Narada Purana
54
अध्याय 54 / 167

Book 1 - Adhyaya 55

367 श्लोकभाग 3/5 · श्लोक 172–280

पूर्ण अध्याय पाठ109 श्लोक

अध्याय 54

श्लोक 172

यमेन्दुतुङ्गगौ लग्ने षष्टेर्ऽकज्ञौ तुलाजगौ ।सितासृजो गुरौ कर्के साराजे लग्नगे नृपाः

yamendutuṅgagau lagne ṣaṣṭer'kajñau tulājagau / sitāsṛjo gurau karke sārāje lagnage nṛpāḥ

हिन्दी अर्थ

है, जो उससे चतुर्थ मेषराशिका है । मेषराशि रातमें बली होती है, अत: रातमें जन्म होगा । इसलिये रात्रिगत इष्टकालका ज्ञान करना चाहिए। यहाँपर राशियोंकी दिन-रात्रि-संज्ञाके अनुसार एक नवमांशका प्रमाण दिन या रात्रिका पूरा प्रमाण होता है। अत: त्रैराशिक क्रिया की गयी--एक नवमांश प्रमाण (३ अंश २० कला-२०० कला)--में गर्भाधान रात्रिमान यदि २८। ० दण्ड मिलता है तो लग्रके चतुर्थ नवमांशके भुक्त कलामान २५में कितना होगा ? इस तरह पा « ३। ३०

English

The reading makes no seme. It must be

अध्याय 54

श्लोक 173

वृषेगेब्जेर्केज्यसौरैः सुहृज्जायाखगैर्नृपः ।मन्दे मृगाङ्गेत्र्यर्यकांशस्थैरजादिभिर्नृप

vṛṣegebjerkejyasauraiḥ suhṛjjāyākhagairnṛpaḥ / mande mṛgāṅgetryaryakāṃśasthairajādibhirnṛpa

हिन्दी अर्थ

घट्यादि मान हुआ। अर्थात् ३ दण्ड ३० पल रात बीतनेपर जन्म होगा; ऐसा निश्चय हुआ । इसी तरह अन्य उदाहरणोंको भी समझना चाहिए।

English

Here bitter and salt tastes are asigned to the Moon and Aferj respectively. It should have been salt and bitter respectively.

अध्याय 54

श्लोक 174

सेज्याजेश्वे मृगमुखे कुजे तुङ्गेर्क्षभागेवौ ।लग्ने ऽथ सेज्यकर्केङ्गे ज्ञाजशुक्रैर्भवोपगैः

sejyājeśve mṛgamukhe kuje tuṅgerkṣabhāgevau / lagne 'tha sejyakarkeṅge jñājaśukrairbhavopagaiḥ

हिन्दी अर्थ

राशि-स्थान पहले दिये हुए राशिस्वरूप-बोधक चक्रमें देखिये।

English

According to the rule enunciated here the Sun must have Jupiter, who owns the 5th and 8th houses fh>m his M01atrikoi>a, Mars owning 4th and 9th; and the Moon owning the 12ch house, as his friends. However, the author gives only Jupiter. Similaiiy, for the Moon, the Sun and Mercury become friends. For Mars they are the Sun, Moon and Jupiter; for Mercury, the Sun and Venus; for Jupiter, the Sun, Moon and Man; for Venus, Mercury and Saturn; and for Satuni, Mercury and Venus. The reading

अध्याय 54

श्लोक 175

मेषे ऽर्के भूमिपासेंदौ एषे षाङ्ग्रेर्कपपासृजः ।सिंहकुंभमृगस्थाश्चेद्भूपः सारेतनावजे

meṣe 'rke bhūmipāseṃdau eṣe ṣāṅgrerkapapāsṛjaḥ / siṃhakuṃbhamṛgasthāścedbhūpaḥ sāretanāvaje

हिन्दी अर्थ

ही उक्त स्थानमें जन्म होता है तथा यदि लग्र- राशि अपने नवमांशमें हो तो स्वगृहमें ही वैसे स्थानमें जन्म होता है। मड़ल और शनिसे त्रिकोण (५, ९)-में अथवा सप्तम भावमें चन्द्रमा हो तो

English

The reading in the Bnt half b woefully corrupt and hence it b impocible to correct. The muthoe*s intention has been atplained in the

अध्याय 54

श्लोक 176

आर्केजीवे तनौ वापि नृपो ऽथोः कुजभास्करौ ।धीस्थौ गुर्विदुकवयो भूमौ रत्र्यगे बुधैर्नृपः

ārkejīve tanau vāpi nṛpo 'thoḥ kujabhāskarau / dhīsthau gurvidukavayo bhūmau ratryage budhairnṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

जातकको माता त्याग देती है। यदि उसपर गुरुकी दृष्टि हो तो त्यक्त होनेपर भी दीर्घायु होता है। पापग्रहसे दृष्ट चन्द्रमा यदि लग्रमें हो और मड्भरल सप्तम भावमें स्थित हो तो मातासे त्यक्त होनेपर

English

The reading should be corrected as Tlie

अध्याय 54

श्लोक 177

मृगास्यलग्नगैः सौरेजाब्जर्क्षहरयः सयाः ।कविक्षौ तुलयुरमस्थौ वै भूपः कीर्तिमान्भवेन्त्

mṛgāsyalagnagaiḥ saurejābjarkṣaharayaḥ sayāḥ / kavikṣau tulayuramasthau vai bhūpaḥ kīrtimānbhavent

हिन्दी अर्थ

जातक मर जाता है। अथवा पापदृष्ट चन्द्रमा यदि शनि-मड़लसे १५वें भावसे स्थित हो तो भी शिशुकी मृत्यु हो जाती है। यदि चन्द्रमा शुभग्रहसे देखा जाता हो तो बालक दूसरेके हाथमें जाकर

English

Planeii* strength b measured in respect of six things viz. Kdta,

अध्याय 54

श्लोक 178

यस्य कस्यापि तनयः प्रोक्तैर्योगैर्नृपो भवेत् ।वक्ष्यमाणैर्नृपसुतो ज्ञेयो भूयो मुनीश्वर

yasya kasyāpi tanayaḥ proktairyogairnṛpo bhavet / vakṣyamāṇairnṛpasuto jñeyo bhūyo munīśvara

हिन्दी अर्थ

सुखी होता है। यदि पापसे ही दृष्ट हो तो दूसरेके हाथमें जानेपर भी हीनायु होता है॥८०--८२॥

English

In astrological works Venus b said to be strong at night.

अध्याय 54

श्लोक 179

स्वोच्चे त्रिकोणभगतेस्त्र्याद्यैर्बलयुतैर्नृपः ।सिंहेर्ऽके मेषलग्ने ऽजे मृगे भौमे घटे ऽष्टमे

svocce trikoṇabhagatestryādyairbalayutairnṛpaḥ / siṃher'ke meṣalagne 'je mṛge bhaume ghaṭe 'ṣṭame

हिन्दी अर्थ

पितृसंज्ञक ग्रह बली हो तो पिताके घरमें और मातृसंज्ञक ग्रह बली हो तो माता (अर्थात् माता) के घरमें जन्म समझना चाहिए। मुने ! यदि शुभग्रह नीच स्थानमें हो तो वृक्षादिके नीचे तृण-

English

The reading must be changed to and

अध्याय 54

श्लोक 180

चापे धरानाथःस्यादथ स्वर्क्षगे भृगौ ।पातालगे धर्मगे ऽब्जे शुभदृष्टे युते मुने

cāpe dharānāthaḥsyādatha svarkṣage bhṛgau / pātālage dharmage 'bje śubhadṛṣṭe yute mune

हिन्दी अर्थ

पत्रादिकी कुटीमें जन्म समझना चाहिए। शुभग्रह नीच स्थानमें हो और लग्न अथवा चन्द्रमापर एक स्थानस्थित शुभग्रहोंकी दृष्टि न हो तो निर्जन स्थानमें प्रसव होता है। यदि चन्द्रमा शनिकी

English

should be read as

अध्याय 54

श्लोक 181

त्रिलग्नभवगैःशेषैर्धराधीशः प्रजायते ।सौम्ये वीर्ययुतेंऽगस्थे बलाढ्येशुभगे शुभे

trilagnabhavagaiḥśeṣairdharādhīśaḥ prajāyate / saumye vīryayuteṃ'gasthe balāḍhyeśubhage śubhe

हिन्दी अर्थ

राशिके नवमांशमें स्थित होकर चतुर्थ भावमें विद्यमान हो तथा शनिसे दृष्ट या युत हो तो प्रसवकालमें “प्रसूतिका' का शयन पृथिवीपर समझना चाहिए। शीर्षोदय राशि लग्र हो तो

English

The reading should be read as may

अध्याय 54

श्लोक 182

धर्मार्थोपचयस्थैश्चशेषैर्धर्मयुतोनृपः ।मेषूरणायतनुगाः शशिसूर्यजसूरयः

dharmārthopacayasthaiścaśeṣairdharmayutonṛpaḥ / meṣūraṇāyatanugāḥ śaśisūryajasūrayaḥ

हिन्दी अर्थ

शिरकी ओरसे तथा पृष्ठोदय राशि लग्न हो तो पृष्ठ (पैर)-की ओरसे शिशुका जन्म होता है। चन्द्रमासे चतुर्थ स्थानमें पापग्रह हो तो माताके लिये कष्ट समझना चाहिए॥ ८३--८५-३॥

English

The pan of thb verse relating to mcn-ses reminds of a similar

अध्याय 54

श्लोक 183

ज्ञारौ धनेशितरवा हिबुके भूपतिस्तदा ।वृषेंऽगे ऽब्जोधनारिस्थो जीवार्की लांभगाः परे

jñārau dhaneśitaravā hibuke bhūpatistadā / vṛṣeṃ'ge 'bjodhanāristho jīvārkī lāṃbhagāḥ pare

हिन्दी अर्थ

जन्मसमयमें सब ग्रहोंकी अपेक्षा शनि बलवान् हो तो सूतिका गृह पुराना, किंतु संस्कार किया हुआ समझना चाहिए। मज्जल बली हो तो जला

English

The fim half of ihb verse b rather unimclligibic. It b fell that it b nothing but a paraphrase ctfthe second half of the vctk quoted above.

