Atharva Veda
11
अध्याय 11 / 20

Kanda 11

काण्ड 11

420 श्लोकभाग 3/7 · श्लोक 3.4-18–3.24

पूर्ण अध्याय पाठ76 श्लोक

अध्याय 11

श्लोक 3.4-18

ऋ॒तस्य॒ हस्ता॑भ्याम्

ṛtasya hastābhyām

हिन्दी अर्थ

प्रपितु उदारता पूवंकं धर्मं भावना से दिये गये, या स्वोपांजित भ्रोदन का सेवन करना चाहिए, श्रौर इसे सर्वाङ्गं सम्पूणं भोजन जानना चाहिए । यह मव कल्याणकारी, भवलास अर्थात् बलक्षय को. दूर करते, खानेमे मधुर, ८६ भ्रथर्वेवेद-माष्य का० ११।सूु०३

English

The Master, welcoming his new disciple, into his bowels takes the Brahmachāri. Three nights he holds and bears him in this belly. When he is born, the Gods convene to see

अध्याय 11

श्लोक 3.4-19

स॒त्ये प्र॑ति॒ष्ठाय॑

satye pratiṣṭhāya

हिन्दी अर्थ

(पूवं ऋषयः) पूरवंकाल के या सदृ गुणो से पूरित ऋषियों ने (यया जायेगी, (इति) यह (एनम्) - इस प्रादान - कर्ता को विन्न (राह) कहे) को (श्रजीगमम्) मैने उदरादि मे पहुंचाया है । (स वा भ्रोदनः"“"वेद) भ्रथं . । । श्रोदन का प्राश्न करने वाला कहता है कि मैने निज जिह्वा. दारा

English

him.

अध्याय 11

श्लोक 3.5

अश्वाः॒ कणा॒ गाव॑स्तण्डु॒ला म॒शका॒स्तुषाः॑

aśvāḥ kaṇā gāvastaṇḍulā maśakāstuṣāḥ

हिन्दी अर्थ

किया है! मनुषी-जिह्वा तो चटपटी, राजसिकः तामसिक, तथा प्रवेष मास - ¦ ॥ बती है, भविङ्ृत रूपा है । भग्निदेव के भ्रति मांसाहृति वेदविष्ढ है । त्यैनमाह । तं वा अहं नावांञं न परां न मत्य् । बतुभिहैन्तैः । (पूर्वे ऋषयः) पूव॑काल के या सद्गुणो से पूरित ऋषियों ने (येः .

English

Mitra from his loftiest soul. The pupil is the Master, yea, the pupil is Prajāpati.

अध्याय 11

श्लोक 3.5-2

तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्

tenainaṃ prāśiṣaṃ tenainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

प५्) इस रोदन का (भ्रजीगमम्) मने उदरादि मे पहुंचाया है । सं वीं भ्रौदनः?०“वेद) अथं पर्ववत्, मनर ३५ । . ऋतु-ऋतु के श्रनुसार व्यञ्जनो मे यथोचित परिवर्तन के साथ, तथा ऋतु-ऋतु के मरनुसार भ्रोदन के परिपाको को तम्यार कर, भ्रोदन के मन्व रँ ऋतुचर्या का विचार दिया है । (वे ऋषयः) पूवं काल के या सगुणो से परिह ऋष्यो ने (येः)

English

The Brahmachāri, earlier born than Brahma, sprang up through

अध्याय 11

श्लोक 3.5-3

ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्

tābhyāmenaṃ prāśiṣaṃ tābhyāmenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

खाया 8, (ततः) उस से (च = चेत्) यदि (श्रन्यैः) भिज्ञ रकार के (एष वा भद्रन“ "वेद ) पूर्ववत् मन्व ३ ५। सप्तषि दो पभरकार के है (१) च लोकस्थ, (२) शरीरस्थ । मन्तमे शरीरस्थ सप्तषियो का कथन किया है । यथा “सप्त ऋषया प्रतिहिताः

English

Fervour, robed in hot libation. From him sprang heavenly lore, the highest Brahma, and all the

अध्याय 11

श्लोक 3.5-4

ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्

tābhyāmenaṃ prāśiṣaṃ tābhyāmenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

मस्तिष्क मे सात ऋषि साथ-साथ उपविष्ट है । इस पर निरुक्त मे कहा ह स्वेतनूः सं भ॑वति य एवं वेद॑ ॥३९॥ वे ऋषयः) पूर्वकाल के. या सदृगणो से. परित ऋषियों ने (येन , कां० ११।सू्० ३ अ्रथववेद-भाष्य ८९

English

Gods, with life that lasts for ever.

अध्याय 11

श्लोक 3.5-5

तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्

tenainaṃ prāśiṣaṃ tenainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

(पुवं ऋषयः) पूवं काल के या .सदुगुणो से पूरित ऋषियों ने (येन विजली (त्वा) तेरी (हनिष्यति) हत्या करेगी,- इति ) यह ( एनम् ) धयु क्षयरोग होने नहीं देती । यइ बुद्ध वायु फेफडो मे जा कर, रणत को शुद्ध करके, समग्र शरीर तया शरीरावयवों को स्वस्थ करती है । , ९० . श्रथरवेवेद-माष्य -कां० ११ सु०३

English

Lighted by fuel goes the Brahmachāri, clad in black-buck skin, consecrate, long-bearded. Swiftly he goes from east to northern ocean, grasping the worlds, oft bringing them anear

अध्याय 11

श्लोक 3.5-6

तयै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तयै॑नमजीगमम्

tayainaṃ prāśiṣaṃ tayainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

शरीरके पृष्ट भाग मे मस्तिष्क ( छं? ), सुषुम्णा नादी सेवन इस प्रकार करने का विधान किया है जिस से किं चुलोकात्मक' नाडी देती है । महात्मा के सिरोंके चारों भ्रोरं जो प्रभामण्डल होते. हवे. नसएणा हपट १० एषा" (्रन्यकार (दारिणां ह ¢पतला०0, 4. 0.

English

him.

अध्याय 11

श्लोक 3.5-7

तैरे॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तैरे॑नमजीगमम्

tairenaṃ prāśiṣaṃ tairenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

के निम्नलिखित उद्धरण विशेष प्रकारश्च डालते है यथा-- १. दुषुम्णानाड़ी के चक् तथा तनतु काः तान-्रतान, शरीर भे मका ( (नधत) का हेतु है । तथा “दिवं, मश्वके सूरबनम्” (भथ १०।७।३९) दवा पूवा ॥ (पूर्वे ऋषयः) पूरवेकाल के या सद्गुणो से प्रित ऋषिर्यो ने (येन

English

The Brahmachāri, fathering Prayer, world, Waters, Virāj, Prajā- pati, and Parameshthin, Lay as a germ within the Immortal’s bosom, then became Indra and destroyed the demons.

