Matsya Purana
47
अध्याय 47 / 176

Adhyaya 47

263 श्लोकभाग 4/4 · श्लोक 208–263

पूर्ण अध्याय पाठ56 श्लोक

अध्याय 47

श्लोक 208

मया संबोधिताः सर्वे यस्मान्मा नाभिनन्दथ ततस्तेनावमानेन गता यूयं पराभवम्

mayā saṃbodhitāḥ sarve yasmānmā nābhinandatha tatastenāvamānena gatā yūyaṃ parābhavam

हिन्दी अर्थ

सामने ही देवताओंसे कहा--“देवगण! यह एक अप्सरा है। यह लोकमें उर्वशी-नामसे प्रसिद्ध होगी' तदनन्तर एक घड़ेसे मित्र और वरुणके अंशसे दो मुनिश्रेष्ठ उत्पन्न हुए। प्राचीनकालकी बात है, एक बार

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अध्याय 47

श्लोक 209

एवं ब्रुवाणं शुक्रं तु बाष्पसंदिग्धया गिरा प्रह्लादस्तं तदोवाच मा नस्त्वं त्यज भार्गव

evaṃ bruvāṇaṃ śukraṃ tu bāṣpasaṃdigdhayā girā prahlādastaṃ tadovāca mā nastvaṃ tyaja bhārgava

हिन्दी अर्थ

उसी समय ब्रह्मपुत्र महर्षि वसिष्ठ उनके पास आये, किंतु राजाने उनका स्वागत-सत्कार नहीं किया। तब वसिष्ठ मुनिने राजाको शाप दे दिया--'तुम विदेह- देहरहित हो जाओ।' तब राजाने भी मुनिको वही शाप दे दिया। इस प्रकार एक-दूसरेके शापवश दोनोंकी चेतना लुप्त-सी हो गयी। तब वे दोनों शापसे छुटकारा पानेके लिये जगत्पति ब्रह्माके पास गये। वहाँ ब्रह्माके आदेशसे राजा निमिका प्राणियोंके नेत्रोंमें निवास हुआ। नारद ! उन्हींको विश्राम देनेके लिये लोगोंके निमेष (पलकोंका गिरना और खुलना) होते रहते हैं। वसिष्ठ भी पहलेकी तरह उसी जलकुम्भसे प्रकट हुए। तदुपरान्त उसी जलकुम्भसे ऋषिश्रेष्ठ अगस्त्य उत्पन्न हुए, जो अत्यन्त शान्त स्वभाववाले

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अध्याय 47

श्लोक 210

स्वाश्रयान् भजमानांश्च भक्तांस्त्वं भज भार्गव त्वय्यदृष्टे वयं तेन देवाचार्येण मोहिताः भक्तानर्हसि वै ज्ञातुं तपोदीर्घेण चक्षुषा

svāśrayān bhajamānāṃśca bhaktāṃstvaṃ bhaja bhārgava tvayyadṛṣṭe vayaṃ tena devācāryeṇa mohitāḥ bhaktānarhasi vai jñātuṃ tapodīrgheṇa cakṣuṣā

हिन्दी अर्थ

थे। उनका गौर वर्ण था, उनके चार भुजाएँ थीं तथा वे अक्षसूत्र (यज्ञोपवीत) और कमण्डलु धारण किये हुए थे। विप्रोंसे घिरे हुए अगस्त्यने अपनी पल्नीके साथ ततः कालेन महता तारकादतिपीडितम्। जगद् वीक्ष्य स कोपेन पीतवान् वरुणालयम्

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अध्याय 47

श्लोक 211

यदि नस्त्वं न कुरुषे प्रसादं भृगुनन्दन अपध्यातास् त्वया ह्य् अद्य प्रविशामो रसातलम्

yadi nastvaṃ na kuruṣe prasādaṃ bhṛgunandana apadhyātās tvayā hy adya praviśāmo rasātalam

हिन्दी अर्थ

ततोऽस्य वरदाः सर्वे बभूवुः शङ्करादयः। ब्रह्मा विष्णुश्च भगवान् वरदानाय जग्मतुः। यावद् ब्रह्मसहस्त्राणां पञ्जविंशतिकोटयः।

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अध्याय 47

श्लोक 212

ज्ञात्वा काव्यो यथातत्त्वं कारुण्यादनुकम्पया एवं प्रत्यनुनीतो वै ततः कोपं नियम्य सः उवाचैतान्न भेतव्यं न गन्तव्यं रसातलम्

jñātvā kāvyo yathātattvaṃ kāruṇyādanukampayā evaṃ pratyanunīto vai tataḥ kopaṃ niyamya saḥ uvācaitānna bhetavyaṃ na gantavyaṃ rasātalam

हिन्दी अर्थ

वैमानिको भविष्यामि दक्षिणाचलवर्त्मनि स सप्तलोकाधिपतिः पर्यायेण भविष्यति

English

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अध्याय 47

श्लोक 213

अवश्यं भाविनो ह्य् अर्थाः प्राप्तव्या मयि जाग्रति न शक्यमन्यथा कर्तुं दिष्टं हि बलवत्तरम्

avaśyaṃ bhāvino hy arthāḥ prāptavyā mayi jāgrati na śakyamanyathā kartuṃ diṣṭaṃ hi balavattaram

हिन्दी अर्थ

एवमस्त्विति तेऽप्युक्त्वा जग्मुर्देवा यथागतम्। तस्मादर्घः प्रदातव्यो ह्यगस्त्यस्य सदा बुधैः कथमर्घप्रदानं तु कर्तव्यं तस्य वै विभो। विधानं यदगस्त्यस्य पूजने तद् वदस्व मे सकांस्यपात्राक्षतशुक्ति युक्तं

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अध्याय 47

श्लोक 214

संज्ञा प्रनष्टा या वो ऽद्य तामेतां प्रतिपत्स्यथ देवाञ्जित्वा सकृच्चापि पातालं प्रतिपत्स्यथ

saṃjñā pranaṣṭā yā vo 'dya tāmetāṃ pratipatsyatha devāñjitvā sakṛccāpi pātālaṃ pratipatsyatha

हिन्दी अर्थ

रहकर मलयपर्वतके एक प्रदेशमें वैखानस-विधिके अनुसार अत्यन्त कठोर तप किया था। चिरकालके पश्चात् तारकासुरद्वारा जगतको अत्यन्त पीड़ित देखकर वे कुपित हो गये और समुद्रको पी गये। यह देखकर शङ्कर आदि सभी देवता उन्हें वर देनेके लिये उत्सुक हो उठे। उसी समय ब्रह्मा और भगवान् विष्णु वर प्रदान करनेके निमित्त उनके निकट गये और बोले--'मुने! आपका कल्याण हो! आपको जो अभीष्ट हो, वह वर माँग