अध्याय 54

श्लोक 184

सुखे गुरुः खेरवीन्दूयमो लग्ने भवे करै ।लग्ने वक्रासितौ चन्द्रेज्यसितार्कबुधाः क्रमात्

sukhe guruḥ kheravīndūyamo lagne bhave karai / lagne vakrāsitau candrejyasitārkabudhāḥ kramāt

हिन्दी अर्थ

हुआ, चन्द्रमा बली हो तो नया और सूर्य बली हो तो अधिक काष्ठसे युक्त होकर भी मजबूत नहीं होता। बुध बली हो तो प्रसवगृह बहुत चित्रोंसे युक्त, शुक्र बली हो तो चित्रोंसे युक्त

English

should be read as Trikafia or trines are

अध्याय 54

श्लोक 185

सुखास्तु शुभखाप्तिस्थानरेशं जनयन्त्यपि ।कर्मलग्नगरवेटस्य दशायां राज्यसंगतिः

sukhāstu śubhakhāptisthānareśaṃ janayantyapi / karmalagnagaraveṭasya daśāyāṃ rājyasaṃgatiḥ

हिन्दी अर्थ

नवीन और मनोहर तथा गुरु बली हो तो सूतिकाका गृह सुदृढ़ समझना चाहिए ॥ ८६-८७॥

English

should be read as and as

अध्याय 54

श्लोक 186

प्रबलस्य दशायां वा शत्रुनीचा दिगार्तिदाः ।आसन्नकेन्द्रद्वयगैर्वर्गदाख्यः सकलग्रहैः

prabalasya daśāyāṃ vā śatrunīcā digārtidāḥ / āsannakendradvayagairvargadākhyaḥ sakalagrahaiḥ

हिन्दी अर्थ

लग्नमें तुला, मेष, कर्क, वृश्चिक या कुम्भ हो तो (वास्तु भूमिमें) पूर्वभागमें; मिथुन, कन्या, धनु या मीन हो तो उत्तर भागमें, वृष हो तो पश्चिम भागमें तथा मकर या सिंह हो तो दक्षिण

English

The reading Tfffw b ulicHy corrupt. It may be corrected

अध्याय 54

श्लोक 187

तन्वस्तगैश्च सकटं विहगो राज्यबन्धुगैः ।शृङ्गाटकं धिगौगस्थैर्लग्नायस्थैर्हलं मतम्

tanvastagaiśca sakaṭaṃ vihago rājyabandhugaiḥ / śṛṅgāṭakaṃ dhigaugasthairlagnāyasthairhalaṃ matam

हिन्दी अर्थ

( गृहराशियोंके स्थान--- ) घरकी पूर्व आदि दिशाओंमें मेष आदि दो-दो राशियोंको और चारों कोणोंमें चारों द्विस्वभाव राशियोंको समझे। सूतिकागृहके समान ही सूतिकाके पलंगमें भी लग्न आदि भावोंको समझे। वहाँ ३, ६, ९ और १२ वें भावको क्रमश: चारों पायोंमें समझना चाहिए।

English

The rcKliflg, m should be corrected as

अध्याय 54

श्लोक 188

वर्ज्जोङ्गेस्थे सत्स्वसत्सु तुर्यखस्थैर्यवोन्यथा ।विमिश्रैः कमलं प्राहुर्वायाकण्टकबाह्यगैः

varjjoṅgesthe satsvasatsu turyakhasthairyavonyathā / vimiśraiḥ kamalaṃ prāhurvāyākaṇṭakabāhyagaiḥ

हिन्दी अर्थ

उपसूतिकाओंकी उपस्थिति घरके भीतर रहती है। बहुत-से आचार्यों और मुनियोंने इससे भिन्न मत प्रकट किया है। (अर्थात् दृश्य चक्रार्धमें जितने ग्रह हों उतनी उपसूतिकाओंको घरके

English

Pregnancy lasts f< 10 months based on the sidereal calendar. Each of the months is ruled by a ianet. The condition of the foetus will depend on the strength etc. of the planet ruling the month. The following are the rulers of the JO months in ofder: Venus, Mars, Jupiter, the 5un, Moon, Saturn, Mercury, the planet that owm the Lagna at impregnation, the Moon, and lastly the Sun.

अध्याय 54

श्लोक 189

लग्नाच्चतुर्भुगैर्यूपःशरस्तूर्याच्चतुर्भुगैः ।द्यूनाद्वेदक्षगैः शक्तिर्ं दऽखादिचतुर्भगैः

lagnāccaturbhugairyūpaḥśarastūryāccaturbhugaiḥ / dyūnādvedakṣagaiḥ śaktirṃ da'khādicaturbhagaiḥ

हिन्दी अर्थ

भीतर तथा अदृश्य चक्रार्थमें जितने ग्रह हों, उतनीको घरके बाहर कहा है) ॥' ८९-९०॥

English

In the teat we find the reading *nrt TTrfwW: which cannot he accepted as genuine. The original reading must have been iTsff 7 wtfgRf:, which means that the foetus would be happy, if Uie malefies do not aspect the Lagna or the Moon.

अध्याय 54

श्लोक 190

लग्नात्क्रमात्सप्तभगैर्नोकाकूटस्तु नुर्यतः ।छत्रमस्तात्स्वभाद्यायोन्यस्मादर्द्धेन्दुनामकः

lagnātkramātsaptabhagairnokākūṭastu nuryataḥ / chatramastātsvabhādyāyonyasmādarddhendunāmakaḥ

हिन्दी अर्थ

लग्नमें जो नवमांश हो, उसके स्वामी ग्रहके सदृश अथवा जन्मसमयमें जो ग्रह सबसे बली हो, उसके समान शिशुका शरीर समझना चाहिए। इसी प्रकार चन्द्रमा जिस नवमांशमें हो उस

English

In astrology the strength of Navamsas and their lords plays an important role. In this verse two criteria are mentioned for determining the sex of the child. These rules can be applied to a nativity, query or impreg¬ nation chart.

अध्याय 54

श्लोक 191

लग्नादेकान्तरगतैश्चक्रमर्थात्सरित्पतिः ।षह्युस्थानेषु वीणाद्याः समसप्तर्क्षगैः

lagnādekāntaragataiścakramarthātsaritpatiḥ / ṣahyusthāneṣu vīṇādyāḥ samasaptarkṣagaiḥ

हिन्दी अर्थ

१. प्रसूता - ( प्रसृता स्त्रीके पास रहकर उसे सहयोग देनेवाली स्त्रियोंको 'उपसूतिका' कहते हैं। ' कहते हैं। २. सप्तमसे आगे लग्रतक क्षितिजके ऊपर होनेसे दृश्य चक्रार्ध कहलाता है।

English

The second half looks like a copy of Vardhamihira*s line:

अध्याय 54

श्लोक 192

वीणादामपाशकेदारभूशूलयुगगोलकाः ।ग्रहैःश्चरभगै राजयोगः प्रकीर्तितः

vīṇādāmapāśakedārabhūśūlayugagolakāḥ / grahaiḥścarabhagai rājayogaḥ prakīrtitaḥ

हिन्दी अर्थ

राशिके समान वर्ण (गौर आदि) समझना चाहिए। एवं द्रेष्काणवश लग्न आदि भावोंसे जातकके मस्तक आदि अड्र-विभाग जानना चाहिए। यथा--लग्रमें प्रथम द्रेष्काण हो तो लग्न मस्तक,

English

The reading should be read as There

अध्याय 54

श्लोक 193

स्थिरस्थैर्यमुसलं नाम द्विशरीणतैर्नलः ।भाला केन्द्रस्थितैः सौम्यैः पापैःसर्प उदाहृतः

sthirasthairyamusalaṃ nāma dviśarīṇatairnalaḥ / bhālā kendrasthitaiḥ saumyaiḥ pāpaiḥsarpa udāhṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

२। १२ नेत्र, ३। ११ कान, ४। १० नाक, ५। ९

English

The word *weak' here includes the condition of eclipse. The

अध्याय 54

श्लोक 194

ईर्य्युरध्वरुची रज्ज्वां मुसले धनमानयुक् ।व्यङ्गा स्थिरा लोनलजो मोनीस्रग्जोहिजोर्द्दितः

īryyuradhvarucī rajjvāṃ musale dhanamānayuk / vyaṅgā sthirā lonalajo monīsragjohijordditaḥ

हिन्दी अर्थ

मुख। द्वितीय द्रेष्काण हो तो लग्न कण्ठ, २। १२

English

The reading ahoxild be corrected as SfgnnTT

अध्याय 54

श्लोक 195

वीणोद्भवोतिनिपुणागीतनृत्यरुचिर्भृशम् ।दाता समृद्धो दामास्थः पाशजो धनशीलयुक्

vīṇodbhavotinipuṇāgītanṛtyarucirbhṛśam / dātā samṛddho dāmāsthaḥ pāśajo dhanaśīlayuk

हिन्दी अर्थ

६। ८ पेट और ७ नाभि। तृतीय द्रेष्काण हो तो लग्र वस्ति (नाभि और लिड्रके मध्यका स्थान), २। १२ लिड़, गुदमार्ग, ३॥ १२ अण्डकोश, ४।

English

The last line being corrupt docs not make construction easy. The reading is gTTT I It may be read as:

अध्याय 54

श्लोक 196

केदारोत्थः कृषिकरः शूले शूरोक्षतो धनः ।युगं पाषण्डयुर्गोले विधनो मलिनस्तथा

kedārotthaḥ kṛṣikaraḥ śūle śūrokṣato dhanaḥ / yugaṃ pāṣaṇḍayurgole vidhano malinastathā

हिन्दी अर्थ

सप्तम भाव पैर समझना चाहिए॥ ९१--९३॥

English

There appears to be some mistake in the reading gtgT,

अध्याय 54

श्लोक 197

भूपवन्द्यपदश्चक्रे समुद्रे नृपभोगयुक् ।सुभगाङ्गोर्द्धचंपात्सुखीशूरश्च चामरः

bhūpavandyapadaścakre samudre nṛpabhogayuk / subhagāṅgorddhacaṃpātsukhīśūraśca cāmaraḥ

हिन्दी अर्थ

जिस अड्की राशिमें पापग्रह हो, उस अडुमें ब्रण और यदि उसपर शुभ ग्रहकी दृष्टि हो तो उस अड़में चिह् (तिल मशक आदि) समझना चाहिए। पापग्रह अपनी राशि या नवमांशमें,