अध्याय 11

श्लोक 3.5-8

तैरे॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तैरे॑नमजीगमम्

tairenaṃ prāśiṣaṃ tairenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

तो (कृष्या) कृषिकमं दवाय (न रात्स्यसि) तु समृद्ध नहीं होगा-- (इति) ( भ्रजीगमम् ) मैने उदरादि रङ्गो मे पहुंचाया है । (एष वा भरोदन वेद) पृथिव्या उरसा जिस प्रकारं प्रथिवी, बीज का एक दाना खा कर, उसे रूपान्तरित कर, उस से करई गुना बीज दानो को उत्पन्न कर, प्राणियों की रक्षा करती है, इसी प्रकार मैने वक्षः स्थल कूपी पृथिवी मे वीरता भौर . (वं ऋषयः) पूवं काल के या सद्गुणो से पूरित ऋषियों उदरेण) जिस उदर से (एतम्) इस भ्रोदन का नि ४५ ।

English

The Master fashioned both these cloudy regions, profound and spacious pair, the earth and

अध्याय 11

श्लोक 3.5-9

तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्

tenainaṃ prāśiṣaṃ tenainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

६२. भ्रथववेद-माष्य कां० १९१ सू० ३ (ततः) उस से (अन्येन उदरेण) . भिन्न भ्रकार के उदर से (चं चेत्) यदि (एनम्) इस भ्रोदन का (प्राशः) तूने प्राशन किया है, तो (उदरदारः ). (एनम्) इस ओदन का (प्रािषम्) मैने भराशन किया है, (तेन) उस द्वारा (निषं १।१२) । उदक के उचित मात्रा में सेवक करने से भ्रान्तो की खुद्की दुर हो कर, शौचक्रिपाके हो जाने से, उदर व्यथा नहीं होने पातीः-यह

English

heaven. The Brahmachāri guards them with his Fervour. In him the deities are all one-minded.

अध्याय 11

श्लोक 3.5-10

तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्

tenainaṃ prāśiṣaṃ tenainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

अथवं० ४।१६।६.७ मे भ्रनृतमाषणं का सम्बन्ध उदर के संज्ञाव के - । मी उचित मात्रा में होना चाहिए । २. इस मन्त्र मँ ““भनृत-भाषण" को उदर-संज्ाव का हेतु दर्शाया है । उदर- कां० ११। सू० ३ भ्रथववेद-माष्य ९३ (पूरवे ऋषयः) पूवंकाल के या सदृगुणों से पूरित ऋषियों ने. (येन

English

The Brahmachāri first of all brought hither this ample earth as alms, and heaven above it.

अध्याय 11

श्लोक 3.5-11

तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्

tenainaṃ prāśiṣaṃ tenainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

चेत्) यदि (एनम्) इस भ्रोदन का (पराशषीः) तूने प्राशन किया है, तो (भ्रमु) जलो मे (मरिष्यति) तु मरेगां, (इति) यहं (एनम्) इस प्राशन समुद्र खारी होता ह, भ्म्ल नहीं ! भोजन भें मोज्य पदां ेसा होना चाहिए जो कि मूत्रमे भ्रम्लपेदा न करे, तथा जलपान भी इसी बना देता है, श्रौर मधुमेह जसे रोगों को उत्पन्न कर देता.है । तथा णप् जलपान प्रभूत मात्रा मेँ होना चाहिए, इस से वस्तिरोग नदीं सर्वेपडः स्वेतनः सं भवति य एवं वेदं ॥४४॥

English

He makes these twain two fuel-logs, and worships, On these sup- ported rest all living creatures.

अध्याय 11

श्लोक 3.5-12

तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्

tenainaṃ prāśiṣaṃ tenainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

(पूवे ऋषयः) पूवं काल के या. सद्गुणो से -पुरित ऋषियों ने भे भोज होताहै, जिससे ऊरु समग्र शरीर के भारको उठाए रखते है । भोजन दस प्रकार का भ्रौर इस दुष्टि से करना चाहिए जिस से ऊर््रो में उदित होता है, भ्रौर चन्द्रमा परिचम दिशा से । वरण, परिचम दिदाका म्रधिपति है । यथा “प्रतीची दिग् बरुणोऽचिपतिः” (रथव. -३।२७।३) । सूयं नौर चन्द्रमा कीः किरणे इन दोनों के ऊर है । ये बड़ भोज वाति है । मानो इन को किरण रूपी ऊर ने इन भारी सूये भ्ौर चान्द के बोम को उठाया ॥

English

Both treasuries of sacred lore lie hidden, one hitherward, beyond heaven’s ridge the other.

अध्याय 11

श्लोक 3.5-13

तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्

tenainaṃ prāśiṣaṃ tenainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

छवङ्ग एव सर्वपरः सर्व॑तनूः स मैवति य एवं वेद् ॥४५॥ (पूवं ऋषयः ) पूरवेकाल के या सद्गरणों से पूरित ऋषिर्यो ने कां ११।सु० ३ .. भथर्ववेद-भाष्य ९५ . भरोदन का. (भालीः) तूने प्रान किया है तो (सामः) लामरोग वाला

English

The Brahmachārī with his Fervour guards them. He makes this all his own as knowing Brahma.

अध्याय 11

श्लोक 3.5-14

ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्

tābhyāmenaṃ prāśiṣaṃ tābhyāmenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

भरस्थियां ह करकाः, श्रोले । ये ओले जब पृथिवी प्र गिरते ह तो कल्निा- ५ दृढावस्था मे होते है । इसी प्रकार घुटनों की वृदावस्था हनो चाहिए. . घुटनों की श्रस्थियों के ढीला पड़ जाने से घुटकों मे पीड़ाहो दिया-ह । ज्लामः=शुष्कजङ्खः (सायण) । का सर्वाङ्गः एव सरव॑परः सर्व॑तनूः सं भ॑वति य एवं वेदं ॥४६॥ (पूर्वे ऋषयः) पूवेकाल के या सदुगृणों से पूरित ऋषियों ने (याम्यां

English

Hitherward one, hence from the earth the other, two Agnis meet between these cloudy

अध्याय 11

श्लोक 3.5-15

ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्

tābhyāmenaṃ prāśiṣaṃ tābhyāmenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

(बहुचारी भविष्यसि) बहुत विच॑रने वाला तु होगा, (इति) यह (एनम्). भररिवयों के उनदो पादो से (एनम्) इस मोदन का (प्रारिषम्) सेने पटुचाया है । (एष वा भोदनः'“ "वेद ) भ्रं पूववत् मन्त्र २५। ९६ श्रथरवेवेद-माष्य का० ११। सुण द

English

regions. Close to these two firm rays of light are clinging. The Brahma- chāri enters them through

अध्याय 11

श्लोक 3.5-16

ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्

tābhyāmenaṃ prāśiṣaṃ tābhyāmenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

रोगों के उपचार कै लिये भिन्न-भिन्न स्थानों मेँ घूमना निष्ट किया है । ६।३४) । पादरोग का शमन सम्भवतः सूयं की शुश्न रदिमियो या इस की सप्तरदिमयो मे से किसी ररिम द्वारा हो सकता हि । भ्रुयं कौ शुन्न रदिमयों . को 8९८४) द्वारा ७ रर्मियों मेँ विमक्त किया जा सकता है । वैदिक साहित्य मे श्रदिवयों को “देवानां भिषजौ” द्वारा वणित . मी किया जाता

English

Fervour.

अध्याय 11

श्लोक 3.5-17

ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्

tābhyāmenaṃ prāśiṣaṃ tābhyāmenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

ररिमिभिः” (यजु० १,३१) । सूर्यं को रदिमयों को हस मन््रपाद मै , ञ्रभिप्राय यहहो कि तेरी टंगो. तथा परो मे भ्रस्थिरता तथा लड़- खडाना रोग हो जायगा, जिसका कि उपचार “्रदिविनोः पादाम्याम् हारा हो सकेगा । “बहुचारी" पदं मे “चर का भ्रथं “गतिमात्र" भ्रभिप्रेत हने.पर परो की श्रस्थिरता तथा लडखडाना भी गति ही. है । शारीरिक रोगो का मुख्य कारण, उदर तथा खानपान में भ्रसंयम है 1 सवौ एव स्वपः सर्वतनूः से म॑वति य एवं वेदं ॥४७॥ (पूवं ऋषयः) पूरवेकाल के या सदुगृर्ो से पूरित ऋषियों ने (या-

English

Thundering, shouting, ruddy-hued, and pallid, he bears along the earth great manly vigour. Down on the ridge of earth the Brahmachāri pours seed, and this gives life to heaven’s four

अध्याय 11

श्लोक 3.5-18

ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्

tābhyāmenaṃ prāśiṣaṃ tābhyāmenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

पादाग्रों सै (चं चेत् ) यदि (एनम् ) इस भ्रोदन का (आसीः) । यदि (एनम्) इस. ५ :) तूने प्राशन क्या है तो (त्वा) तुभे (सपः) सपं ( ) मार डालेगा, या प्राप्त म पहुंचाया है । एष वा रोदन “““वेद) भ्रथं पूरवेवत् मन्त्र ३५ 1. भ्रपहत हो जाय भ्रौर द्युलोक रदिमियों से भराकोणं हो जाय, भ्रौर नीचे पृथिवी पर भ्रभी तमस् श्रन्धकार हो तो वह सविता काकाल है। इस

English

regions.