English

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अध्याय 47

श्लोक 215

प्राप्ते पर्यायकाले च हीति ब्रह्माभ्यभाषत मत्प्रसादाच्च त्रैलोक्यं भुक्तं युष्माभिरूर्जितम्

prāpte paryāyakāle ca hīti brahmābhyabhāṣata matprasādācca trailokyaṃ bhuktaṃ yuṣmābhirūrjitam

हिन्दी अर्थ

अगस्त्य बोले--देव! मैं एक सहस्र ब्रह्माओंके पचीस करोड़ वर्षांतक दक्षिणाचलके मार्गमें विमानपर स्थित होकर निवास करूँ। उस समय मेरे विमानके उदय होनेपर जो कोई मनुष्य मेरा पूजन करे, वह क्रमशः सातों लोकोंका अधिपति हो जाय ईश्वरने कहा--नारद! तब वे देवगण भी “एवमस्तु ऐसा ही हो' यों कहकर जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। इसलिये विद्वानोंको अगस्त्यके लिये सदा अर्घ्य प्रदान करते रहना चाहिए

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अध्याय 47

श्लोक 216

युगाख्या दश सम्पूर्णा देवानाक्रम्य मूर्धनि एतावन्तं च कालं वै ब्रह्मा राज्यमभाषत

yugākhyā daśa sampūrṇā devānākramya mūrdhani etāvantaṃ ca kālaṃ vai brahmā rājyamabhāṣata

हिन्दी अर्थ

नारदजीने पूछा-विभो! अगस्त्यके लिये किस विधिसे अर्घ्य प्रदान करना चाहिए? तथा उनके पूजनका क्या विधान है? यह मुझे बतलाइये ? ईश्वरने कहा--नारद ! विद्वान् गृहस्थको चाहिए कि वह आगस्त्यके उदयसे संयुक्त रात्रिमें प्रातःकाल श्वेत तिलमिश्रित जलसे स्नान करे। उसी प्रकार श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंको माला धारण करे। तत्पश्चात् एक छिद्ररहित

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अध्याय 47

श्लोक 217

राज्यं सावर्णिके तुभ्यं पुनः किल भविष्यति लोकानामीश्वरो भाव्यस् तव पौत्रः पुनर्बलिः

rājyaṃ sāvarṇike tubhyaṃ punaḥ kila bhaviṣyati lokānāmīśvaro bhāvyas tava pautraḥ punarbaliḥ

हिन्दी अर्थ

कलश स्थापित करे और उसे पुष्पमाला तथा वस्त्रसे विभूषित कर दे। उसके भीतर पञ्चरल डाल दे और पार्श्वभागमें घीसे भरा हुआ एक पात्र रख दे। साथ ही काँसेका पात्र चावल भरकर उसके ऊपर सीप अथवा शङ्क रखकर प्रस्तुत करे। फिर अँगूठेके बराबर लम्बी सोनेकी एक ऐसी पुरुषाकार प्रतिमा बनवाये, जिसमें चार मुख दीख पड़ते हों और जिसकी भुजाएँ लम्बी हों, उसे कलशके मुखमें स्थापित कर दे। उसके निकट पृथक्-पृथक् सात वस्त्रोमें बँधी हुई धान्य- राशि भी रखे। तदनन्तर अनन्य चित्तसे दक्षिणाभिमुख हो लम्बे उदर और लम्बी भुजाआंवाली अगस्त्यमुनिकी उस प्रतिमाको (घड़ेसे) निकालकर हाथमें लेकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक

English

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अध्याय 47

श्लोक 218

एवं किल मिथः प्रोक्तः पौत्रस्ते विष्णुना स्वयम् वाचा हृतेषु लोकेषु तास्तास्तस्याभवन्किल

evaṃ kila mithaḥ proktaḥ pautraste viṣṇunā svayam vācā hṛteṣu lokeṣu tāstāstasyābhavankila

हिन्दी अर्थ

मनन्यचेता यमदिङ्मुखः सन्॥ ४७ सारी सामग्रियोंसहित सुपात्र ब्राह्मणको दान कर दे। रथोर्ध्वमप्यत्र वदन्ति केचित्

English

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अध्याय 47

श्लोक 219

यस्मात्प्रवृत्तयश्चास्य संकाशाद् अभिसंधिताः तस्माद्वृत्तेन प्रीतेन तुभ्यं दत्तं स्वयम्भुवा

yasmātpravṛttayaścāsya saṃkāśād abhisaṃdhitāḥ tasmādvṛttena prītena tubhyaṃ dattaṃ svayambhuvā

हिन्दी अर्थ

काशपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव। इमं लोकं स चाप्नोति रूपारोग्यसमन्वितः। द्वितीयेन भुवर्लोकं स्वर्लोकं च ततः परम् सपैव लोकानाप्नोति सप्तार्घ्यान् यः प्रयच्छति। यावदायुश्च यः कुर्यात् परं ब्रह्माधिगच्छति

English

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अध्याय 47

श्लोक 220

देवराज्ये बलिर्भाव्य इति मामीश्वरो ऽब्रवीत् तस्माददृश्यो भूतानां कालापेक्षः स तिष्ठति

devarājye balirbhāvya iti māmīśvaro 'bravīt tasmādadṛśyo bhūtānāṃ kālāpekṣaḥ sa tiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

एतद् युगलमुनिप्रभवार्घ्यसम्प्रदानम् । एक श्वेत वर्णको बछड़ेवाली दुधारू गौको सोनेके मुख और चाँदीके खुरोंसे संयुक्त करे तथा उसे माला, वस्त्र और घंटीसे विभूषित करके नमस्कारपूर्वक ब्राह्मणको दान कर दे। इस प्रकार गृहस्थ पुरुषको अगस्त्योदयसे सात रात्रियोंतक इन

English

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अध्याय 47

श्लोक 221

प्रीतेन चापरो दत्तो वरस्तुभ्यं स्वयम्भुवा तस्मान्निरुत्सुकस्त्वं वै पर्यायं सहितो ऽसुरैः

prītena cāparo datto varastubhyaṃ svayambhuvā tasmānnirutsukastvaṃ vai paryāyaṃ sahito 'suraiḥ

हिन्दी अर्थ

सभी वस्तुओंका दान करना चाहिए। इस विधानको सात अथवा दस वर्षांतक करना चाहिए। कुछ लोग इससे आगे भी इसकी अवधि बतलाते हैं तदनन्तर यों प्रार्थना करते हुए अर्घ्य प्रदान करे-- ' कुम्भसे उत्पन्न होनेवाले अगस्त्यजी ! आपके शरीरका रंग कासके पुष्पके सदृश उज्वल है, आपकी उत्पत्ति अग्नि और वायुसे हुई है और आप मित्रावरुणके पुत्र हैं, आपको नमस्कार है।' इस प्रकार फलत्यागपूर्वक प्रतिवर्ष अर्घ्य प्रदान करनेवाला पुरुष कष्टभागी नहीं होता । तत्पश्चात् हवन करके कार्य समाप्त करे। उस समय मनुष्यको फलकी अभिलाषा नहीं करनी चाहिए। जो पुरुष इस विधिके

