कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ।मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि न:
kundendīvarasundarāvatibalau vijñānadhāmāvubhau śobhāḍhyau varadhanvinau śrutinutau govipravṛndapriyau| māyāmānuṣarūpiṇau raghuvarau saddharmavarmau hitau sītānveṣaṇatatparau pathigatau bhaktipradau tau hi na:
व्याख्याVyakhya
गोस्वामी तुलसीदास जी मित्रता को केवल एक गुण से परिभाषित करते हैं: मित्र के दुख के प्रति संवेदनशीलता। यह कोई औपचारिक सहानुभूति या केवल व्यावहारिक सहायता नहीं है (यद्यपि उनका भी महत्व है), बल्कि प्रियजन के पीड़ित होने पर हृदय में उठने वाली सहज और सच्ची पीड़ा है। जिसमें इस भाव का अभाव है — जो अपने मित्र के दुख को देखकर विचलित नहीं होता — वह मनुष्य के सबसे मूलभूत और पवित्र बंधन से कटा हुआ है। किष्किन्धाकांड इसे व्यावहारिक रूप में दिखाता है: हनुमान जी श्रीराम की पूरी कहानी सुनने से पहले ही उनके दुख को देखकर रो पड़ते हैं। मित्रता कोई सौदा नहीं है — यह हृदय का स्पंदन (अनुनाद) है।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी
मिरर न्यूरॉन पर शोध (रिज़ोलैटी, गैलेसी): दूसरों की पीड़ा को देखकर हमारे मस्तिष्क का मिरर सिस्टम सक्रिय हो जाता है, जो सहानुभूति का तंत्रिका-वैज्ञानिक आधार है। जिन लोगों में उच्च सहानुभूति क्षमता होती है — जो दूसरों की भावनाओं को वास्तव में महसूस करते हैं — वे अधिक मजबूत सामाजिक संबंध बनाते हैं, अधिक सुखी होते हैं और अधिक प्रभावी सहयोगी बनते हैं। सच्ची मित्रता के लिए तुलसीदास जी का यह मापदंड दशकों के जुड़ाव (अटैचमेंट) संबंधी शोध द्वारा समर्थित है: केवल व्यावहारिक सहायता ही नहीं, बल्कि भावनात्मक संवेदनशीलता ही घनिष्ठ संबंधों का प्राण है।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
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- Gita Press Editorial Board (Hindi)
- Last updated
- 2026-10-23
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Collated with Kashi Nagari Pracharini Sabha recension.
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