अध्याय 11

श्लोक 3.5-19

तयै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तयै॑नमजीगमम्

tayainaṃ prāśiṣaṃ tayainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

इस.काल में भोदन. रादि का प्राशन, बर्थात् प्रातराश करना चाहिए, न कि द्रस.से पूवं । इम समय से पूरवंकाल मेँ भरन्वेरा भ्रधिक होता है, मरतः सपं प्रादि के काटने का भय रहता है । हनिष्यति =संपं मार डालेगा, या सर्वो्गः एव सरव॑परः सर्वतनूः सं भ॑वति य एवं वेद॑ ।॥४८॥ (पुवं ऋषयः) पूवं काल के या सदृगुणों ऋषियों 4 अथववेवेद-माष्य कां० ११1 सूु०३े

English

The Brahmachāri stores with fuel Waters, and Fire, and Sun, and Moon, and Mātarisvan.

अध्याय 11

श्लोक 3.6

कब्रु॑ फली॒कर॑णाः॒ शरो॒ऽभ्रम्

kabru phalīkaraṇāḥ śaro'bhram

हिन्दी अर्थ

मी, परमेश्वरीयेच्छा के अभाव मे, मेष बरसता नहं । मेध तो परमेश्वराय कृति है, भमौर पत्थर की मूतति मानुषङ्ृति है । पत्थर की मूत से मनुष्य . के कौशल की तो प्रशंसा हो सकती है, परमेश्वर की नहीं । ्रोषधि्यों को (रभि) लक्षय कर के (कन्दति) नादया ध्वनि करता है,

English

May Soma free me, God to whom they give the name of Chan- dramās. All creatures both of heaven and earth, wild beasts and sylvan animals,

अध्याय 11

श्लोक 3.6-2

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

, (भूम्याम् भ्रधि) पृथिवी पर है। खूप हो जानाः उन की प्रसन्नता है । : का० ११।यु०४ भ्रथवेवेद-माष्य . १०५ निर्चय से (नः) हमारे लिये (महः) महान् भरत (भविष्यति) होगा ॥

English

By self-restraint the ox and horse seek to win fodder for them- selves.

अध्याय 11

श्लोक 3.6-3

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

प्राणे के.साथ (समवादिरन्) संवादं किया किं (वे) निरचय से (नः भ्रायुः) हमारी श्राय को (परातीत्रः) तूने बढ़ा दिया है, रौर (नः सर्वाः) हम सब कों (सुरमीः) सुगन्धित (श्रकः) तने कर दिया है। नमस्कार हो, (परायते) परे जाते हृएं (नमः, भ्रस्तु) नमस्कार हो । (तिष्ठते) स्थिर होते हृए (ते) तुभे (नमः) नमस्कार हो, (उत) तथा (भ्रासोनाय) बेठे हृए (ते नमः) तुभे नमस्कार 'हो । न, फफडों के मोतर श्रातां, तथा भोतरसे बाहिर जातादहै । प्राणायाम की श्रल्पकालिक तथा दीषंकालिक कुम्भक कह सकते है । विशेष परिज्ञान के

English

By Fervour and by self-restraint the Gods draye Death away from them, And Indra brought by self-restraint heaven’s lustre to the deities.

अध्याय 11

श्लोक 3.6-4

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्वपरुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

१०९६ श्रथवेवेद-भाष्य कां० ११।५यु४ परमेद्वर का देन भी भल्याधिक काल तक होने लमतां है । पहिले परमेदवर का अत्यल्प काल के - लिये दर्चंन होताः (श्रायते) ; भौर पुनः दन का श्रमावहो जाता, विलोप हयो जाता (परायते) । कालान्तर मे पूर्णतया परिपक्व हौ जाने पर परमे्वर भानो चित्त मे भ्रासीन हौ जाता देना । परायते चित्त से प्ररे-चला जाना, ्र्थात् दशेन का विलोप हो जाना । इस प्रकार का अभिप्राय “तिष्ठते” रौर शभासीनाय का 9.१ मन्तरमें पराण-श्रपान या स्वास-उच्छवास रूप व्रायु के व व

English

The plants, what is and what shall be, day, night, the tall tree of the wood,

अध्याय 11

श्लोक 3.6-5

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

चेतन- देवता को सूचित करता है । इस लिये व्यं मन्त्रमे भी शश्राण" से राण) है भ्राण ! (श्राणते) प्राण क्रिया करने वाले (ते नमः) तु गति करने वाले (ते नमः) तु नमस्कार हो,(मतीचीनाय ) शरीर के भ्रति भ्र्थात् शरीर के भीतर की भोर गति करने वाले (ते नमः) तुमे नमस्कार हो, (सर्वस्मै ) जगत् की सब प्रकार की करियाभो को करने वाले (ते) तु (इदं नमः) यहं नमस्कार हो.। - (१) प्राणायाम के ४ भाग। अरयवा चतु भाग = “बाह्याभ्यन्तरविषया-

English

The year with seasons of the year, all from the Brahmachāri sprang. All creatures of the earth and heaven, tame animals and sylvan beasts,

अध्याय 11

श्लोक 3.6-6

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

नमस्कार हो । (पराचीनाय) पराड सुख भर्थात् शरीर से बाहिर की भ्रोर का० ११। सु० ४ भ्रथववेद-भाष्य , : १०७ ग्रपान वायु की क्रिया । पराचीनायपरा (परे) +-भव्च् ( गतौ, पराञ्चनाय, परागमनकरे । मन्व ७ मँ परायते भौर मन्त ८ मे पराचौनाय भ्राण रूप परमेर्वर के प्रति नमस्कार है ।

English

Winged and wingless creatures, from the Brahmachāri sprang to life,

अध्याय 11

श्लोक 3.6-7

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

अथो यद् मेंषजं तव॒ तस्य॑ नो पेहि जीवसे ॥९॥ (प्राण) है प्राण ! (या, ते, त्रिया, तनू) जो तेरी प्रियरूपा तनु है, भ्रवयवों को, परमेदवर की तनू तथा . तन् के श्रङ्खोके रूपमे वणित किया परमेदवर भेषजलूप भी है, भौषध रूप भी है -(भिषज् चिकित्सायाम्) । यथा “भेषजमसि भेषजं गवेऽदवाय पुरुषाय भेषजम् । -सुखं मेषाय मेष्ये ॥ (यजु ° ३।५९ । इस .मन्तर मे रद्रनामक परमेच्वर को सम्बोधित करके, १९८ अरयवेवेद-माष्य कां० ११1 सू०४

English

All children of Prajāpati have breath distinctly in themselves. The Brahma that is stored within the Brahmachāri guards them all.

