Matsya Purana
47
अध्याय 47 / 176

Adhyaya 47

263 श्लोकभाग 3/4 · श्लोक 136–207

पूर्ण अध्याय पाठ72 श्लोक

अध्याय 47

श्लोक 136

बहुनेत्राय धुर्याय त्रिनेत्रायेश्वराय च कपालिने च वीराय मृत्यवे त्र्यम्बकाय च

bahunetrāya dhuryāya trinetrāyeśvarāya ca kapāline ca vīrāya mṛtyave tryambakāya ca

हिन्दी अर्थ

कार्यमें केवल (कुछ) मन्त्रोंका ही भेद है। विधि- विधान प्रायः एक-से ही हैं। उपर्युक्त विधिका यदि पूर्णतया पालन करनेकी शक्ति न हो तो आधे व्ययसे भी यह कार्य सम्पन्न हो सकता है। यह बात ब्रह्माजीने कही है। किंतु इस अल्प विधानमें भी मनुष्यको कृपणताका त्याग कर एकाग्नि ब्राह्मणकी भाँति दान आदि करना चाहिए॥ ४०--५२॥

English

This incarnation will destroy all the wicked ones and the hypocrites; and, with a large army of the Brilunanas, He will kill iudra Kings and drive away all hypocrisy. After killing the enemies of Bralimanas and other enemies, fie will marcli on with flis army in the of the Kaliyiiga, and thou, after purifying the jJudras, will cross the ocean, where He will destroy the sinful mixed castes and, thus fulfilling His mission, He will educate his peoples.— 249-253.

अध्याय 47

श्लोक 137

बभ्रवे च पिशङ्गाय पिङ्गलायारुणाय च पिनाकिने चेषुमते चित्राय रोहिताय च

babhrave ca piśaṅgāya piṅgalāyāruṇāya ca pinākine ceṣumate citrāya rohitāya ca

हिन्दी अर्थ

जिस पोखरेमें केवल वर्षाकालमें ही जल रहता है, वह अग्निष्टोम-यज्ञके बराबर फल देनेवाला होता है। जिसमें शरत्कालतक जल रहता हो, उसका भी यही फल है। हेमन्त और शिशिरकालतक रहनेवाला जल क्रमशः वाजपेय और अतिरात्र नामक यज्ञका फल देता है। वसन्तकालतक टिकनेवाले जलको अश्वमेध-यज्ञके समान फलदायक बतलाया गया है तथा जो जल ग्रीष्मकालतक वर्तमान रहता है, वह राजसूय-यज्ञसे भी अधिक फल देनेवाला होता है

English

Afterwards, the people, by becoming enraged and deluded with each other, will kill each other to fulfil the future destiny. — 254.

अध्याय 47

श्लोक 138

दुन्दुभ्यायैकपादाय अजाय बुद्धिदाय च आरण्याय गृहस्थाय यतये ब्रह्मचारिणे

dundubhyāyaikapādāya ajāya buddhidāya ca āraṇyāya gṛhasthāya yataye brahmacāriṇe

हिन्दी अर्थ

महाराज! जो मनुष्य पृथ्वीपर इन विशेष धर्माका पालन करता है, वह शुद्धचित्त होकर शिवजीके लोकमें जाता है और वहाँ अनेक कल्पोंतक दिव्य आनन्दका अनुभव करता है।

English

When, in ])rocess of time, the incarnation of Kalki will vanish, then the future kings will be destroyed, through rlie rebellion of their subjects. — 255.

अध्याय 47

श्लोक 139

सांख्याय चैव योगाय व्यापिने दीक्षिताय च अनाहताय शर्वाय भव्येशाय यमाय च

sāṃkhyāya caiva yogāya vyāpine dīkṣitāya ca anāhatāya śarvāya bhavyeśāya yamāya ca

हिन्दी अर्थ

२३८ मत्स्यपुराण अनेकलोकान् स महत्तमादीन् सहैव विष्णोः परमं पदं यत्

English

The people, not finding anyone as their protector, will fight amongst themselves, aij;:/' will tlien land themselves in great troubles after killing one another. — 256.

अध्याय 47

श्लोक 140

रोधसे चेकितानाय ब्रह्मिष्ठाय महर्षये चतुष्पदाय मेध्याय रक्षिणे शीघ्रगाय च

rodhase cekitānāya brahmiṣṭhāya maharṣaye catuṣpadāya medhyāya rakṣiṇe śīghragāya ca

हिन्दी अर्थ

वह पुनः परार्ध (ब्रह्माजीको पिछली आधी आयु)-तक देवाङ्गनाओंके साथ अनेक महत्तम लोकोंका सुख भोगनेके पश्चात् ब्रह्माजीके साथ ही योगबलसे श्रीविष्णुके भूयः॥ ५६ परमपदको प्राप्त होता है

English

All cities and villages will be devastated, and the duties of castes and the stagps of life will disappear. — 257.

अध्याय 47

श्लोक 141

शिखण्डिने करालाय दंष्ट्रिणे विश्ववेधसे भास्वराय प्रतीताय सुदीप्ताय सुमेधसे

śikhaṇḍine karālāya daṃṣṭriṇe viśvavedhase bhāsvarāya pratītāya sudīptāya sumedhase

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तडागविधिर्नामाष्टपञ्चाशोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तडागविधि नामक अट्टावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ वृक्ष लगानेकी विधि

English

At that juucture— the end of the Iron Age— men will open markets to sell boile<l rice, the Brlhmanas will sell the Vedas and the women will earn their living by selling their hair.— 258.

अध्याय 47

श्लोक 142

क्रूरायाविकृतायैव भीषणाय शिवाय च सौम्याय चैव मुख्याय धार्मिकाय शुभाय च

krūrāyāvikṛtāyaiva bhīṣaṇāya śivāya ca saumyāya caiva mukhyāya dhārmikāya śubhāya ca

हिन्दी अर्थ

विधिना केन कर्तव्यं पादपोद्यापनं बुधैः। ये च लोकाः स्मृतास्तेषां तानिदानीं वदस्व न: ॥ सूच्या सौवर्णया कार्य सर्वेषां कर्णवेधनम्।

English

People will be very short of stature, and they will be short-lived. They will make forest, as tlieir place of dwelling, or they will reside by rivers and hills, subsisting on roots, fruits and leaves. — 259.

अध्याय 47

श्लोक 143

अवध्यायामृतायैव नित्याय शाश्वताय च व्यापृताय विशिष्टाय भरताय च साक्षिणे

avadhyāyāmṛtāyaiva nityāya śāśvatāya ca vyāpṛtāya viśiṣṭāya bharatāya ca sākṣiṇe

हिन्दी अर्थ

फलानि सप्त चाष्टौ वा कलधौतानि कारयेत्। ऋषियोंने पूछा--सूतजी ! अब आप हमें विस्तारके साथ वृक्ष लगानेकी यथार्थ विधि बतलाइये। विद्वानोंको किस विधिसे वृक्ष लगाने चाहिए तथा वृक्षारोपण करनेवालोंके लिये जिन लोकोंकी प्राप्ति बतलायी गयी है, उन्हें भी आप इस समय हमलोगोंको बतलाइये

English

They will clothe themsevles with tattered clothes, the deer-skin, <tc. All the castes will mingle into one mass, and the people will be reduced to penury and will find themselves in great distress and subjected to many troubles.— 260.

अध्याय 47

श्लोक 144

क्षेमाय सहमानाय सत्याय चामृताय च कर्त्रे परशवे चैव शूलिने दिव्यचक्षुषे

kṣemāya sahamānāya satyāya cāmṛtāya ca kartre paraśave caiva śūline divyacakṣuṣe

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं- यही प्रश्न जब मनुने मत्स्य- भगवान्से किया था तो इसे उनसे मत्स्य (भगवान्)- ने कहा था। जगदीश्वर! मैं बगीचेमें वृक्षोंके लगानेको विधि तुम्हें बतलाता हूँ। तड़ागकी प्रतिष्ठाके विषयमें जो विधान बतलाया गया है, उसीके समान सारी विधि समझनी चाहिए। इसमें भी ऋत्विज्, मण्डप, सामग्री और आचार्यको पूर्ववत् रखे। उसी प्रकार सुवर्ण, वस्त्र और चन्दनद्वारा ब्राह्मणोंकी पूजा भी करनी चाहिए।

English

Being thus tormented with myriads of troubles and difficulties, all the population will become annihilated along with the end of the Kali- yuga.— 281.