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अध्याय 47

श्लोक 222

न हि शक्यं मया तुभ्यं पुरस्ताद् विप्रभाषितुम् ब्रह्मणा प्रतिषिद्धो ऽहं भविष्यं जानता विभो

na hi śakyaṃ mayā tubhyaṃ purastād viprabhāṣitum brahmaṇā pratiṣiddho 'haṃ bhaviṣyaṃ jānatā vibho

हिन्दी अर्थ

अनुसार आगस्त्यको अर्घ्य निवेदित करता है, वह सुन्दर रूप और नीरोगतासे युक्त होकर इस मृत्युलोकमें पुनः जन्म धारण करता है। इसी प्रकार वह दूसरे अर्घ्यसे भुवर्लोकको और तीसरेसे उससे भी श्रेष्ठ स्वर्लोकको जाता है । इसी तरह जो मनुष्य उन (सात) दिनोंमें अर्घ्य देता है, बह क्रमशः सातों लोकोंको प्राप्त होता है तथा जो आयुपर्यन्त इसका अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ ५०--५३॥

English

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अध्याय 47

श्लोक 223

इमौ च शिष्यौ द्वौ मह्यं समाव् एतौ बृहस्पतेः दैवतैः सह संसृष्टान् सर्वान्वो धारयिष्यतः

imau ca śiṣyau dvau mahyaṃ samāv etau bṛhaspateḥ daivataiḥ saha saṃsṛṣṭān sarvānvo dhārayiṣyataḥ

हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य इस मर्त्यलोकमें इन दोनों (वसिष्ठ और अगस्त्य) मुनियोंको उत्पत्ति और आगस्त्य मुनिके अर्घ्यप्रदान के वृत्तान्तको पढ़ता अथवा सुनता है या ऐसा करनेकी सलाह देता है, वह विष्णुलोकमें जाकर देवगणोंद्वारा पूजित होता है इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽगस्त्योत्पत्तिपूजाविधानं नामैकषष्टितमोऽध्यायः

English

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अध्याय 47

श्लोक 224

इत्युक्ता ह्य् असुराः सर्वे काव्येनाक्लिष्टकर्मणा हृष्टास्तेन ययुः सार्धं प्रह्लादेन महात्मना

ityuktā hy asurāḥ sarve kāvyenākliṣṭakarmaṇā hṛṣṭāstena yayuḥ sārdhaṃ prahlādena mahātmanā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अगस्त्योत्पत्तिपूजा-विधान नामक इकसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ १. यहाँ पूनावाली प्रतिमें तीन श्लोक अधिक हैं।

English

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अध्याय 47

श्लोक 225

अवश्यं भाव्यमर्थं तु श्रुत्वा शुक्रेण भाषितम् सकृदाशंसमानास्तु जयं शुक्रेण भाषितम् दंशिताः सायुधाः सर्वे ततो देवान्समाह्वयन्

avaśyaṃ bhāvyamarthaṃ tu śrutvā śukreṇa bhāṣitam sakṛdāśaṃsamānāstu jayaṃ śukreṇa bhāṣitam daṃśitāḥ sāyudhāḥ sarve tato devānsamāhvayan

हिन्दी अर्थ

२. अगस्त्यार्घ्यपर ऋग्वेद १। १७९। ६ से लेकर अग्नि, गरुड, बृहद्धर्म आदि पुराणोंतकमें अपार सामग्री भरी पड़ी है। हेमाद्रि, गोपाल तथा रत्नाकर आदिने भी इन्हें अपने ब्रत-निबन्धोंमें कई पृष्ठोमें संगृहीत किया है। ऋक् प्रथम मण्डलमें दीर्घतमा १६४ सू० के बाद १९१ सूक्तोंतकके ये ही द्रष्टा हैं। अनन्ततृतीया-ब्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

English

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अध्याय 47

श्लोक 226

देवास्तदासुरान्दृष्ट्वा संग्रामे समुपस्थितान् सर्वे संभृतसम्भारा देवास्तान् समयोधयन्

devāstadāsurāndṛṣṭvā saṃgrāme samupasthitān sarve saṃbhṛtasambhārā devāstān samayodhayan

हिन्दी अर्थ

सौभाग्यारोग्यफलदं विपक्षक्षयकारकम्। भुक्तिमुक्तिप्रदं देव तन्मे ब्रूहि जनार्दन॥ यदुमायाः पुरा देव उवाच पुरसूदनः। कैलासशिखरासीनो देव्या पृष्टस्तदा किल॥ कथासु सम्प्रवृत्तासु धर्म्यासु ललितासु च।

English

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अध्याय 47

श्लोक 227

देवासुरे तदा तस्मिन् वर्तमाने शतं समाः अजयन्नसुरा देवांस् ततो देवा ह्य् अमन्त्रयन्

devāsure tadā tasmin vartamāne śataṃ samāḥ ajayannasurā devāṃs tato devā hy amantrayan

हिन्दी अर्थ

शृणुष्वावहिता देवि तथैवानन्तपुण्यकृत्। नराणामथ नारीणामाराधनमनुत्तमम्॥ दधिचन्दनसम्मिश्रं ललाटे तिलकं न्यसेत्। देवीं तु पञ्चगव्येन ततः क्षीरेण केवलम्। स््रापयेन्मधुना तद्दत् पुष्पगन्धोदकेन च॥

English

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अध्याय 47

श्लोक 228

यज्ञेनोपाह्वयामस् तौ ततो जेष्यामहे ऽसुरान् तदोपामन्त्रयन्देवाः शण्डामर्कौ तु ताव् उभौ

yajñenopāhvayāmas tau tato jeṣyāmahe 'surān tadopāmantrayandevāḥ śaṇḍāmarkau tu tāv ubhau

हिन्दी अर्थ

मनुने पूछा-जनार्दनदेव ! जो इस लोकमें सौभाग्य और नीरोगतारूप फल देनेवाला तथा भोग और मोक्षका प्रदाता एवं शत्रुनाशक हो, वह व्रत मुझे बतलाइये मत्स्यभगवानूने कहा--राजन्! पूर्वकालमें कैलास पर्वतके शिखरपर बैठे हुए त्रिपुरविनाशक महादेवजीने सुन्दर धार्मिक कथाओंके प्रसङ्गमें उमादेवीद्वारा पूछे जानेपर उनसे जिस व्रतका वर्णन किया था, वही इस