अध्याय 11

श्लोक 3.6-8

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

प्रतीत होता है. इन दो स्थरूपों को उपनिषदों में प्रेय भ्रौर शेय का है । शरीर मे अर शरीवयवो मे प्रेरणा चेतन-जीवात्मा द्वाराः होती है। इसी म,.तथा सरवेदवर का वणन मरस्यरूप मे अभिप्रेत है । भाणो मृत्युः भ्राणस्तक्मा भराणं देवा उपांसते ।

English

Piled up on high, but never yet ascended, that power of deities is brightly shining.

अध्याय 11

श्लोक 3.6-9

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

भाणो हं सत्यवादिगयुत्तमे छक आ द् षत् ।॥११॥ (भ्रा दधत्) स्थापित करता. हैः । क कां०-११। सुन भरथ्ववेद-माष्य १०४. मृ्यु-देवता नहीं .। यभा “स एव मृत्युः सोऽमृतं सोऽभ्वं स॒ रक्षः” (अथव ° १३।४। पर्याय ३१२५) । परमेदवर ही प्राणियों के क्मंफलरूप मे मृत्युः

English

From that sprang heavenly lore, the loftiest Brahma, and all the Gods with, life that lasts for ever.

अध्याय 11

श्लोक 3.6-10

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

(सरवे) सब (उपासते) उपासना करते हैँ । (सूयः) सूयं (ह) .निक्चय से है, (ब्रीहिः) षान (श्रपानः उच्यते) भ्रपानं कहा जाताः है । ४ ब्रीहि घान, जिस के भीतर तण्डुल होता है । शकट या गाड़ी क्योंकि बैल की सहायतासे खेत के . जूत .जाने के पदचात् बीजावाप से ब्रीहि भैर यव पैदा होते है । ब्रीहि भौर यवे के सेवन से प्राणं भौर भयान. ११० भ्रथर्ववेद-भाष्य का० ११। सु०३

English

The Brahmachāri wields the radiant Brahma wherein all Gods are woven close together;

अध्याय 11

श्लोक 3.6-11

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

(पुरषः) पुरुष (मर्भे) मातुगभं के -(भन्तरा) . भीतर (श्रपानति, भणति) अपान रौर प्राणकौी क्रिथाए करता है १ (प्राण) है प्राण ! यदा जब. (त्वम्) तू (जिन्वसि) उसे पृरिुष्ट कर देता है (रथ) तव (सः) वह् (पुनः जायते) पुनजन्म लेता है । । पुरषः =दरीरपुरी मे शयन करने वाचाया वास करे वाला जीवात्मा । जीवात्मा कारीरं धारण करना ही उसका जन्मंहै। इस. प्राण कहते है, (वातः ह) सं वारी तथा रोगनाशक' वायु भी (प्राणः उच्यते)

English

Creating breath, inhaling and exhaling, voice, mind, and heart, Brahma and holy wisdom.

अध्याय 11

श्लोक 3.6-12

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

भरायणेणोरां्गिरसीहैवीभेतष्यजा उत । जबकि हि प्राण ! तु उन्हं प्रीणित करता ह । ( १ बात, रोगनाणक भेषज तथा विदवभेषज है । यथा “प्रा बात ना जेषं लि वात वाहि य्, रपः । तवं हि निस्वभेषन देवाना त ह्यते" (भयव ०

English

Bestow on us the power of sight and hearing, glory and food and seed and blood and belly.

अध्याय 11

श्लोक 3.6-13

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

कां ११-५सु० ४ अयरववेद-माष्यं ११४ कता है कि “तुमे शान्ति देने वाली भौर तु स्वस्थ. करने वाली को र्म प्रेरित करता हूं" ।. शि १ प्रयं मे हस्तो भगवानयं मे भगवत्तरः । भ्यं मे विदवभेषजोऽयं िवाभिमंञन; 1 (श्रथरवं० ४।१३।६), “यह मेरा हाय माग्यक्लाली है, यह मेरा भ्रधिक भाग्यशाली हैँ । यहं मेरा सब रोगों का भरौषधरूप है, यह शने

English

These, standing on the flood, the Brahmachāri formed practising in sea his hot devotion. When he hath bathed, brown, yellow-hued, he shines exceedingly on earth.

अध्याय 11

श्लोक 3.6-14

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

द्वारा, रोगीःके रोग को दुर करने का भ्रादवासन दिया है) इस प्रकारकी मनोबल चिकित्सा भ्राथर्वणी-्रोषधि चिकित्सा है । भर्थात् रोगजेनक कीटाणुरभ्रो का हन करने वाला. तथा "“इममीवचातनः” खूप है । भ्रोषधि-=जलन तथा दोषो का चयन करने वाली । गृह्याग्निहोत्र

English

A prayer to all Divinities and Sanctities for deliverance from distress

अध्याय 11

श्लोक 3.6-15

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

भ्नोषधयः” में बहुवचन भी उपपन्न हो जाता है । ११२ भरथवेवेद-माष्य का० ११।सू०४ गा। उर्होनि कटा कि वह कहां है कि जिस ने हमे इस प्रकार विजय दिलाई. भङ्से प्राण निकल जाता है वह-वह सुख जाता है ।

English

We call on Agni, on the trees lords of the forest, herbs and. plants, Indra, Sūrya, Brihaspati: may they deliver us from woe.

अध्याय 11

श्लोक 3.6-16

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

वर्णन हुभ्ना है । नासिका,. मुख श्रौर उरः स्थल मे संचार करने वाली वायु . : रोगनिवारक होने से महौषघ रूप है । यही मुख्य प्राण, भअरपान, न्यानः यमान, भ्रौर उदान रूष में विभक्त हौ कर जीवनचर्या का कारण बन रहा है, रतः “श्राङ्कखिरसीः भोषधयः" रूपं ह । । हैवीः-पुथिवी, रप्, तेज श्रर वायु हैवी भ्रोषधियां है 1 पृथिवी होतो है (ग्रथरवे० १।४।४; ६।५।१-४) 1 तेज भर्थात् श्रागनेय, सौर, तथा . “

English

We call on Vishnu, Bhaga, on Mitra and Varuna the King,

अध्याय 11

श्लोक 3.6-17

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

कां ११।सु०४ श्रथवेवेद-भाष्य ११३ ओषधयः प्रजायन्तेऽथो याः काश्च वोरुषंः ॥१७॥ धियां (याः काः च वीशुद्धः) भ्रौर. जो कोई विरोहण्ील लतां भ्रादि यस्तं प्राणेदं वेद यस्मिासि परतिष्ठितः ।

English

Ansa Vivasvān we address: may they deliver us from woe. We call on Savitar the God, on Pūshan the establisher,

अध्याय 11

श्लोक 3.6-18

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

(प्राण) है प्राण ! (यः) जो (ते) तेरे (इदम्) इस स्वरूपम को लोके) उस उत्तम लोक मे (बलिम्, हरान्) भेटं प्रदान. करते है । यां स्थान मेँ रहने वाले के लिये, या भावी उत्तम जन्म में भी भटे प्रदान. करते है । मन््रमें प्राण हारा परमेदवर का.वणेनहुभराहै, वह प्र्णोका कर तेरी प्रेरणा के भ्रनुसार जीवनचर्या करता है; . वह सब - के लिये पूज्य

English

Tvashtar the foremost we address: may they deliver us from woe.

अध्याय 11

श्लोक 3.6-19

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

ये ब प्रजाए › (तुभ्यम्) तेरे लिये, (बलिहृतः) उपहार लाती है, (एवा) इसी प्रकार (तस्मे ) उस कै" लिये (वतिम्) उपहार (हरान्) -लाए् ११४ भरथववेद-भाष्य कां ११ सु० ४ जोकि प्राण लेता है, जो शब्द सुनता है । मू न मानने वाले या भ्रमनन- शील वे मनुष्य मेरे भ्राश्चय पर निवास करते रहै, है श्रवण करने वले!