अध्याय 47

श्लोक 145

सोमपायाज्यपायैव धूमपायोष्मपाय च शुचये परिधानाय सद्योजाताय मृत्यवे

somapāyājyapāyaiva dhūmapāyoṣmapāya ca śucaye paridhānāya sadyojātāya mṛtyave

हिन्दी अर्थ

रोपे गये पौधोंको सर्वौषधिमिश्रित जलसे सींचे। फिर उनके ऊपर दही और अक्षत छोड़े। उसके बाद उन्हें पुष्पमालाओंसे अलंकृत कर वस्त्रोसे परिवेष्टित कर दे। सोनेकी सूईसे सबका कर्णवेध करे। उसी प्रकार सोनेको सलाईसे अञ्जन भी लगाना चाहिए। सात अथवा आठ सुवर्णके फल बनवावे, फिर इन फलोंके साथ सभी वृक्षोंको वेदीपर स्थापित कर दे। वहाँ गुग्गुलका धूप देना श्रेष्ठ माना गया है । वृक्षोंको पृथक्-पृथक् ताम्रपात्रमे रखकर उन्हें सप्तधान्यसे आवृत करे तथा उनके ऊपर वस्त्र और चन्दन चढ़ाये। नरेश्वर! फिर प्रत्येक वृक्षके पास कलश-स्थापन करके उन सभी कलशोंमें स्वर्ण-

English

Satyayuga (the Age of Truth) will follow on the heels of the dis- appearing Kajiyuga. " This is the narration of the doing of the Devas and the Asuras that I have related at some length to you, 0 sages; now hear an account of YaduvaipsSa, Tiirvasu, Puru, Druhya, Au, along with the glory of Vignii." — 262-263.

अध्याय 47

श्लोक 146

पिशिताशाय सर्वाय मेघाय विद्युताय च व्यावृत्ताय वरिष्ठाय भरिताय तरक्षवे

piśitāśāya sarvāya meghāya vidyutāya ca vyāvṛttāya variṣṭhāya bharitāya tarakṣave

हिन्दी अर्थ

सहिरण्यानशेषांस्तान् कृत्वा बलिनिवेदनम्॥ ८ खण्ड डाले, फिर बलि प्रदान करके उनकी पूजा करे। यथास्वं लोकपालानामिन्द्रादीनां विशेषत: । वनस्पतेश्च विद्वद्धि्होमः कार्यो द्विजातिभि:

English

Here ends the Forty-seoenth chapter dealing with the curse of ukra on Asuras and the ten Incarnations.

अध्याय 47

श्लोक 147

त्रिपुरघ्नाय तीर्थाया-वक्राय रोमशाय च तिग्मायुधाय व्याख्याय सुसिद्धाय पुलस्तये

tripuraghnāya tīrthāyā-vakrāya romaśāya ca tigmāyudhāya vyākhyāya susiddhāya pulastaye

हिन्दी अर्थ

सकांस्यदोहां सौवर्ण शुङ्गाभ्यामतिशालिनीम्। पयस्विनीं वृक्षमध्यादुत्सृजेद् गामुदङ्मुखीम् वासोभिः शयनीयैश्च तथोपस्करपादुकैः। क्षीरेण भोजनं दद्याद् यावद्दिनचतुष्टयम् होमश्च सर्षपैः कार्यो यवैः कृष्णतिलैस्तथा।

English

Samkrit Texi$, pp. I61-ia6,

अध्याय 47

श्लोक 148

रोचमानाय चण्डाय स्फीताय ऋषभाय च व्रतिने युञ्जमानाय शुचये चोर्ध्वरेतसे

rocamānāya caṇḍāya sphītāya ṛṣabhāya ca vratine yuñjamānāya śucaye cordhvaretase

हिन्दी अर्थ

सर्वान् कामानवाप्नोति फलं चानन्त्यमश्नुते सोऽपि स्वर्गे वसेद् राजन् यावदिन्द्रायुतत्रयम्

English

TEB MAT8YA PURAEAM.

अध्याय 47

श्लोक 149

असुरघ्नाय स्वाघ्नाय मृत्युघ्ने यज्ञियाय च कृशानवे प्रचेताय वह्नये निर्मलाय च

asuraghnāya svāghnāya mṛtyughne yajñiyāya ca kṛśānave pracetāya vahnaye nirmalāya ca

हिन्दी अर्थ

भूतान् भव्यांश्च मनुजांस्तारयेद् द्रुमसम्मितान्। परमां सिद्धिमाप्रोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम् रातमें विद्वान् द्विजातियोंद्वारा इन्द्रादि लोकपालों तथा वनस्पतिके निमित्त वित्तानुसार हवन कराये। तदनन्तर दूध देनेवाली एक गौको लाकर उसे श्वेत वस्त्र ओढ़ाये। उसके मस्तकपर सोनेकी कलगी लगाये, सींगोंको सोनेसे मँढा दे। उसको दूहनेके लिये काँसेकी दोहनी प्रस्तुत करे। इस प्रकार अत्यन्त शोभासम्पन्न उस गौको उत्तराभिमुख खड़ी करके वृक्षोंके बीचसे छोड़े। तत्पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मण बाजों और मङ्गलगीतोंकी ध्वनिके साथ

English

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अध्याय 47

श्लोक 150

रक्षोघ्नाय पशुघ्नायाविघ्नाय श्वसिताय च विभ्रान्ताय महान्ताय अर्णवे दुर्गमाय च

rakṣoghnāya paśughnāyāvighnāya śvasitāya ca vibhrāntāya mahāntāya arṇave durgamāya ca

हिन्दी अर्थ

अभिषेकके मन्त्र—तीनों वेदोंकी वरुणसम्बन्धिनी ऋचाएँ पढ़ते हुए उक्त कलशोंके जलसे यजमानका अभिषेक करें। अभिषेकके पश्चात् यज्ञकर्ता पुरुष श्वेत वस्त्र धारण करे और अपनी सामर्थ्यके अनुसार सावधानीपूर्वक गौ, सोनेकी जंजीर, कड़े, अँगूठी, पवित्री, वस्त्र, शय्या शय्योपयोगी सामान तथा चरणपादुका देकर सम्पूर्ण ऋत्विजोंका पूजन करे। इसके बाद चार दिनोंतक उन्हें दूधके साथ भोजन कराये तथा सरसोंके दाने, जौ और

English

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अध्याय 47

श्लोक 151

कृष्णाय च जयन्ताय लोकानामीश्वराय च अनाश्रिताय वेध्याय समत्वाधिष्ठिताय च

kṛṣṇāya ca jayantāya lokānāmīśvarāya ca anāśritāya vedhyāya samatvādhiṣṭhitāya ca

हिन्दी अर्थ

काले तिलोंसे होम कराये। होममें पलाश (ढाक) की लकड़ी उत्तम मानी गयी है। वृक्षारोपणके पश्चात् चौथे दिन विशेष उत्सव करे। उसमें भी अपनी शक्तिके अनुसार पुनः उसी प्रकार दक्षिणा दे। जो-जो वस्तु अपनेको अधिक प्रिय हो, ईर्ष्या छोड़कर उस-उसका दान करे। आचार्यको दूनी दक्षिणा दे तथा प्रणाम करके यज्ञको समाप्ति करे जो विद्वान् उपर्युक्त विधिसे वृक्षारोपणका उत्सव करता है, उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा वह अक्षय फलका भागी होता है। राजेन्द्र! जो मनुष्य इस प्रकार एक भी वृक्षकी स्थापना करता है, राजन्! वह

English

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अध्याय 47

श्लोक 152

हिरण्यबाहवे चैव व्याप्ताय च महाय च सुकर्मणे प्रसह्याय चेशानाय सुचक्षुषे

hiraṇyabāhave caiva vyāptāya ca mahāya ca sukarmaṇe prasahyāya ceśānāya sucakṣuṣe

हिन्दी अर्थ

भी जबतक तीस इन्द्र समाप्त हो जाते हैं, तबतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। वह जितने वृक्षोंका रोपण करता है, अपने पहले और पीछेकी उतनी ही पीढ़ियोंका वह उद्धार कर देता है तथा उसे पुनरावृत्तिसे रहित परम सिद्धि प्राप्त होती है। जो मनुष्य प्रतिदिन इस प्रसङ्गको सुनता या सुनाता है, वह भी देवताओंद्वारा सम्मानित

