छान्दोग्योपनिषद्

Prapathaka 1 · Khanda 2 — The War of Devas and Asuras & the Invincible Pranaश्लोक 1.2.2/1414%

Chandogya Upanishad 2.1.2.2

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

ते ह नासक्यं प्राणमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तं हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

देवताओं ने नासिकास्थित प्राण की उद्गीथ रूप में उपासना की; असुरों ने उसे पाप (द्वैत) से बींध दिया। इसीलिये मनुष्य नासिका से सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनों सूंघता है। ॥ २ ॥

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

They meditated on the udgîtha (Om) as the breath (scent) in the nose , but the Asuras pierced it (the breath) with evil. Therefore we smell by the breath in the nose both what is good-smelling and what is bad-smelling. For the breath was pierced by evil.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

मधु-विद्या के इस दृष्टांत में ऋषि उद्दालक मधुमक्खियों का सुंदर उदाहरण देते हैं: "यथा सौम्य मधुकृतो मध्वानि संनिष्ठाप्य नानात्ययानां वृक्षाणां रसान् समवहारमेकतां गमयन्ति। ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सौम्य।" जिस प्रकार मधुमक्खियां अनेक वृक्षों और पुष्पों से अलग-अलग पराग और रस लाकर उन्हें एक मधु (शहद) में एकाकार कर देती हैं, और फिर उस मधु में कोई भी रस यह नहीं कह सकता कि 'मैं आम का रस हूँ या जामुन का'—उसी प्रकार संपूर्ण जीव सत् (परब्रह्म) में विलीन होकर अपनी संकीर्ण, अलग पहचान खोकर एक हो जाते हैं।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक समाज की सबसे बड़ी मानसिक व्याधि है 'अति-वैयक्तिकता' (Hyper-Individualism) और अपनी संकीर्ण पहचान का कठोर आग्रह। लोग अपनी जाति, धर्म, राष्ट्रीयता, कॉर्पोरेट पदवी और सोशल मीडिया प्रोफाइल को इतनी दृढ़ता से पकड़ लेते हैं कि जरा सा विरोध होते ही वे आहत, क्रोधी और आक्रामक हो जाते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हमारी सारी विशिष्टताएं और उपलब्धियां उसी एक जीवन-स्रोत से उपजी हैं। छान्दोग्य का मधुमक्खी-दृष्टांत हमें सिखाता है कि विभिन्नता केवल सतह पर है; गहराई में हम सब एक ही अस्तित्व के अमृत हैं। जब व्यक्ति अपनी क्षुद्र अहंकारी सीमाओं को समर्पित करके संपूर्ण समष्टि के हित में कार्य करना सीखता है, तो उसके भीतर का संकीर्ण तनाव समाप्त हो जाता है। यह समर्पण अपनी प्रतिभा को खोना नहीं है, बल्कि अपनी छोटी बूंद को असीम महासागर में मिलाकर अमर हो जाना है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **एकीभाव का अनुभव (Ego Dissolution)**: जब भी किसी समूह या टीम में काम करें, तो 'मेरा विचार' या 'मेरी उपलब्धि' का हठ छोड़कर सामूहिक लक्ष्य और समरसता को प्राथमिकता दें; बूंद के बजाय मधु बनने का आनंद लें। - **विविधता में समरसता (Harmonious Synthesis)**: विभिन्न पृष्ठभूमियों, विचारों और संस्कृतियों के लोगों से मिलते समय उनकी बाह्य भिन्नताओं के पीछे छिपी एक ही मानवीय चेतना को पहचानें और उसका सम्मान करें। - **सामूहिक चेतना का पोषण (Serving the Collective Whole)**: अपने दैनिक जीवन में कोई ऐसा निःस्वार्थ कार्य करें जिससे समाज या प्रकृति का पोषण हो, बिना किसी व्यक्तिगत श्रेय या प्रशंसा की अपेक्षा किए।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप अपनी अलग पहचान और अहंकार की रक्षा करने में अपनी जीवन-ऊर्जा व्यर्थ कर रहे हैं, या समस्त जीवन के साथ उस एकीभाव का आनंद लेने के लिए तैयार हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

आधुनिक न्यूरोसाइंस में जब व्यक्ति गहन ध्यान (Deep Meditative Absorption) या ट्रांसेंडेंटल अवस्था का अनुभव करता है, तो मस्तिष्क के 'डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क' (Default Mode Network - DMN) की सक्रियता अत्यधिक मंद हो जाती है। डीएमएन ही वह तंत्रिका परिपथ है जो 'अहंकार', 'मेरी कहानी' और 'दूसरों से अलगाव' की भावना को बनाए रखता है। जब यह नेटवर्क शांत होता है, तो व्यक्ति चेतना की अखंड एकता (Unitive Consciousness) का अनुभव करता है, जहाँ अलग-अलग पहचान विलीन होकर एक विराट बोध बन जाती है—ठीक वैसे ही जैसे मधु में अलग-अलग पुष्पों का रस।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
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Last updated
2026-10-24
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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next