English

should be changed to

अध्याय 54

श्लोक 198

मित्रो पकारकृच्छत्रे कूटे चानृतबन्धराट् ।तौजः सकीर्तिः सुखभाक् मानवो भवति ध्रुवम्

mitro pakārakṛcchatre kūṭe cānṛtabandharāṭ / taujaḥ sakīrtiḥ sukhabhāk mānavo bhavati dhruvam

हिन्दी अर्थ

अथवा स्थिर राशिमें हो तो जन्मके साथ ही त्रण होता है अन्यथा उस ग्रहकी दशा-अन्तर्दशामें आगे चलकर ब्रण होता है। शनिके स्थानमें वात या पत्थरके आघातसे, मड्गलके स्थानमें विष,

English

From vene $5 to 68 only single lines i.e. 2 quarters* are taken

अध्याय 54

श्लोक 199

त्यागी यज्वात्मवान् यूथे हिंस्रो गुह्याधिपः शरैः ।शक्तौ नीचो ऽलसो निःस्वो दण्डे प्रियवियोगभाक्

tyāgī yajvātmavān yūthe hiṃsro guhyādhipaḥ śaraiḥ / śaktau nīco 'laso niḥsvo daṇḍe priyaviyogabhāk

हिन्दी अर्थ

शस्त्र और अग्रनिसे, बुधके स्थानमें पृथ्वी (मिट्टी )- के आघातसे, सूर्याश्रित अड़में काष्ठ और पशुसे, क्षीण चन्द्राभश्रित अड्भमें सींगवाले पशु और जलचरके आधघातसे ब्रण होता है। जिस अड्भकी

English

The reading WRt' should be read as

अध्याय 54

श्लोक 200

व्यर्कैः स्वान्त्योभयगतैः खेटैः स्यात्सुनफआनफआ ।दुरुधरा चैव विधौ ज्ञेयः केमुद्रुमो ऽन्यथा

vyarkaiḥ svāntyobhayagataiḥ kheṭaiḥ syātsunaphaānaphaā / durudharā caiva vidhau jñeyaḥ kemudrumo 'nyathā

हिन्दी अर्थ

राशिमें तीन पापग्रह हों, उस अड्भमें निश्चितरूपसे ब्रण होता ही है। षष्ठ भावमें पापग्रह हो तो उस राशिके आश्रित अज्भमें त्रण होता है। यदि उसपर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो उस अद्भमें तिल या मसा

English

should be as

अध्याय 54

श्लोक 201

स्वोपार्जितार्थभुग्दाता सुनफआयां धनी सुखी ।नीरोगः शीलवान् ख्यातः सुवेषश्चानफआभवः

svopārjitārthabhugdātā sunaphaāyāṃ dhanī sukhī / nīrogaḥ śīlavān khyātaḥ suveṣaścānaphaābhavaḥ

हिन्दी अर्थ

होता है। यदि शुभग्रहका योग हो तो उस अड्जमें चिह्न (दाग) मात्र होता है॥ ९४--९६३ ॥

English

The reading should be corrected as and vz

अध्याय 54

श्लोक 202

भोगी सुखी धनीदानीत्यागी दुरुधुरोद्भवः ।केमुद्रुमे ऽतिमलिनो दुःखी नीचो ऽथ निर्धनः

bhogī sukhī dhanīdānītyāgī durudhurodbhavaḥ / kemudrume 'timalino duḥkhī nīco 'tha nirdhanaḥ

हिन्दी अर्थ

( ग्रहोंके स्वरूप और गुणका वर्णन--) सूर्यकी आकृति चतुरसत्र है, शरीरकी कान्ति और नेत्र पिड्रल हैं। पित्तप्रधान प्रकृति है और

English

'wlfd* should be read as It is strange (hat the

अध्याय 54

श्लोक 203

यन्त्र्याश्मकारंशाजोको भौमपुष्करुर्ते ध्वगः सुज्ञः ।सुकीर्तिर्निपुणं विद्वांसं धनिनं तथा

yantryāśmakāraṃśājoko bhaumapuṣkarurte dhvagaḥ sujñaḥ / sukīrtirnipuṇaṃ vidvāṃsaṃ dhaninaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

उनके मस्तकपर थोड़े-से केश हैं। चन्द्रमाका आकार गोल है; उनकी प्रकृतिमें वात और कफकी प्रधानता है, वे पण्डित और मृदुभाषी हैं तथा उनके नेत्र बड़े सुन्दर हैं। मद्भलकी दृष्टि क्रूर

English

The reading Z should be emended as and

अध्याय 54

श्लोक 204

सेन्योन्यकार्यनिरतं सास्फुजिच्छस्रजीविनम् ।समन्दो धातुकुशलं तथा भाडंविदं मुने

senyonyakāryanirataṃ sāsphujicchasrajīvinam / samando dhātukuśalaṃ tathā bhāḍaṃvidaṃ mune

हिन्दी अर्थ

है, युवावस्था है, पित्तप्रधान प्रकृति है और वह चझ्ल स्वभावका है। बुधकी प्रकृतिमें कफ, पित्त और वातकी प्रधानता है, वह हास्यप्रिय और अनेकार्थक शब्द बोलनेवाला है। बृहस्पतिकी

English

According to Vuhamihira the colour or complexion corres*

अध्याय 54

श्लोक 205

कूटस्न्याशवपण्याठं नसासृगिन्द्गः प्रसूद्विषम् ।कुर्यात्सज्ञोर्थनिपुणं नम्रं सत्कीर्तिसंयुतम्

kūṭasnyāśavapaṇyāṭhaṃ nasāsṛgindgaḥ prasūdviṣam / kuryātsajñorthanipuṇaṃ namraṃ satkīrtisaṃyutam

हिन्दी अर्थ

अड्भकान्ति, केश और नेत्र पिड़ल हैं, उनका शरीर बड़ा है, प्रकृतिमें कफकी प्रधानता है और वे बड़े बुद्धिमान् हैं । शुक्रके अड़ और नेत्र सुन्दर हैं, मस्तकपर काले घुँघराले केश हैं और वे

English

Suppose the fuit decanAte of Me$a rises. Then the hnt ones of the 12 houses will represent in order the head, the right eye, right ear, right nostril, right cheek, right jaw, mouth, left jaw, left cheek, left nostril, left ear and the left eye.

अध्याय 54

श्लोक 206

सज्यो ऽस्थिरवयं वंश्यं विक्रान्तं च समर्थिनम् ।ससितोसुकवेत्तारं सार्किपोनभवं मुने

sajyo 'sthiravayaṃ vaṃśyaṃ vikrāntaṃ ca samarthinam / sasitosukavettāraṃ sārkiponabhavaṃ mune

हिन्दी अर्थ

सर्वदा सुखी रहनेवाले हैं। शनिका शरीर लम्बा और नेत्र कपिश वर्णके हैं, उनकी वातप्रधान प्रकृति है, उनके केश कठोर हैं और वे बड़े आलसी हैं ॥ ९७--१०० ॥

English

The reading should be rectified as Similarly

अध्याय 54

श्लोक 207

आरे सज्ञे वाहुयोधी पुराध्यक्षः सगीष्पतौ ।सशुक्रे द्यूतक्रर्हेयो नृती द्यूति समन्दके

āre sajñe vāhuyodhī purādhyakṣaḥ sagīṣpatau / saśukre dyūtakrarheyo nṛtī dyūti samandake

हिन्दी अर्थ

( ग्रहोंके धातु-- ) स्रायु (शिरा), हड्डी,

English

The reading should be corrected into

अध्याय 54

श्लोक 208

सेज्येज्ञे नृत्यगीताढ्यो मायादक्षः ।सभार्गवेसमन्दे लुब्धकः क्रूरो नरो भवति नारद

sejyejñe nṛtyagītāḍhyo māyādakṣaḥ / sabhārgavesamande lubdhakaḥ krūro naro bhavati nārada

हिन्दी अर्थ

( अरिष्टरकथन-- ) चन्द्रमा, लग्न और पापग्रह-- ये राशिके अन्तिमांशमें हों अथवा चन्द्रमा और तीनों पापग्रह ये लग्रादि चारों केन्द्रोंमें हों तथा कर्क लग्न हो तो जातककी मृत्यु होती है। दो पापग्रह लग्न और सप्तम भावमें हों तथा चन्द्रमा एक पापग्रहसे युक्त हो और उसपर शुभग्रहकी

English

The reading should be emended as

अध्याय 54

श्लोक 209

सशुक्रे वाक्पतौ विद्वान्सासिते ऽन्नघटङ्करः ।कवौ स मन्दमन्दाक्षा व वनिश्रयवित्तवान्

saśukre vākpatau vidvānsāsite 'nnaghaṭaṅkaraḥ / kavau sa mandamandākṣā va vaniśrayavittavān

हिन्दी अर्थ

जिसकी लम्बाई-चौड़ाई बराबर हो, वह चौकोर वस्तु 'चतुरत्न” कहलाती है।

English

The reading Ip: should be read as Ip9.

अध्याय 54

श्लोक 210

एकस्थैश्चतुराद्यैस्तु खवार्थैः खचरैः पृथक् ।कुजज्ञेज्याजशुक्रार्किसूर्यः परिव्रजेन्नरः

ekasthaiścaturādyaistu khavārthaiḥ khacaraiḥ pṛthak / kujajñejyājaśukrārkisūryaḥ parivrajennaraḥ

हिन्दी अर्थ

देखा जाता हो तो शिशुका शीघ्र मरण होता है। शुभग्रहसे दृष्ट हो तो ८ वर्षमें और शुभ तथा पापग्रह दोनोंसे दृष्ट हो तो ४ वर्षमें जातककी मृत्यु हो जाती है। क्षीण चन्द्रमा लग्नमें तथा पापग्रह

English

The reading Is corrupt and may be corrected

अध्याय 54

श्लोक 211

शाक्याजीवकवृद्धार्थिच रकाखफलाशनः ।तत्स्वामिभिः परिदजितैः प्रव्रज्याप्रच्युतिर्भवेत्

śākyājīvakavṛddhārthica rakākhaphalāśanaḥ / tatsvāmibhiḥ paridajitaiḥ pravrajyāpracyutirbhavet

हिन्दी अर्थ

८, १, ४, ७, १० में स्थित हों तो उत्पन्न बालकका मरण होता है। अथवा दो पापग्रहोंके बीचमें होकर चन्द्रमा ४, ७, ८ स्थानमें स्थित हो या लग्र ही दो पापग्रहोंके बीचमें हो तो जातककी मृत्यु होती

English

Ihe reading should be emended as

अध्याय 54

श्लोक 212

अदीक्षिताल्पस्तगतैः सबलैस्तत्स्थभक्तयः ।जन्मपोन्यैर्यद्यदृष्टो मन्दं पश्यति नारद

adīkṣitālpastagataiḥ sabalaistatsthabhaktayaḥ / janmaponyairyadyadṛṣṭo mandaṃ paśyati nārada

हिन्दी अर्थ

है। पापग्रह ७, ८ में हों और उनपर शुभग्रहकी दृष्टि न हो तो मातासहित शिशुकी मृत्यु होती है। राशिके अन्तिमांशमें चन्द्रमा पापग्रहसे अदृष्ट हो तथा पापग्रह त्रिकोण (५, ९)-में हो अथवा लग्रमें

English

The reading fdfTlsilvw: should be corrected as fWrtt'T*!#:.