English

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अध्याय 47

श्लोक 153

क्षिप्रेषवे सदश्वाय शिवाय मोक्षदाय च कपिलाय पिशङ्गाय महादेवाय धीमते

kṣipreṣave sadaśvāya śivāya mokṣadāya ca kapilāya piśaṅgāya mahādevāya dhīmate

हिन्दी अर्थ

सोऽपि सम्पूजितो देवैर्ब्रह्मलोके महीयते॥ १९ और ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वृक्षोत्सवो नामैकोनषष्टितमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वृक्षोत्सव नामक उनसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

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अध्याय 47

श्लोक 154

महाकायाय दीप्ताय रोदनाय सहाय च दृढधन्विने कवचिने रथिने च वरूथिने

mahākāyāya dīptāya rodanāya sahāya ca dṛḍhadhanvine kavacine rathine ca varūthine

हिन्दी अर्थ

वृक्ष मुनियों तथा कवियोंको बहुत प्रिय थे। वृक्ष-उद्यानादि रोपण-प्रतिष्ठाकी सभी विधियाँ पद्म, भविष्य, स्कन्दादि पुराणोंमें बहुत विस्तारसे हैं। अमरसिंह, कालिदासादिने भी इनका खूब वर्णन किया है। मत्स्यपुराणमें वृक्षोंका वर्णन बार-बार मिलेगा। सौभाग्यशयन-व्रत तथा जगद्धात्री सतीकी आराधना

English

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अध्याय 47

श्लोक 155

भृगुनाथाय शुक्राय गह्वरेष्ठाय वेधसे अमोघाय प्रशान्ताय सुमेधाय वृषाय च

bhṛgunāthāya śukrāya gahvareṣṭhāya vedhase amoghāya praśāntāya sumedhāya vṛṣāya ca

हिन्दी अर्थ

तथैवान्यत् प्रवक्ष्यामि सर्वकामफलप्रदम्। सौभाग्यशयनं नाम यत् पुराणविदो विदुः पुरा दग्धेषु लोकेषु भूर्भुवःस्वर्महादिषु। ततः कालेन महता पुनः सर्गविधौ नृप। अहङ्कारावृते लोके प्रधानपुरुषान्विते

English

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अध्याय 47

श्लोक 156

नमो ऽस्तु तुभ्यं भगवन् विश्वाय कृत्तिवाससे पशूनां पतये तुभ्यं भूतानां पतये नमः

namo 'stu tubhyaṃ bhagavan viśvāya kṛttivāsase paśūnāṃ pataye tubhyaṃ bhūtānāṃ pataye namaḥ

हिन्दी अर्थ

पिङ्ाकारा समुद्भूता वल्ले््वालातिभीषणा। तयाभितप्तस्य हरेर्वक्षसस्तद् विनिःसृतम् उत्क्षिप्तमन्तरिक्षे तद् ब्रह्मपुत्रेण धीमता। दक्षेण पीतमात्रं तद् रूपलावण्यकारकम्

English

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अध्याय 47

श्लोक 157

प्रणवे ऋग्यजुःसाम्ने स्वाहाय च स्वधाय च वषट्कारात्मने चैव तुभ्यं मन्त्रात्मने नमः

praṇave ṛgyajuḥsāmne svāhāya ca svadhāya ca vaṣaṭkārātmane caiva tubhyaṃ mantrātmane namaḥ

हिन्दी अर्थ

ततस्त्वोषधयो जाताः सप्त सौभाग्यदायिकाः। इक्षवो रसराजश्च निष्पावा राजधान्यकम् विकारवच्च गोक्षीरं कुसुम्भं कुङ्कमं तथा। मत्स्यभगवानूने कहा--राजन्! इसी प्रकार एक दूसरा व्रत बतलाता हूँ, जो समस्त मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है। उसका नाम है--'सौभाग्यशयन'। इसे पुराणोंके विद्वान् ही जानते हैं। पूर्वकालमें जब भूर्लोक,

English

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अध्याय 47

श्लोक 158

त्वष्ट्रे धात्रे तथा कर्त्रे चक्षुःश्रोत्रमयाय च भूतभव्यभवेशाय तुभ्यं कर्मात्मने नमः

tvaṣṭre dhātre tathā kartre cakṣuḥśrotramayāya ca bhūtabhavyabhaveśāya tubhyaṃ karmātmane namaḥ

हिन्दी अर्थ

भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्लोक आदि सम्पूर्ण लोक दग्ध हो गये, तब समस्त प्राणियोंका सौभाग्य एकत्रित हो गया। वह वैकुण्ठलोकमें जाकर भगवान् श्रीविष्णुके वक्षःस्थलमें स्थित हो गया। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् जब पुनः सृष्टि-रचनाका समय आया, तब प्रकृति और पुरुषसे युक्त सम्पूर्ण लोकोंके अहंकारसे आवृत हो जानेपर श्रीब्रह्माजी तथा भगवान् श्रीविष्णुमें स्पर्धा जाग्रत् हुई। उस समय एक पीले रंगकी (अथवा शिवलिङ्गके

English

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अध्याय 47

श्लोक 159

वसवे चैव साध्याय रुद्रादित्यसुराय च विषाय मारुतायैव तुभ्यं देवात्मने नमः

vasave caiva sādhyāya rudrādityasurāya ca viṣāya mārutāyaiva tubhyaṃ devātmane namaḥ

हिन्दी अर्थ

आकारको) अत्यन्त भयंकर अग्निज्वाला प्रकट हुई। उससे भगवानका वक्षःस्थल तप उठा, जिससे वह सौभाग्यपुञ्ज वहाँसे गलित हो गया। श्रीविष्णुके वक्ष:स्थलका आश्रय लेकर स्थित वह सौभाग्य अभी रसरूप होकर धरतीपर गिरने भी न पाया था कि ब्रह्माजीके बुद्धिमान् पुत्र दक्षने उसे आकाशमें ही रोककर पी लिया। दक्षके पीते ही वह अद्भुत रूप और लावण्य प्रदान करनेवाला सिद्ध हुआ। ब्रह्म-पुत्र दक्षका बल और तेज बढ़ गया। उनके पीनेसे बचा हुआ जो अंश पृथ्वीपर गिर पड़ा, वह आठ भागोंमें बँट गया। उनमेंसे सात भागोंसे सात सौभाग्यदायिनी ओषधियाँ उत्पन्न हुई, जिनके नाम इस प्रकार हैं-ईख, रसराज (पारा), निष्पाव (सेम), राजधान्य

English

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अध्याय 47

श्लोक 160

अग्नीषोमविधिज्ञाय पशुमन्त्रौषधाय च स्वयम्भुवे ह्य् अजायैव अपूर्वप्रथमाय च प्रजानां पतये चैव तुभ्यं ब्रह्मात्मने नमः

agnīṣomavidhijñāya paśumantrauṣadhāya ca svayambhuve hy ajāyaiva apūrvaprathamāya ca prajānāṃ pataye caiva tubhyaṃ brahmātmane namaḥ

हिन्दी अर्थ

(कुसुम नामक) पुष्प, कुङ्कुम (केसर) तथा आठवाँ पदार्थ लवणं चाष्टमं तद्वत् सौभाग्याष्टकमुच्यते॥ ९ नमक है। इन आठोंको सौभाग्याष्टक कहते हैं॥१--९॥

English

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अध्याय 47

श्लोक 161

आत्मेशायात्मवश्याय सर्वेशातिशयाय च सर्वभूताङ्गभूताय तुभ्यं भूतात्मने नमः

ātmeśāyātmavaśyāya sarveśātiśayāya ca sarvabhūtāṅgabhūtāya tubhyaṃ bhūtātmane namaḥ

हिन्दी अर्थ

कहीं-कहीं लिङ्गाकारा पाठ है; जिसका शिव, स्कन्द आदि पुराणोंकी तथा शिवरात्रि-त्रत कथाके लिङ्गोद्भव-वृततान्तसे तात्पर्यं माना जाना चाहिए। पीतं यद् ब्रह्मपुत्रेण योगज्ञानविदा पुनः। दुहिता साभवत् तस्य या सतीत्यभिधीयते

English

TEB MAT8YA PURAEAM.

अध्याय 47

श्लोक 162

निर्गुणाय गुणज्ञाय व्याकृतायामृताय च निरुपाख्याय मित्राय तुभ्यं सांख्यात्मने नमः

nirguṇāya guṇajñāya vyākṛtāyāmṛtāya ca nirupākhyāya mitrāya tubhyaṃ sāṃkhyātmane namaḥ

हिन्दी अर्थ

लोकानतीत्य लालित्याल्ललिता तेन चोच्यते । त्रैलोक्यसुन्दरीमेनामुपयेमे पिनाकधृक् तस्मिन्नहनि सा देवी किल विश्वात्मना सती। पाणिग्रहणकैर्मन्त्रैरवसद् वरवर्णिनी

English

TEB MAT8YA PURAEAM.

