Atharva Veda
11
अध्याय 11 / 20

Kanda 11

काण्ड 11

420 श्लोकभाग 4/7 · श्लोक 3.25–3.56

पूर्ण अध्याय पाठ14 श्लोक

अध्याय 11

श्लोक 3.25

याव॑द् दा॒ताभि॑मन॒स्येत॒ तन्नाति॑ वदेत्

yāvad dātābhimanasyeta tannāti vadet

हिन्दी अर्थ

(१) जो लोकों का धारण करता है, विनष्ट नहीं होता, उस श्रोदन दवारा मै मृल्यु-नद से तैर जाऊ, पर हो जाऊं (मनर १) । गायत्री का श्रधिपति है, जिस मे विद्व क्रा निरूपण करने वाले वेद निहित विदवजितं पचामि” (मन्तं ७) मै विद्वविजयी ब्रह्मरूपी भरोदन का परिपाक केरता हं, निज जीवनं में उस की स्थिति परिपक्व करता हूं । इस निमित्त काण्ड ११ । सूक्तं ३ । पर्याय १ के मनर (१९-२१)भी विशेषतया द्रष्टव्य है ।

English

water . . . With the sea as abdomen. 44. And thence, etc. . . . with other thighs . . . 174

अध्याय 11

श्लोक 3.26

ब्र॒ह्म॒वा॒दिनो॑ वदन्ति॒ परा॑ञ्चमोद॒नं प्राशीः३ प्र॒त्यञ्चा३मिति॑

brahmavādino vadanti parāñcamodanaṃ prāśīḥ3 pratyañcā3miti

हिन्दी अर्थ

६४ भ्रथरववेद-माष्य का० ११।सु०३ कंहा है । यथा “श्रहुमन्नम्" (तं्ि° उप० भृगुवल्ली, अनुवाक १०) । इस का श्रास्मिक प्रारन करते ह । “किरः भी बृहस्पति है, बृहती लौकिकीं वाक् तस्याः पतिः । पशु्रो रौर मनुष्यों मे एक भारी भेद है "लौकिकी वाक्" का 1 इस लौकिंको-वाक्

English

Thy thigh will perish . . . With Mitra-Varuna as thighs. 45. And thence, etc. . . . with other knees . . . Thou wilt become a sick man . . . With the

अध्याय 11

श्लोक 3.27

त्वमो॑द॒नं प्राशी३स्त्वामो॑द॒ना३ इति॑

tvamodanaṃ prāśī3stvāmodanā3 iti

हिन्दी अर्थ

३१।११) । ब्राह्मण" निज मुख द्वारा, श्रोदन का शारीरिक भोजनया द्यक है, ्रध्यारिमक भ्रौर शारीरिक । उस श्नोदन के (चावापृथिवी) द्य लोक श्नौर् पृथिवीलोकं (रोते) द्यावापृथिवी को करन्दसी मी कहते है, यथा “थं कऋन्दसीऽग्रवसा

English

knees of Tvashtar. 46. And thence, etc. . . . with other feet . . . Thou wilt become a wanderer . . . With the feet of the Asvins. 47. And thence, etc. . . with other fore-parts of the feet . . . A

अध्याय 11

श्लोक 3.28

परा॑ञ्चं चैनं॒ प्राशीः॑ प्रा॒णास्त्वा॑ हास्य॒न्तीत्ये॑नमाह

parāñcaṃ cainaṃ prāśīḥ prāṇāstvā hāsyantītyenamāha

हिन्दी अर्थ

१. यदपि ब्राह्ाणेतर मी भोदन का प्राशन करते ह 1. परन्तु वंदिक समाज (अये १०।७।३२)› भर्यात् सूर श्रौर चद्रमा को परमे्वर ने चु के. का प्राणापान के साथं सम्बन्धः विचारणीय है । ५ । (कामः) श्रौर कामना (उलूखलम्) भोखली स्थानी है । ति

English

serpent will kill thee . . . With the fore-parts of Savitar’s feet. 48. And thence, etc. . . . with other hands . . . The Brāhmana (divine power) will kill thee . . . With the hands of Right. 49.

अध्याय 11

श्लोक 3.29

प्र॒त्यञ्चं॑ चैनं॒ प्राशी॑रपा॒नास्त्वा॑ हास्य॒न्तीत्ये॑नमाह

pratyañcaṃ cainaṃ prāśīrapānāstvā hāsyantītyenamāha

हिन्दी अर्थ

सृष्टिरचना मेँ परमेश्वर मे. भरथम, ईक्षण होता है । यथा “ है । यथा “श्ोऽकरामयतः' (वृ उप० १।४-७) । कष्योदन .के लिये ब्रीहि मरथातू.घान के भ्रवेहनन में प्रथम मुसल को उठते भ्रौर उसका प्रहार (रद) ) 4 + व्यक्ति का स्थानी दहै, (वातः) वाथु (अरपाविनक् लो के विवेचयिता भर्थात् २, तथा “स ई्वाचके'" (बृहदा० उप० भ्र ° १। ब्जा ४। ख० ए।४