अध्याय 54

श्लोक 213

मन्दो वा जन्मपं नष्टं तथा च मन्दकागणे ।भौमार्कांशे सौरदृष्टे चन्द्रे वा दीक्षितो भवेत्

mando vā janmapaṃ naṣṭaṃ tathā ca mandakāgaṇe / bhaumārkāṃśe sauradṛṣṭe candre vā dīkṣito bhavet

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमा और सप्तममें पापग्रह हो तो शिशुका मरण होता है। राहुग्रस्त चन्द्रमा पापग्रहसे युक्त हो और मड़ल अष्टम स्थानमें स्थित हो तो माता और शिशु दोनोंकी मृत्यु होती है। इसी प्रकार राहुग्रस्त

English

I'he printed text gives T'Idl:' which can mean only 'defeated*. It may be some other word standing for some number. It must be fiRT. which would give the number 24. The word may yield the number 27 which is the number of stars, or 12 which is the number of Rais.

अध्याय 54

श्लोक 214

सुरूपो भूषितगो ऽशिन्यां दक्षः सत्यवचा यमे ।बहूभुग्पदारग्नौ स्थिरधीः प्रियवाक्तथा

surūpo bhūṣitago 'śinyāṃ dakṣaḥ satyavacā yame / bahūbhugpadāragnau sthiradhīḥ priyavāktathā

हिन्दी अर्थ

( आयुर्दायकथन-- ) चन्द्रमा और बृहस्पतिसे युक्त कर्क लग्न हो, बुध और शुक्र केन्द्रमें हों और

English

After subtracting the planet's longitude from its highest exal¬

अध्याय 54

श्लोक 215

ब्राह्मो धनीमृगे भोगी रौद्रे हिंस्त्रः शठो ऽघकृत् ।दान्तो रोगी शुभो ऽदित्यां पुष्यर्यजन्मा कविः सुखी

brāhmo dhanīmṛge bhogī raudre hiṃstraḥ śaṭho 'ghakṛt / dānto rogī śubho 'dityāṃ puṣyaryajanmā kaviḥ sukhī

हिन्दी अर्थ

स्थानमें हों तो ऐसे योगमें उत्पन्न जातककी आयु बहुत अधिक होती है। मीन लग्रमें मीनका नवमांश हो, बुध वृषमें २५ कलापर हो तथा शेष सब ग्रह अपने-अपने उच्च स्थानमें हों तो जातककी आयु

English

The text invariably gives (Moon) for amt The reading

अध्याय 54

श्लोक 216

धूर्तः शठः कृतघ्नो ऽहौ पापः सर्वाशनो भवेत् ।पत्रे भोगी धनी भक्तो दाता प्रियवचा भगे

dhūrtaḥ śaṭhaḥ kṛtaghno 'hau pāpaḥ sarvāśano bhavet / patre bhogī dhanī bhakto dātā priyavacā bhage

हिन्दी अर्थ

परम (१२० वर्ष ५ दिनकी) होती है। लग्रेश बली होकर केन्द्रमें हो, उसपर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो बालक धनसहित दीर्घायु होता है। चन्द्रमा अपने उच्वमें हो, शुभग्रह अपनी राशिमें हों, बली लग्रेश

English

The reading WtWnTTO: b utterly corrupt It should ht read somewhat as

अध्याय 54

श्लोक 217

धनी भोगीनरोर्यमर्क्षे स्तेनो धृष्टो घृणी करे ।चित्रांबरः सुदृक्त्वाष्ट्रे न च धर्मदयापरः

dhanī bhogīnaroryamarkṣe steno dhṛṣṭo ghṛṇī kare / citrāṃbaraḥ sudṛktvāṣṭre na ca dharmadayāparaḥ

हिन्दी अर्थ

लग्नमें हो तो जातककी ६० वर्षकी आयु होती है। केन्द्रमें शुभग्रह हों और अष्टम भाव शुद्ध (ग्रहरहित)

English

The reading nWI: OTT: I b corrupt.

अध्याय 54

श्लोक 218

द्वीशे लुब्धः पटुः क्रोधी मढैयो आठनोविदेशगः ।शाक्रे धर्मपरस्तुष्टो मूले मानी धनी सुखी

dvīśe lubdhaḥ paṭuḥ krodhī maḍhaiyo āṭhanovideśagaḥ / śākre dharmaparastuṣṭo mūle mānī dhanī sukhī

हिन्दी अर्थ

हो तो ७० वर्षकी आयु होती है। शुभग्रह अपने- अपने मूल त्रिकोणमें हों, गुरु अपने उच्चमें हो तथा लग्नेश बलवान् हों तो ८० वर्षकी आयु होती है। सबल शुभग्रह केन्द्रमें हों और अष्टम भावमें कोई

English

The reading would mean the 3rd, ascendant and

अध्याय 54

श्लोक 219

आप्ये मानी दृष्टो वैश्वे नम्रश्च धार्मिकः ।कर्णे धनी सुखी ख्यातो दाता शूरो धनी वसौ

āpye mānī dṛṣṭo vaiśve namraśca dhārmikaḥ / karṇe dhanī sukhī khyāto dātā śūro dhanī vasau

हिन्दी अर्थ

ग्रह न हो तो ३० वर्षकी आयु होती है। अष्टमेश नवम भावमें हों, बृहस्पति अष्टम भावमें रहकर पापग्रहसे दृष्ट हों तो २४ वर्षकी आयु होती है। लग्नेश और अष्टमेश दोनों अष्टम भावमें स्थित हों

English

should be read as '' as

अध्याय 54

श्लोक 220

शेतऽरिहॄन्ता व्यसनी स्रीजितो जाहिभेदिनी ।बुध्ने वक्ता सुखी कान्तः पौष्णे शूरो धनी शुचिः

śeta'rihṝntā vyasanī srījito jāhibhedinī / budhne vaktā sukhī kāntaḥ pauṣṇe śūro dhanī śuciḥ

हिन्दी अर्थ

तो २७ वर्षकी आयु होती है। लग्नमें पापग्रहसहित बृहस्पति हों, उसपर चन्द्रमाकी दृष्टि हो तथा अष्टममें कोई ग्रह न हो तो २२ वर्षकी आयु समझनी चाहिए। शनि नवम भाव या लग्रमें हो, शुक्र

English

As usual the readings are corrupt: Instead of putting «l4lfU: the editor of the Puriu has given us the reading 9WW:. sSlmilarly

अध्याय 54

श्लोक 221

कामी शूरः कृतज्ञो ऽजे कान्तस्त्यागी क्षमी वृषे ।युग्मे स्रीद्यूतशास्रज्ञः स्रैणो ह्रस्वः स्वभे विधौ

kāmī śūraḥ kṛtajño 'je kāntastyāgī kṣamī vṛṣe / yugme srīdyūtaśāsrajñaḥ sraiṇo hrasvaḥ svabhe vidhau

हिन्दी अर्थ

केन्द्रमें हो और चन्द्रमा १२ या ९ में हो तो १०० वर्षकी आयु होती है। बृहस्पति कर्कमें होकर केन्द्रमें हो अथवा बृहस्पति और शुक्र दोनों केन्द्रमें हों तो १०० वर्षकी आयु समझनी चाहिए। अष्टमेश

English

should be read as and VPTT as vit.

अध्याय 54

श्लोक 222

स्रीद्विट् क्रोधी हरौ मानी विक्रान्तः स्थिरधीः सुखी ।धर्मी श्लक्ष्णः सुधीः षष्टे प्राज्ञः प्रांशुर्धनी घटे

srīdviṭ krodhī harau mānī vikrāntaḥ sthiradhīḥ sukhī / dharmī ślakṣṇaḥ sudhīḥ ṣaṣṭe prājñaḥ prāṃśurdhanī ghaṭe

हिन्दी अर्थ

लग्रमें हो और अष्टम भावमें शुभग्रह न हो तो ४० वर्षकी आयु होती है। लग्रेश अष्टम भावमें और अष्टमेश लग्रमें हों तो ५ वर्षकी आयु होती है। शुक्र और बृहस्पति एक राशिमें हों अथवा बुध और

English

ir iz should be read as

अध्याय 54

श्लोक 223

रोगी पूज्यः क्षती कारैर्प्ये कविः शिल्पीज्यभे धनी ।मृगे ऽलसो ऽटनः स्वक्षः परदारार्थहृद्धटे

rogī pūjyaḥ kṣatī kārairpye kaviḥ śilpījyabhe dhanī / mṛge 'laso 'ṭanaḥ svakṣaḥ paradārārthahṛddhaṭe

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमा लग्न या अष्टम भावमें हों तो ५० वर्षको आयु होती है॥ ११०--११८॥

English

should be read as and Htiivntl) as

अध्याय 54

श्लोक 224

सबलेभैभयेवापिस वलेजेशिलफलम् ।अन्यथा विपरीतं तत्पलंमेवं परे ऽपि न ।ख्यातः स्रीद्विट् धनी तीक्ष्णोज्ञः कविः शैण्डिको धनी ।पूज्यो लुब्धो ऽधनसखो मेषादौ भास्करे जनौ

sabalebhaibhayevāpisa valejeśilaphalam / anyathā viparītaṃ tatpalaṃmevaṃ pare 'pi na / khyātaḥ srīdviṭ dhanī tīkṣṇojñaḥ kaviḥ śaiṇḍiko dhanī / pūjyo lubdho 'dhanasakho meṣādau bhāskare janau

हिन्दी अर्थ

मुने! मैंने इस प्रकार ग्रहयोग-सम्बन्धसे आयुर्दायका प्रमाण कहा है। अब गणितद्वारा स्पष्टायुर्दायका वर्णन करता हूँ। (सूर्य, चन्द्रमा और लग्नमेंसे) यदि सूर्य अधिक बली हो तो

English

is unintelligible. should be read as T99[ifltr:

अध्याय 54

श्लोक 225

निःस्वोर्ऽकभे भूमिपुत्रे भूमिपुत्रे धनी चान्द्रे स्वभेदनः ।बौधे कृतज्ञो जैवे तु ख्यातः शौक्रे ऽन्यदारिकः

niḥsvor'kabhe bhūmiputre bhūmiputre dhanī cāndre svabhedanaḥ / baudhe kṛtajño jaive tu khyātaḥ śaukre 'nyadārikaḥ

हिन्दी अर्थ

बली हो तो अंशायुका साधन करना चाहिए। उसका साधन-प्रकार मैं बतलाता' हूँ॥ ११९३॥

English

The reading «nrr .. may have to be read as Vff: ftrTRff.