English

Gandharvas and Apsarases; the Asvins, Brāhmanaspati, Aryaman, God, by name we call: may they deliver us from woe.

अध्याय 11

श्लोक 3.7

श्या॒ममयो॑ऽस्य मां॒सानि॒ लोहि॑तमस्य॒ लोहि॑तम्

śyāmamayo'sya māṃsāni lohitamasya lohitam

हिन्दी अर्थ

अन्तगं्भशरति देवताखवाभूतो भूतः स घं जायते पुनं । (श्नाभूतः) सर्वं विद्यमान, (मूतः) भनादि परमेश्वर, (देवतासु विचरता है, (सः.उ) वहः ही (पुनः) बार-बार (जायते) सृष्टिर्यो में प्रकट होता है । (सः) - वह (भूतः) श्रनादि (पिता) परमेश्वर-पिता

English

We speak to the collected Gods, faithful, maintainers of the

अध्याय 11

श्लोक 3.7-2

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

मे प्रत्यक्ष होकर प्रकट होतार । करता हृश्रा, उडता हृभा, (एकं पादम्) एक पेर को (न उत्विदति) नहीं कां० ११ । सुम अर्थवेवेद-माष्य ११५. देत्) उखाड़ दे तो व्यक्ति के लिये . (न एव भय) न हा आज हो,

English

All the Ādityas we address: may they deliver us from woe. Vāta, Parjanya we address, the Quarters, and the Firmament,

अध्याय 11

श्लोक 3.7-3

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(न कदाचन व्युच्छेत्) न कृभी उवा चमके । हंख षद द्वारा प्राणवायु कावर्णेनहृग्राहै 1 हेस जल के वासी है, इसलिये सलिल का प्रयोग हरभ्रा है । प्राणवायुरूपी हंस, रक्तरूपी जल के भाखयभूत हदय के समीपस्थ फफड़ं से छस्थान कर उडतां है नासिका दाया श्रीरसि बाहर जावादहै। बाहर उङ् कर जाताहुभ्राभो वह मानो भपना एक पाद शरीरं के साथ जमाए रखता हैः । जसे कि सूत द्वारा से, उस के लिये ्राज-कल, रात्री-दिन तथा उषा भादि का व्यवहार नहीं

English

And all the Regions of the sky: may they deliver us from woe.

अध्याय 11

श्लोक 3.7-4

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

-हंसः= हन् + सः (षणु दाने) +डः ॥ प्राण वायु के कारण शरीरगत दुगेन्व का हनन भौर नवौन वायु का प्रदान होता रहता है । इारीरगत दगन्व गन्दी वायु है, जो कि नासिका वारा बहिरगंत होती रहती है । सूर्यं ल्मे भी भन्त्राथं सुसङ्गतं होता ह । थधन विश्वं युवन जनान यद॑स्यां कतमः सः केतुः ॥२२॥ भागे की.भओर (निं पदचा) भ्रौर नितरां पीठे की भोर (वतंते) विद्यमान रूप है, (सः केतुः) वह॒ ज्ञानमय है, विञ्ञानघन है ।

English

From all that brings a curse may Day and Night and Dawn deliver me, May Soma free me, God to whom they give the name of Chan- dramās.

अध्याय 11

श्लोक 3.7-5

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

११६. श्रथरवेवेद-भाष्य का० ११।सू०४ भ्राधित तथा चलायमान हो रहा है.1 रथ में चक्र तो भ्रत्प परिमाण होते. एकनेमिः नेमि लोहे का च्रहोता है जोकि रथ के पियो पर मिलाए रखने के लिये उन कै बीच मे दण्डा लगा रहता है जिसे किं भक्ष

English

All creatures both of heaven and earth, wild beasts and sylvan animals,

अध्याय 11

श्लोक 3.7-6

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

भी भ्रं है, समृद्ध है । कतमः कः (सुखम्) + तमप् (्रतिकांयने) । हो जातादहै। शरीर में किसी भी भ्रत्य भरवयवंकी गति इतनी घीघ्र नहीं होती जितनी गति कि प्राणापान की होती है! प्राणवायु के प्रतिपादित गुणों की श्रपेक्षया परमेदवर मेँ इन गुणो का अतिशय है ! परमेश्वर की ही है । इस प्रकारं प्राणवायु के वर्णन के साथ-साथ परमेश्वर का भी वणन मन्व मै हमरा है । वस्तुतः “नमः” .पद परमेरवर को लक्ष्य करके ही - पठित

English

And winged birds of air we call: may they deliver us from woe. Bhava and Sarva we address, and Rudra who is Lord of Beasts,

अध्याय 11

श्लोक 3.7-7

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

कर्म॑शील । चीः == कमं (निधं. २५२), प्रज्ञानाम (निधं ०-३।९) + र(वाला) । स्थिति द्वारा जीवन की भ्रभिलाषा तभी फलवती हो रकती है यदि जीवन जागता है प्राण या परमेवर (तिर्यक्) टेढ़ा होकर (न, नु) नहीं कभी (निपद्यते) नेता, नहीं सोता । (सुप्तेषु) सोए हृशमो भें (अरस्य) इस प्राण

English

Their arrows which we feel and know: may they be ever kind to us.

अध्याय 11

श्लोक 3.7-8

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

१. भनूर्लकाणे (ष्टा ० १।४।८४) । या परमेश्वर के (सुतम्) सोने को (भनु) वंशपरम्परा से (कश्चन) किती ने (न, शुश्राव) नहीं सुना । । अपां मर्मेमिव जीवसे राणं बध्नामि तवा मयि ॥२६॥ (आण) है प्राण! (मत्) मुर से (मा, पर्यावृतः) न पराङ मुल हो, (जीषसे) जीने के लिये, (रपा, गर्भम् इव) जंसे माता ग्मिय के जल

English

We speak to Constellations, Heaven, to Earth, to Genii, and to Hills,

अध्याय 11

श्लोक 3.7-9

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

से अरन्य भर्थात् परिचित न होगा“ अतः मुर भ्रपना परिचित जान कर प्रकट करता है। परमेश्वर को भी धारणा-ध्यान आदि उपायों दवारा उपास भ्रपते साय बान्धे रने का संकल्प करता है । “बध्नामि "यथा का० ११1 सू०.५ अथवेवेद-माष्य ११९ ३. ब्रहाचयं जीवन म विद्यप्राप्ठि के साथ-साथ. “तपः का विशेषं महत्व है (श.रे०४८ १०) । =

English

To Seas, to Rivers, and to Lakes: may they deliver us from woe.

अध्याय 11

श्लोक 3.7-10

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

४. ब्रह्मचारी का उपनयने श्रौर उसका. तीन रात तक गर्म-निवास ४. ब्रह्मचारी की १,२ तथा. भ्रधिक समिषा (४,९,१३) । ७. ब्रह्मचारी के ज्ञानां पृथिवी रौर दयलोक क नसूर्नो (7० 0५8) का निर्माण भ्राचायं द्वारा (८) । ९. ब्रह्मचारी की ज्ञान-निधियां (१०) ५ र

English

Or the Seven Rishis we address, Waters divine, Prajāpati, Fathers with Yama at their head: may they deliver us from woe.

