अन्य धर्मका आचरण नहीं करना चाहिए। वे ही तीनों लोक हैं, बे ही तीनों आश्रम वे ही तीनों वेद हैं तथा तीनों अग्नियाँ भी वे ही कहलाते हैं। पिता गार्हपत्याग्नि, माता दक्षिणाग्नि तथा गुरुराहवनीयश्च साग्नित्रेता गरीयसी॥ २६ गुरु आहवनीयाग्नि है। ये तीनों अग्नियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं।

English

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अध्याय 150

श्लोक 220

अयं स दैत्यचक्राणां कृतान्तः केशवो ऽरिहा एनमाश्रित्य लोकेषु यज्ञभागभुजो ऽमराः

ayaṃ sa daityacakrāṇāṃ kṛtāntaḥ keśavo 'rihā enamāśritya lokeṣu yajñabhāgabhujo 'marāḥ

हिन्दी अर्थ

त्रिषु प्रमाद्यते नैषु त्रींल्लोकान् जयते गृही । दीप्यमानः स्ववपुषा देववद् दिवि मोदते कामेन निवर्त भद्रे

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।