अध्याय 54

श्लोक 226

मृगे बह्वात्मजधनः कुंभे दुःख्यनृती खलः ।स्रीद्वेष्यः स्वजनद्वेषीनियरत्यः सधीयनः

mṛge bahvātmajadhanaḥ kuṃbhe duḥkhyanṛtī khalaḥ / srīdveṣyaḥ svajanadveṣīniyaratyaḥ sadhīyanaḥ

हिन्दी अर्थ

( पिण्डायु और निसर्गायुका' साधन--) सूर्य आदि ग्रह अपने-अपने उनच्चमें हों तो क्रमशः

English

should be read as

अध्याय 54

श्लोक 227

समानार्थः सपुत्रस्रीसर्णः सूर्यादिभे बुधे ।सेनानीः स्त्र्यर्थपुत्राढ्यः दक्षमैश्यः परिच्छदी

samānārthaḥ saputrasrīsarṇaḥ sūryādibhe budhe / senānīḥ stryarthaputrāḍhyaḥ dakṣamaiśyaḥ paricchadī

हिन्दी अर्थ

१-'पिण्डायु” वह है, जिसमें उच्च और नीच स्थानमें आयुके पिण्ड (मान-संख्या)-का निर्देश किया हुआ है, ठसके द्वारा इष्टस्थानस्थित ग्रहसे आयुका साधन किया जाता है। २-'निसर्गायु' वह है, जो ग्रहोंके निसर्ग (स्वभाव)-से ही सिद्ध है, जिसमें कभी परिवर्तन नहीं होता।

English

The reading fAw; toHw: possibly stands siat Here

अध्याय 54

श्लोक 228

मण्डलेशः सार्थसुखः सर्णस्वाम्यर्कभाद्गुरौ ।स्त्र्याप्तार्थो मन्दशोकाढ्यो बन्धुद्वेषी धनाघवान्

maṇḍaleśaḥ sārthasukhaḥ sarṇasvāmyarkabhādgurau / stryāptārtho mandaśokāḍhyo bandhudveṣī dhanāghavān

हिन्दी अर्थ

पिण्डायुके प्रमाण होते हैं तथा २०, १, २, ९, १८, २०, ५० ये क्रमशः सूर्यादि ग्रहोंके निसर्गायुर्दायके प्रमाण होते हैं॥ १२०-१२१॥ पिण्डायु और निसर्गायुमें आयु-साधन करना

English

Here too the readings are very bad: The eKpreuion irTTP

अध्याय 54

श्लोक 229

सार्थः प्राज्ञः समः ख्यातिः स्रीजिऽतोर्कादिभे मृगौ ।व्यङ्गजार्थो खप्रसूको विधिमित्रो सुखत्रयः

sārthaḥ prājñaḥ samaḥ khyātiḥ srīji'torkādibhe mṛgau / vyaṅgajārtho khaprasūko vidhimitro sukhatrayaḥ

हिन्दी अर्थ

हो तो राश्यादि ग्रहमें अपने उच्चको घटाना चाहिए। यदि वह ६ राशिसे अल्प हो तो उसको १२ राशिमें घटाकर ग्रहण करें। उसके अंश बनानेसे वह आयुर्दाय-साधनमें उपयोगी होता है।

English

The irotsfPITW b to be changed to

अध्याय 54

श्लोक 230

सत्पुत्रस्त्रीधनो राजा ग्रामे शोकादिभेर्कजे ।भूपज्ञगुणिपौरास्वादृष्टेब्जेजेसृगादिभिः

satputrastrīdhano rājā grāme śokādibherkaje / bhūpajñaguṇipaurāsvādṛṣṭebjejesṛgādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

जो ग्रह शत्रुके गृहमें हो उसके अंशोंमें उसीका तृतीयांश घटावे। यदि वह ग्रह वक्रगति न हो तभी ऐसा करना चाहिए। (यदि ग्रह वक्रगति हो तो शत्रुगृहमें रहनेपर भी तृतीयांश नहीं घटाना

English

should be read as

अध्याय 54

श्लोक 231

निः स्वस्तेन नृपाः प्रज्ञप्रेष्यामविनृयुग्मगे ।धात्वाजीवी नृपज्ञाभीतन्तुवायाधनाः स्वभे

niḥ svastena nṛpāḥ prajñapreṣyāmavinṛyugmage / dhātvājīvī nṛpajñābhītantuvāyādhanāḥ svabhe

हिन्दी अर्थ

चाहिए) तथा शनि और शुक्रको छोड़कर अन्य ग्रह अस्त हों तो उनके अंशोंमें आधा घटा देना चाहिए। (शनि और शुक्र अस्त हों तो भी उनके अंशोंमें आधा नहीं घटाना चाहिए।) यदि किसी

English

The expression may have to be read as

अध्याय 54

श्लोक 232

युयुत्सुकविसूरीज्यधातुजीविदृगामयाः ।ज्योतिर्ज्ञाढ्येज्यनु खलु नृपेज्ञादिकर्हरौ

yuyutsukavisūrījyadhātujīvidṛgāmayāḥ / jyotirjñāḍhyejyanu khalu nṛpejñādikarharau

हिन्दी अर्थ

ग्रहमें दोनों हानि प्राप्त हो (अर्थात् वह शत्रुगृहमें हो और अस्त भी हो) तो उसमें अधिक हानिमात्र करें (अर्थात् केवल आधा घटावे, तृतीयांश नहीं)। यदि लग्नमें पापग्रह हो तो

English

W should be read as fracT.

अध्याय 54

श्लोक 233

षष्टे शुभैर्नृपचमूपनैपुण्यवतिताशयाः ।जूके भूपस्वर्णकारवणिजः शेषदृग्युते

ṣaṣṭe śubhairnṛpacamūpanaipuṇyavatitāśayāḥ / jūke bhūpasvarṇakāravaṇijaḥ śeṣadṛgyute

हिन्दी अर्थ

उसकी राशिको छोड़कर केवल अंशादिसे आयुर्दायके अंशको गुणा करके गुणनफलमें ३६० का भाग

English

should be read as 4#

अध्याय 54

श्लोक 234

द्विपैतृकाब्धिध्वजिनो व्यङ्गा स्वक्षितिपा अलौ ।ज्ञातिक्ष्माजनयाश्चाये सद्भिर्दर्मी शठस्तथा

dvipaitṛkābdhidhvajino vyaṅgā svakṣitipā alau / jñātikṣmājanayāścāye sadbhirdarmī śaṭhastathā

हिन्दी अर्थ

देकर लब्ध अंशादिको पूर्वोक्त अंशमें घटावे। इस प्रकार पापग्रहके समस्त लब्धांश घटावे। यदि उसमें शुभग्रहका योग या दृष्टि हो तो लब्धांशका आधा घटाना चाहिए। इस तरह आगे बताये

English

It b strange that the author has omitted Sign Mina (Pisces) while giving the effects of the various natal Sns.

अध्याय 54

श्लोक 235

भूपमण्डितसखेज्यामृगे भूयान्यदारिकौ ।कुंभे शेषैश्च हास्यज्ञनृपज्ञाः सद्भिरन्त्यभे

bhūpamaṇḍitasakhejyāmṛge bhūyānyadārikau / kuṃbhe śeṣaiśca hāsyajñanṛpajñāḥ sadbhirantyabhe

हिन्दी अर्थ

जानेवाले प्रकारसे आयुर्दाय-साधन योग्य स्पष्ट अंश उपलब्ध होते हैं॥ १२२--१२५॥

English

{aU is to be changed to to

अध्याय 54

श्लोक 236

हारेशर्क्षदलस्थैस्तु दृष्टो युक्तः शशी शुभः ।त्र्यंशे तत्पतिमित्रर्क्षगतेर्युक्तेक्षितस्तथा

hāreśarkṣadalasthaistu dṛṣṭo yuktaḥ śaśī śubhaḥ / tryaṃśe tatpatimitrarkṣagateryuktekṣitastathā

हिन्दी अर्थ

( पिण्डायु-साधन-- ) उन स्पष्टांशोंको अपने-

English

The reading may stand for In that case

अध्याय 54

श्लोक 237

द्वादशांशे फलं प्रोक्तं नवांशे ऽप्यथ कीर्त्यते ।आरक्षेको वधरुचिर्नियुद्धकुशलोर्ऽथवान्

dvādaśāṃśe phalaṃ proktaṃ navāṃśe 'pyatha kīrtyate / ārakṣeko vadharucirniyuddhakuśalor'thavān

हिन्दी अर्थ

आदि) -से गुणा करके गुणनफलमें ३६० से भाग देनेपर लब्धि वर्ष-संख्या होती है। शेषको १२ से गुणा करके ३६० से भाग देनेपर लब्धि मास- संख्या होती है। पुनः शेषको ३० से गुणा

English

The reading, WWWl makes no sense.