अध्याय 11

श्लोक 3.7-11

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

कां प्रा-स्थित होना (११) 1 - र ११. भ्राचार्यं के नानारूप (१४) ॥ १२० भथववेवेद-माष्य का० ११. सुभ १५. कन्याश्रों का ब्रह्मचयेवास (१८) । २३ धुरोबाहंतातिनागतगर्भा; . २५ एकावसानाच्युं हिणक्; २६ मध्ये-

English

Gods whose abode is in the heaven and those who dwell in middle air,

अध्याय 11

श्लोक 3.7-12

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

्रहमचारीष्णंरति रोद॑सी डमे तसम् देवाः सनतो. भवन्ति । दोनों (रोदसी) चलोक भौर भूलोक मे (चरति) विचरता है; (तस्मिन्) उस ब्रह्माचारी मे (देवाः) देव (संमनसः) एकं मन वाले (भवन्ति) हो जाते है । (खः) -वह् (पृथिवीं, दिवं च॑) पृथिवी भौर दुलोकं के ज्ञान को : (दाधार) निज चित्त में धारण करता है, (सः) वह॒ (भ्रावार्यम्) निज के लिये यत्नशीलं होना चाहिए । ठथा तपदधर्या कां जीवन व्यतीत करना यामय जीवन को देख कर भ्रात्रायं प्रसन्नता से मरपूर हो जातादहै।

English

And Mighty ones who rest on earth: may they deliver us from. woe. Ādityas, Rudra, Vasus, Gods aloft in heaven, Atharvan’s sons,

अध्याय 11

श्लोक 3.7-13

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

अर्थात् इस मनुष्य मेँ सभी देवता रहते हँ जसे किं गोशाला मे गौएं रहती पम्रौर विकास. कियाजा सकतादहै । ब्रह्मचारी के जीवन मे इन शक्तियों के विकास मे संमनस्कता हो जाती है। उस के जीवन में देवासुर-संग्राम नहीं होता, क्योंकि उस के जीवन में निवास देवोँकाही होता है, भासुरी सनन रहता है; सांमनस्य . रहता है पिपति पृ पालनपूरणयोः । ब्रह्मचारिणं पिनरौ देवजनाः पृथग् देवा अनुसंय॑न्ति सरवे ।

English

The sages, sons of Angiras: may they deliver us from woe.

अध्याय 11

श्लोक 3.7-14

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(पितरः) पितृवर्ग, (देवजनाः) विद्वान् तथा दिन्यकोटि के लोग, पृथिवी का धारण करने वाले ६३३३ देवं (एनम्, भनु भ्रायन्) शसं की श्रभिप्रेत हो, तब ६३३३ सस्या इन शसक-प्रधिकारि्यो की वेद ने नियत ' की है, जोकि सावं मौमे शासना होनी चाहिए । इस संख्या. की उत्पत्ति

English

To sacrifice, to worshipper, hymns, songs, and healing charms, we speak, To priestly acts and Yajus texts: may they deliver us from woe.

अध्याय 11

श्लोक 3.7-15

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

१२२ श्रथ्व॑वेद-भाष्य कांर ११। सु०५ (१) लासन के लिये वेद ने त्रीणि. सदांसि" श्रर्थात् तीन सभाए कही हैँ । यथा “त्रीणि राजानां विदथे पुरूणि परि विदवानि भूषथः सर्दा- सि" (ऋ०.३।३०८।६) । तीन समाए' है “विद्यायंसमा, धर्मांसमा भ्रौर लिये, घरम्यंसभां नियमनिर्माण तथा तदनुसार न्याय के लिये, तथा रा जा्यसभा राज्य-शासन के लिये । सत्याथंप्रकाशं मे इन सभाश्रों के साथ (२) “सावंमौमदासक” सर्वोपरि शक्ति है, जोकि. समग्र पृथिवी की प्रजाश्रों द्वारा वरण किंया'गया है । इस केः निरीक्षण मे तीन सभाए

English

To the five kingdoms of the plants which Soma rules as Lord we speak.

अध्याय 11

श्लोक 3.7-16

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

पारिषद्य यां पारिषद । इसे मनु मे “दक्षावरो घा परिषव्” कहा ह । १ सभापति भ्रौर १० पाररिषद्यो को “देवा एकाक्ष" कहा है (यजु०.२०। ११).।.य “एकादशवेवाः” ३ भागों या समाभ्रों मे विभक्त हैँ श्रया देवा - दिव्य सभासरदो मे एक-एक पुरोहित हीता है, मुखिया होता है. जिसे कि बृहस्पति कहा है “बृहस्पतिपुरोहिता” (यजु ° २०।११) ।'ये तीन सभाए सावभौम राजा की रक्षा कर्ती है “देव वेवैरवत्तु भा”. (यजु° २०।११) । (४१ प्रत्येक समौ कौ सभापति तो समो का प्रबन्धक है, भौर शेष

English

Darbha, hemp, barley, mighty power: may these deliver us from woe, To demons and fierce fiends we speak, to Holy Genii, Fathers,.

अध्याय 11

श्लोक 3.7-17

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

भ्रौर शासको को भिलाकर तीन सभाभ्रों मे ११८२३२३ होतेै। ये ३३ . देव है, दिव्यकोटि के शासक है; सावभौम शासक हैँ । (५) ददावरा परिषदो के दस-दस शासकों मे प्रत्येक के भ्रघीन दस-दस उपासक हों । इस प्रकार प्रत्येकं परिषद् के भरधीने दध-दस उपक्लासकों की संख्या होती है १०० । भ्रतः तीन परिषदो के उपश्ासक ३०० होते है । संख्या (४). के ३३ देव तथा संख्या (५) कै ३०० देव मिल . से सक्त मे प्राधिमौतिक् वणेन है । इसलिये ६३३३

English

Snakes,

अध्याय 11

श्लोक 3.7-18

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

शासक होते है ३०००९२० = ६००० । मरतः कूल योग देव भो भाषिमौतिक ही प्रतीत होते ह । से दष्टिगोचर सम्भवतः ६३३३ तारा हों। ह्यण्डे तथा पिण्डे” के भरनुसार सम्भवतः

English

And to the hundred deaths and one: may these deliver us from woe. We speak to Seasons, Season-Lords, to years and sections of the year,

अध्याय 11

श्लोक 3.7-19

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(८) आधिहैविक दृष्टि से, विना दुरबीन नाडयो की संख्या निम्न प्रकार दर्चाई है बृहदारण्यकोपनिषद् मे केवल हृदय मकं नाईि है, जोकि हृदय से पुरीत

English

To Months, half-months, and years complete: may they deliver us from woe.

अध्याय 11

श्लोक 3.8

त्रपु॒ भस्म॒ हरि॑तं॒ वर्णः॒ पुष्क॑रमस्य ग॒न्धः

trapu bhasma haritaṃ varṇaḥ puṣkaramasya gandhaḥ

हिन्दी अर्थ

. = - स्थल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर शरीर में एेन्द्रियिक शा्वि्तयां = १० सौ वषे काल में ्ञारीरिकं परिवतंने = १०० देन्द्रियिक परिवर्तनं के दो भाग कूल . १९४ अथवंवेद-भाष्य का० ११।स्०५

English

Right. Present with their collective Dames: may these deliver us from woe.

अध्याय 11

श्लोक 3.9

खलः॒ पात्रं॒ स्फ्यावंसा॑वी॒षे अ॑नू॒क्येऽ

khalaḥ pātraṃ sphyāvaṃsāvīṣe anūkye'

हिन्दी अर्थ

इस सख्या के सम्बन्ध मे निदिचतरूप में कुछ कहा नहीं जा सकता। सायणा- चायं ने लिखा है किं “वेहवदेवनिविदि देवानां संख्या उत्तरोत्तरं भरयसी तं रा्रीस्ठिस उदरं बिभति तं जातं द्रष्टंममिसयन्ति देवाः ॥३॥ भूत को (तिसः रात्रीः) तीन रात्री पयन्तं (उदरे). उदर मे (बिभति) देखने के लिये (श्रभि) उस के संमुखं (देवाः) देवकोटि के लोग (संयन्ति)

English

The spirit, yea, the spirits’ Lord, ruler of spirits, we address.