English

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अध्याय 47

श्लोक 229

यज्ञे चाहूय तौ प्रोक्तौ त्यजेतामसुरान् द्विजौ वयं युवां भजिष्यामः सह जित्वा तु दानवान्

yajñe cāhūya tau proktau tyajetāmasurān dvijau vayaṃ yuvāṃ bhajiṣyāmaḥ saha jitvā tu dānavān

हिन्दी अर्थ

समय मैं बतला रहा हूँ, यह भोग और मोक्षरूप फल देनेवाला है ईश्वरने कहा--देवि! मैं पुरुषों तथा स्त्रियोंके लिये एक सर्वश्रेष्ठ व्रत बतला रहा हूँ, जो अनन्त पुण्यदायक है । तुम सावधानीपूर्वक उसे सुनो । इस ब्रतका व्रती भाद्रपद, वैशाख, पौष अथवा मार्गशीर्ष मासके शुक्लपक्षमें तृतीया तिथिको पीली सरसोंसे युक्त जलसे भलीभाँति स्तरान करे। फिर गोरोचन, गोमूत्र, मुश्ता, गोबर, दही और चन्दनको मिलाकर ललाटमें तिलक लगावे; क्योंकि यह तिलक सौभाग्य और आरोग्यका प्रदायक तथा ललितादेवीको

English

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अध्याय 47

श्लोक 230

एवं कृताभिसंधी तौ शण्डामर्कौ सुरास्तथा ततो देवा जयं प्रापुर् दानवाश्च पराजिताः

evaṃ kṛtābhisaṃdhī tau śaṇḍāmarkau surāstathā tato devā jayaṃ prāpur dānavāśca parājitāḥ

हिन्दी अर्थ

परम प्रिय है। प्रत्येक शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको पुरुषको पीला वस्त्र, यदि सधवा स्त्री व्रतनिष्ठ होती है तो उसे लाल वस्त्र, विधवाको गेरू आदि धातुओंसे रँगा हुआ वस्त्र और कुमारी कन्याको श्वेत वस्त्र धारण करना चाहिए। उस समय देवीकी मूर्तिको पञ्चगव्यसे ख्रान करानेके पश्चात् केवल दूधसे नहलाना चाहिए। उसी प्रकार मधु और पुष्प-चन्दनमिश्रित जलसे भी स्नान करावे । फिर श्वेत पुष्प, अनेक प्रकारके फल, धनिया, श्वेत जीरा, नमक,

English

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अध्याय 47

श्लोक 231

शण्डामर्कपरित्यक्ता दानवा ह्य् अबलास्तथा एवं दैत्याः पुरा काव्यशापेनाभिहतास्तदा

śaṇḍāmarkaparityaktā dānavā hy abalāstathā evaṃ daityāḥ purā kāvyaśāpenābhihatāstadā

हिन्दी अर्थ

गुड़, दूध और घृतसे देवीकी पूजा करे। श्वेत अक्षत और तिलसे तो ललितादेवीकी सदा पूजा करनी चाहिए। प्रत्येक शुक्लपक्षमें तृतीया तिथिको देवीकी मूर्तिके आपादाद्यर्चनं कुर्याद् गौर्य्याः सम्यक् समासतः ॥ १० चरणसे लेकर मस्तकपर्यन्त संक्षेपसे पूजनका विधान है। सौर, पाद्म सृष्टि, भविष्योत्तरपुराण अ० २६ में यह व्रत सविस्तर निरूपित है। सौभाग्य एवं ललितादेवीके विषयमें ६० वें

English

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अध्याय 47

श्लोक 232

काव्यशापाभिभूतास्ते निराधाराश्च सर्वशः निरस्यमाना देवैश्च विविशुस्ते रसातलम्

kāvyaśāpābhibhūtāste nirādhārāśca sarvaśaḥ nirasyamānā devaiśca viviśuste rasātalam

हिन्दी अर्थ

अध्यायकी टिप्पणी द्रष्टव्य है। अशोकायै नमो जङ्घे पार्वत्यै जानुनी तथा

English

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अध्याय 47

श्लोक 233

एवं निरुद्यमा देवैः कृताः कृच्छ्रेण दानवाः ततः प्रभृति शापेन भृगोर्नैमित्तिकेन तु

evaṃ nirudyamā devaiḥ kṛtāḥ kṛcchreṇa dānavāḥ tataḥ prabhṛti śāpena bhṛgornaimittikena tu

हिन्दी अर्थ

ऊरू मङ्गलकारिण्यै वामदेव्यै तथा कटिम्। पद्योदरायै जठरमुरः कामश्रिये नमः करौ सौभाग्यदायिन्यै बाहूदरमुखं श्रियै। दन्तान् दर्पणवासिन्यै स्मरदायै स्मितं नमः

English

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अध्याय 47

श्लोक 234

जज्ञे पुनः पुनर्विष्णुर् धर्मे प्रशिथिले प्रभुः कुर्वन्धर्मव्यवस्थानम् असुराणां प्रणाशनम्

jajñe punaḥ punarviṣṇur dharme praśithile prabhuḥ kurvandharmavyavasthānam asurāṇāṃ praṇāśanam

हिन्दी अर्थ

तुष्टयै ललाटमलकान् कात्यायन्यै शिरस्तथा नमो गौर्ये नमो धिष्ण्यै नमः कान्त्यै नमः श्रियै। रम्भायै ललितायै च वासुदेव्यै नमो नमः

English

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अध्याय 47

श्लोक 235

प्रह्लादस्य निदेशे तु न स्थास्यन्त्यसुराश्च ये मनुष्यवध्यास्ते सर्वे ब्रह्मेति व्याहरत्प्रभुः

prahlādasya nideśe tu na sthāsyantyasurāśca ye manuṣyavadhyāste sarve brahmeti vyāharatprabhuḥ

हिन्दी अर्थ

पतरैद्वादशभिर्युक्तं कुङ्कमेन सकर्णिकम् पूर्वेण विन्यसेद् गौरीमपर्णा च ततः परम्। भवानीं दक्षिणे तद्दद् रुद्राणीं च ततः परम् विन्यसेत् पश्चिमे सौम्यां सदा मदनवासिनीम्। वायव्ये पाटलावासामुत्तरेण ततोऽप्युमाम्

English

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अध्याय 47

श्लोक 236

धर्मान्नारायणस्यांशः सम्भूतश् चाक्षुषे ऽन्तरे यज्ञं वै वर्तयामासुर् देवा वैवस्वते ऽन्तरे

dharmānnārāyaṇasyāṃśaḥ sambhūtaś cākṣuṣe 'ntare yajñaṃ vai vartayāmāsur devā vaivasvate 'ntare

हिन्दी अर्थ

रुद्रं च मध्ये संस्थाप्य ललितां कर्णिकोपरि। कुसुमैरक्षतैर्वाभिर्नमस्कारेण विन्यसेत् गीतमङ्गलनिर्घोषान् कारयित्वा सुवासिनीः।

