अध्याय 5
श्लोक 19.1
ब्रह्मगवि १-१५ मयोभूः।ब्रह्मगवि।अनुष्टुप्, २ विराट्-पुरस्ताद्बृबती, ७ उपरिष्टाद्बृहती।अ॒ति॒मा॒त्रम॑वर्धन्त॒ नोदि॑व॒ दिव॑मस्पृशन्।भृगुं॑ हिंसि॒त्वा सृञ्ज॑या वैतह॒व्याः परा॑भवन्
brahmagavi 1-15 mayobhūḥ| brahmagavi| anuṣṭup, 2 virāṭ-purastādbṛbatī, 7 upariṣṭādbṛhatī| atimātramavardhanta nodiva divamaspṛśan| bhṛguṃ hiṃsitvā sṛñjayā vaitahavyāḥ parābhavan
हिन्दी अर्थ
देखो अथर्व० (५।१८।१२), इसमे १०१ संख्या का कथन हुआ है नव नवत्यः = (नव नरई-नई, परमेश्वर की सत्ता से, न+ वत्यः' इन्कार करनेवालीं, नास्तिक जनतां । इन्हे भूमि ने कपा दिया । नवत्यः (क्यम् ) कुत्सित आवाज करनेवाली, (पदयोपनीम्) परो को संजञा- शन्थ कर देनेवाली (याम्) जिस वेडी को (मृताय) मृत्युदण्ड के लिए (अनु) हानि पहुंचानेवाले है राजन् ! (देवाः) राष्ट के दिव्य न्यायाधीशौने (व)
English
Brāhman’s dame. No broad-browed calf with wide-set ears is ever in his homestead born.