अध्याय 47

श्लोक 163

पृथिव्यै चान्तरिक्षाय दिव्याय च महाय च जनस्तपाय सत्याय तुभ्यं लोकात्मने नमः

pṛthivyai cāntarikṣāya divyāya ca mahāya ca janastapāya satyāya tubhyaṃ lokātmane namaḥ

हिन्दी अर्थ

तया सहेव देवेशं तृतीयायामथार्चयेत्। फलैर्नानाविधैर्धूपैदीपैनैवेद्यसंयुतैः प्रतिमां पञ्चगव्येन तथा गन्धोदकेन तु। स्त्रापयित्वार्चयेद् गौरीमिन्दुशेखरसंयुताम् नमोऽस्तु पाटलायै तु पादौ देव्याः शिवस्य तु। शिवायेति च संकीर्त्य जयायै गुल्फयो योः

English

TEB MAT8YA PURAEAM.

अध्याय 47

श्लोक 164

अव्यक्ताय च महते भूतादेरिन्द्रियाय च आत्मज्ञाय विशेषाय तुभ्यं सर्वात्मने नमः

avyaktāya ca mahate bhūtāderindriyāya ca ātmajñāya viśeṣāya tubhyaṃ sarvātmane namaḥ

हिन्दी अर्थ

संकीर्त्य हरिकेशाय तथोरू वरदे नमः ईशायै च कटिं देव्याः शंकरायेति शंकरम्। कुक्षिद्रयं च कोटव्यै शूलिने शूलपाणये

English

TEB MAT8YA PURAEAM.

अध्याय 47

श्लोक 165

नित्याय चात्मलिङ्गाय सूक्ष्मायैवेतराय च बुद्धाय विभवे चैव तुभ्यं मोक्षात्मने नमः

nityāya cātmaliṅgāya sūkṣmāyaivetarāya ca buddhāya vibhave caiva tubhyaṃ mokṣātmane namaḥ

हिन्दी अर्थ

योग और ज्ञानके तत्त्वको जाननेवाले ब्रह्मपुत्र दक्षने पूर्वकालमें जिस सौभाग्य-रसका पान किया था, उसके अंशसे उन्हें एक कन्या उत्पन्न हुई; जिसे सती नामसे अभिहित किया जाता है। अपनी सुन्दरतासे तीनों लोकोंको पराजित कर देनेके कारण वह कन्या लोकमें ललिता के नामसे भी प्रसिद्ध है। पिनाकधारी भगवान् शंकरने उस त्रिभुवनसुन्दरी देवीके साथ विवाह किया। सती तीनों लोकोंकी सौभाग्यरूपा हैं। वे भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं। उनकी भक्तिपूर्वक आराधना करके नर या नारी क्या नहीं प्राप्त कर सकती

English

TEB MAT8YA PURAEAM.

अध्याय 47

श्लोक 166

नमस्ते त्रिषु लोकेषु नमस्ते परतस् त्रिषु सत्यान्तेषु महाद्येषु चतुर्षु च नमो ऽस्तु ते

namaste triṣu lokeṣu namaste paratas triṣu satyānteṣu mahādyeṣu caturṣu ca namo 'stu te

हिन्दी अर्थ

मनुजीने पूछा जनार्दन! जगद्धात्री सतीकी आराधना कैसे की जाती है ? जगन्नाथ! उसके लिये जो विधान हो, वह सब मुझे बतानेको कृपा कीजिये मत्स्यभगवानूने कहा--जनप्रिय! चैत्रमासके शुक्लपक्षकी तृतीयाको दिनके पूर्वभागमें मनुष्य तिलमिश्रित जलसे स्नान करे। उस दिन परम सुन्दरी भगवती सतीका विश्वात्मा भगवान् शंकरके साथ वैवाहिक

English

TEB MAT8YA PURAEAM.

अध्याय 47

श्लोक 167

नमः स्तोत्रे मया ह्य् अस्मिन् यदि न व्याहृतं भवेत् मद्भक्त इति ब्रह्मण्य तत्सर्वं क्षन्तुमर्हसि

namaḥ stotre mayā hy asmin yadi na vyāhṛtaṃ bhavet madbhakta iti brahmaṇya tatsarvaṃ kṣantumarhasi

हिन्दी अर्थ

देवीके साथ ही भगवान् शंकरका भी पूजन करे। पञ्चगव्य तथा चन्दनमिश्रित जलके द्वारा गौरी और भगवान् चन्द्रशेखरकी प्रतिमाको स्नान कराकर धूप, दीप, नैवेद्य तथा नाना प्रकारके फलोंद्वारा उन दोनोंकी पूजा करनी चाहिए। “पाटलायै नमोऽस्तु', ' शिवाय नमः ' इन मन्त्रोंसे क्रमशः पार्वती और शिवके चरणोंका, “जयायै नमः', “शिवाय नमः? से दोनोंकी घुट्टियोंका, 'त्रिगुणाय रुद्राय नमः ', भवान्यै नमः' से गुल्फोंका, ' भद्रेश्वराय नमः ', ' विजयायै नमः ' से घुरनोंका ' हरिकेशाय नमः', “वरदायै नमः” से ऊरुओंका, “शङ्कराय नमः' 'ईशायै नमः' से दोनों कटिभागका, "कोटव्यै नमः ', “शूलिने नमः' से दोनों कुक्षिभागोंका, “शूलपाणये

English

TEB MAT8YA PURAEAM.

अध्याय 47

श्लोक 168

एवमाभाष्य देवेशम् ईश्वरं नीललोहितम् प्रह्वो ऽभिप्रणतस्तस्मै प्राञ्जलिर्वाग्यतो ऽभवत्

evamābhāṣya deveśam īśvaraṃ nīlalohitam prahvo 'bhipraṇatastasmai prāñjalirvāgyato 'bhavat

हिन्दी अर्थ

नमः ', ' मङ्गलायै नमः ' से उदरका पूजन करना चाहिए। "सर्वात्मने नमः', ईशान्यै नमः' से दोनों स्तनोंकी, इसमें वर्णित-'सौभाग्य' एवं “ललिता” देवीके रहस्यका सामञ्जस्य-स्थापन तथा पूर्ण चित्रण भास्कराय भारतीने “ललितासहस्रनाम 'के परम श्रेष्ठ 'सौभाग्य-भास्कर-भाष्य' में मत्स्यपुराणके नामोल्लेखपूर्वक किया है।

English

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अध्याय 47

श्लोक 169

काव्यस्य गात्रं संस्पृश्य हस्तेन प्रीतिमान्भवः निकामं दर्शनं दत्त्वा तत्रैवान्तरधीयत

kāvyasya gātraṃ saṃspṛśya hastena prītimānbhavaḥ nikāmaṃ darśanaṃ dattvā tatraivāntaradhīyata

हिन्दी अर्थ

त्रिपुरघ्नाय विश्वेशमनन्तायै करद्दयम् त्रिलोचनाय च हरं बाहू कालानलप्रिये। नमोऽर्धनारीशहरमसिताङ्गीति नासिकाम्। नम उग्राय लोकेशं ललितेति पुनर्भ्रुवौ

English

TEB MAT8YA PURAEAM.

अध्याय 47

श्लोक 170

ततः सो ऽन्तर्हिते तस्मिन् देवेशे ऽनुचरीं तदा तिष्ठन्तीं पार्श्वतो दृष्ट्वा जयन्तीमिदमब्रवीत्

tataḥ so 'ntarhite tasmin deveśe 'nucarīṃ tadā tiṣṭhantīṃ pārśvato dṛṣṭvā jayantīmidamabravīt

हिन्दी अर्थ

शर्वाय पुरहन्तारं वासव्यै तु तथालकान्। नमः श्रीकण्ठनाथायै शिवकेशांस्ततो ऽर्चयेत्। भीमोग्रसमरूपिण्यै शिरः सर्वात्मने नमः स्थापयेद् घृतनिष्पावकुसुम्भक्षीरजीरकान्

English

TEB MAT8YA PURAEAM.