English

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अध्याय 47

श्लोक 237

प्रादुर्भावे ततस्तस्य ब्रह्मा ह्य् आसीत्पुरोहितः युगाख्यायां चतुर्थ्यां तु आपन्नेषु सुरेषु वै

prādurbhāve tatastasya brahmā hy āsītpurohitaḥ yugākhyāyāṃ caturthyāṃ tu āpanneṣu sureṣu vai

हिन्दी अर्थ

बन्धुजीवैराश्वयुजे कार्तिके शतपत्रकैः “वरदायै नमः” से दोनों चरणोंका, “श्रियै नमः' से दोनों गुल्फोंका, ' अशोकायै नमः' से दोनों जाँधोंका, “पार्वत्यै नमः ' से दोनों जानुओंका, ' मङ्गलकारिण्यै नमः' से दोनों ऊरुओंका, 'वामदेव्यै नमः' से कटिप्रदेशका, 'पद्मोदरायै नमः' से उदरका तथा “कामश्रियै नम: ' से वक्षःस्थलका अर्चन करे; फिर “सौभाग्यदायिन्यै नमः' से दोनों हाथोंका, ' श्रियै नमः' से बाहु, उदर और मुखका, 'दर्षणवासिन्यै

English

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अध्याय 47

श्लोक 238

सम्भूतस्तु समुद्रान्ते हिरण्यकशिपोर्वधे द्वितीये नरसिंहाख्ये रुद्रो ह्य् आसीत्पुरोहितः

sambhūtastu samudrānte hiraṇyakaśiporvadhe dvitīye narasiṃhākhye rudro hy āsītpurohitaḥ

हिन्दी अर्थ

नमः ' से दाँतोंका, ' स्मरदाये नमः ' से मुसकानका, “गौर्यै नमः' से नासिकाका, ' उत्पलायै नमः ' से नेत्रोंका, ' तुष्टयै नमः' से ललाटका, 'कात्यायन्ये नमः' से सिर और बालोंका पूजन करना चाहिए। तदुपरान्त “गौर्यै नमः', 'धिष्ण्यै नमः ', ' कान्त्यै नमः', ' श्रियै नमः', ' रम्भायै नमः', “ललितायै नमः ' और ' वासुदेव्यै नमः ' कहकर देवीके चरणोंमें प्रणिपात करना चाहिए ॥ ४--१५॥

English

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अध्याय 47

श्लोक 239

बलिसंस्थेषु लोकेषु त्रेतायां सप्तमं प्रति तृतीये वामनस्यार्थे धर्मेण तु पुरोधसा

balisaṃstheṣu lokeṣu tretāyāṃ saptamaṃ prati tṛtīye vāmanasyārthe dharmeṇa tu purodhasā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार विधिपूर्वक पूजा करके मूर्तिके आगे कुङ्कमसे बारह पत्तोसे युक्त कर्णिकासहित कमल बनाये। उसके पूर्वभागमें गौरी, उसके बाद अपर्णा, दक्षिणभागमें भवानी और नैऋत्य कोणमें रुद्राणीको स्थापित करे। पुनः पश्चिममें सदा सौम्य स्वभावसे रहनेवाली मदनवासिनी, वायव्यकोणमें पाटला और उत्तरमें पुष्पमें निवास करनेवाली उमाकी स्थापना करे। मध्यभागमें लक्ष्मी, स्वाहा, स्वधा, तुष्टि, मङ्गला, कुमुदा और सतीको स्थित करे। कमलके मध्यमें रुद्रको स्थापना करके कर्णिकाके ऊपर ललितादेवीको स्थित करे। तत्पश्चात् गीत और माङ्गलिक बाजाका आयोजन कराकर पुष्प, श्वेत अक्षत और जलसे देवीकी अर्चना करके उन्हें नमस्कार करे। फिर लाल वस्त्र, लाल

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अध्याय 47

श्लोक 240

एतास् तिस्रः स्मृतास्तस्य दिव्याः सम्भूतयो द्विजाः मानुषाः सप्त यान्यास्तु शापजास्ता निबोधत

etās tisraḥ smṛtāstasya divyāḥ sambhūtayo dvijāḥ mānuṣāḥ sapta yānyāstu śāpajāstā nibodhata

हिन्दी अर्थ

पुष्पोंकी माला और लाल अङ्गरागसे सुहागिनी स्त्रियोंका पूजन करे तथा उनके सिर (माँग) -में सिन्दूर और कुङ्कुम लगावे; क्योंकि सिन्दूर और कुङ्कुम सती देवीको सदा अभीष्ट हैं। तदनन्तर उपदेश करनेवाले गुरु अर्थात् आचार्यको यत्रपूर्वक पूजा करनी चाहिए; क्योंकि जहाँ आचार्यकी पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं । गौरीदेवीकी पूजा सदा भाद्रपदमासमें नीले कमलसे, आश्विनमें बन्धुजीव (गुलदुपहरिया)-के

English

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अध्याय 47

श्लोक 241

त्रेतायुगे तु प्रथमे दत्तात्रेयो बभूव ह नष्टे धर्मे चतुर्थांशे मार्कण्डेयपुरःसरः

tretāyuge tu prathame dattātreyo babhūva ha naṣṭe dharme caturthāṃśe mārkaṇḍeyapuraḥsaraḥ

हिन्दी अर्थ

फूलोंसे, कार्तिकमें शतपत्रक (कमल)-के पुष्पॉंसे, कुन्दकुङ्कुमपुष्पैस्तु देवीं माघे तु पूजयेत्। सिन्धुवारेण जात्या वा फाल्गुनेऽप्यर्चयेदुमाम् चैत्रे तु मल्लिकाशोकैर्वेशाखे गन्धपाटलैः। ज्येष्ठे कमलमन्दारैराषाढे चम्पकाम्बुजैः। कदम्बैरथ मालत्या श्रावणे पूजयेदुमाम्

English

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अध्याय 47

श्लोक 242

पञ्चमः पञ्चदश्यां च त्रेतायां संबभूव ह मान्धाता चक्रवर्ती तु तदोत्तङ्कपुरःसरे

pañcamaḥ pañcadaśyāṃ ca tretāyāṃ saṃbabhūva ha māndhātā cakravartī tu tadottaṅkapuraḥsare

हिन्दी अर्थ

स्त्रियै दद्यात् फलं पुंसे सुवर्णोत्पलसंयुतम् यथा न देवि देवेशस्त्वां परित्यज्य गच्छति। तथा मां सम्परित्यज्य पतिर्नान्यत्र गच्छतु