अध्याय 11

श्लोक 3.10

आ॒न्त्राणि॑ ज॒त्रवो॒ गुदा॑ वर॒त्राः

āntrāṇi jatravo gudā varatrāḥ

हिन्दी अर्थ

(भ्ूतपती) है त मौर भौतिक जगत् के भ्रषिपतियो ! (पशुपती) हि साथ लींची गई इषु को (मा विन्नाष्टम्) हमारी भ्रोर न छोड़ो । (नः) . (मारे (द्विपदः) दो पंस वालि सम्बन्बियो,.. तथा (चतुष्पदः) चोपायो की ३८ . अथववंवेद-माष्य का० ११।सू०२

English

Be homage, Rudra, unto thee approaching and departing hence! Homage to thee when standing still, to thee when seated and at rest!

अध्याय 11

श्लोक 3.11

इ॒यमे॒व पृ॑थि॒वी कु॒म्भी भ॑वति॒ राध्य॑मानस्यौद॒नस्य॒ द्यौर॑पि॒धान॑म्

iyameva pṛthivī kumbhī bhavati rādhyamānasyaudanasya dyaurapidhānam

हिन्दी अर्थ

मान हो, उस दिशा ओ मुख कर, .उस के प्रति नमरकार करने चाहिए । -॥§ भी हो रहा हो, उत निनकमों का फल ही समना चाहिए । -इस निमित्तं परमेरवर की भवंहेलती न करते हुए उसे नमस्कार ही करने चोद्ये । कां० ११।सु०२ भरथर्वेवेद-माष्य ॑ ४७

English

Gods’ existence. Harm thou among us neither great nor little, not one who bears us, not our future bearers.

अध्याय 11

श्लोक 3.12

सीताः॒ पर्श॑वः॒ सिक॑ता॒ ऊब॑ध्यम्

sītāḥ parśavaḥ sikatā ūbadhyam

हिन्दी अर्थ

काल में (तिष्ठते) कुछ काल . तक स्थिर रूपमे देन देते हृए (ते नमः) तेरे प्रति नमस्कार हो, (उत) तथा (आ्रासीनाय) समाधि काल मेँ चिरकाल तकं मानो रासनं लगा कर उपविष्ट हुए(ते)तेरे प्रति(नमः) नमस्कार हो । म्रवायं च शुर्वायं चोभाम्यामकरं नम॑ः ॥१६॥ (नमः) नमस्कार हो, (दिवा) दिनके समय (नमः) नमस्कार हो। दोनों सन्ध्या कालों मे, रात्रि मे सोते समय, प्रातः जागरणं के समय, परमेश्वर को नमस्कार करना चाहिए । संहारावस्था मे, तथा . उत्पादकतावस्था मे, परमेश्वर को नमस्कार करना चाहिए ।

English

Injure no sire among us, harm no mother. Forbear to injure our own bodies, Rudra. This lowly reverence have I paid to Rudra’s dogs with mighty mouths,

अध्याय 11

श्लोक 3.13

ऋ॒तं ह॑स्ताव॒नेज॑नं कु॒ल्योऽप॒सेच॑नम्

ṛtaṃ hastāvanejanaṃ kulyo'pasecanam

हिन्दी अर्थ

कौ निरसनं करने वाले, ( विपंदिचतस्) मेघावी, (बहुधा ईयमानम्) प्राय बहुधा ईयमानम् == इन पदों द्वारा यह दर्चायाः है कि प्रातः कालं पूवे दिला मं मुखकर समाधि का भ्रभ्यास करनेवाले को प्रायः रद्र-परमेदवर के दोन होते है, वह समाधि भवस्य में चित्त से.भ्राता है, प्रकट होता है । नराय" पद द्वारा यह प्रकट कियाहैकि समोचि के ठीक प्रकारन लगने पदयम में दूर तङ, देखने मे खद को सहस्राक्ष भर्थात्' हजारो भरांखो वाला

English

Hounds terrible with bark and howl, who gorge unmasticated food. Homage to thy loud-shouting hosts and thy long-haired followers!

अध्याय 11

श्लोक 3.14

ऋ॒चा कु॒म्भ्यधि॑हि॒तार्त्विज्येन॒ प्रेषि॑ता

ṛcā kumbhyadhihitārtvijyena preṣitā

हिन्दी अर्थ

हिसा करने वाले, (मीमम्) भयप्रद, ( केशिनः रथम्) किरणो वाले सूयं ¦ रथ को (पादयन्तम्) नीचे गिराने वाले रुद्र को (पूवं) प्रथम भावी हमं यथा "केकी केशा रहमथः तनन्" (निक्त १२।३।२५) । रथ भर्थात् सूयं पिण्ड म्नौर ररिमयों वाला सूयं भिन्न-मित्न नहीं है । “शा ॥ इयावाद्वम् दयाव पद ““दयैड.” गतौ का रूप है । -यौगिकदृष्टिर्म

English

Homage to hosts that are adored, homage to armies that enjoy Homage to all thy troops, O God. Security and bliss be ours!

अध्याय 11

श्लोक 3.15

ब्रह्म॑णा॒ परि॑गृहीता॒ साम्ना॒ पर्यू॑ढा

brahmaṇā parigṛhītā sāmnā paryūḍhā

हिन्दी अर्थ

रहती है इन ररिमयों से शुक्त सूयं है । भ्रथवा “स्याव शब्द, “कलेननीने रंगों वाली सौर-रदिमयों का बोधक है 1 सूर्यं भ्रमी उदय व हरा तथा च, चख पूवं काले अथवा नीले नभस पर जब सूये की . उतिक्षप्त होतो है तब दस भिभितवणं को स्याव कहा है । यहं समय उपासना का है का०.११ ॥। सु०२ . अ्य्वेवेद-माष्य ४९

English

A glorification of the Odana or oblation of boiled rice 1.Of that Odana Brihaspati is the head, Brahma the mouth.

अध्याय 11

श्लोक 3.16

बृ॒हदा॒यव॑नं रथन्त॒रं दर्विः॑

bṛhadāyavanaṃ rathantaraṃ darviḥ

हिन्दी अर्थ

भरितम् = मर षिञ् बन्धने +क्त । सूये सदा विचरता है, दिन भें भी भ्रौररातंमेभी। जो कड दो वहं स्वतन्व्रतापवंक सदा विचर नहीं परिचम मे पटक देता है, रतं: सूयं दिखाई नहीं देता । ‹ पूरवे = प्रथमा के बहुवचन तथां सप्तमी के एकः वचन में “पूर्वे” रूप भयुक्त होता है । जो उपासक पूर्व-पूवं काल में परमेदवर का ध्यान करते है वे प्रथम भावी हो कर प्रथम देन परमात्मा का करते ह, यथा “पुरवः पुव है पूवं प्रदेश में । भर्थात् पूवं की भोर मुख केर ध्यान करने वाला उपासक

English

Heaven and Earth are the ears, the Sun and Moon are the eyes, the seven Rishis are the vital airs inhaled and exhaled.

