तैत्तिरीयोपनिषद्

Brahmānanda Vallīश्लोक 9/9100%

Taittiriya Upanishad 2.9

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

यतो वाचो निवर्तन्ते ।अप्राप्य मनसा सह ।आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् ।न बिभेति कुतश्चनेति ।एतंह वाव न तपति ।किमहंसाधु नाकरवम् ।किमहं पापमकरवमिति ।स य एवं विद्वानेते आत्मान स्पृणुते ।उभे ह्येवैष एते आत्मान स्पृणुते ।य एवं वेद ।इत्युपनिषत् ॥ १ ॥ ॥ इति अनुवाकः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जिससे वाणी मन के साथ लौटती है — उसको प्राप्त किये बिना — ब्रह्म-आनन्द को जानने वाला कभी नहीं डरता। उसे "मैंने साधु क्यों नहीं किया?", "मैंने पाप क्यों किया?" — ये नहीं तपाते। ऐसा ज्ञानी इन दोनों को आत्मा-रूप मानता है — दोनों ही आत्मा को पोषित करते हैं उसके लिये। यह उपनिषद् है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

From which words turn back, unattained, with the mind — knowing the bliss of Brahman, he never fears. He is not tormented by: 'Why did I not do good? Why did I do evil?' He who knows thus accepts both as the Self — both are nourishing to the Self for him who knows thus. — This is the upaniṣad.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

ब्रह्मानन्द-वल्ली का समापन। प्रसिद्ध 'यतो वाचो निवर्तन्ते' पुनः आता है। साक्षात्कारी पुरुष नैतिक आत्म-पीड़न से परे है — वह 'मैंने यह अच्छा क्यों नहीं किया / यह बुरा क्यों किया' दोनों को आत्मा की गतिविधियाँ मानकर स्वीकार करता है। समता ही फल है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक युग में मानसिक रोगों का एक बहुत बड़ा कारण अंतहीन आत्म-ग्लानि (chronic guilt), पछतावा और नैतिक आत्म-पीड़न है। लोग अतीत की गलतियों को बार-बार याद करके खुद को कोसते रहते हैं: 'मैंने वह अच्छा काम क्यों नहीं किया? मैंने वह भूल क्यों कर दी?' यह निरंतर चलने वाला आंतरिक युद्ध मनुष्य की मानसिक ऊर्जा को चूस लेता है और उसे अवसाद में धकेल देता है। तैत्तिरीयोपनिषद् की ब्रह्मानन्दवल्ली का यह शिखर मंत्र जीवन-मुक्ति की परम अवस्था प्रस्तुत करता है। जब साधक उस अनिर्वचनीय ब्रह्म-चेतना का साक्षात्कार कर लेता है—'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह'—तो वह समस्त द्वंद्वों और आत्म-धिक्कार से परे चला जाता है। वह जान जाता है कि पुण्य और पाप, सफलता और विफलता दोनों प्रकृति और मन के स्तर पर घटने वाली घटनाएं थीं, जबकि उसका शुद्ध आत्म-स्वरूप इन सबसे सर्वथा अछूता और निष्कलंक है। आधुनिक मनोविज्ञान (Self-Compassion Theory by Kristin Neff) भी सिद्ध करता है कि अत्यधिक आत्म-आलोचना के बजाय गैर-निर्णयात्मक आत्म-स्वीकृति ही सच्चे नैतिक सुधार का आधार बनती है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **आत्म-धिक्कार का विसर्जन (Transcending Chronic Guilt)**: 'काश मैंने ऐसा किया होता' के अंतहीन चक्रव्यूह से बाहर निकलें; अपनी पिछली गलतियों से सीख लें और वर्तमान क्षण में स्वयं को क्षमा करके आगे बढ़ें। - **साक्षी भाव में विश्राम (Resting in Pure Non-Judgment)**: जब भी मन में आत्म-आलोचना का ज्वार उठे, एक गहरी सांस लें और स्वयं को स्मरण कराएं कि आपकी अंतरात्मा इन मानसिक तरंगों से परे शुद्ध और मुक्त है। - **करुणापूर्ण नैतिक आचरण (Compassion-Led Right Action)**: दूसरों की या अपनी कमियों पर दंड देने वाली मानसिकता के बजाय करुणा और विवेक से कार्य करें, क्योंकि शांतिपूर्ण मन ही सही निर्णय ले सकता है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं दिन-रात अतीत के पछतावे और आत्म-आलोचना के कांटे से खुद को छलनी कर रहा हूं, या मैंने उस अंतरात्मा की समता में शरण ली है जो समस्त द्वंद्वों से परे है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

आत्म-करुणा शोध (Neff) — गैर-निर्णयात्मक आत्म-स्वीकृति अपराध-बोध की तुलना में निरन्तर नैतिक विकास से अधिक सहसम्बद्ध है। यह counter-intuitive किन्तु सुप्रमाणित है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (Book Code 0071). Gita Press Gorakhpur (Official Publication)
Translation
Gita Press Editorial Board (Hindi)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain. Digitized by sanskritdocuments.org.
पाठ-भेद · Variant readings
Collated with Anandashram Sanskrit Series No. 12.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next