अध्याय 47

श्लोक 171

कस्य त्वं सुभगे का वा दुःखिते मयि दुःखिता महता तपसा युक्ता किमर्थं मां निषेवसे

kasya tvaṃ subhage kā vā duḥkhite mayi duḥkhitā mahatā tapasā yuktā kimarthaṃ māṃ niṣevase

हिन्दी अर्थ

कर्तव्यं विधिवद् भक्त्या सर्वसौभाग्यमीप्सुभिः शृङ्गोदकं चैत्रमासे वैशाखे गोमयं पुनः क्षीरमाश्वयुजे मासि कार्तिके पृषदाज्यकम्। मार्गे मासे तु गोमूत्रं पौषे सम्प्राशयेद् घृतम्

English

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अध्याय 47

श्लोक 172

अनया संस्तुतो भक्त्या प्रश्रयेण दमेन च स्नेहेन चैव सुश्रोणि प्रीतो ऽस्मि वरवर्णिनि

anayā saṃstuto bhaktyā praśrayeṇa damena ca snehena caiva suśroṇi prīto 'smi varavarṇini

हिन्दी अर्थ

वेदात्मने नमः', 'रूद्राण्यै नमः” से कण्ठकी, "त्रिपुरघ्नाय नमः', 'अनन्तायै नमः” से दोनों हाथोंको पूजा करे फिर 'त्रिलोचनाय नम: ', 'कालानलप्रियायै नमः ' से बाँहोंका, 'सौभाग्यभवनाय नमः ' से आभूषणोंका नित्य पूजन करे। 'स्वाहास्वधायै नमः', 'ईश्वराय नमः' से दोनोंके मुखमण्डलका, ' अशोकमधुवासिन्यै

English

TEB MAT8YA PURAEAM.

अध्याय 47

श्लोक 173

किमिच्छसि वरारोहे कस्ते कामः समृध्यताम् तत्ते सम्पादयाम्यद्य यद्यपि स्यात्सुदुष्करः

kimicchasi varārohe kaste kāmaḥ samṛdhyatām tatte sampādayāmyadya yadyapi syātsuduṣkaraḥ

हिन्दी अर्थ

नम: '--इस मन्त्रसे ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले ओठोंका, “स्थाणवे नमः', ' चन्द्रमुखप्रियायै नमः' से मुँहका, ' अर्धनारीश्वराय नमः ', ' असिताडूयै नमः ' से नासिकाका, 'उग्राय नमः', "ललितायै नमः' से दोनों भौंहोंका, 'शर्वाय नमः', 'वासव्यै नमः” से केशोंका, ' श्रीकण्ठनाथाय नमः' से केवल शिवके बालोंका पूजन करे तथा ' भीमोग्रसमरूपिण्यै नमः ', ' सर्वात्मने नमः ' से दोनोंके मस्तकोंका पूजन करे इस प्रकार शिव और पार्वतीकी विधिवत् पूजा कर उनके आगे सौभाग्याष्टक रखे। निष्पाव (सेम), कुसुम्भ, क्षीरजीरक, रसराज, इक्षु, लवण, कुङ्कुम तथा राजधान्य-इन आठ वस्तुओंको देनेसे सौभाग्यकी प्राप्ति होती है, इसलिये इनकी

English

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अध्याय 47

श्लोक 174

एवमुक्ताब्रवीदेनं तपसा ज्ञातुमर्हसि चिकीर्षितं हि मे ब्रह्मंस् त्वं हि वेत्थ यथातथम्

evamuktābravīdenaṃ tapasā jñātumarhasi cikīrṣitaṃ hi me brahmaṃs tvaṃ hi vettha yathātatham

हिन्दी अर्थ

'सौभाग्याष्टक' संज्ञा है। शत्रुदमन! इस प्रकार शिवपार्वतीके आगे सब सामग्री निवेदन करके रातमें सिंघाड़ा खाकर अथवा श्रृङ्गोदक पान करके भूमिपर शयन करे। फिर सबेरे उठकर स्नान और जप करके पवित्र हो माला, वस्त्र और आभूषणोंके द्वारा ब्राह्मण-दम्पतिका पूजन करे। इसके बाद सौभाग्याष्टकसहित शिव और पार्वतीको सुवर्णमयी प्रतिमाओंको ललितादेवीकी प्रसन्नताके लिये ब्राह्मणको निवेदन करे

English

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अध्याय 47

श्लोक 175

एवमुक्तो ऽब्रवीदेनां दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा मया सह त्वं सुश्रोणि दश वर्षाणि भामिनि

evamukto 'bravīdenāṃ dṛṣṭvā divyena cakṣuṣā mayā saha tvaṃ suśroṇi daśa varṣāṇi bhāmini

हिन्दी अर्थ

मनो! इस प्रकार सम्पूर्ण सौभाग्यकी अभिलाषावाले मनुष्योंको एक वर्षतक प्रत्येक तृतीया तिथिको भक्तिपूर्वक विधिवत् पूजन करना चाहिए। केवल भोजन और दानके मन्त्रॉमें कुछ विशेषता है, उसे मुझसे सुनिये। चैत्रमासमें शृङ्गोदक, वैशाखमें गोबर, ज्येष्ठमें मन्दारका पुष्प, आषाढ्में बिल्वपत्र, श्रावणमें दही, भाद्रपदमें कुशोदक, आश्विनमासमें दूध, कार्तिकमें दही मिला हुआ घी, मार्गशीर्षमासमें गोमूत्र, पौषमें घृत, वासुदेवी तथा गौरी मड्ुुला कमला सती। उमा च दानकाले तु प्रीयतामिति कीर्तयेत्

English

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अध्याय 47

श्लोक 176

सर्वभूतैरदृश्या च संप्रयोगमिहेच्छसि देवि चेन्दीवरश्यामे वरार्हे वामलोचने एवं वृणोषि कामं त्वं मत्तो वै वल्गुभाषिणि

sarvabhūtairadṛśyā ca saṃprayogamihecchasi devi cendīvaraśyāme varārhe vāmalocane evaṃ vṛṇoṣi kāmaṃ tvaṃ matto vai valgubhāṣiṇi

हिन्दी अर्थ

मल्लिकाशोककमलं कदम्बोत्पलमालतीः । कुब्जकं करवीरं च बाणमम्लानकुङ्कमम् सिन्धुवारं च सर्वेषु मासेषु क्रमशः स्मृतम्। जपाकुसुम्भकुसुमं मालती शतपत्रिका

English

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अध्याय 47

श्लोक 177

एवं भवतु गच्छामो गृहान्नो मत्तकाशिनि ततः स्वगृहमागत्य जयन्त्याः पाणिमुद्वहन्

evaṃ bhavatu gacchāmo gṛhānno mattakāśini tataḥ svagṛhamāgatya jayantyāḥ pāṇimudvahan

हिन्दी अर्थ

यथालाभं प्रशस्तानि करवीरं च सर्वदा। एवं संवत्सरं यावदुपोष्य विधिवन्नरः व्रतान्ते शयनं दद्यात् सर्वोपस्करसंयुतम् उमामहेश्वरं हैमं वृषभं च गवां सह। स्थापयित्वाथ शयने ब्राह्मणाय निवेदयेत्

English

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अध्याय 47

श्लोक 178

तया सहावसद्देव्या दश वर्षाणि भार्गवः अदृश्यः सर्वभूतानां मायया संवृतः प्रभुः

tayā sahāvasaddevyā daśa varṣāṇi bhārgavaḥ adṛśyaḥ sarvabhūtānāṃ māyayā saṃvṛtaḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

धान्यालङ्कारगोदानैरभ्यर्चेद् धनसंचयैः। एवं करोति यः सम्यक् सौभाग्यशयनब्रतम्।

English

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अध्याय 47

श्लोक 179

कृतार्थमागतं दृष्ट्वा काव्यं सर्वे दितेः सुताः अभिजग्मुर्गृहं तस्य मुदितास्ते दिदृक्षवः

kṛtārthamāgataṃ dṛṣṭvā kāvyaṃ sarve diteḥ sutāḥ abhijagmurgṛhaṃ tasya muditāste didṛkṣavaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वान् कामानवाप्नोति पदमानन्त्यमश्रुते। फलस्यैकस्य त्यागेन व्रतमेतत् समाचरेत् य इच्छन् कीर्तिमाप्रोति प्रतिमासं नराधिप। सौभाग्यारोग्यरूपायुर्वस्त्रालङ्कारभूषणैः । न वियुक्तो भवेद् राजन् नवार्बुदशतत्रयम् करोति सप्त चाष्टौ वा श्रीकण्ठभवनेऽमंरैः। पूज्यमानो वसेत् सम्यग् यावत्कल्पायुतत्रयम्