English

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अध्याय 47

श्लोक 243

एकोनविंश्यां त्रेतायां सर्वक्षत्रान्तकृद्विभुः जामदग्न्यस्तथा षष्ठो विश्वामित्रपुरःसरः

ekonaviṃśyāṃ tretāyāṃ sarvakṣatrāntakṛdvibhuḥ jāmadagnyastathā ṣaṣṭho viśvāmitrapuraḥsaraḥ

हिन्दी अर्थ

नभस्यादिषु मासेषु प्रीयतामित्युदीरयेत्। व्रतान्ते शयनं दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम् सर्वपापहरां देवि सौभाग्यारोग्यवर्धिनीम्। मार्गशीर्षमें जाती (मालती)-के पुष्पोंसे, पौषमें पीले कुरण्टक (कटसरैया)-के पुष्पोंसे, माघमें कुन्द और कुङ्कुमके पुष्पोंसे करनी चाहिए। इसी प्रकार फाल्गुनमें सिन्दुवार अथवा मालतीके पुष्पोंसे उमाकी अर्चना करे। चैत्रमें मल्लिका

English

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अध्याय 47

श्लोक 244

चतुर्विंशे युगे रामो वसिष्ठेन पुरोधसा सप्तमो रावणस्यार्थे जज्ञे दशरथात्मजः

caturviṃśe yuge rāmo vasiṣṭhena purodhasā saptamo rāvaṇasyārthe jajñe daśarathātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

और अशोकके पुष्पोंसे, वैशाखमें गन्धपाटलके फूलोंसे, ज्येष्ठमें कमल और मन्दारके कुसुमोंसे, आषाढ़में चम्पा एवं कमल-पुष्पोंसे और श्रावणमें कदम्ब तथा मालतीके फूलोंसे पार्वतीकी पूजा करनी चाहिए । इसी तरह भाद्रपदसे आरम्भ कर आश्विन आदि बारह महीनोंमें क्रमश: गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी, कुशोदक, बिल्व-पत्र, मदारका पुष्प, गोशृङ्गोदक, पञ्चगव्य और बेलका नैवेद्य अर्पण करनेका विधान है। क्रमशः भाद्रपदसे लेकर श्रावणतक प्रत्येक

English

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अध्याय 47

श्लोक 245

अष्टमे द्वापरे विष्णुर् अष्टाविंशे पराशरात् वेदव्यासस्तथा जज्ञे जातूकर्ण्यपुरःसरः

aṣṭame dvāpare viṣṇur aṣṭāviṃśe parāśarāt vedavyāsastathā jajñe jātūkarṇyapuraḥsaraḥ

हिन्दी अर्थ

मासके लिये ये नैवेद्य बतलाये गये हैं वरानने ! प्रत्येक शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको एक ब्राह्मण-दम्पतिको उनमें शिव-पार्वतीकी कल्पना कर भोजन कराकर उनकी वस्त्र, पुष्पमाला और चन्दनसे भक्तिपूर्वक अर्चना करे तथा पुरुषको दो पीताम्बर और स्त्रीको दो पीली साड़ियाँ प्रदान करे । फिर ब्राह्मणी-स्त्रीको निष्पाव (बड़ी मटर या सेम), जीरा, नमक, ईख, गुड़, फल और फूल आदि सौभाग्याष्टक देकर और पुरुषको सुवर्णनिर्मित कमल देकर यों प्रार्थना करे--' देवि! जिस

English

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अध्याय 47

श्लोक 246

कर्तुं धर्मव्यवस्थानम् असुराणां प्रणाशनम् बुद्धो नवमको जज्ञे तपसा पुष्करेक्षणः देवसुन्दररूपेण द्वैपायनपुरःसरः

kartuṃ dharmavyavasthānam asurāṇāṃ praṇāśanam buddho navamako jajñe tapasā puṣkarekṣaṇaḥ devasundararūpeṇa dvaipāyanapuraḥsaraḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकार देवाधिदेव भगवान् महादेव आपको छोड़कर नहीं जाते, उसी प्रकार मेरे भी पतिदेव मुझे छोड़कर अन्यत्र न ललिता, कमला, गौरी, सती, रम्भा और पार्वतीदेवीके इन नामोंका उच्चारण करके प्रार्थना करे कि आप क्रमशः भाद्रपद आदि मासोंमें प्रसन्न हों। व्रतकी समासिमें सुवर्ण- निर्मित कमलसहित शय्या दान करे और चौबीस अथवा

English

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अध्याय 47

श्लोक 247

तस्मिन्नेव युगे क्षीणे संध्याशिष्टे भविष्यति कल्की तु विष्णुयशसः पाराशर्यपुरःसरः

tasminneva yuge kṣīṇe saṃdhyāśiṣṭe bhaviṣyati kalkī tu viṣṇuyaśasaḥ pārāśaryapuraḥsaraḥ

हिन्दी अर्थ

बारह द्विज-दम्पतियोंकी पूजा करे। पुनः प्रतिमास आठ या छः दम्पतियोंका पूजन करते रहनेका विधान है। विद्वान् व्रती सर्वप्रथम गुरुको दान देकर तत्पश्चात् दूसरे ब्राह्मणोंकी अर्चना करे। देवि! इस प्रकार मैंने इस अनन्त-तृतीयाका वर्णन कर दिया, जो सदा अनन्त फलकी प्रदायिका है ॥ २७--३४॥ देवि! यह अनन्ततृतीया समस्त पापोंकी विनाशिका तथा सौभाग्य और नीरोगताकी वृद्धि करनेवाली है, इसका कृपणता-वश कभी भी उल्लङ्खन नहीं करना चाहिए; क्योंकि चाहे पुरुष हो या स्त्री-कोई

English

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अध्याय 47

श्लोक 248

दशमो भाव्यसम्भूतो याज्ञवल्क्यपुरःसरः सर्वांश्च भूतांस् तिमितान् पाषण्डांश्चैव सर्वशः

daśamo bhāvyasambhūto yājñavalkyapuraḥsaraḥ sarvāṃśca bhūtāṃs timitān pāṣaṇḍāṃścaiva sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

भौ कृपणताके वशीभूत होकर यदि इसका नरो वा यदि वा नारी वित्तशाठ्यात् पतत्यधः॥ ३५ उल्लङ्कन करता है तो उसका अध:पतन हो जाता है।

English

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अध्याय 47

श्लोक 249

प्रगृहीतायुधैर् विप्रैर् वृतः शतसहस्रशः

pragṛhītāyudhair viprair vṛtaḥ śatasahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

गर्भिणी सूतिका नक्तं कुमारी वाथ रोगिणी। गर्भिणी एवं सूतिका (सौरीमें पड़ी हुई) स्त्री नक्तब्रत यद्यशुद्धा तदान्येन कारयेत् प्रयता स्वयम्॥ ३६ (रातमें भोजन) करे। कुमारी और रोगिणी अथवा