अध्याय 54

श्लोक 238

कलहः क्षितिजांस्थे शौक्रे मूर्खो ऽन्यदारदः ।कविः सुखी बुधांशे तु नटचौरज्ञशिल्पिनः

kalahaḥ kṣitijāṃsthe śaukre mūrkho 'nyadāradaḥ / kaviḥ sukhī budhāṃśe tu naṭacaurajñaśilpinaḥ

हिन्दी अर्थ

करके ३६० के द्वारा भाग देनेपर लब्धि दिन- संख्या होगी। फिर शेषको ६० से गुणा कर ३६० से भाग देनेपर लब्धि घटी एवं पलादि रूप

English

should be taken as and vnVTlf as

अध्याय 54

श्लोक 239

स्वांशे त्वल्पतनुः सखस्तपस्वी लोभतत्परः ।क्रोधी निधीशो मात्यो वा नृपो हिंस्रो सुतो हरेः

svāṃśe tvalpatanuḥ sakhastapasvī lobhatatparaḥ / krodhī nidhīśo mātyo vā nṛpo hiṃsro suto hareḥ

हिन्दी अर्थ

( लग्नायु-साधन--- ) लग्नरकी राशियोंको छोड़कर अंशादिको कला बनाकर २०० से भाग देनेपर लब्धि वर्ष-संख्या होगी। शेषको १२ से गुणाकर २०० से भाग देनेपर लब्धि मास-संख्या होगी। पुनः पूर्ववत् ३० आदिसे गुणा करके हरसे भाग

English

The reading AouW be changed loJwWprtWTT:.

अध्याय 54

श्लोक 240

जीवांशे हास्यविद्योधा बली मन्त्री च धार्मिकः ।अल्पापत्यो दुःखितो खो दुष्टस्त्रीसौरिभागगे

jīvāṃśe hāsyavidyodhā balī mantrī ca dhārmikaḥ / alpāpatyo duḥkhito kho duṣṭastrīsauribhāgage

हिन्दी अर्थ

१. यदि लग्गन-राश्यादि ३। १५। २०। ३० और स्पष्ट सूर्य १०।१५। १०। २० है तो उपर्युक्त रीतिके अनुसार सूर्यकी

English

should be read as RtnVTI. to

अध्याय 54

श्लोक 241

भानार्विद्वादिदृष्टे नु तद्वदेव फलं वदेत् ।वर्गोत्तमे खे परभे पल मुक्तं शुभं क्रमात्

bhānārvidvādidṛṣṭe nu tadvadeva phalaṃ vadet / vargottame khe parabhe pala muktaṃ śubhaṃ kramāt

हिन्दी अर्थ

राश्यादिमें सूर्यकी उच्च राश्यादि ०। १० को घटानेपर १०। ५। १०। २० रहा। यह ६ राशिसे अधिक है, इसलिये इसीको अंशात्मक बनानेसे ३०५। १० २० हुआ। सूर्य शत्रुके घरमें नहीं है, इसलिये इसमें संस्कार-विशेष न करके इसी अंशादिको सूर्यके उच्चस्थानीय

English

The meaning! given under Kwnbha and Mbia are tentative*

अध्याय 54

श्लोक 242

पुष्टं मध्यं लघु ज्ञेयं यदि चांशपतिर्बली ।राशीक्षणफलं रुद्ध्वा ददात्यंशपलं स्पुटम्

puṣṭaṃ madhyaṃ laghu jñeyaṃ yadi cāṃśapatirbalī / rāśīkṣaṇaphalaṃ ruddhvā dadātyaṃśapalaṃ spuṭam

हिन्दी अर्थ

आयुमान १९ से गुणा करनेपर गुणनफल ५७९८ १६। २० में ३६० का भाग देनेपर लब्ध वर्ष १६ हुए। शेष ३८। १६। २० को १२ से गुणा कर गुणनफल ४५९ । १६। ० में ३६० का भाग देनेपर लब्ध मास १ हुआ। मास-शेष ९९ । १६ को ३० से गुणा करनेपर गुणनफल

English

atTTghr....ftlfinrtiTP thwld be read as arrrftt

अध्याय 54

श्लोक 243

शूरस्तब्धो विकलदृग्निघृणोर्ऽके तनुस्थिते ।मेषे धनी तैमिरकः सिंहे रात्र्यन्ध एव च

śūrastabdho vikaladṛgnighṛṇor'ke tanusthite / meṣe dhanī taimirakaḥ siṃhe rātryandha eva ca

हिन्दी अर्थ

२९७६ में ३६० का भाग देनेपर लब्ध दिन ८ हुए। शेष ९६ को ६०

English

ITV should be emended as

अध्याय 54

श्लोक 244

नीचोधोस्वः कर्कगेर्ऽके उद्बुदाक्षस्तनुस्थिते ।द्वितीयेर्ऽके बहुधनो नृपदण्ड्यो मुखामयी

nīcodhosvaḥ karkager'ke udbudākṣastanusthite / dvitīyer'ke bahudhano nṛpadaṇḍyo mukhāmayī

हिन्दी अर्थ

से गुणा करके गुणनफल ५७६० में ३६० का भाग देनेपर लब्धि घड़ी १६ हुई; शेष ० रहा। इस प्रकार सूर्यसे आयुमान वर्षादि १६। १।८। १६। ० हुआ। इसी तरह सब ग्रहोंका आयु-साधन कर लेना चाहिए।

English

ffrdm should be read as fvvt fT, and f as

अध्याय 54

श्लोक 245

त्रिगे बुधो विक्रमी च विमुखः पीडितो भुवि ।धनापत्योक्तितो धीस्थे बली शत्रुजितोरिगे

trige budho vikramī ca vimukhaḥ pīḍito bhuvi / dhanāpatyoktito dhīsthe balī śatrujitorige

हिन्दी अर्थ

२. लग्रायु-साधन--लग्रकी राशिको छोड़कर अंशादि १५। २०। ३० को कलात्मक बनानेसे ९२०। ३० हुआ। इसमें २०० का भाग देनेपर लब्ध वर्ष ४ हुए। शेष १२० । ३० को १२ से गुणा करनेपर गुणनफल १४४६॥। ० में २००का

English

should be read as and as

अध्याय 54

श्लोक 246

स्त्री जितो द्यूनसंस्थे च निधनेल्पात्मजोल्पदृक् ।सुतार्थसुखभा भारये दशमे श्रुतशौर्यवात्

strī jito dyūnasaṃsthe ca nidhanelpātmajolpadṛk / sutārthasukhabhā bhāraye daśame śrutaśauryavāt

हिन्दी अर्थ

... अंशायुर्दाय"-साधन-- ) लग्रसहित ग्रहोंके पृथक्ू-पृथक् अंश बनाकर ४० से भाग देकर जो शेष बचे उसे आयुर्दाय-साधनोपयोगी अंशादि समझे; उसमें जो विशेष संस्कार कर्तव्य है,

English

is to be read as and mfiral as

अध्याय 54

श्लोक 247

लाभे बहुधनो मानी पतितो खो ऽव्यये रवौ ।।मूकोधो बधिरः प्रेष्यो जेगे खाञ्चाजगे धनी

lābhe bahudhano mānī patito kho 'vyaye ravau /. mūkodho badhiraḥ preṣyo jege khāñcājage dhanī

हिन्दी अर्थ

उसका वर्णन करता हूँ। लग्नमें ग्रहको घटावे। यदि शेष ६ राशिसे अल्प हो तो उसमें निम्नाद्धित संस्कार विशेष करना चाहिए, अन्यथा नहीं। यदि घटाया हुआ ग्रह ६ राशिसे अल्प और १

English

Tliese verses contain many unintelligible readings:

अध्याय 54

श्लोक 248

बुटुर्वा धनवानधे हिंस्रो विक्रमगे भवेत् ।साधुभावः सुखगते धीस्थे कन्याप्रजोलसः

buṭurvā dhanavānadhe hiṃsro vikramage bhavet / sādhubhāvaḥ sukhagate dhīsthe kanyāprajolasaḥ

हिन्दी अर्थ

राशिसे अधिक हो तो उन अंशोंसे ३० में भाग देकर लब्धिको १ में घटावे और शेषकों गुणक समझे। यदि ग्रह घटाया हुआ लग्र १ राशिसे अल्प हो तो उन्हीं अंशोंमें ३० का भाग देकर

English

Read tntff »nd troft m ilroraY

अध्याय 54

श्लोक 249

अल्पाग्निकामस्तीक्ष्णोरौईष्युस्तत्रिमदोज्ञरवे ।व्याधिपूडान्वितो मृत्यौ भानुर्द्धनगे मित्रधनान्वितः

alpāgnikāmastīkṣṇorauīṣyustatrimadojñarave / vyādhipūḍānvito mṛtyau bhānurddhanage mitradhanānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

लब्धिको १ में घटानेसे शेष गुणक होता है। इस प्रकार शुभग्रहके गुणकको आधा करके गुणक समझे और पाप-ग्रहके समस्त गुणकोंको ग्रहण करे। फिर इस प्रकारके गुणकोंसे उपर्युक्त आयुर्दायके

English

?r should be reawi as gWTW:; 5®TOtt as it ift; ftyifipn.

अध्याय 54

श्लोक 250

धर्मधीधनयुग्राज्ये ख्यातधीधनयुग्भवेत् ।क्षुद्राएंऽगहीनो व्ययगे चन्द्रे प्रोक्तं फलं बुधैः

dharmadhīdhanayugrājye khyātadhīdhanayugbhavet / kṣudrāeṃ'gahīno vyayage candre proktaṃ phalaṃ budhaiḥ

हिन्दी अर्थ

अंशको गुणा करे तो संस्कृत अंश होता है। यह संस्कार कहा गया है। इस संस्कृत आयुर्दायके

English

should be read as and tR as or

अध्याय 54

श्लोक 251

लग्ने कुजे क्षततनुर्द्धनगे तु कदन्नभुक् ।धर्मपापसमाचारो ऽन्यत्र सूर्यसमो मतः

lagne kuje kṣatatanurddhanage tu kadannabhuk / dharmapāpasamācāro 'nyatra sūryasamo mataḥ

हिन्दी अर्थ

अंशको कलात्मक बनाकर २०० से भाग देकर लब्धिको वर्ष समझे। फिर शेषको १२ से गुणा करके गुणनफलमें २००का भाग देनेसे लब्धिको मास समझे। तत्पश्चात् शेषमें ३० आदिसे गुणा

English

should be read as

अध्याय 54

श्लोक 252

विद्वान् धनी च प्रवरः पण्डितः सचिवोरियुक् ।धर्मज्ञो विस्तृतगुणो गाधोज्ञेयरतोर्ऽकवत्

vidvān dhanī ca pravaraḥ paṇḍitaḥ sacivoriyuk / dharmajño vistṛtaguṇo gādhojñeyarator'kavat

हिन्दी अर्थ

करके २०० का भाग देनेसे लब्धिको दिन एवं

English

TO: TOT: should read as TOf: TOIT. and as TOWf.

