छान्दोग्योपनिषद्

Prapathaka 1 · Khanda 2 — The War of Devas and Asuras & the Invincible Pranaश्लोक 1.2.1/147%

Chandogya Upanishad 2.1.2.1

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

देवासुरा ह वै यत्र संयेतिरे उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैनानभिभविष्याम इति

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जब प्रजापति के दोनों पुत्र — देव और असुर — परस्पर युद्ध करने लगे, तब देवताओं ने उद्गीथ (ओंकार) का आश्रय लिया कि 'इसके द्वारा हम असुरों को परास्त करेंगे।' ॥ १ ॥

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

When the Devas and Asuras struggled together, both of the race of Pragâpati, the Devas took the udgîtha (Om), thinking they would vanquish the Asuras with it.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

मधु-विद्या का यह केंद्रीय उपदेश समस्त चराचर जगत की अंतर्निहित मिठास और पारस्परिक संबंध को प्रकट करता है: "अयं सूर्यः सर्वेषां भूतानां मधु... अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मधु"। सूर्य, पृथ्वी, जल, अग्नि और धर्म—ये सभी एक-दूसरे के लिए मधु (अमृतमय पोषण) हैं, और सभी प्राणी इनके लिए मधु हैं। इस संपूर्ण व्यवस्था के केंद्र में वह एक ही तेजस्वी, अमृतमय पुरुष (परमात्मा) विद्यमान है, जो इस ब्रह्मांड में भी है और मनुष्य के अंतरतम में भी। यह उपनिषद का वह परम दृष्टांत है जो संपूर्ण अस्तित्व को एक जीवंत, सामंजस्यपूर्ण और प्रेमपूर्ण ईकाई के रूप में स्थापित करता है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
21वीं सदी के व्यक्ति की सबसे गहरी पीड़ा है — अस्तित्वगत अकेलापन (Existential Alienation) और प्रकृति से विखंडन। आधुनिक जीवनशैली ने हमें कंक्रीट के जंगलों और डिजिटल स्क्रीन के पीछे इस भ्रम में कैद कर दिया है कि हम इस सृष्टि से अलग, स्वतंत्र और अकेले उपभोक्ता हैं। जब हम प्रकृति को केवल शोषण की वस्तु और अन्य मनुष्यों को प्रतिस्पर्धी मानने लगते हैं, तो अवसाद, पर्यावरण-संकट और समाज में विभाजन अपरिहार्य हो जाता है। छान्दोग्य उपनिषद की 'मधु-विद्या' इस कृत्रिम अलगाव को समूल नष्ट कर देती है। आप इस ब्रह्मांड में किसी दुर्घटना की तरह नहीं आए हैं; आप इस ब्रह्मांड के अभिन्न अंग हैं। जिस अनंत चेतना ने तारों, आकाशगंगाओं और जीवन को रचा है, वही चेतना इस क्षण आपकी आँखों से देख रही है और आपके हृदय में धड़क रही है। जब आप इस सत्य को पहचानते हैं, तो अकेलापन और हीनता सदा के लिए विलीन हो जाते हैं, और आपके भीतर एक अगाध ब्रह्माण्डीय आत्मीयता जागृत हो जाती है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **अलगाव के भ्रम का विसर्जन (Transcending Separation)**: जब भी जीवन में अकेलापन, अवसाद या यह भाव घेरे कि "कोई मुझे नहीं समझता", तो मौन होकर अपनी श्वास के साक्षी बनिए और स्मरण कीजिए कि संपूर्ण ब्रह्मांड का जीवन-रस आपके भीतर बह रहा है। - **संबंधों में अद्वैत दृष्टि (Seeing the One in All)**: जब किसी व्यक्ति से मतभेद या कटुता उत्पन्न हो, तो स्वयं को स्मरण कराइए कि सामने वाला व्यक्ति कोई पराया शत्रु नहीं, बल्कि उसी एक चेतना का दूसरा रूप है; इस दृष्टि से क्रोध तुरंत शांत हो जाता है। - **प्रकृति के प्रति कृतज्ञता (Ecological Reverence)**: प्रतिदिन जल, वायु, सूर्य के प्रकाश और भोजन को ग्रहण करते समय एक क्षण का मौन रखकर उस पारस्परिक पोषण (मधु) के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करें जो आपके अस्तित्व को बनाए हुए है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप स्वयं को एक 6 फीट के नश्वर शरीर और सीमित उपाधियों में कैद मानते रहेंगे, अथवा समस्त ब्रह्मांड के साथ अपने उस अविभाज्य और अमृतमय संबंध का साक्षात्कार करेंगे?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

पारिस्थितिक तंत्र विज्ञान (Ecosystem Ecology) और जेम्स लवलॉक का 'गाइया सिद्धांत' (Gaia Hypothesis) यह प्रदर्शित करते हैं कि पृथ्वी और उसका संपूर्ण वायुमंडल एक स्व-नियमित, जीवित तंत्र की तरह कार्य करता है, जहाँ प्रत्येक घटक (सूर्य का प्रकाश, जल चक्र, वनस्पति, जीव) परस्पर निर्भर हैं। एक घटक का अस्तित्व दूसरे के बिना असंभव है। उपनिषद की 'मधु-विद्या' इस वैज्ञानिक सत्य का आध्यात्मिक साक्षात्कार है कि प्रकृति में कोई अलगाव नहीं है; प्रत्येक कण दूसरे कण के जीवन और आनंद का आधार है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

  • Original text
  • Translation · from the source archive

No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.

Sanskrit edition
Imported text; printed edition not recorded. Open Sanskrit text archives (see the source link)
Translation
Not recorded. Some Hindi and English text is AI-assisted and is flagged where it appears.
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain. Digitized by sanskritdocuments.org.

Found a mistake?

Interactive Verse Knowledge Graph · ज्ञान जाल

श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

Reviewed links only. A line here is a stored connection, not a guess from the neighboring verse.

Chandogya Upanishad 2.1.2.1Current VerseBhagavadBhagavad Gita Bh…TaittiriTaittiriya Upani…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

Listed beside Brahman in this library. The link does not say the passages teach the same thing.

आगे क्या · What next