English

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अध्याय 47

श्लोक 250

निःशेषाञ्छूद्रराज्ञस्तु तदा स तु करिष्यति ब्रह्मद्विषः सपत्नांस्तु संहृत्यैव च तद्वपुः

niḥśeṣāñchūdrarājñastu tadā sa tu kariṣyati brahmadviṣaḥ sapatnāṃstu saṃhṛtyaiva ca tadvapuḥ

हिन्दी अर्थ

कल्पकोटिशतं साग्रं शिवलोके महीयते य इत्थं गिरितनयाव्रतमिन्द्रलोकसंस्थः । मतिमपि च ददाति सोऽपि देवै-

English

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अध्याय 47

श्लोक 251

पञ्चविंशे स्थितः कल्किश् चरितार्थः ससैनिकः शूद्रान् संशोधयित्वा तु समुद्रान्तं च वै स्वयम्

pañcaviṃśe sthitaḥ kalkiś caritārthaḥ sasainikaḥ śūdrān saṃśodhayitvā tu samudrāntaṃ ca vai svayam

हिन्दी अर्थ

अशुद्ध स्त्री स्वयं नियमपूर्वक रहकर दूसरेके द्वारा व्रतका अनुष्ठान कराये। जो मानव अनन्त फल प्रदान करनेवाली इस तृतीयाके व्रतका अनुष्ठान करता है, वह सौ करोड़ कल्पोंसे भी अधिक समयतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। निर्धन पुरुष भी यदि तीन वर्षोतक उपवास करके पुष्प और मन्त्र आदिके द्वारा इस व्रतका अनुष्ठान करता है तो उसे भी उस फलकी प्राप्ति होती है। सधवा स्त्री, कुमारी अथवा विधवा-जो कोई भी इस व्रतका पालन करती है, वह भी गौरीकी कृपासे लालित होकर उस फलको प्राप्त कर लेती है। इस प्रकार जो मनुष्य गिरीश-नन्दिनी पार्वतीके इस व्रतको पढ़ता अथवा सुनता है, वह इन्द्रलोकमें वास करता है

English

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अध्याय 47

श्लोक 252

प्रवृत्तचक्रो बलवान् संहारं तु करिष्यति उत्सादयित्वा वृषलान् प्रायशस्तानधार्मिकान्

pravṛttacakro balavān saṃhāraṃ tu kariṣyati utsādayitvā vṛṣalān prāyaśastānadhārmikān

हिन्दी अर्थ

तथा जो इसका अनुष्ठान करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी देवताओं, देवाङ्गनाओं और किन्नरोंद्वारा पूजनीय पूज्यः ॥ ४० हो जाता है ॥३५--४० ॥

English

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अध्याय 47

श्लोक 253

ततस्तदा स वै कल्किश् चरितार्थः ससैनिकः प्रजास्तं साधयित्वा तु समृद्धास्तेन वै स्वयम्

tatastadā sa vai kalkiś caritārthaḥ sasainikaḥ prajāstaṃ sādhayitvā tu samṛddhāstena vai svayam

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽनन्ततृतीयाब्रतं नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अनन्ततृतीया-व्रत नामक बासठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ रसकल्याणिनी-ब्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

English

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अध्याय 47

श्लोक 254

अकस्मात्कोपितान्योन्यं भविष्यन्तीह मोहिताः क्षपयित्वा तु ते ऽन्योन्यं भाविनार्थेन चोदिताः

akasmātkopitānyonyaṃ bhaviṣyantīha mohitāḥ kṣapayitvā tu te 'nyonyaṃ bhāvinārthena coditāḥ

हिन्दी अर्थ

अथान्यामपि वक्ष्यामि तृतीयां पापनाशिनीम्। रसकल्याणिनीमेनां पुराकल्पविदो विदुः माघमासे तु सम्प्रासे तृतीयां शुक्लपक्षतः। प्रातर्गव्येन पयसा तिलैः स्त्रानं समाचरेत्

English

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अध्याय 47

श्लोक 255

ततः काले व्यतीते तु स देवो ऽन्तरधीयत नृपेष्वथ प्रनष्टेषु प्रजानां संग्रहात्तदा

tataḥ kāle vyatīte tu sa devo 'ntaradhīyata nṛpeṣvatha pranaṣṭeṣu prajānāṃ saṃgrahāttadā

हिन्दी अर्थ

स्त्रापयेन्मधुना देवीं तथैवेक्षुरसेन च। दक्षिणाङ्गानि सम्पूज्य ततो वामानि पूजयेत् गन्धोदकेन च पुनः पूजनं कुङ्कुमेन वै। ललितायै नमो देव्याः पादौ गुल्फौ ततोऽर्चयेत्। ईश्वरने कहा--नारद! अब मैं एक अन्य तृतीयाका भी वर्णन कर रहा हूँ. जो पापोंका विनाश करनेवाली है, तथा जिसे पुराकल्पके ज्ञातालोग 'रस-कल्याणिनी' के नामसे जानते हैं। माघका महीना आनेपर शुक्लपक्षकी

English

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अध्याय 47

श्लोक 256

रक्षणे विनिवृत्ते तु हत्वा चान्योन्यमाहवे परस्परं च हत्वा तु निराक्रन्दाः सुदुःखिताः

rakṣaṇe vinivṛtte tu hatvā cānyonyamāhave parasparaṃ ca hatvā tu nirākrandāḥ suduḥkhitāḥ

हिन्दी अर्थ

तृतीया तिथिको प्रातःकाल ब्रतीको गो-दुग्ध और तिलमिश्रित जलसे स्त्रान करना चाहिए। (इस प्रकार स्वयं शुद्ध होकर) फिर देवीकी मूर्तिको मधु और गन्नेके रससे स्नान करावे। तत्पश्चात् सुगन्धित जलसे शुद्ध स्नान कराकर कुडुगका -मका अनुलेप करे। पूजनमें दक्षिणाङ्गकी पूजा कर पश्चात् वामाङ्गकी पूजा करनेका विधान है। “ललितायै नमः' से देवीके दोनों चरणों तथा दोनों गुल्फोंकी अर्चना करे। “शान्त्यै नमः'

English

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अध्याय 47

श्लोक 257

पुराणि हित्वा ग्रामांश्च तुल्यत्वे निष्परिग्रहाः प्रनष्टाश्रमधर्माश्च नष्टवर्णाश्रमास्तथा

purāṇi hitvā grāmāṃśca tulyatve niṣparigrahāḥ pranaṣṭāśramadharmāśca naṣṭavarṇāśramāstathā

हिन्दी अर्थ

जङ्घां जानुं तथा शान्त्यै तथैवोरुं श्रियै नमः॥ ४ से जंघाओं और जानुओंका, “श्रियै नमः” से ऊरुओंका, भ्रूललाटे च रूद्राण्यै शंकरायै तथालकान् मुकुटं विश्ववासिन्यै शिरः कान्त्यै तथार्चयेत्। मदनायै ललाटं तु मोहनायै पुनर्थुवौ