English

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अध्याय 47

श्लोक 180

यदा गता न पश्यन्ति मायया संवृतं गुरुम् लक्षणं तस्य तद्बुद्ध्वा प्रतिजग्मुर्यथागतम्

yadā gatā na paśyanti māyayā saṃvṛtaṃ gurum lakṣaṇaṃ tasya tadbuddhvā pratijagmuryathāgatam

हिन्दी अर्थ

सापि तत्फलमाप्नोति देव्यनुग्रहलालिता सोऽपि विद्याधरो भूत्वा स्वर्गलोके चिरं वसेत्

English

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अध्याय 47

श्लोक 181

बृहस्पतिस्तु संरुद्धं काव्यं ज्ञात्वा वरेण तु तुष्ट्यर्थं दश वर्षाणि जयन्त्या हितकाम्यया

bṛhaspatistu saṃruddhaṃ kāvyaṃ jñātvā vareṇa tu tuṣṭyarthaṃ daśa varṣāṇi jayantyā hitakāmyayā

हिन्दी अर्थ

माघमें काला तिल और फाल्गुनमें पञ्चगव्यका प्राशन करना चाहिए तथा दानके समय ललिता, विजया, भद्रा, भवानी, कुमुदा, शिवा, वासुदेवी, गौरी, मङ्गला, कमला, सती और उमा प्रसन्न हों--ऐसा कीर्तन करे। मल्लिका, कुब्जक, करवीर (कनेर), बाण (कचनार या काश), ताजा कुङ्कुम और सिन्दुवार-इनके पुष्प क्रमशः सभी मासोंमें उपयुक्त माने गये हैं। जपाकुसुम, कुसुम्भ- कुसुम, मालती और शतपत्रिकाके पुष्प यदि मिल सकें तो प्रशस्त माने गये हैं, किंतु करवीर (कनेर) पुष्प तो सदा सभी महीनोंमें ग्राह्य है। इस प्रकार एक वर्षतक इस व्रतका विधिपूर्वक अनुष्ठान कर पुरुष, स्त्री या कुमारी भक्तिके साथ शिवजीकी पूजा करे। व्रतकी

English

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अध्याय 47

श्लोक 182

बुद्ध्वा तदन्तरं सो ऽपि दैत्यानामिन्द्रनोदितः काव्यस्य रूपमास्थाय असुरान् समुपाह्वयत्

buddhvā tadantaraṃ so 'pi daityānāmindranoditaḥ kāvyasya rūpamāsthāya asurān samupāhvayat

हिन्दी अर्थ

समासिके समय सम्पूर्ण सामग्रियोसे युक्त शय्या दान करे। उस शय्यापर शिव-पार्वतीकी सुवर्णमयी प्रतिमा और स्वर्णनिर्मित गौके साथ बैलको स्थापित कर ब्राह्मणको दान करे अन्यान्य ब्राह्मण-दम्पतियोंका भी वस्त्र, धान्य, अलंकार, गोदान और प्रचुर धनसे पूजन करना चाहिए। कृपणता छोड़कर दृढ़ निश्चयके साथ भगवानूका पूजन करे। जो मनुष्य इस प्रकार उत्तम सौभाग्यशयन नामक

English

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अध्याय 47

श्लोक 183

ततस्तानागतान्दृष्ट्वा बृहस्पतिरुवाच ह स्वागतं मम याज्यानां प्राप्तो ऽहं वो हिताय च

tatastānāgatāndṛṣṭvā bṛhaspatiruvāca ha svāgataṃ mama yājyānāṃ prāpto 'haṃ vo hitāya ca

हिन्दी अर्थ

व्रतका भलीभाँति अनुष्ठान करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। अथवा (यदि वह निष्कामभावसे इस व्रतको करता है तो) उसे नित्यपदकी प्राप्ति होती है। इस व्रतका आचरण करनेवाले पुरुषको एक फलका परित्याग कर देना चाहिए। राजन्! प्रतिमास इसका आचरण करनेवाला पुरुष यश और कीर्ति प्राप्त करता है। नरेश्वर! (सौभाग्य-शयनका दान करनेवाला पुरुष) सौभाग्य, आरोग्य, सुन्दर रूप, आयु, वस्त्र, अलंकार और आभूषणोंसे नौ अरब तीन सौ वर्षोंतक वञ्चित नहीं होता। जो बारह, आठ या सात वर्षोतक सौभाग्यशयन- ब्रतका अनुष्ठान करता है, वह श्रीकण्ठ (महादेव) के लोकमें देवगणोंद्वारा भलीभाँति पूजित होकर तीस

English

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अध्याय 47

श्लोक 184

अहं वो ऽध्यापयिष्यामि विद्याः प्राप्तास्तु या मया ततस्ते हृष्टमनसो विद्यार्थमुपपेदिरे

ahaṃ vo 'dhyāpayiṣyāmi vidyāḥ prāptāstu yā mayā tataste hṛṣṭamanaso vidyārthamupapedire

हिन्दी अर्थ

कल्योंतक निवास करता है। नरेश्वर! जो विवाहिता स्त्री या कुमारी इस व्रतका पालन करती है, वह भी ललितादेवीके अनुग्रहसे लालित होकर पूर्वोक्त फलको प्रात करती है। जो इस व्रतकी कथाको श्रवण करता है अथवा दूसरोंको इसे करनेकी सलाह देता है, वह भी विद्याधर होकर चिरकालतक स्वर्गलोकमें निवास करता है।

English

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अध्याय 47

श्लोक 185

पूर्णे काव्यस्तदा तस्मिन् समये दशवार्षिके समयान्ते देवयानी तदोत्पन्ना इति श्रुतिः बुद्धिं चक्रे ततः सो ऽथ याज्यानां प्रत्यवेक्षणे

pūrṇe kāvyastadā tasmin samaye daśavārṣike samayānte devayānī tadotpannā iti śrutiḥ buddhiṃ cakre tataḥ so 'tha yājyānāṃ pratyavekṣaṇe

हिन्दी अर्थ

जननाथ ! पूर्वकालमें कामदेवने, राजा शतधन्वाने, कार्तवीर्य अर्जुनने, वरुणदेवने तथा नन्दीने भी इस अद्धुत ब्रतका अनुष्ठान किया था। इस प्रकार इस व्रतके अनुष्ठानसे जैसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है, उसके विषयमें और

English

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अध्याय 47

श्लोक 186

देवि गच्छाम्यहं द्रष्टुं मम याज्याञ्शुचिस्मिते विभ्रान्तवीक्षिते साध्वि त्रिवर्णायतलोचने

devi gacchāmyahaṃ draṣṭuṃ mama yājyāñśucismite vibhrāntavīkṣite sādhvi trivarṇāyatalocane

हिन्दी अर्थ

किमु जननाथ ततो यदुद्भवः स्यात्॥ ४९ अधिक क्या कहा जाय॥ ४३--४९ ॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सौभाग्यशयनब्रतं नाम षष्टितमोऽध्यायः

English

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अध्याय 47

श्लोक 187

एवमुक्ताब्रवीद् एनं भज भक्तान्महाव्रत एष धर्मः सतां ब्रह्मन् न धर्मं लोपयामि ते

evamuktābravīd enaṃ bhaja bhaktānmahāvrata eṣa dharmaḥ satāṃ brahman na dharmaṃ lopayāmi te

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सौभाग्यशयनत्रत नामक साठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ अगस्त्य और वसिष्ठकी दिव्य उत्पत्ति, उर्वशी अप्सराका प्राकट्य और अगस्त्यके लिये अर्घ्य-प्रदान करनेकी विधि एवं माहात्म्य भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकोऽथ महर्जनः । तपः सत्यं च सपैते देवलोकाः प्रकीर्तिताः

English

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अध्याय 47

श्लोक 188

ततो गत्वासुरान्दृष्ट्वा देवाचार्येण धीमता वञ्चितान्काव्यरूपेण ततः काव्यो ऽब्रवीत्तु तान्

tato gatvāsurāndṛṣṭvā devācāryeṇa dhīmatā vañcitānkāvyarūpeṇa tataḥ kāvyo 'bravīttu tān

हिन्दी अर्थ

इह लोके शुभं रूपमायुः सौभाग्यमेव च। तारकः कमलाक्षश्च कालदंष्ट: परावसुः। विरोचनश्च संग्रामादपलायंस्तपोधन

English

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अध्याय 47

श्लोक 189

काव्यं मां वो विजानीध्वं तोषितो गिरिशो विभुः वञ्चिता बत यूयं वै सर्वे शृणुत दानवाः

kāvyaṃ māṃ vo vijānīdhvaṃ toṣito giriśo vibhuḥ vañcitā bata yūyaṃ vai sarve śṛṇuta dānavāḥ