English

And thence, etc. . . . with other basis . . . Without standing-ground and resting-place thou wilt die . . . Having taken my stand on truth. With this I ate it, with this I came to it. Now this

अध्याय 11

श्लोक 3.30

नैवाहमो॑द॒नं न मामो॑द॒नः

naivāhamodanaṃ na māmodanaḥ

हिन्दी अर्थ

(अदवाः कणाः) दव कण स्थानी है, (गावः तण्ड्लाः) गौए तण्डुल स्थानी है (मशकाः तुषाः) मच्छर तुष स्थानी हं । टूट तण्डल जो किं कणरूप होते है उन्हं भ्रदव कहा है वायु के कारण कण ठेसे उडते है जंसे ' कि श्रव वेग से भागते दँ । भ्रनटूटे तण्ड्लों सात्विक है। गावः=गोदुग्ध । यथा “गोभिः शुणीत मत्सरम् (ऋ ९।४६।४) की व्याख्या म कहा है कि “इति पयसः" (निरक्त २।२।५) ।

English

A glorification of Prāna, Breath or Vital Spirit Homage to Prāna, him who hath dominion o’er the universe,

अध्याय 11

श्लोक 3.31

ओ॒द॒न ए॒वौद॒नं प्राशी॑त्

odana evaudanaṃ prāśīt

हिन्दी अर्थ

(यः) जो (म्रोदनस्य) भोदन की . (महिमानम्) महिमा को. परनुपसेचनः इति) न कहे कि यह उपसेचन से रहित है, (न इदम् चः कि च : इति) न कटे कि यह ही, न कहे कि क्या भ्नौरं नहीं ।॥॥२४॥ श्नौर दीजिये, न कहे किं भ्रोदन का स्वरूप केवलं इतना ही है ? न कहे कि कुछ श्रौर भ्रोदन क स्वरूप पर प्रकार डालिये 1 उपसेचन = यजुवद ३१।९

English

To him will all present their gift of tribute in that loftiest will all present their gift of tribute in

अध्याय 11

श्लोक 3.50

४९॥ (३) ५०-५६ मन्त्रोक्ताः।५० आसुर्यनुष्टुप्, ५१ आर्च्युष्णिक्, ५२ त्रिपदा भुरिक्साम्नी त्रिष्टुप्, ५३ आसुरी बृहती, ५४ द्विपदा भुरिक्साम्नी बृहती, ५५ साम्न्युष्णिक्, ५६ प्राजापत्या बृहती।ए॒तद् वै ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टपं॒ यदो॑द॒नः

49|| (3) 50-56 mantroktāḥ| 50 āsuryanuṣṭup, 51 ārcyuṣṇik, 52 tripadā bhuriksāmnī triṣṭup, 53 āsurī bṛhatī, 54 dvipadā bhuriksāmnī bṛhatī, 55 sāmnyuṣṇik, 56 prājāpatyā bṛhatī| etad vai bradhnasya viṣṭapaṃ yadodanaḥ

हिन्दी अर्थ

मेवति य एवं वेद् ॥४९॥ . (पूर्वे ऋषयः) पूर्वकाल के या सद्गुणो से पूरित ऋषियों ने (यया तनः). आ्आाश्चय-रदित (मरिष्यसि) मर जायेगा, (इति) यह् (एनम्) इस श्रोदन““वेद ) भ्रथं पुवेवत् मन्त ३५॥ ११५. भरथरवेवेद-माष्य का० ११।सू०३

English

Prajāpati shines bright; the bright Virāj grew potent Indra’s self.

अध्याय 11

श्लोक 3.51

ब्र॒ध्नलो॑को भवति ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टपि॑ श्रयते॒ य ए॒वं वेद॑

bradhnaloko bhavati bradhnasya viṣṭapi śrayate ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(वेद) जान लेता है उसे (्रघ्नलोकः) महान् सू्लोक (भवति) प्राप्त परमेदवर में (श्रयते) वह प्राश्यं पाता है । है, ऊच्वं गति करता है, जितनी देर मन को सूयं तक उत्क्षेपण मेँ लगती म प्रविष्ट भी है, रौर सूयं का भ्राश्चय भी. ।

English

By Fervour and by self-restraint the King protects the realm he rules. By self-restraint the Master seeks a Brahmachari to instruct.

अध्याय 11

श्लोक 3.52

ए॒तस्मा॒द् वा ओ॑द॒नात् त्रय॑स्त्रिंशतं लो॒कान् निर॑मिमीत प्र॒जाप॑तिः

etasmād vā odanāt trayastriṃśataṃ lokān niramimīta prajāpatiḥ

हिन्दी अर्थ

(निरमिमीत) उसने निभ्नित किया, भर्थात् ३३ देवो के ३३ स्थानो को का० ११५ ३ भरवषेद-भाष्य . । १५९१. प्रजापति ने चंसार-यज्ञ को रचा,ताकिं इस यज्ञ के घटक ३३ लोका का यथाथं स्वरूप जाना जा सके । ,. (सः) वह (यः) जो पुरुष. (एवं विदुषः) हस प्रकार के बरहा का, (उपद्रष्टा भवति) उस के समीपं रह कर, उस का देन रा ही करता रहता

English

By self-restraint a maiden finds a youth to be her wedded lord.