English

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अध्याय 47

श्लोक 258

अट्टशूला नानपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः प्रमदाः केशशूलाश्च भविष्यन्ति युगक्षये

aṭṭaśūlā nānapadāḥ śivaśūlāścatuṣpathāḥ pramadāḥ keśaśūlāśca bhaviṣyanti yugakṣaye

हिन्दी अर्थ

रम्भायै वामकुक्षिं च विशोकायै नमः कटिम्। हृदयं मन्मथाधिष्ण्यै पाटलायै तथोदरम् जानुजङ्घे नमो गौर्यै गायत्र्यै घुटिके नमः

English

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अध्याय 47

श्लोक 259

ह्रस्वदेहायुषश्चैव भविष्यन्ति वनौकसः सरित्पर्वतवासिन्यो मूलपत्त्रफलाशनाः

hrasvadehāyuṣaścaiva bhaviṣyanti vanaukasaḥ saritparvatavāsinyo mūlapattraphalāśanāḥ

हिन्दी अर्थ

धराधरायै पादौ तु विश्वकायै नमः शिरः। नमो भवान्यै कामिन्यै कामदेव्यै जगत्प्रिये अनेन विधिना देवीं मासि मासि सदार्चयेत् पानकं ज्येष्ठमासे तु आषाढे चाथ जीरकम्। श्रावणे वर्जयेत् क्षीरं दधि भाद्रपदे तथा

English

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अध्याय 47

श्लोक 260

चीरचर्माजिनधराः संकरं घोरमाश्रिताः उत्पातदुःखाः स्वल्पार्था बहुबाधाश्च ताः प्रजाः

cīracarmājinadharāḥ saṃkaraṃ ghoramāśritāḥ utpātaduḥkhāḥ svalpārthā bahubādhāśca tāḥ prajāḥ

हिन्दी अर्थ

'मदालसायै नमः ' से कटिभागका, 'अमलाये नमः ' से उदरका, “मदनवासिन्यै नमः ' से दोनों स्तनोंका, “कुमुदायै नमः ' से कंधोंका, “माधव्यै नमः ' से भुजाओं और भुजाओंके अग्रभागका, “कमलायै नमः ' से मुख और मुसकानका, "रूद्राण्यै नमः' से भौंहों और ललाटका, शङ्करायै नम: ' से बालोंका, ' विश्ववासिन्यै नमः ' से मुकुटका और ' कान्त्यै नमः ' से सिरका पूजन करे। पुनः (पूजनका अन्य क्रम बतलाते हैं--) “मदनायै नमः ' से ललाटकी, 'मोहनायै

English

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अध्याय 47

श्लोक 261

एवं कष्टमनुप्राप्ताः काले संध्यंशके तदा ततः क्षयं गमिष्यन्ति सार्धं कलियुगेन तु

evaṃ kaṣṭamanuprāptāḥ kāle saṃdhyaṃśake tadā tataḥ kṣayaṃ gamiṣyanti sārdhaṃ kaliyugena tu

हिन्दी अर्थ

नमः से दोनों भौंहोंकी, 'चन्द्रार्धधारिण्यै नमः ' से दोनों नेत्रोंकी, तुष्टयै नमः ' से मुखकी, ' उत्कण्ठिन्यै नमः' से कण्ठको, “अमृतायै नमः' से दोनों स्तनोंकी, ' रम्भायै नमः ' से बायीं कुक्षिको, “विशोकायै नमः ' से कटिभागकी, “मन्मथाधिष्ण्यै नमः' से हृदयकी, “पाटलायै नमः' से उदरको, 'सुरतवासिन्यै नमः” से कटिप्रदेशकी, “चम्पकप्रियायै नमः' से ऊरुओंकी, 'गौयै नमः” से जंघाओं और जानुओंकी, “गायत्र्यै नमः ' से घुरनोंकी, ' धराधरायै नमः” से दोनों चरणोंकी और 'विश्वकायै नमः ' से सिरको पूजा करके ' भवान्यै नमः ', "कामिन्यै नमः ', “कामदेव्यै नमः', “जगत्प्रियायै नमः” कहकर चरणोंमें प्रणिपात (प्रणाम) करना चाहिए॥ १--११॥

English

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अध्याय 47

श्लोक 262

क्षीणे कलियुगे तस्मिंस् ततः कृतमवर्तत इत्येतत्कीर्तितं सम्यग् देवासुरविचेष्टितम्

kṣīṇe kaliyuge tasmiṃs tataḥ kṛtamavartata ityetatkīrtitaṃ samyag devāsuraviceṣṭitam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार विधि-विधानके साथ देवीकी पूजा करके एक द्विज-दम्पतिका भी पूजन करना चाहिए। उस समय व्रती अहंकाररहित हो अर्थात् विनम्रतापूर्वक उन्हें मधुर अन्न और जलका भोजन कराकर दो श्वेत वस्त्रोसे परिवेष्टित एवं स्वर्णनिर्मित कमलसहित जलसे भरा हुआ घड़ा प्रदान करे फिर चन्दन और पुष्पमाला आदिसे उनकी अर्चना करे, तथा इस प्रकार कहे-'इस ब्रतसे कुमुदा देवी प्रसन्न हों।' ऐसा कहकर उस दिन

English

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अध्याय 47

श्लोक 263

यदुवंशप्रसङ्गेन समासाद्वैष्णवं यशः तुर्वसोस्तु प्रवक्ष्यामि पूरोर् द्रुह्योस्तथा ह्य् अनोः

yaduvaṃśaprasaṅgena samāsādvaiṣṇavaṃ yaśaḥ turvasostu pravakṣyāmi pūror druhyostathā hy anoḥ

हिन्दी अर्थ

लवण-त्रत ग्रहण करे अर्थात् नमक खाना छोड़ दे। इसी विधिसे प्रत्येक मासमें सदा देवीकी अर्चना करनी चाहिए। व्रतीको माघमें नमक और फाल्गुनमें गुड़ नहीं खाना चाहिए । चैत्रमें तेल और पीली सरसों (या राई) तथा वैशाखमें मधु वर्जित है । ज्येष्ठमासमें पानक (एक प्रकारका पेय पदार्थ या ताम्बूल), आघषाढ्में जीरा, श्रावणमें दूध और भाद्रपदमें दही निषिद्ध है। इसी प्रकार अश्विनमें घी और कार्तिकमें मधुका निषेध किया गया धान्यकं मार्गशीर्षे तु पौषे वर्ज्या च शर्करा॥ १७ है। मार्गशीर्षमें धनिया और पौषमें शक्कर वर्जित है।

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।