हिन्दी अर्थ

ततः प्रभृति ते देवान् मनुष्यान् सभुजङ्गमान्। सम्पीड्य च मुनीन् सर्वान् प्रविशन्ति पुनर्जलम् जलदुर्गबलाद् ब्रह्मन् पीडयन्ति जगत्त्रयम् नारदजीने पूछा--त्रिपुरविनाशक महेश्वर! भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक-ये सात देवलोक बतलाये गये हैं। इन सबपर क्रमशः आधिपत्य केसे प्राप्त किया जा सकता

English

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अध्याय 47

श्लोक 190

श्रुत्वा तथा ब्रुवाणं तं संभ्रान्तास्ते तदाभवन् प्रेक्षन्तस् ताव् उभौ तत्र स्थितासीनौ सुविस्मिताः

śrutvā tathā bruvāṇaṃ taṃ saṃbhrāntāste tadābhavan prekṣantas tāv ubhau tatra sthitāsīnau suvismitāḥ

हिन्दी अर्थ

है ? तथा नाथ! इस लोकमें सुन्दर रूप, दीर्घायु, सौभाग्य और विपुल लक्ष्मीकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? (कुपया इसे बतलाइये) भगवान् महेश्वरने कहा--तपोधन ! पूर्वकालकी बात है, एक बार इन्द्रने भूतलपर देवद्रोही असुरोंका विनाश करनेके लिये वायुके साथ अग्निको आज्ञा दी। तब अग्निद्वारा हजारों दानवोंको जलाकर भस्म कर दिये

English

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अध्याय 47

श्लोक 191

सम्प्रमूढास् ततः सर्वे न प्राबुध्यन्त किंचन अब्रवीत् सम्प्रमूढेषु काव्यस्तानसुरांस्तदा

sampramūḍhās tataḥ sarve na prābudhyanta kiṃcana abravīt sampramūḍheṣu kāvyastānasurāṃstadā

हिन्दी अर्थ

जानेपर तारक, कमलाक्ष, कालदंष्ट, परावसु और विरोचन आदि प्रधान दानव रणभूमिसे भाग खड़े हुए और समुद्रके जलमें प्रविष्ट होकर (वहाँ छिपकर) निवासस्थान बनाकर रहने लगे। उस समय अग्नि और वायुने भी “अब ये सर्वथा अशक्त, निर्जीव हो गये हैं'--ऐसा समझकर उनकी उपेक्षा कर दी। तबसे वे दानव जलसे निकलकर देवताओं, नागों (सामान्य) मनुष्यों और समस्त मुनियोंको बुरी तरह पीड़ित कर पुनः जलमें प्रविष्ट हो जाते थे। ब्रह्मन्! इस प्रकार वे पाँच-सात ही दानववीर हजारों वर्षोसे अपने जलदुर्गके बलपर त्रिलोकीको पीड़ा पहुँचा रहे थे। तब यह सब देखकर देवेश्वर इन्द्रने अग्नि और वायुको

English

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अध्याय 47

श्लोक 192

आचार्यो वो ह्य् अहं काव्यो देवाचार्यो ऽयमङ्गिराः अनुगच्छत मां दैत्यास् त्यजतैनं बृहस्पतिम्

ācāryo vo hy ahaṃ kāvyo devācāryo 'yamaṅgirāḥ anugacchata māṃ daityās tyajatainaṃ bṛhaspatim

हिन्दी अर्थ

आदिदेश चिरादम्बुनिधिरेष विशोष्यताम्॥ ८ आज्ञा दी कि ' आपलोग इस समुद्रको सुखा डालें। अधर्म एष देवेन्द्र सागरस्य विनाशनम्

English

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अध्याय 47

श्लोक 193

इत्युक्ता ह्य् असुरास्तेन ताव् उभौ समवेक्ष्य च यदासुरा विशेषं तु न जानन्त्युभयोस्तयोः

ityuktā hy asurāstena tāv ubhau samavekṣya ca yadāsurā viśeṣaṃ tu na jānantyubhayostayoḥ

हिन्दी अर्थ

यस्माज्जीवनिकायस्य महतः संक्षयो भवेत्। तस्मान्न पापमद्यावां करवावः पुरंदर अस्य योजनमात्रेऽपि जीवकोटिशतानि च। निवसन्ति सुरश्रेष्ठ स कथं नाशमर्हति एवमुक्तः सुरेन्द्रस्तु कोपात् संरक्तलोचनः । उवाचेदं वचो रोषान्निर्दहन्निव पावकम्

English

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अध्याय 47

श्लोक 194

बृहस्पतिर् उवाचैनान् असम्भ्रान्तस्तपोधनः काव्यो वो ऽहं गुरुर्दैत्या मद्रूपो ऽयं बृहस्पतिः

bṛhaspatir uvācainān asambhrāntastapodhanaḥ kāvyo vo 'haṃ gururdaityā madrūpo 'yaṃ bṛhaspatiḥ

हिन्दी अर्थ

न धर्माधर्मसंयोगं प्राुवन्त्यमराः क्कचित्। भवतस्तु विशेषेण माहात्म्यं चाधितिष्ठति मुनित्रतमहिंसादि परिगृह्य त्वया कृतम्। धर्मार्थशास्त्ररहितं शत्रुं प्रति विभावसो

English

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अध्याय 47

श्लोक 195

संमोहयति रूपेण मामकेनैष वो ऽसुराः श्रुत्वा तस्य ततस्ते वै समेत्य तु ततो ऽब्रुवन्

saṃmohayati rūpeṇa māmakenaiṣa vo 'surāḥ śrutvā tasya tataste vai sametya tu tato 'bruvan

हिन्दी अर्थ

तस्मादेकेन वपुषा मुनिरूपेण मानुषे। मारुतेन समं लोके तव जन्म भविष्यति भविष्यत्युदधिर्वह्ले तदा देवत्वमाप्स्यसि अगस्त्य इत्युग्रतपाः सम्बभूव पुनर्मुनिः

English

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अध्याय 47

श्लोक 196

अयं नो दश वर्षाणि सततं शास्ति वै प्रभुः एष वै गुरुरस्माकम् अन्तरेप्सुरयं द्विजः

ayaṃ no daśa varṣāṇi satataṃ śāsti vai prabhuḥ eṣa vai gururasmākam antarepsurayaṃ dvijaḥ

हिन्दी अर्थ

सम्भूतः स कथं भ्राता वसिष्ठस्याभवन्मुनि: । पुरा पुराणपुरुषः कदाचिद् गन्धमादने। भूत्वा धर्मसुतो विष्णुश्चचार विपुलं तपः

English

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अध्याय 47

श्लोक 197

ततस्ते दानवाः सर्वे प्रणिपत्याभिनन्द्य च वचनं जगृहुस्तस्य चिराभ्यासे न मोहिताः

tataste dānavāḥ sarve praṇipatyābhinandya ca vacanaṃ jagṛhustasya cirābhyāse na mohitāḥ

हिन्दी अर्थ

चूँकि यह वरुणका निवासस्थान समुद्र हमारे शत्रुओंका आश्रयस्थान बना हुआ है, इसलिये आपलोग आज ही इसे नष्ट कर दें।' तब वे दोनों (अग्नि और वायु) शम्बरासुरका विनाश करनेवाले इन्द्रसे बोले--' देवेन्द्र! समुद्रका विनाश कर देना-यह महान् अधर्म होगा। पुरंदर! ऐसा करनेसे बहुत बड़े जीव-समुदायका विनाश हो जायगा, इसलिये हमलोग आज यह पाप नहीं करना चाहते। सुरश्रेष्ठ! इस समुद्रके एक योजन (चार मील)-के विस्तारमें ही सैकड़ों करोड़ जीव निवास करते हैं, भला, उनका विनाश कैसे किया जा सकता है!'

English

TEB MAT8YA PURAEAM.