अध्याय 11

श्लोक 3.53

तेषां॑ प्र॒ज्ञाना॑य य॒ज्ञम॑सृजत

teṣāṃ prajñānāya yajñamasṛjata

हिन्दी अर्थ

डालता.है, भरपितु (सज्यानि जीग्रते) समग्र जीवन कों हानिं पहुंचाता है । , (नच) भ्रौरन केवल (सरवैज्यानि जोयते) -समश्रं जीवन को हानि ही पहुंबाता है, पितुं (जरसः पुरा) जरावरस्था से पहिले (एनम्) इसे (प्राणः जंहाति) प्राण त्याग देता है ।. ' (२) पृष्ट-पंन को बहौ यत्त कहा.है।. सुध्टःके होते ही पृष के षट १०२ भ्रथर्वेवेद-माष्य का ११ सू० ४

English

By self-restraint the ox and horse seek to win fodder for them- selves. By Fervour and by self-restraint the Gods draye Death away from them,

अध्याय 11

श्लोक 3.54

स य ए॒वं वि॒दुष॑ उपद्र॒ष्टा भ॑वति प्रा॒णं रु॑णद्धि

sa ya evaṃ viduṣa upadraṣṭā bhavati prāṇaṃ ruṇaddhi

हिन्दी अर्थ

कारण होने से प्राणियों को प्राण देते ह (२-५; १७) । ३. प्राणं वायु तथा परमेरुवर, दोनों की प्राणरूपता (७, र) । ७. राण है-्रोहि धान्य , यव जौ तथा भ्रनङ्वान् बेल (१३), ९. प्राण है, मातरिश्वा भ्रौर वात (१५) । रसीः, हैवीः, मनुष्यजाः (१६) । ११. प्राणज्ञ की महिमा, तथा उत के प्रति उपहार (१९) । १२. प्राण-पस्मेवर को रज्ञा या कथन का श्रवण (१९) । १५. प्राण के दो बराबर-बराबर के ब्र्धमाग (२२). 1 १६. प्राण के प्रति नमः (२३) ।

English

And Indra brought by self-restraint heaven’s lustre to the deities.

अध्याय 11

श्लोक 3.55

न च॑ प्रा॒णं रु॒णद्धि॑ सर्वज्या॒निं जी॑यते

na ca prāṇaṃ ruṇaddhi sarvajyāniṃ jīyate

हिन्दी अर्थ

१८. भ्राण का सदा जागरण (२४) । ति १६. जीवन के लिये प्राण को बान्धे रखना (२६) ॥ कां० ११। सु र) अथरववेद-भाष्य १०३ (प्राणाय नमः) भाण को. नमस्कार हो, .(यस्य) जिस के (वरे) , समग्र जगत् का गुख्य-पराण परमेर्वर है ॥ जड़-चेतन जगत के. . प्रत्येक पदां भँ भ्रपना पनां प्राण है, जिस के कारण उस-उस पदाथ की

English

The plants, what is and what shall be, day, night, the tall tree of the wood, The year with seasons of the year, all from the Brahmachāri sprang.

अध्याय 11

श्लोक 3.56

न च॑ सर्वज्या॒निं जी॒यते॑ पु॒रैनं॑ ज॒रसः॑ प्रा॒णो ज॑हाति

na ca sarvajyāniṃ jīyate purainaṃ jarasaḥ prāṇo jahāti

हिन्दी अर्थ

के नियमानुसार, जब परमेदबर, इन पदार्थो भे प्राणदा, भर्थात् इन की स्थिति. को कायम रखने की शक्ति को हर लेता है तो उस महाप्रलय मे. सब पदां प्रकृतिरूपी उपादान कारण भे विलीन हो जते है,. भ्रौर प्राण- (माण) है प्राण (क्रन्दाय) नाद या ध्वनि करते हुए (ते नमः) तुभे नमस्कार हो, - (स्तनयित्नवे) गरजते हए (ते) तुर (नमः) नमस्कार हो । (प्राण) है प्राण !- ( विद्युते ) चमकते हृए (ते. नमः) तुमे नमस्कार हो, (प्राण) है प्राण ! (वर्षते) बरसते हए (ठे नमः) तुमे पराप्त करता है । इस की गेरजना, नाद, . चमकना शौर बरसना परमेदवरा- घीन है । जंसे छरीर जड़ है, भौर शरीरस्थ जीवात्मा चेतन है । -इस चेतग १०४. भ्रथर्वैवेद-भाष्य का० ११। सु9४ के कारण शरीर की स्थिति तथा चेष्टाएं होती हैः जीवात्मा के निकल जाने पर शरीर भरम्नि के अर्पित हो जातादहै, इती प्रकार मेष भौर पर

English

All creatures of the earth and heaven, tame animals and sylvan beasts,

स्रोत: bhavykhatri/DharmicData · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।