अध्याय 54

श्लोक 253

विद्वान्स वाच्यः कृपणी सुखाक्षो रिपुगृद्धिमान् ।नीचस्तपस्वी चष्णवनी लोभीदुष्टस्तनोर्गुरो

vidvānsa vācyaḥ kṛpaṇī sukhākṣo ripugṛddhimān / nīcastapasvī caṣṇavanī lobhīduṣṭastanorguro

हिन्दी अर्थ

लग्नके आयुर्दाय अंशादिको ३ से गुणा करके गुणनफलमें १० का भाग देनेसे जो लब्धि हो, वह वर्ष है। फिर शेषको १२ आदिसे गुणा करके १० से भाग देनेपर जो लब्धि हो उसे मासादि

English

wA ould read as azid fisvrtT fmiwvqfd.

अध्याय 54

श्लोक 254

स्मरी मुखी विलग्नस्थे कलही सुरतोत्सुकः ।सुखितस्तनपस्ये च भृगौ जीववदन्यतः

smarī mukhī vilagnasthe kalahī suratotsukaḥ / sukhitastanapasye ca bhṛgau jīvavadanyataḥ

हिन्दी अर्थ

समझे। (लग्नकी आयुमें इतनी विशेषता है कि) यदि लग्न सबल हो तो लग्रकी जितनी भुक्त

English

should read as The reading 4tTt|fTOPf

अध्याय 54

श्लोक 255

निःश्वो रोगी कामवशो मलिनः शैशवार्तियुक् ।अलसो लग्नगे मन्दे धर्मात्स्वोञ्चगते नृपः

niḥśvo rogī kāmavaśo malinaḥ śaiśavārtiyuk / alaso lagnage mande dharmātsvoñcagate nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

अंशादिको २ से गुणा करके ५ का भाग देकर लब्धिको मास समझकर उसे भी जोड़े तथा शेषको ३० आदिसे गुणा करके हरसे भाग देकर जो लब्धि आवे, उसके तुल्य दिनादि रूप फल भी

English

should read as

अध्याय 54

श्लोक 256

ग्रामाधिपः स विद्वांश्च चार्वङ्गो ऽन्यत्र सूर्यवत् ।पूर्णमुच्चेथ पादोनफलं मूलत्रिकोणगे

grāmādhipaḥ sa vidvāṃśca cārvaṅgo 'nyatra sūryavat / pūrṇamuccetha pādonaphalaṃ mūlatrikoṇage

हिन्दी अर्थ

जोड़े तो लग्नायु स्पष्ट होती है यह क्रिया पिण्डायु

English

There are three yogas vis. Vesi Visi and Ubhacarft when there

अध्याय 54

श्लोक 257

शुभग्रहेदलं स्वर्क्षे मित्रभेंऽघ्रिमितं फलम् ।शत्रुभे ऽल्पं तथा नीचास्तङ्गते फलशून्यता

śubhagrahedalaṃ svarkṣe mitrabheṃ'ghrimitaṃ phalam / śatrubhe 'lpaṃ tathā nīcāstaṅgate phalaśūnyatā

हिन्दी अर्थ

भाग देनेसे लब्ध मास ७ हुए। शेष ४६ को ३० से गुणा करके गुणनफल १३८० में २०० का भाग देनेपर लब्ध दिन ६ हुए। शेष १८० को ६० से गुणा करनेपर गुणनफल १०८०० में २०० का भाग देनेसे लब्धि ५४ घड़ी हुई। इस प्रकार लग्रायुमान वर्षादि ४। ७। ६। ५४। ० हुआ।

English

Read as atTWWHfRtr. I

अध्याय 54

श्लोक 258

खभराकादिके खेटे कुलतुल्यः कुलाधिकः ।बन्धुपूज्यो ऽथधनवान्सुखी भोगी नृपः क्रमात्

khabharākādike kheṭe kulatulyaḥ kulādhikaḥ / bandhupūjyo 'thadhanavānsukhī bhogī nṛpaḥ kramāt

हिन्दी अर्थ

१. 'अंशायु' वह है, जो ग्रहोंके अंश (नवमांश)-द्वारा अनुपातसे जानी जाती है।

English

should read as ftdfijill

अध्याय 54

श्लोक 259

परिवित्तसुहृद्वन्धुपोष्यागणबलाधिपौ ।नृपश्च मित्रभास्थेषु खेटे व्रेकादिषु क्रमात्

parivittasuhṛdvandhupoṣyāgaṇabalādhipau / nṛpaśca mitrabhāstheṣu kheṭe vrekādiṣu kramāt

हिन्दी अर्थ

२. अंशायु-साधन--स्पष्ट राश्यादि सूर्य १०। १५। १०। २० को अंशात्मक बनानेसे ३१५। १०। २० में ४० का भाग देनेपर शेष ३५। १०। २० हुआ। यह साधनोपयोगी अंशादि हुआ। इसमें संस्कारविशेष करनेके लिये सूर्य १०।१५। १०। २० लग्न ३। १५। २० । ३० में न घट सकनेके कारण नियमानुसार १२ राशिमें जोड़कर घटानेसे शेष ५। ०। १०। १० यह ६ राशिसे कम और १ राशिसे अधिक है, इसलिये इस शेषके अंशादि १५० । १० १० से ३०

English

should read as and as

अध्याय 54

श्लोक 260

विषमर्क्षेर्ऽकहोरायां सस्थिते शुभभेषु च ।ख्यातो महोद्यमी चातितेजा धीमान्धनी बली

viṣamarkṣer'kahorāyāṃ sasthite śubhabheṣu ca / khyāto mahodyamī cātitejā dhīmāndhanī balī

हिन्दी अर्थ

में भाग देनेपर लब्ध अंश ० हुआ। शेष ३० को ६० से गुणा कर गुणनफल १८०० में उक्त भाजकका भाग देनेपर लब्धि-कला ११ हुई। शेष १४८। ८। १० को ६० से गुणा कर गुणनफल ८८८८ । १०में उक्त अंशादि भाजकसे भाग देनेपर तृतीय लब्धि ५९ हुई। इस प्रकार लब्धिमान अंशादि ०। ११। १५ हुआ। इसको १ अंशमें घटानेसे शेष ०। ४८ । १ यह गुणक हुआ। सूर्य पापग्रह है, अत: इस गुणकसे आयुसाधनोपयोगी अंशादि ३५। १०। २० को गुणा

English

should be read as 94.

अध्याय 54

श्लोक 261

शुभेषु चन्द्रहोरायां स्थितेषु समराशिषु ।कान्तिमार्द्दवसौभाग्यभोगधीमान्भवेन्नरः

śubheṣu candrahorāyāṃ sthiteṣu samarāśiṣu / kāntimārddavasaubhāgyabhogadhīmānbhavennaraḥ

हिन्दी अर्थ

करनेपर गुणनफल २८। ८। ५१ यह संस्कृत अंशादि हुआ। इसको कलात्मक बनानेसे १६८८। ५१ हुआ। इसमें २००का भाग देनेपर लब्ध वर्ष ८ हुए। शेष ८८।५१ को १२ आदिसे गुणा कर गुणनफलमें २०० का भाग देकर पूर्ववत्

English

should read as 9:.

अध्याय 54

श्लोक 262

सूर्यहोरागतः पापः समभेषु तु मध्यमाः ।विषमर्क्षेषु भास्कर्या सौम्या नोक्तफलप्रदाः

sūryahorāgataḥ pāpaḥ samabheṣu tu madhyamāḥ / viṣamarkṣeṣu bhāskaryā saumyā noktaphalapradāḥ

हिन्दी अर्थ

मासादि निकालनेसे आयुमान वर्षादि ८।५।९। ५५। ४८ हुआ।

English

V should be read as

अध्याय 54

श्लोक 263

स्वमित्रत्र्यंशगश्चन्द्रः सुरूपं गुणिनं नरम् ।करोत्यन्नगतस्तद्वत्तत्तुल्यगुणरूपिणम्

svamitratryaṃśagaścandraḥ surūpaṃ guṇinaṃ naram / karotyannagatastadvattattulyaguṇarūpiṇam

हिन्दी अर्थ

३. लग्रका अंशायु-साधन--लग्न ३। १५। २० ३० के अंशादि बनानेसे १०५। २०। ३० हुए। इनमें ४० का भाग देनेपर बचे हुए २५। २०। ३० को ३०से गुणा करके गुणनफल ७६ है १। ३० में १० का भाग दिया तो लब्ध ७ वर्ष हुए। शेष ६। १। ३० को १२से गुणा करके गुणनफल ७२। १८ ०» में १० का भाग देनेपर लब्ध ७ मास हुए। मास-

English

should read as The expression is used «V«n:

अध्याय 54

श्लोक 264

व्यालायुधे चतुष्पादांऽजेषु च त्र्यंशके च ।तीक्ष्णे ऽतिहिंस्रश्च भवेद्गुरुतल्पगतोटनः

vyālāyudhe catuṣpādāṃ'jeṣu ca tryaṃśake ca / tīkṣṇe 'tihiṃsraśca bhavedgurutalpagatoṭanaḥ

हिन्दी अर्थ

इन तीनोंमें जो अधिक बली है, प्रथम उसीकी दशा होती है। फिर उससे केन्द्रस्थित ग्रहोंकी,

English

should read as

अध्याय 54

श्लोक 265

स्तेनो भोक्ता सधनधीर्नृपः क्लीबश्च शत्रुहा ।विष्टिकृद्दासवृत्तिश्च पापो हिंस्नो ऽमतिर्भवेत्

steno bhoktā sadhanadhīrnṛpaḥ klībaśca śatruhā / viṣṭikṛddāsavṛttiśca pāpo hiṃsno 'matirbhavet

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर “पणफर” स्थित ग्रहोंकी, तत्पश्चात्

English

*9IW Mauwltl' must be wrong. It should be read as 9m

अध्याय 54

श्लोक 266

मेषादिकोत्तमांशेषु द्वादशांशेषु राशिवत् ।जायाबलविभूषाढ्यः सत्त्वयुक्तो ऽतिसाहसी

meṣādikottamāṃśeṣu dvādaśāṃśeṣu rāśivat / jāyābalavibhūṣāḍhyaḥ sattvayukto 'tisāhasī