अध्याय 11

श्लोक 3.17

ऋ॒तवः॑ प॒क्तार॑ आर्त॒वाः समि॑न्धते

ṛtavaḥ paktāra ārtavāḥ samindhate

हिन्दी अर्थ

करने का विधान मन्त्र में हुभ्रा है । जो दीखता नहीं उसे नमस्कार कंसा ? मा नोऽभि स्ञां मत्यं देवेति मा सैः कुषः पञुपते नम॑स्ते । न (अभिन्नाः) फक, (नः) हमारे प्रति (मा रषः). करोव न कर, (पशुपते) - जब वियत् चमकती है तो काम्पती हुई शाखा सी, प्रतीत होती है

English

Vision is the pestle, Desire the mortar. 4. Diti is the winnowing basket, Aditi is she who holds it, Vāta is the sifter.

अध्याय 11

श्लोक 3.18

च॒रुं पञ्च॑बिलमु॒खं घ॒र्मो॒३भी॑न्धे

caruṃ pañcabilamukhaṃ gharmo3bhīndhe

हिन्दी अर्थ

५० म्रथववेद-भाष्यं का०-१११स्०२ (नः) हमारी (मा हिसीः) हिसा न कर, भषितुं (नः) हमे (्रधि- ब्रहि) स्वाधिकार पूवंक सदुपदेश दे ।॥ (नः) हमे (परि वृड गधि) हिसमकमं से छोड दे, (माक्रषः) हम पर क्रोघन कर (त्वया). तेरे साथ (मा समरामहि) हम समर भावनामें न हो, श्र्थात् तेरे नियमों तथा .सदुपदेों के विपरीत हम.न चलं । अन्यर्ोग्र 'वि व॑सेय पियांरूणां जां जहि ।२१॥ (नः) मासे (गोषु) गौ तया (परे) पुरषो के सम्बन्य भं.

English

Horses are the grains, oxen the winnowed ricegrains, gnats the husks. 6. Kabru is the husked grain, the rain cloud is the reed. 7. Grey iron is its flesh, copper its blood. 8. Tin is its

अध्याय 11

श्लोक 3.19

ओ॒द॒नेन॑ यज्ञव॒चः सर्वे॑ लो॒काः स॑मा॒प्याः

odanena yajñavacaḥ sarve lokāḥ samāpyāḥ

हिन्दी अर्थ

कर, (मा) नः (नः) 'हमारी (ग्रजविंषु) (यस्य) जिसं परमेदवर -का (तक्मा) ज्वर; तेथा (कालिका) कुत्सित : शाब्द करने बालो खांसी (हेतिः) भरस्तरःहै, जो. खांसीः (एकम्) किसी "एकर की (इव) तरह (एति) 'प्राप्तं होती हैः त वह हेति निणेग्रवे) : मानो. स्वर

English

ashes, gold its colour, the blue lotus flower its scent. 9. The threshing-floor is its dish, the 173

अध्याय 11

श्लोक 3.20

यस्मि॑न्त्समु॒द्रो द्यौर्भूमि॒स्त्रयो॑ऽवरप॒रं श्रि॒ताः

yasmintsamudro dyaurbhūmistrayo'varaparaṃ śritāḥ

हिन्दी अर्थ

हिसा करता हमा ८ तिष्ठति) स्थित है, ( तस्म) उस के प्रति , शक्वरीभिः = दाक्वरी शब्द यथपि बाहु वाचक है, “शक्वरी बाहुनाम'. (निषं९. २।४),परन्तु यहां १० शवत्ररियो दवारा, १० ड् गुलियां को स्मपित किये हृए है, तेरे भ्राश्चय पर जीवित । (पशुपते) है सब . ्रारप्यवासी पशु, तथा वनोपवनों में रहने वाले मृग, तथां भ्रा

English

as it is cooking. 12. Furrows are its ribs, sandy soils the undigested contents of its stomach. 13. Law is its

अध्याय 11

श्लोक 3.21

यस्य॑ दे॒वा अक॑ल्प॒न्तोच्छि॑ष्टे॒ षड॑शी॒तयः॑

yasya devā akalpantocchiṣṭe ṣaḍaśītayaḥ

हिन्दी अर्थ

दितिः=दो भवखण्डने याः दीड क्षये, क्षीण होने वाला कार्यजगतू 1 भ्रदितिःन क्षीण होनेः वाली प्रकृति 1 वि फलीकरणाः == खलियान मे, खेत कटे ब्रीहि पौवों के भ्रवहनन से शरः तण्डुलो को उबालते समय उठी हई सफद माग वि मांसानि =सदूढी या साठो (“षष्टिका" चावल ) तपदूलों के पकने पर उन. का पिण्ड गुच्छा-न आना, श्रलग-अलग दानो का न होना । लोहितम् = सद्ठी या साठी" के चावलो पर का लाल -भ्च । . पात्रम् शकट, जिस. भे कि खेत कटे ब्रीहि पौषे डाल कर होते हं । षष्टिका का भन्न श है । घद्ढी भौर साटी ।

English

Seasons as teeth. 38. And thence, etc. . . . with other vital airs. . . . Thy vital airs will leave thee . . . With the Seven

अध्याय 11

श्लोक 3.22

तं त्वौ॑द॒नस्य॑ पृच्छामि॒ यो अ॑स्य महि॒मा म॒हान्

taṃ tvaudanasya pṛcchāmi yo asya mahimā mahān

हिन्दी अर्थ

६२ भरयर्वेवेद-भाष्य कां० ११। सु० इ ईषे = शकट के श्रग्रमागमें दोनों भरोरभागेकीभ्रोरलगे दा दण्डे जिन के दो किनारो पर जुभ्रा-दण्ड (४५०). लगा रहता. है, जिसे कि बेल की गर्दन पर रखा जाता, है । सीताः हल जोतने पर खेत म पडीं हल की पद्धतियां, भागे । ऊबध्यम् =भ्राधा पका, बल के उदरस्थ शकत । कुल्या =भ्रल्पा सरित् (सायण), या संचने के लिये खेत की

English

Rishis as the vital airs. 39. And thence, etc. . . . with other expanse . . . Consumption will destroy thee . . . With the firmament as expanse. 40 And thence, etc. . . . with other back. . . .

अध्याय 11

श्लोक 3.23

स य ओ॑द॒नस्य॑ महि॒मानं॑ वि॒द्यात्

sa ya odanasya mahimānaṃ vidyāt

हिन्दी अर्थ

, दविः = पके भ्रोदनों को कुम्भी से निकालने की कड्छी । घर्मः भ्रभीन्धे = गरम रादित्य तपाता है। ग्निः म्रभीन्वे=-पाथव-भ्रमि तपाती है। . - के स्वरूप का ज्ञान होता है । ग्रौर “शिरः"--शीषंक के. नीचे दिये पदार्थौ द्वारा भ्रोदन (ङृष्यन्न) के स्वरूप का ज्ञान होता) है ।

English

Lightning will slay thee. . . With the heaven as back. 41. And thence, etc. . . . with other breast . . . Thou wilt fail in agriculture. . . . With the earth as breast. 42. And thence, etc. . . .

अध्याय 11

श्लोक 3.24

नाल्प॒ इति॑ ब्रूया॒न्नानु॑पसेच॒न इति॒ नेदं च॒ किं चेति॑

nālpa iti brūyānnānupasecana iti nedaṃ ca kiṃ ceti

हिन्दी अर्थ

खाच तण्डल की बटलोई को, पाथिव-अरिनि पकाती है । भ्रायवनम् उदक मे डाले तण्डंलों के मिश्रण का साधन भूत कां० ११।सु० ३ भ्रथवेवेद-भाष्य ६३. (अथववेद ४।३५।१-७) में ग्रोदनरूप-परमेश्वर का -विस्तृत वर्णेन हृधा है ।

English

with other belly . . . colic will destroy thee . . . With truth as belly. 43. And thence, etc. . . . with other abdomen . . . Thou wilt die in the

स्रोत: bhavykhatri/DharmicData · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।