अध्याय 47

श्लोक 198

ऊचुस् तमसुराः सर्वे क्रोधसंरक्तलोचनाः अयं गुरुर् हितो ऽस्माकं गच्छ त्वं नासि नो गुरुः

ūcus tamasurāḥ sarve krodhasaṃraktalocanāḥ ayaṃ gurur hito 'smākaṃ gaccha tvaṃ nāsi no guruḥ

हिन्दी अर्थ

उनके ऐसा कहनेपर क्रोधके कारण सुरेन्द्रके नेत्र लाल हो गये। तब वे अपनी क्रोधाग्निसे अग्निको जलाते हुएकी तरह यह वचन बोले--' विभावसो! देवताओंपर कहीं भी धर्म और अधर्मका प्रभाव नहीं पड़ता। आपमें तो यह महत्त्व विशेषरूपसे वर्तमान है। चूँकि आपने वायुके साथ मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन किया है और अहिंसा आदि मुनि-ब्रत धारण कर धर्म, अर्थ और शास्त्रसे विहीन शत्रुके प्रति उपेक्षा की है, इसलिये

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TEB MAT8YA PURAEAM.

अध्याय 47

श्लोक 199

भार्गवो वाङ्गिरा वापि भगवानेष नो गुरुः स्थिता वयं निदेशे ऽस्य साधु त्वं गच्छ माचिरम्

bhārgavo vāṅgirā vāpi bhagavāneṣa no guruḥ sthitā vayaṃ nideśe 'sya sādhu tvaṃ gaccha māciram

हिन्दी अर्थ

मानवलोकमें वायुके साथ आपका एक शरीरसे मुनिरूपमें जन्म होगा। अग्ने! मानव-योनिमें उत्पन्न होनेपर भी जब आपद्वारा अगस्त्यरूपसे समुद्र सोख लिया जायगा, तब पुनः आपको देवत्वकी प्राप्ति होगी ।' तपोधन! इस प्रकार इन्द्रके शापसे वे दोनों (अग्नि और वायु) उसी क्षण पृथ्वीतलपर गिर पड़े और एक ही शरीरसे (दोनोंने) घड़ेसे जन्म धारण किया। वे मित्रावरुणके वीर्यसे उत्पन्न होकर वसिष्ठके अनुज हुए। आगे चलकर वे दोनों संयुक्त उग्रतपस्वी अगस्त्य मुनिके नामसे विख्यात हुए

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अध्याय 47

श्लोक 200

एवमुक्त्वासुराः सर्वे प्रापद्यन्त बृहस्पतिम् यदा न प्रत्यपद्यन्त काव्येनोक्तं महद्धितम्

evamuktvāsurāḥ sarve prāpadyanta bṛhaspatim yadā na pratyapadyanta kāvyenoktaṃ mahaddhitam

हिन्दी अर्थ

नारदजीने पूछा--त्रिपुरसूदन! वे मुनि जन्म धारण करनेके पश्चात् वसिष्ठके भ्राता कैसे हो गये? वे दोनों मित्रावरुण इनके पिता कैसे कहलाये? तथा अगस्त्य मुनिका घड़ेसे जन्म कैसे हुआ? (यह सब हम जानना चाहते हैं ॥)

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अध्याय 47

श्लोक 201

चुकोप भार्गवस्तेषाम् अवलेपेन तेन तु बोधिता हि मया यस्मान् न मां भजथ दानवाः

cukopa bhārgavasteṣām avalepena tena tu bodhitā hi mayā yasmān na māṃ bhajatha dānavāḥ

हिन्दी अर्थ

ईश्वरने कहा--नारद! पूर्वकालमें पुराणपुरुष भगवान् विष्णु किसी समय धर्मके पुत्ररूपमें उत्पन्न होकर गन्धमादन पर्वतपर महान् तपस्यामें संलग्न थे। न काममाधवाभ्यां च विषयान् प्रति चुक्षुभे तदा काममधुस्त्रीणां वरिषादमगमद् गण: ।

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अध्याय 47

श्लोक 202

तस्मात्प्रनष्टसंज्ञा वै पराभवमवाप्स्यथ इति व्याहृत्य तान्काव्यो जगामाथ यथागतम्

tasmātpranaṣṭasaṃjñā vai parābhavamavāpsyatha iti vyāhṛtya tānkāvyo jagāmātha yathāgatam

हिन्दी अर्थ

नारीमुत्पादयामास त्रैलोक्यजनमोहिनीम् संक्षुब्धास्तु तया देवास्तौ तु देववरावुभौ। अप्सरोभिः समक्षं हि देवानामब्रवीद्धरिः

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अध्याय 47

श्लोक 203

शप्तांस्तानसुराञ्ज्ञात्वा काव्येन स बृहस्पतिः कृतार्थः स तदा हृष्टः स्वरूपं प्रत्यपद्यत

śaptāṃstānasurāñjñātvā kāvyena sa bṛhaspatiḥ kṛtārthaḥ sa tadā hṛṣṭaḥ svarūpaṃ pratyapadyata

हिन्दी अर्थ

अप्सरा इति सामान्या देवानामब्रवीद्धरिः। उर्वशीति च नाग्नेयं लोके ख्यातिं गमिष्यति ततः कामयमानेन मित्रेणाहूय सोर्वशी। उक्ता मां रमयस्वेति बाढमित्यब्रवीत् तु सा तस्यै मानुषलोके त्वं गच्छ सोमसुतात्मजम्

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अध्याय 47

श्लोक 204

बुद्ध्यासुरान् हताञ्ज्ञात्वा कृतार्थो ऽन्तरधीयत ततः प्रनष्टे तस्मिंस्तु विभ्रान्ता दानवाभवन्

buddhyāsurān hatāñjñātvā kṛtārtho 'ntaradhīyata tataḥ pranaṣṭe tasmiṃstu vibhrāntā dānavābhavan

हिन्दी अर्थ

भजस्वेति यतो वेश्याधर्म एष त्वया कृतः। प्रक्षितमथ संजातौ द्वावेव मुनिसत्तमौ

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अध्याय 47

श्लोक 205

अहो विवञ्चिताः स्मेति परस्परमथाब्रुवन् पृष्ठतो ऽभिमुखाश्चैव ताडिताङ्गिरसेन तु

aho vivañcitāḥ smeti parasparamathābruvan pṛṣṭhato 'bhimukhāścaiva tāḍitāṅgirasena tu

हिन्दी अर्थ

तत्रान्तरेऽभ्याजगाम वसिष्ठो ब्रह्मसम्भवः तस्य पूजामकुर्वन्तं शशाप स मुनिर्नृपम्। विदेहस्त्वं भवस्वेति ततस्तेनाप्यसौ मुनिः जग्मतुः शापनाशाय ब्रह्माणं जगतः पतिम्

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अध्याय 47

श्लोक 206

वञ्चिताः सोपधानेन स्वे स्वे वस्तुनि मायया ततस्त्वपरितुष्टास्ते तमेव त्वरिता ययुः प्रह्लादमग्रतः कृत्वा काव्यस्यानुपदं पुनः

vañcitāḥ sopadhānena sve sve vastuni māyayā tatastvaparituṣṭāste tameva tvaritā yayuḥ prahlādamagrataḥ kṛtvā kāvyasyānupadaṃ punaḥ

हिन्दी अर्थ

अथ ब्रह्मण आदेशाल्लोचनेष्ववसन्निभिः। निमेषाः स्युश्च लोकानां तद्विश्रामाय नारद अगस्त्य इति शान्तात्मा बभूव ऋषिसत्तमः

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अध्याय 47

श्लोक 207

ततः काव्यं समासाद्य उपतस्थुरवाङ्मुखाः समागतान्पुनर्दृष्ट्वा काव्यो याज्यानुवाच ह

tataḥ kāvyaṃ samāsādya upatasthuravāṅmukhāḥ samāgatānpunardṛṣṭvā kāvyo yājyānuvāca ha

हिन्दी अर्थ

उनको तपस्यासे भयभीत हुए इन्द्रने उसमें विन्न डालनेके लिये अप्सराओंके साथ वसन्त-ऋतु और कामदेव-दोनोंको भेजा। उस समय श्रीहरि न तो उनके गाने, बजाने अथवा अङ्गराग आदिसे ही प्रभावित हुए, न वसन्त और कामदेवद्वारा उपस्थित किये गये विषय- भोगोंके प्रति ही उनका मन क्षुब्ध हुआ। यह देखकर कामदेव, वसन्त और अप्सराओंका समूह विषादमें डूब गया। तत्पश्चात् नरके अग्रज नारायणने उन्हें विशेषरूपसे क्षुब्ध करनेके हेतु अपने ऊरुप्रदेशसे एक ऐसी नारीको उत्पन्न किया, जो त्रिलोकोके मनुष्योंको मोहित करनेवाली थी। उस स्त्रीने समस्त देवताओं तथा उन दोनों देवश्रेष्ठोंको भलीभाँति क्षुब्ध कर दिया। उस समय श्रीहरिने अप्सराओंके

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।