हिन्दी अर्थ

'आपोक्लिम' स्थित ग्रहोंकी दशा होती है। केन्द्रादि-स्थित ग्रहोंमें बलके अनुसार ही पूर्व- पूर्व दशा होती है। एक स्थानमें स्थित दो या तीन ग्रहोंमें यदि बलकी समानता हो तो उनमें जिसकी

English

This verse appears so be a repetition of verse 297. Here the

अध्याय 54

श्लोक 267

तेजस्वी च नरः खाये त्रिंशांसे सृजिसंस्थिते ।आमयी वा स्वभार्यायां विषमः पारदारिकः

tejasvī ca naraḥ khāye triṃśāṃse sṛjisaṃsthite / āmayī vā svabhāryāyāṃ viṣamaḥ pāradārikaḥ

हिन्दी अर्थ

अधिक आयु हो उसकी प्रथम दशा होती है। आयुके वर्षादिमें भी समता हो तो जिस ग्रहका सूर्य-सान्निध्यसे प्रथम उदय हुआ हो, उसकी प्रथम दशा होती है ॥१३६-१३७॥

English

should read as

अध्याय 54

श्लोक 268

दुःखी परिच्छदयुतो मलिनश्चार्कजे स्वके ।सुखधीधनकीर्त्यालस्तेजस्वी लोकपूजितः

duḥkhī paricchadayuto malinaścārkaje svake / sukhadhīdhanakīrtyālastejasvī lokapūjitaḥ

हिन्दी अर्थ

( अन्तर्दशा-कथन-- ) दशापति पूर्णदशाका पाचक होता है, तथापि उसके साथ रहनेवाला ग्रह आधे (+--) का, दशापतिसे त्रिकोण (५, ९)-में रहनेवाला तृतीयांश (--) का, सप्तममें रहनेवाला

English

The word for or

अध्याय 54

श्लोक 269

नीरगुह्यभवान्भोगी जीवे खत्रिंशभागगे ।मेधाकलाकाव्यशिल्पविवादकपटाञ्चितः

nīraguhyabhavānbhogī jīve khatriṃśabhāgage / medhākalākāvyaśilpavivādakapaṭāñcitaḥ

हिन्दी अर्थ

सप्तमांश (७) का, चतुरस्र (४। ८)-में रहनेवाला चतुर्थाश (-) अन्‍्तर्दशाका पाचक होता है। इससे

English

reminds us of the Brhajjataka expression.

अध्याय 54

श्लोक 270

शास्त्रार्थसाहसयुतो बुधे स्वत्रिंशभागगे ।बह्वपत्सुखारौग्यरोगरूपार्थसंयुतः

śāstrārthasāhasayuto budhe svatriṃśabhāgage / bahvapatsukhāraugyarogarūpārthasaṃyutaḥ

हिन्दी अर्थ

शेष २। १८ को ३० से गुणा कर गुणनफल ६९ ० में १० का भाग देनेपर लब्ध ६ दिन हुए। शेष ९ को ६० से गुणा कर गुणनफल ५४० में १० का भाग देनेपर लब्धि ५४ घड़ी हुई। इस प्रकार लग्रका अंशायुर्दायमान वर्षादि ७।

English

fsnftsnA: should read as

अध्याय 54

श्लोक 271

ललिताङ्गो विप्रकीणन्द्रियः स्याद्भार्गवे स्वके ।शूरस्तब्धौ च विषमवधकौ सद्गुणान्वितौ

lalitāṅgo viprakīṇandriyaḥ syādbhārgave svake / śūrastabdhau ca viṣamavadhakau sadguṇānvitau

हिन्दी अर्थ

यहाँ लग्रन, सूर्य और चन्द्रमा--इन तीनोंमें लग्न बली है, इसलिये प्रथम दशा लग्रकी होगी; फिर उससे केन्द्रादिस्थित ग्रहोंकी । तथा लग्नकी दशामें प्रथम अन्तर्दशा

English

artniT shoidd read as

अध्याय 54

श्लोक 272

सुखेज्ञो चारु चेष्टाङ्गौ चन्द्रार्क्कौचेत्कुजादिगौ मूलत्रिकोणस्वर्क्षोच्चे कण्ठस्थास्तु च ये ग्रहाः

sukhejño cāru ceṣṭāṅgau candrārkkaucetkujādigau mūlatrikoṇasvarkṣocce kaṇṭhasthāstu ca ye grahāḥ

हिन्दी अर्थ

सिद्ध है कि इन स्थानोंसे भिन्न स्थानमें स्थित ग्रहोंकी अन्तर्दशा नहीं होती है॥ १३८-३-॥

English

should read as

अध्याय 54

श्लोक 273

अन्योन्यकारकास्ते स्युः कर्मगस्तु विशेषतः ।शुभं वर्गोत्तमे जन्म वेसिस्थाने वसद्गृहैः

anyonyakārakāste syuḥ karmagastu viśeṣataḥ / śubhaṃ vargottame janma vesisthāne vasadgṛhaiḥ

हिन्दी अर्थ

( अन्तर्दशा-साधनके गुणक-- ) मूल दशापतिका ८४, उसके साथ रहनेवालेका ४२, त्रिकोणमें रहनेवालेका २८, सप्तममें रहनेवालेका १२ तथा चतुर्थ-अष्टममें रहनेवालेका २१ गुणक

English

should be emended as and

अध्याय 54

श्लोक 274

अशून्येषु च केन्द्रेषु कारकाख्यगृहेषु च ।गुरुजन्मेशलग्नेशाः केन्द्रस्था मध्यसौख्यादाः

aśūnyeṣu ca kendreṣu kārakākhyagṛheṣu ca / gurujanmeśalagneśāḥ kendrasthā madhyasaukhyādāḥ

हिन्दी अर्थ

कहा गया है। वर्षादि रूप दशा-प्रमाणको अपने- अपने गुणकसे गुणा करके सब गुणकोंके योगसे भाग देनेपर जो लब्धि आवे, वह वर्ष होता है। शेषको १२, ३० आदिसे गुणा करके गुणनफलनमें

English

Th should be read as

अध्याय 54

श्लोक 275

पृष्टोभवकोदपर्क्षस्थितास्त्वन्त्यान्तरादुषु ।प्रवेशे भास्करकुजौ भृग्वीज्यो मध्यगौ तथा

pṛṣṭobhavakodaparkṣasthitāstvantyāntarāduṣu / praveśe bhāskarakujau bhṛgvījyo madhyagau tathā

हिन्दी अर्थ

गुणकके योगसे भाग देनेपर जो लब्धि आवे, वह मास-दिन आदिका सूचक होती है। नारदजी ! इसी प्रकार अन्तर्दशामें उपदशाके मान समझने चाहिए॥ १३९--१४१ ्र ॥

English

should read 9mvi4l4; and as Rfipr. The

अध्याय 54

श्लोक 276

चन्द्रार्की फल दावन्त्ये सदा ज्ञः फलदायकः ।लग्नात्पुत्रे कलत्रे वाब्जाच्छुभेशयुतेक्षिते

candrārkī phala dāvantye sadā jñaḥ phaladāyakaḥ / lagnātputre kalatre vābjācchubheśayutekṣite

हिन्दी अर्थ

( दशाफल-- ) दशारम्भ-कालमें यदि चन्द्रमा दशापतिके मित्रकी राशि, स्वोच्च, स्वराशि या दशापतिसे १, ४, ७, ३, १०, ११ में शुभ स्थानमें हो तो जिस भावमें चन्द्रमा हो, उस भावकी

English

ihould be read as and as

अध्याय 54

श्लोक 277

स्यात्तयोः संपदः स्वत्वमन्यथाथाङ्गतोदयः ।रवौ भीनेर्ऽकजः स्रीघ्नः पुत्रस्थस्तु तथा कुजः

syāttayoḥ saṃpadaḥ svatvamanyathāthāṅgatodayaḥ / ravau bhīner'kajaḥ srīghnaḥ putrasthastu tathā kujaḥ

हिन्दी अर्थ

विशेषरूपसे पुष्टि करता हुआ शुभ फल देता है।

English

RT: should be read as OTfkWTO:.

अध्याय 54

श्लोक 278

सिमातुर्याष्टगैः क्रूरैर्यद्वा क्रूरान्तरे सितः ।सद्ग्रहायुतदृष्टश्चेदग्निपातान्मृतिः स्त्रियाः

simāturyāṣṭagaiḥ krūrairyadvā krūrāntare sitaḥ / sadgrahāyutadṛṣṭaścedagnipātānmṛtiḥ striyāḥ

हिन्दी अर्थ

लग्रकी, आगे फिर बलक्रमसे शुक्र और बुधकी अन्तर्दशा होगी। यहाँ दशापति लग्र है, इसलिये इसके गुणकाड्ू ८४ से दशावर्षादि ११। १। ११ को गुणा कर गुणनफल ९३३ । ६। २४ में गुणकयोग १८७ का भाग देनेपर लब्ध

English

should be read as

अध्याय 54

श्लोक 279

लग्नद्य पाणिगतयोः शशिरव्योः सह स्त्रिया ।एकेन यस्य जन्माहुरथ सप्तमसंस्थयोः

lagnadya pāṇigatayoḥ śaśiravyoḥ saha striyā / ekena yasya janmāhuratha saptamasaṃsthayoḥ

हिन्दी अर्थ

वर्ष ४ हुए। शेष १८५। ६। २४ को १२ से गुणा कर गुणनफल २२२६। ९। १८ में १८७ का भाग देनेपर लब्ध ११ मास हुए। शेष १६९। ९। १८ को ३० से गुणा कर गुणनफल ५०९४ में १८७ का भाग देनेपर लब्ध

English

should be read as as If

अध्याय 54

श्लोक 280

नवधीगतयोर्वापि विकलस्रीसितार्कयोः ।कोणोदये ऽस्तां त्यसन्धौ भृगौ बन्ध्यापतेर्जनिः

navadhīgatayorvāpi vikalasrīsitārkayoḥ / koṇodaye 'stāṃ tyasandhau bhṛgau bandhyāpaterjaniḥ

हिन्दी अर्थ

२७ दिन हुए। शेष ४३ को ६० से गुणा कर गुणनफल २५८० में १८७ का भाग देनेपर लब्धि १३ घड़ी हुई। शेष १४९ को ६० से गुणा कर गुणनफल ८९४० में १८७ का भाग देनेसे लब्ध ४७ पल हुए। इस प्रकार

English

should read as Vt.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_nAradapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।